जातिगत जनगणना पर क्या सोचते हैं बुद्धिजीवी – 3

गांव के लोग की टीम

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जाति जनगणना को लेकर हम लगातार देश के बुद्धिजीवियों से संवाद चला रहे हैं। इस प्रक्रिया में हमने सभी को चार प्रश्न भेजे जिनके जवाब उन्होंने मेल और व्हाट्सप के जरिये हम तक प्रेषित किया। इस मुद्दे पर प्रायः जो बात सामने आई है उसने इस मुद्दे के आधार पर वैचारिक ध्रुवीकरण कर दिया है । दलित-पिछड़े बुद्धिजीवी अमूमन इस बात पर एकमत हैं कि जाति जनगणना आज देश की ऐतिहासिक जरूरत है। वहीं सवर्ण बुद्धिजीवियों के मुट्ठीभर लोगों को छोड़कर अमूमन लोग या तो बरगलाने और गाली-गलौज की भाषा में बात कर रहे हैं अथवा सिरे से इसको नकार रहे हैं। वे इसे जातिवादी राजनीति कहकर बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन यह स्पष्ट हो चुका है कि जाति जनगणना आज का एक बड़ा सवाल है। जो बुद्धिजीवी जाति के कारण मानवीय अधिकारों से वंचित समाजों के संघर्ष से सरोकार रखते हैं वे इस मुद्दे पर डटकर बोल रहे हैं।प्रस्तुत है इस मुद्दे पर कुछ महत्वपूर्ण बुद्धिजीवियों के विचार :

जाति जनगणना देश के भविष्य के लिए शुभ है

डॉ. जयप्रकाश कर्दम, प्रसिद्ध कथाकार-आलोचक , दिल्ली

मेरा स्पष्ट मत है कि जाति जनगणना होनी चाहिए। भारत एक जाति-समाज है। समाज में व्यक्ति की पहचान जाति के साथ जुड़ी हुई है। बहुत सारी चीज़ें जाति के आधार पर तय होती हैं तब जाति जनगणना क्यों नहीं होनी चाहिए?

इससे पैदा होनेवाली दरार की तो बात छोड़िए भारतीय समाज तो जाति के आधार पर पहले से ही विभाजित है। यह विडंबना है कि विभाजित समाज दरार पैदा होने की आशंका व्यक्त करता है। यह उन लोगों द्वारा फैलाया जानेवाला भ्रम है जो जाति के आधार पर सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक सब तरह से वर्चस्वशाली हैं। उनको डर है कि जाति जनगणना हुई तो वे बहुत अल्पसंख्या में सिद्ध हो जाएँगे। जाति जनगणना को वे अपने वर्चस्व के लिए एक चुनौती या ख़तरे के रूप में देखते हैं।

अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग का शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण जाति के आधार पर है। समाज में ब्राह्मण की श्रेष्ठता और सर्वोच्चता तथा देश के विशाल मंदिर उद्योग पर ब्राह्मण पुजारियों का एकाधिकार जाति के आधार पर है। जाति जनगणना से यह पता चलेगा कि देश के शासन से लेकर संपदा तक में दलित-पिछड़े और आदिवासियों की अनुपातिक हिस्सेदारी कितनी है। दलितों, आदिवासियों और पिछड़ी जातियों की संख्या उनको दिए जा रहे आरक्षण की तुलना में निश्चित रूप से अधिक है। सही जातियों का सही आँकड़ा उपलब्ध हो जाने पर दलित, पिछड़े और आदिवासी आरक्षित क्षेत्रों में अपनी जनसंख्या के अनुपात में अपनी हिस्सेदारी की माँग कर सकते हैं, जो आवश्यक है। सरकारी नौकरी ही नहीं, प्रत्येक क्षेत्र में जाति के अनुपात में प्रतिनिधित्व के लिए लड़ाई लड़ी जाने आवश्यक है। यह कार्य जाति जनगणना होने से ही संभव होगा। सभी जातियों को उनके अनुपात में सभी क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व मिल जाए तो आक्रोश असंतोष समाप्त हो जाएगा और सामाजिक आंदोलन दलित, पिछड़ी और आदिवासी जातियाँ अधिकारों के लिए चलाए जाने वाले आंदोलनों को भी एक सार्थकता मिलेगी।

जाति जनगणना राजनीति को भी प्रभावित करेगी। दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों की अधिक जनसंख्या होने पर संसद और विधानसभाओं में भी उनका प्रतिनिधित्व बढ़ेगा, इससे सत्ता के समीकरण बदल जाएँगे। या तो समाज से जातियां ख़त्म हों, नहीं तो जातियों के आधार पर प्रतिनिधित्व हो, तभी लोकतंत्र सफल हो सकता है। जाति जनगणना देश के भविष्य के लिए शुभ है।

जाति जनगणना को लंबित रखने से नीति-निर्माण पर नकारात्मक असर पड़ता है

डॉ बजरंग बिहारी तिवारी, सुप्रसिद्ध आलोचक और प्राध्यापक, दिल्ली

सभी जाति-समुदायों की वास्तविक संख्या जानने के उद्देश्य से जाति जनगणना का आग्रह है। यह कार्य लंबे समय से लंबित रखा जा रहा है और इससे सरकार के नीति-निर्माण पर नकारात्मक असर पड़ता (रहा) है।  जाति जनगणना लोक कल्याणकारी शासनतंत्र को खोखलेपन से बचाने या कि उसे सार्थक बनाने के लिए आवश्यक है।

समाज में दरार पहले से है। इस दरार को पाटे जाने की जरूरत है। जाति जनगणना से सामाजिक संरचना में दरार पड़ने का भय वे लोग दिखा रहे हैं जो यथास्थिति को बनाए रखना चाहते हैं। ऊपर कही गई बातों को दुहराते हुए कहना चाहता हूँ कि इन कारणों से जाति जनगणना आवश्यक है-) एक पदानुक्रम आधारित समाज की यथार्थ स्थिति जानने के लिए। ) नीति निर्माण को सही दिशा देने, मीनिंगफुल बनाने के लिए। ) देश को समतामूलक बनाने के लिए। ) ज़रूरतमंदों की वास्तविक पहचान के लिए। ) लोकतंत्र को मजबूती देने के लिए। जाति जनगणना से देश की सेहत पर अंततः सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

शुरू में बेशक हो-हल्ला मचे और मीडिया में इसके दुष्प्रभाव उछाले जाएं। तब शायद यह संभव हो कि ईडब्ल्यूएस सहित आरक्षण का लाभ लेने वाले समुदायों के लोग देश की परिसंपत्तियों की बिक्री और विनाश पर चिंतित हों और अपने हितों की परवाह करते हुए उसे बचाने का यत्न आरंभ करें।

जाति जनगणना से यह पता चलेगा कि देश के शासन से लेकर संपदा तक में दलित-पिछड़े और आदिवासियों की अनुपातिक हिस्सेदारी कितनी है। दलितों, आदिवासियों और पिछड़ी जातियों की संख्या उनको दिए जा रहे आरक्षण की तुलना में निश्चित रूप से अधिक है। सही जातियों का सही आँकड़ा उपलब्ध हो जाने पर दलित, पिछड़े और आदिवासी आरक्षित क्षेत्रों में अपनी जनसंख्या के अनुपात में अपनी हिस्सेदारी की माँग कर सकते हैं, जो आवश्यक है। सरकारी नौकरी ही नहीं, प्रत्येक क्षेत्र में जाति के अनुपात में प्रतिनिधित्व के लिए लड़ाई लड़ी जाने आवश्यक है। यह कार्य जाति जनगणना होने से ही संभव होगा।

सवर्णों को अपनी संख्या का पता चलेगा इसीलिये वे डरते हैं

विद्या भूषण रावत, चिंतक और सामाजिक कार्यकर्ता, दिल्ली और देवरिया

सामाजिक दरार पैदा करने के लिए जातीय जनगणना की आवश्यकता नहीं है। वह तो पहले से ही है। यह झूठ फैलाया जा रहा है। दरअसल, इससे सबसे ज्यादा घबराहट उन जातियों में है जो सत्ता में क्रीम खा रही हैं। आखिर जनगणना में धर्म क्यों लाया गया? क्योंकि इसने एक फर्जी मेजोरिटी का निर्माण किया जिसके  लोग ‘बहुमत’ के शासन के नाम पर आज लट्ठ मार रहे हैं। दरअसल जब पॉपुलर डिस्कोर्स जाति आधारित होगा तो शर्मा, दुबे, गोयल, सक्सेना आदि को अपनी संख्या का पता चलेगा और इसीलिये वे डरते है। आप देखेंगे कि धर्म के आधार पर पूरी बहस को भारत में कौन लीड कर रहे है। सभी ब्राह्मणवादी ताकतें और 2014 के बाद तो ये बड़ी-बड़ी मूंछों और लाल टिका लगाकर किसी को भी गरिया देने में माहिर हो चुकी हैं। ये सभी ताकतें जानती हैं कि जब इन्हें जाति के आधार पर अपनी संख्या पता चल जाएगा तो दबंगई भी किनारे हो जायेगी।

जाति दक्षिण एशिया की हकीकत है और हर धर्म की जाति के आधार पर जनगणना हो न कि केवल हिन्दुओं की। मुस्लिम, सिख और इसाई लोगों में भी पिछड़े और दलित समाज हैं और उनकी जनगणना होनी चाहिए। ये देश में सभी धर्मों या अधर्मों के उत्पीड़ित समाजों को एक करने में मदद करेगा और फिर उसके आधार पर सरकार अपने कार्यक्रम बना सकती है ताकि सबका विकास हो सके। समुदायों की व्यापक जानकारी के बिना कोई भी योजना सफल नहीं हो पाएगी। यह अत्यंत आवश्यक है कि हमें यह पता चले कि किन समुदायों में घर कितने लोगों के पास है और कितने पूरी तरह से घरविहीन हैं? कितने लोगों के पास खेती की जमीन है, कितने लोगों के पास सरकारी नौकरी है? इससे पता चल जाएगा कि मलाईदार तबका कौन है? इससे एक लाभ हो सकता है कि डाटा आने से फिर सबको एक ही खांचे में रखना मुश्किल होगा!

जातिगत जनगणना से किसी प्रकार की सामाजिक दरार नही पैदा होगी बल्कि समाज में जातीय आधार पर जो गैर बराबरी और टकराव मौजूद है उसे इन आंकड़ों के आधार पर नीतियां बनाकर कम किया जा सकेगा और समाज को और समावेशी तथा समतापरक बनाया जा सकेगा।

 

 सामाजिक न्याय के लिए अत्यंत जरूरी काम है

डॉ सुरेन्द्र प्रसाद सुमन, दरभंगा (बिहार)

जाति जनगणना निश्चित रूप से होनी चाहिए, जिससे वास्तविक स्थिति का पता चल सके। समाज में इससे कोई दरार बिल्कुल नहीं आएगी, बल्कि इसके ठीक उलट पिछड़े एवं वंचितों को संख्या बल के कारण उनके सम्मान और हिस्सेदारी की दावेदारी मजबूत होगी। सामाजिक न्याय एवं समता स्थापित करने के लिए यह आज का एक ऐतिहासिक निर्णय होगा जिसे सरकार को लेना होगा। इससे देश की उन्नति का मार्ग प्रशस्त होगा और नये समाज के निर्माण में सफलता मिलेगी।

जातिगत जनगणना से सामाजिक दूरी बनने की कोई संभावना नहीं है

कौशल कुमार मधुकर, युवा कवि-आलोचक, बिहार

यह जनगणना जाति आधारित शोषण, अशिक्षा, रोजगार, सामाजिक विकास आदि की सही पड़ताल करने के साथ विकासात्मक कार्यों के मूल्यांकन और उसके बेहतर क्रियान्वयन को आसान बनाएगा। जातिगत जनगणना से सामाजिक दूरी बनने की कोई संभावना नहीं है बल्कि यह समावेशी विकास को मूर्तमान कर सदियों से बनी दरार को भरने में मददगार साबित होगी।

जातिगत जनगणना आंकड़ों के लिहाज से तो महत्त्वपूर्ण है ही, आने वाले समय में यह जातिमुक्त समाज बनाने में भी सहायक हो सकती है। देश बेहतर विकल्प के साथ और स्पष्ट राजनीतिक समझ के साथ आगे बढ़ेगा। संवैधानिक उद्देश्यों की पूर्ति में यह मील का पत्थर साबित होगी।

प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए जाति जनगणना बेहद जरूरी है

तेजभान , अध्यापक , मऊ

हमारे देश में जाति एक सच्चाई है। यहां जब हर चीज की गणना हो सकती है तो जाति की गणना भी होनी चाहिए। सामाजिक दरार जाति से पैदा होती है, जाति जनगणना से नहीं। यह सबसे बड़ा कुतर्क है कि जाति जनगणना होने से सामाजिक दरार पैदा हो जाएगी। देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संसाधनों पर सभी जातियों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए जाति जनगणना बेहद जरूरी है। इससे देश के संसाधनों पर जाति विशेष के वर्चस्व को समाप्त कर देश को और भी बेहतर बनाने में हमें मदद मिलेगी। हमें देश की वास्तविक स्थिति का भी पता चल सकेगा। जाति जनगणना से देश की वास्तविक स्थिति का आकलन करने में हमें मदद मिलेगी। यह देश की तरक्की के लिए बेहद जरूरी है।

 

कथित उच्च जातियों की भी गणना आवश्यक है

आशु अद्वैत , प्राध्यापक , मुरादाबाद

जिस प्रकार जनगणना देश के नागरिकों के सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक आदि विभिन्न स्थितियों के आकलन और आगामी योजना-निर्माण के लिए सरकार हर दस वर्ष पर जनगणना कराती है। मगर चूंकि नागरिक कोई समरूप इकाई नहीं है इसलिए उसके भीतर स्तरीकरण के कारण उन पृथक समूहों की गणना भी बहुत आवश्यक है। जाति उन्हीं कारकों में से एक है। जहाँ जातीय आधार पर भेदभाव का लंबा सिलसिला रहा है। चूंकि कई जातियों के सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक स्थितियों के आधार पर उनका समूह (पिछड़ा वर्ग)बनाकर कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं, किंतु सही आंकड़े और संख्या के न होने से एक तरफ अंदाजे से धन आवंटित होते है तो दूसरी ओर यह अनुमान लगाने में भी कठिनाई होती है कि अब तक चलाई गई योजनाओं और नीतियों से कौन सा तबका सर्वाधिक लाभान्वित रहा है और कौन इससे कम या बिल्कुल अछूते रह गए। इसलिए हर जाति की सही स्थिति का पता लगाने के लिए जातिगत जनगणना बेहद आवश्यक है। चूंकि एससी-एसटी की गणना आजादी के बाद से ही होती रही है इसलिए जातिगत जनगणना में केवल पिछड़ी जातियों की गणना का ही सवाल नहीं है बल्कि कथित उच्च जातियों की भी गणना आवश्यक है, क्योंकि इससे उनकी स्थिति का भी सही आकलन हो सकेगा तो यह भी साफ हो सकेगा कि उन जातियों में भी कौन-सा तबका अपने अनुपात से अधिक संसाधनों का उपभोग कर रहा है? साथ ही ऐसे  पूर्वाग्रहों और धारणाओं पर भी विराम लग सकेगा जहां बिना किसी आंकड़े और आधार के सियासी पार्टियां खास तरह की जातियों पर हकमारी का तोहमत लगाती हैं। इनआंकड़ों के संग्रहण से सरकार को न केवल योजनाओं और नीतियों को बनाने में सरलता होगी बल्कि इसके जरिए सही हिस्सेदारी भी सुनिश्चित की जा सकेगी।

जातिगत जनगणना से किसी प्रकार की सामाजिक दरार नही पैदा होगी बल्कि समाज में जातीय आधार पर जो गैर बराबरी और टकराव मौजूद है उसे इन आंकड़ों  के आधार पर नीतियां बनाकर कम किया जा सकेगा और समाज को और समावेशी तथा समतापरक बनाया जा सकेगा।

कोई भी सरकार जब किसी के लिए योजना बनाती है तो उसके पहले सर्वप्रथम उससे सम्बंधित डाटा एकत्र करती है और उसकी वास्तविक स्थिति का अध्ययन करने के पश्चात योजना, कार्यक्रम या नीतियां तय करती है, जिससे कि वस्तुनिष्ठ व ठोस तरीके से वे क्रियान्वित की जा सकें। चूंकि पिछड़ी जातियों से सम्बंधित सरकारें कई कल्याणकारी योजनाएं और कार्यक्रम संचालित करती हैं, लेकिन उसके पास इसके आंकड़े नहीं होने से वे अंदाजे से धन आवंटित कर देती हैं और यह भी नहीं जान पातीं कि इससे उस समूह के भीतर कौन से लोग लाभ पा रहे हैं और और कौन नहीं? इसलिए हरेक जाति की वास्तविक स्थिति का पता लगाने और उनकी भागीदारी तय करने के लिए जाति जनगणना अत्यंत आवश्यक है।  इस जनगणना के बाद जब सभी जातियों की सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक आदि स्थितियों का सही डाटा आ जाएगा तो सरकारें प्रभावी ढंग से नीतियाँ बना सकेंगी और पात्र लाभार्थी को उसे उसका लाभ दिला सकेंगी, जिससे लोगों की हकमारी पर रोक लगाया जा सकेगा और अपात्रों को इससे अलग करके संसाधनों का सही वितरण सुनिश्चित किया जा सकेगा। यह स्थिति लोगों के साथ देश के विकास और उन्नति में सहायक साबित होगी।

जाति जनगणना बहुजन एकता बनाने की चाबी है 

प्रेम प्रकाश सिंह यादव एडवोकेट , वाराणसी

जाति जनगणना बहुजन एकता बनाने और बहुजनों को उनकी संख्या के हिसाब से भागीदारी सुनिश्चित कराने की चाबी है । जाति जनगणना से  इस बात का भी आकलन होगा कि देश की सामंती ताकतों ने  बहुजन समाज के हिस्से की कितनी लूट व डकैती किया है। जाति जनगणना से  मनुवादियों की  अन्य पिछड़े वर्ग के हिंदुओं व मुसलमानों को आपस में लड़ाने की साजिश भी बेनकाब होगी। ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने  आजादी के बाद से आज तक जाति जनगणना सिर्फ इसलिए नहीं होने दिया कि इससे बहुजनों की संख्या के हिसाब से उनको हिस्सेदारी देनी पड़ेगी। 2011 में जातिगत की जनगणना होने  के बाद भी  साजिश के तहत उसे सार्वजनिक नहीं किया।  इसके लिए सत्ता के साथ-साथ विपक्ष भी उतना ही जिम्मेदार है।

वंचित अपना प्रतिनिधित्व ले लेंगे

डॉ. अनूप श्रमिक , सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता, वाराणसी  

जातिगत जनगणना से एक साथ कई मसले हल होंगे डरी हुई है कि यदि जाति को जनगणना हो गई तो यह दलित-पिछड़े-आदिवासी और अल्पसंख्यक समाजों के लोग अपने संगठन की ताकत के बल पर  अपने हिस्से के जल जंगल जमीन व प्रतिनिधित्व छीन लेंगे इसलिए सदियों से सत्ता का आनंद ले रहे लोग जातिगत जनगणना कराने से डरे हुए हैं।

सामान्य वर्ग, अन्य पिछड़ा वर्ग, एवं अनुसूचित जाति/जनजाति के अंदर की उप जातियों की भी जनगणना होनी चाहिए और फिर उसी के अनुपात में सबको प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया जाना चाहिए। साथ ही में इसमें जनसंख्या नियंत्रण कानून भी लागू किया जाना चाहिए ताकि कोई भी जाति समूह ज्यादा लाभ पाने के लालच में अपनी जनसंख्या बढ़ाने का प्रयास न कर सके।

अभी तक वंचित रहे समाजों को लाभ होगा

प्रेमनन्दन, सुपरिचित कवि और प्राध्यापक, फ़तेहपुर

भारतीय समाज जातियों के समुच्चय से बना हुआ एक ऐसा  समाज है जिसमें हर जाति अपने से नीचे वाली जाति से बेहद नफरत करती है और नीच समझती है। जाति का यह  भयंकर जाल कमजोर होने के बजाय दिन-प्रतिदिन और अधिक मजबूत होता जा रहा है। डॉ. अंबेडकर ने जातिमुक्त समाज की परिकल्पना की थी लेकिन हुआ ठीक उल्टा। जातिवाद समाज की सच्चाई है तो सरकार को जाति आधारित जनगणना कराने में किसी तरह की आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

जातीय चेतना के उभार ने समाज में विभिन्न जातियों के बीच वैमनस्यता को बढ़ाने का काम किया है जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए था। जाति और जाति के अन्दर की विभिन्न उप जातियों की भी गणना होनी चाहिए ताकि समाज के सभी लोगों को आरक्षण का लाभ मिल सके। अभी तक आरक्षण का लाभ कुछ ही लोगों को मिल पा रहा है। जाति और उपजातियों की जनगणना से समाज के उन लोगों को भी लाभ मिल सकेगा जो अभी तक इससे वंचित रहे हैं।

सामान्य वर्ग, अन्य पिछड़ा वर्ग, एवं अनुसूचित जाति/जनजाति के अंदर की उप जातियों की भी जनगणना होनी चाहिए और फिर उसी के अनुपात में सबको प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया जाना चाहिए। साथ ही में इसमें जनसंख्या नियंत्रण कानून भी लागू किया जाना चाहिए ताकि कोई भी जाति समूह ज्यादा लाभ पाने के लालच में अपनी जनसंख्या बढ़ाने का प्रयास न कर सके।

 

क्रमश:

 

 

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