आंदोलन नहीं, क्रांति कर रहे हैं भारतीय किसान डायरी (6 सितंबर,2021)

नवल किशोर कुमार

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जाति व्यवस्था भारतीय समाज की कड़वी सच्चाई है और इसे कायम रखने में व्यापारी वर्ग के लोगों के साथ ही उच्च जातियों की बड़ी भूमिका है। ऐसा करने के पीछे उनका एकमात्र मकसद अपने वर्चस्व को बनाए रखना है ताकि न्यूनतम श्रम के बदले अधिकतम सुविधाओं का उपयोग व संसाधनों पर एकाधिकार बना रहे। हालांकि उन्हें चुनौती मिलती रही है। अंग्रेजों के जाने बाद यह चुनौती तीव्रतर हुई है। लेकिन इसके साथ ही शोषक जातियों ने इसका काट भी खोज लिया है। एक उदाहरण है मध्य प्रदेश सरकार का एक फैसला।

दरअसल, मध्य प्रदेश के शिक्षा मंत्री विश्वास सारंग ने एक घोषणा की है। उनके मुताबिक अब राज्य के मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस के पहले साल छात्र-छात्राओं को सामाजिक और नैतिक मूल्य सिखाए जाएंगे। इसके तहत उन्हें आरएसएस के संस्थापक केबी हेडगेवार, भारतीय जनसंघ के नेता दीनदयाल उपाध्याय, विवेकानंद और डॉ. आंबेडकर के बारे में पढ़ाया जाएगा। इसके साथ ही छात्रों को भारतीय आयुर्वेद के जनक ऋषि चरक, शल्य चिकित्सक के जनक व भारत के महान चिकित्साशास्त्री ऋषि सुश्रुत के बारे में भी जानकारी दी जाएगी।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि आरएसएस और जनसंघ (अब भाजपा) की नीतियां कैसी रही हैं। एमबीबीएस के छात्रों को इनके बारे में पढ़ाने का मतलब साफ है कि मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार अब ऐसे डाक्टर चाहती है जो हिंदू-मुस्लिम में भेद करे। विज्ञान के बजाय अंधविश्वास को प्राथमिकता दे। अभी दो साल पहले की ही बात है। दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में एक कथित डाक्टर हिंदू धर्म ग्रंथों के श्लोकों का उच्चारण कर रोगियों का इलाज करने का दावा कर रहा था। आश्चर्य नहीं कि उसे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का संरक्षण हासिल था। मेरे पास इसकी जानकारी नहीं है कि अब वह डाक्टर देश के किस अस्पताल में किस मरीज के सामने हवनकुंड में आहुतियां दे रहा है और मंत्रोच्चारण कर रहा है। लेकिन मुझे विश्वास है कि उस पर किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं हुई होगी। यदि हुई होती तो मेरे पास खबर जरूर आती.

आरएसएस के इरादे खतरनाक हैं और वह बेहद आक्रामक है तो उसका विरोध भी कुछ कम नहीं है। कल उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जो कि हाल के वर्षों में सांप्रदायिक दंगों के लिए कुख्यात था, वहां किसानों की महापंचायत हुई। भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने लाखों किसानों की मौजदूगी में “अल्लाहू-अकबर, हर-हर महादेव” का नारा न केवल लगाया बल्कि लोगों से लगवाया भी। वाकई यह एक शानदार नजारा था।


दरअसल, मध्य प्रदेश सरकार के उपरोक्त निर्णय को समझने की आवश्यकता है। वह डॉ. आंबेडकर का उपयोग अपनी ढाल के रूप में कर रहा है। अभी कल ही दिल्ली से प्रकाशित दैनिक राष्ट्रीय सहारा के दूसरे पृष्ठ पर एक खबर प्रकाशित की गयी। खबर के मुताबिक एक सरकारी विद्यालय में शिक्षक दिवस के मौके पर सावित्रीबाई फुले पुरस्कार का वितरण किया गया। इस आयोजन के आयोजकों के नाम में लगे सरनेम पर विचार करें तो उनमें कोई भी दलित और गैर-बनिया ओबीसी नहीं है। यानी जिनलोगों ने सावित्रीबाई फुले के नाम पर छात्र-छात्राओं को पुरस्कृत किया है, वे आरएसएस और भाजपा के समर्थक हैं। सवाल है कि ऐसा क्यों किया गया? यही सवाल मध्य प्रदेश की हुकूमत के उपरोक्त निर्णय के संबंध में भी है।

मेरे हिसाब से आरएसएस और भाजपा को जो चुनौतियां मिल रही हैं, उसे वे अवसरों में बदल रहे हैं। वे यह समझ रहे हैं कि जबतक दलित-बहुजनों के प्रतीक नायक-नायिकाओं का उपयोग वे अपनी ढाल के रूप में नहीं करेंगे, दलित-बहुजनों की आज की युवा पीढ़ी उनके खतरनाक इरादों को कामयाब नहीं होने देगी। इसलिए वे हेडगेवार, दीनदयाल उपाध्याय और विवेकानंद साथ डॉ. आंबेडकर को भी पढ़ाए जाने की बात कर रहे हैं। मकसद तो केवल अपना वर्चस्व बनाए रखना है तथा भारतीय समाज के खलनायकों को डॉ. आंबेडकर जैसे महानायकों के साथ एक श्रेणी में रखकर लोगों को बेवकूफ बनाना है।

वैसे अपने खलनायकों को भारत के विश्वविद्यालयों में स्थापित करने की आरएसएस की उपरोक्त योजना नई योजना नहीं है। इससे पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के द्वारा रातों-रात सावरकर की प्रतिमा के साथ सुभाषचंद्र बोस और भगत सिंह की प्रतिमा स्थापित कर दी गयी थी। यह संभवत: 21 अगस्त, 2019 को किया गया। हालांकि भारी विरोध को देखते हुए तीनों प्रतिमाओं को विश्वविद्यालय प्रबंधन ने हटवा दिया।

बागवानों की मजबूरी हो गई है कि वह अडानी को उसी के मूल्य पर सेब बेचे। इस सेब पर अड़ानी ‘फार्म-पिक’ का चवन्नीछाप स्टिकर चिपका कर अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में 200-250 रुपए किलो बेच रहा है। ढली जैसी सेब की मंडियाँ कहने को तो ख़त्म नहीं हुई हैं, मगर अब उनमें उल्लू बोलते हैं। धीरे धीरे ढह जाएँगी।

खैर, आरएसएस के इरादे खतरनाक हैं और वह बेहद आक्रामक है तो उसका विरोध भी कुछ कम नहीं है। कल उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जो कि हाल के वर्षों में सांप्रदायिक दंगों के लिए कुख्यात था, वहां किसानों की महापंचायत हुई। भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने लाखों किसानों की मौजदूगी में “अल्लाहू-अकबर, हर-हर महादेव” का नारा न केवल लगाया बल्कि लोगों से लगवाया भी। वाकई यह एक शानदार नजारा था। कल के इस सफल आयोजन के बाद किसानों ने हरियाणा के करनाल में कल यानी 7 सितंबर को महापंचायत का आयोजन किया है।

मैं सोशल मीडिया पर मुजफ्फरनगर में राकेश टिकैत को भाषण देते देख रहा था। जब उन्होंने “अल्लाहू-अकबर, हर-हर महादेव” का नारा लगाया तो वे मुझे किसान नेता से जननेता के रूप में परिवर्तित होते दिखे। यह सकारात्मक परिवर्तन है। चूंकि उत्तर प्रदेश में चुनाव होने हैं तो उसपर किसानों के आंदोलन का असर पड़ेगा ही। मेरा अनुमान है कि मुजफ्फरनगर में लगाए गए “अल्लाहू-अकबर, हर-हर महादेव” नारे की गूंज बढ़ती जाएगी और इसके परिणाम सकारात्मक होंगे।

खैर, किसानों का आंदोलन क्यों जरूरी है, इस संबंध में एक बहुत जरूरी पोस्ट हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ साहित्यकार राजकुमार राकेश ने तीन दिन पहले अपने फेसबुक पर शेयर किया है। उसे हू-ब-हू रख रहा हूं-

“किसान आंदोलन क्यों कर रहे हैं, इसे जानने के लिए भूल जाइए शिमला शहर और वहाँ जाने वाली सड़क से होने वाले पर्यावरण के नुक़सान की रोमेंटिसिज्म से लवरेज तमाम थियोरीज़ को, बल्कि इस मसले को समझने के लिए शिमला के भीतरी ग्रामीण हिस्सों और उससे ऊपर आउटर कुल्लू व किन्नौर में में जाइए। ठंडी हवाओं के बीच ज्ञानचक्षु खुलेंगे।

रुरल शिमला, किन्नौर और रामपुर कि साथ वाले कुल्लू के हिस्से में सेब के बाग़ान है। पहले सारा सेब दिल्ली की आज़ादपुर मंडी में ले ज़ाया जाता था। उसका एकाधिकार तोड़ने के लिए स्थानीय स्तर पर मंडियाँ खुलीं। बाग़वानों से छोटे व्यापारी सेब ख़रीदकर देश भर में वितरण करने लगे। इन व्यापारियों ने स्थानीय सेब मंडियों में अपने छोटे छोटे गोदाम स्थापित कर रखे थे। अचानक अडानी की नज़र इस कारोबार पर पड़ी और पूरा परिदृश्य ही बदल गया। उसकी नई कम्पनी ‘अडानी एग्रीकल्चर फ़्रेश लिमिटेड’ ने रुरल शिमला में, सैंज,रोहडू और बिथल में, अपनी पूँजी के बल पर अपने हाई-टेक गोदाम स्थापित किए, जो मौजूदा छोटे व्यापारियों के गोदाम से हज़ारों गुना बड़े और आधुनिकतम सुविधाओं से लेस हैं। सेब को लम्बे समय तक स्वस्थ और फ़्रेश रखते हैं।

अडानी ने सेब ख़रीदना शुरू किया, छोटे व्यापारी जो सेब किसानों से 20 रुपए किलो के भाव से ख़रीदते थे, अडानी ने वो सेब 25 रुपये किलो ख़रीदा। अगले साल अडानी ने रेट बढ़ाकर 28/30 रुपए किलो कर दिया। धीरे धीरे छोटे व्यापारी वहाँ ख़त्म हो गए, अडानी से कम्पीट करना किसी के वश में नहीं था। जब वहाँ अडानी का एकाधिकार हो गया तो तीसरे साल अड़ानी ने सेब का भाव कम कर दिया।

अब छोटा व्यापारी वहाँ बचा नहीं था, बागवानों की मजबूरी हो गई है कि वह अडानी को उसी के मूल्य पर सेब बेचे। इस सेब पर अड़ानी ‘फार्म-पिक’ का चवन्नीछाप स्टिकर चिपका कर अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में 200-250 रुपए किलो बेच रहा है। ढली जैसी सेब की मंडियाँ कहने को तो ख़त्म नहीं हुई हैं, मगर अब उनमें उल्लू बोलते हैं। धीरे धीरे ढह जाएँगी।

तीनों कृषि बिल अगर लागू हो गए तो गेहूँ , चावल और दूसरे कृषि उत्पाद का भी यही हश्र होगा। पहले दाम बढ़ाकर वे छोटे व्यापारियों को ख़त्म करेंगे और फिर मनमर्ज़ी रेट पर किसान की उपज ख़रीदेंगे। जब सारी उपज केवल अडानी जैसे लोगों के पास होगी तो मार्केट में इनका एकाधिकार और वर्चस्व होगा और वे अपने रेट पर बेचेंगे। अब सेब की महंगाई तो आप बर्दाश्त कर सकते हो क्यूँकि उसको खाए बग़ैर आपकी ज़िंदगी चल सकती है, लेकिन गेहूं और चावल के बिना कैसे गुज़ारा होगा।

अभी भी वक्त है, जाग जाइए, किसान केवल अपनी नहीं आपकी और देश के 100 करोड़ से अधिक मध्यमवर्गीय परिवारों की लड़ाई लड़ रहा है।

बाक़ी फ़ैसला आपके हाथ में है।”

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।


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