जातिगत जनगणना पर क्या सोचते हैं बुद्धिजीवी – 2

गाँव के लोग टीम

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भभुआ में रहनेवाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर संजय कुमार जाति जनगणना के सवाल पर बेझिझक अपनी बात रखते हुये कहते हैं –‘जातिगत जनगणना होनी चाहिए। इससे लोगों को यह बात समझ आएगी कि लोक कल्याणकारी राज्य के लिए आवश्यक भागीदारी सभी जातियों की कितनी होनी चाहिए।  दरार बहुत है, इससे ज़्यादा क्या होगी। बल्कि इसको दूर करने में मदद मिलेगी। एक बेहतर समाज की समझ बढ़ेगी जिसमे साझीदारी की ज़रूरत की तरफ सबका ध्यान जाएगा। अभी सब घालमेल है।’

भारत में 1860 से ही जनगणना की जा रही है और 1931 तक जातिगत जनगणना की जाती रही है । लेकिन भारत की आजादी के बाद जब जनगणना शुरू हुई तो केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन-जाति की जातियों की ही अलग से जनगणना की जाती रही है। उसमें ओबीसी जातियों की जनगणना नहीं होती रही है। लिहाजा देश का ओबीसी वर्ग अपनी जनगणना को लेकर सरकार के सामने अपना एक मजबूत पक्ष रख दिया है कि ओबीसी जातियों की भी गणना कर उनकी वास्तविक संख्या देश के सामने लाई जाए।

ऐसे ही साहेबगंज झारखंड के नवीन यादव नास्तिक मूलनिवासी का कहना है कि ‘जिस दिन भारत मे जातिगत जनगणना हो गयी उसके 10 वर्षों के अंदर भारत मे जाति व्यवस्था खत्म हो जाएगी और साथ ही ब्राह्मणवादी और सैयदवादी वर्चस्व भी खत्म हो जाएगा और भारत के 90% मूलनिवासी (एससी, एसटी, ओबीसी, माइनारिटी) का शासन-सत्ता पर अधिकार हो जाएगा और भारत 2035 से 40 तक दुनिया के 5 सबसे विकसित, खुशहाल और न्यायपूर्ण देश बन जायेगा।’  प्रस्तुत है जाति जनगणना पर विभिन्न बुद्धिजीवियों के विचार :

भारत में जाति आधारित जनगणना की प्रासंगिकता

आरसी यादव, डोभी, जौनपुर

पिछले कुछ दिनों से जाति जनगणना को लेकर राजनीतिक गलियारों में काफी गहमागहमी चल रही है जिसकी वकालत गाहे-बगाहे लगभग हर राजनीतिक पार्टी के नेता और कार्यकर्ता करते नजर आ रहे हैं। सामरिक दृष्टिकोण से बात करें तो जाति जनगणना की मांग जायज और देश के मौजूदा हालात को देखते हुए आवश्यक भी है। जाति जनगणना देश में निवास करने वाली विभिन्न जातियों और उनकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक वास्तविक स्थिति की जानकारी से देश के निवासियों को अवगत कराने के लिए आवश्यक है । भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में निवास करने वाली विभिन्न जातियों की शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने और उनके अधिकारों के लिए भी जातीय जनगणना जरूरी है। इसके अलावा जाति जनगणना कराने का सबसे प्रबल पक्ष भारत की सत्ता, न्यायपालिका, कार्यपालिका और प्रशासनिक सेवाओं में विभिन्न जातियों की भागीदारी सुनिश्चित करना है। मौजूदा समय में यह नितांत आवश्यक हो गया है कि भारत में निवास करने वाली विभिन्न जातियों की संख्या के आधार पर उनकी भागीदारी देश विभिन्न  सुनिश्चित की जाए।

ऐसा नहीं है कि भारत में इससे पहले जातीय जनगणना न हुई हो । भारत में जातीय जनगणना सबसे पहले ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड मेयो के नेतृत्व में 1872 में कराई गई थी । उसके बाद यह हर 10 वर्ष के बाद कराई जाने लगी । भारत की पहली संपूर्ण जनगणना 1881 में हुई। भारत की आजादी के बाद 1949 के बाद से जनगणना भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन भारत के महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त द्वारा कराई जाती है। भारत जातीय जनगणना आखिरी बार 1931 में कराई गई थी जिसके अनुसार भारत में 52 फीसदी ओबीसी आबादी थी। आज से 10 वर्ष पूर्व  2011 में भी जनगणना के लिए जाति की जानकारी ली गई लेकिन प्रकाशित नहीं की गई ।

जाति आधारित जनगणना के लिए जनगणना आयोग को ‘मंडल आयोग’ के रूप में जाना जाता है । इसके अध्यक्ष बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल ने दिसंबर 1980 में एक रिपोर्ट पेश की थी, जिसके अनुसार ओबीसी की जनसंख्या ( हिंदुओं और गैर हिंदुओं) भारत की कुल आबादी का लगभग 52% है। भारत में निवास करने वाली विभिन्न जातियों की बात करें तो अनुसूचित जाति (एससी) की जनसंख्या 16 करोड़ 66 लाख 35 हजार 700 है, जो कुल आबादी का 16.2 प्रतिशत है।  जबकि अनुसूचित जाति की आबादी 8 करोड़ 43 लाख 26 हजार 240 है और यह देश की कुल जनसंख्या का 8.2 फीसदी है ।

भारत में 1860 से ही जनगणना की जा रही है और 1931 तक जातिगत जनगणना की जाती रही है । लेकिन भारत की आजादी के बाद जब जनगणना शुरू हुई तो केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन-जाति की जातियों की ही अलग से जनगणना की जाती रही है। उसमें ओबीसी जातियों की जनगणना नहीं होती रही है। लिहाजा देश का ओबीसी वर्ग अपनी जनगणना को लेकर सरकार के सामने अपना एक मजबूत पक्ष रख दिया है कि ओबीसी जातियों की भी गणना कर उनकी वास्तविक संख्या देश के सामने लाई जाए।

सामाजिक वर्ण व्यवस्था न सिर्फ समाज के लिए घातक है बल्कि किसी भी देश की क्षमता को साकार करने तथा विज्ञान, प्रौद्योगिकी, ज्ञान, कला, खेल एवं आर्थिक समृद्धि के विषय में एक महान राष्ट्र में स्थापित करने के मार्ग को अवरुद्ध कर देता है। विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि भारत में 90% तुच्छ नौकरियाँ वंचित जातियों द्वारा की जाती हैं जबकि सफेदपोश नौकरियों के मामले में यह आँकड़ा उल्टा हो जाता है।

यह एक विचारणीय प्रश्न है कि‌ सामाजिक, आर्थिक और राजनीति में प्रमुखता से मौजूद होने के बावजूद भी देश की आधी से अधिक आबादी के लिये जाति संबंधी कोई विश्वसनीय और व्यापक जाति आँकड़ा मौजूद ही नहीं है। जबकि संविधान में भी जाति आधारित जनगणना आयोजित कराने का प्रावधान है। अनुच्छेद 340 केे अनुसार आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की दशाओं की वास्तविक जानकारी के लिए और सरकारों द्वारा इस दिशा में किए जा सकने वाले उपायों की सिफारिश करने के लिए एक आयोग की नियुक्ति का प्रावधान  है। इस वर्ष 2021 की जनगणना होने वाली है। उसके लिए जो प्रारुप तैयार किया गया है उसमें 32 श्रेणी बनाई गई है। इसमें हिंदू, मुसलमान, एससी व एसटी आदि श्रेणी तो है लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग नहीं है। ऐसी स्थिति में ओबीसी के लिए भी जनगणना होना जरूरी है ।

तर्क दिया जा रहा है कि जातीय जनगणना से सामाजिक असंतुलन और दरार उत्पन्न हो सकती है, परंतु ऐसा कदापि नहीं होगा । हमारा जो समाज सदियों से वर्ण व्यवस्था की जंजीरों में जकड़ा हुआ है उसकी गणना करने से क्या सामाजिक टकराव होगा ? बल्कि जातीय जनगणना से वर्षों से आर्थिक रूप से कमजोर और सामाजिक अधिकारों से वंचित जातियों की सामाजिक स्थिति में सुधार की प्रबल संभावना बढ़ सकती है। आजादी के 75 वर्ष बाद भी देश में बहुत सी ऐसे गुमनाम लोग हैं जिनकी आर्थिक स्थिति बद से बद्तर है । जीवन यापन करने के लिए आवश्यक वस्तुओं के अभाव में इनका जीवन दूभर हो गया है । जैसे-जैसे जीवन के दिन काटने वालों लोगों के लिए जातीय जनगणना संजीवनी साबित हो सकती है ।

किसी भी देश का भविष्य वहां के जन-समुदाय पर निर्भर करता है । यदि देश के सभी लोगों को उनका अधिकार देकर उन्हें अपने-अपने क्षेत्र में नेतृत्व करने का जिम्मा सौंप दिया जाए तो देश का समुचित विकास अत्यंत प्रभावशाली होगा । यह तभी संभव है जब जातीय जनगणना कर *जिसकी जितनी हिस्सेदारी उतनी उसकी  भागीदारी* के आधार पर देश की सत्ता, संगठन, प्रशासन , न्यायलय और कार्यपालिका में  उनकी भूमिका निर्धारित की जाए । जातीय जनगणना का देश‌ के भविष्य पर कोई भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा । देश में जातियों का मकड़जाल तो फैला ही हुआ , इन्हें मकड़जाल की सफाई कर उन गुमनाम जातियों को बाहर लाना है जो समाज की मुख्यधारा से वंचित हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है और जिन्हें विशेष मदद की जरूरत है । यह मदद सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक भी हो सकती है । सही मार्गदर्शन के अभाव में योग्यताएं भी विलुप्त हो जाती हैं । देश की कुछ विशेष जातियों के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। संपूर्ण योग्यता के बाद भी कुछ विशेष वर्ग के अभ्यर्थी वहां नहीं पहुंच पाते जहां उन्हें होना चाहिए । कारण यह कि उच्च प्रतिष्ठित स्थानों पर कुछ विशेष लोगों का अधिपत्य स्थापित है भले ही वे योग्य न हों । देश की इन्हीं विसंगतियों को दूर करने के लिए जातीय जनगणना अत्यंत आवश्यक है ।

जाति जनगणना से उपेक्षित एवं अति पिछड़े समूहों के आंकड़े प्राप्त होंगे

विद्या सिंह, सेवानिवृत्त प्राध्यापिका, देहरादून

जाति जनगणना तभी उपयोगी होगी जब भिन्न-भिन्न जातियों की संख्या के साथ ही उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति की भी जानकारी प्राप्त की जाए। जातीय जनगणना से अति उपेक्षित एवं अति पिछड़े समूहों का संख्या बल एवं अन्य आंकड़े भी  प्राप्त होंगे, जिससे सरकार को उनके बारे में नीतियां बनाने में सहजता होगी। सरकारी योजनाओं और विशेषकर सामाजिक उत्थान संबंधी योजनाओं का सही क्रियान्वयन तभी हो सकता है, जब नीति नियंताओं के पास जातियों की संख्या संबंधी स्पष्ट आंकड़े हों।

मेरी दृष्टि में इसकी संभावना नहीं है। हमारे देश में जाति आधारित राजनीति का पर्याप्त पुराना इतिहास है। जाति व्यवस्था भारतीय समाज की अपनी विशेषता है, जिसे पूरा संसार जानता है। यह अवश्य है कि आज जो जातियां पुराने संख्या बल पर लाभ ले रही हैं, हो सकता है कि उनकी वर्तमान संख्या मालूम होने पर, उस लाभ से उन्हें वंचित होना पड़े। मेरा आशय है जो अल्पसंख्यक हैं कहीं वे बहुसंख्यक न हो गए हों।

सरकार ने जाति आधारित आरक्षण प्रदान किया है लोकतांत्रिक चुनाव भी जाति आधारित होते हैं। अभी स्वतंत्रता पूर्व के जो आंकड़े सरकार के पास हैं वह उन्हीं का सहारा लेती है।  यदि एक ताज़ा सर्वेक्षण हो जाता है तो उसके अनुसार उसमें बदलाव लाया जा सकता है। जातियों की सही- सही स्थिति के बारे में जानकारी मिलेगी।

भविष्य के लिए सर्वोत्तम स्थिति तो यह होती कि जाति प्रथा समाप्त हो जाती किंतु ऐसा होगा नहीं। भविष्य पर जाति जनगणना से कोई बहुत अधिक असर पड़ेगा, ऐसा मैं नहीं सोचती। भारतवर्ष में तीन हजार के करीब जातियां हैं । सबको उनकी संख्या के आधार पर सुविधाएं उपलब्ध हों इसके बनिस्बत उनकी आर्थिक स्थिति के आधार पर, उन्हें संसाधनों का लाभ मिलना चाहिए।

इससे  समाज और देश दोनों का भविष्य उज्जवल होगा 

डॉ. चन्दन कुमार, अध्यापक, इलाहाबाद

बाबू जगदेव प्रसाद, जो कि बिहार के लेनिन के नाम से प्रसिद्ध है, की एक हकदारी वाली बात की 100 में 90 शोषित है। 90 भाग हमारा है। जबकि वास्तविक स्थिति कुछ और है।  आज हम देखते हैं कि महत्वपूर्ण संस्थानों , प्रशासनिक कार्यों और न्यायिक व्यवस्था में letral entry के जरिये विशेष वर्ग का काबिज होना एक पक्षपातपूर्ण सामाजिक वर्चस्व को बढ़ाएगा। संसाधन का यह मनमाना वितरण एक अव्यस्क लोकतंत्र को स्थापित करेगा। इसके लिए आरक्षण के माध्यम से सामाजिक भागीदारी की कल्पना की गई थी किंतु आज आरक्षण एक अभद्र शब्द बन गया है। वह इसके अलावा विशेष लाभ नहीं प्रदान कर पा रहा है। आरक्षण के माध्यम से केवल जीविका अथवा संस्थानों और प्रशासनिक पदों में हिस्सेदारी ही न होकर राजनीतिक और सबसे बड़ी आर्थिक हिस्सेदारी होनी थी। मगर सवाल यह है कि कब तक?

अतः मेरे दृष्टिकोण में जातिगत जनगणना आवश्यक है ताकि सबको अवसर की समानता, न्याय ,आर्थिक स्वतंत्रता मिले और सभी एक मजबूत लोकतंत्र के निर्माण में भागीदार हो सकें।  यह सब तब होगा जब प्रत्येक व्यक्ति और उसकी क्षमता के अनुसार सभी को लाभ हो।

सामाजिक दरार का प्रश्न तो उपरोक्त विवरण से ही दृष्टिगत है  क्योंकि संविधान की अपेक्षा के अनुसार कार्य न होना पहले से ही एक बड़ी खाई पैदा कर रहा है।  ऐसे में जातिगत जनगणना सामाजिक स्वतंत्रता के लिए एक क्रांति साबित होगी।

संविधान निर्माण के दौरान देश के पास संसाधन सीमित थे अतः सबके कल्याण के लिए राज्य को बाध्य न कर राज्य के कर्तव्य को परिभाषित किया गया जिसमें राज्य सबको समान न्याय प्रदान कर सके। और सबके वैज्ञानिक सोच और शिक्षा से देश उन्नति कर सकें किंतु आज वोट बैंक के लिए जाति को साधा जा रहा है। ऐसे में राज्य का यह दायित्व है कि सर्वप्रथम जातिगत जनगणना कराई जाए। इससे  समाज का भविष्य और देश का भविष्य दोनों उज्जवल है।

व्यक्ति को कार्य और दक्षता के अनुसार अवसर की समानता प्राप्त होगा और राष्ट्र को अप्रतिम श्रेष्ठ मस्तिष्क प्राप्त होगा जो राष्ट्र को एक प्रगतिशील वयस्क लोकतंत्र निर्माण में सहायक होगा।

समानता आएगी,कार्य दक्षता बढ़ेगी

श्रीनाथ सिंह कुशवाहा, लखनऊ

भारत की पहली जनगणना अंग्रेजों ने 1872 में करायी और 1881 से लगातार कराते रहे.1931 में जातिवार जनगणना की गती उसके बाद काले अंग्रेजों ने अपने स्वार्थवश जातिवार जनगणना कभी नहीं करायी। जातिगत जनगणना अनिवार्य होनी चाहिए।

जातिगत जनगणना से समाज में दरार पैदा नहीं होगी। सामाजिक दरार सवर्णों द्वारा समाज में झूठा प्रचार किया जा रहा है ताकि सभी के हिस्से के संसाधनों पर उनका प्रभुत्व बना रहे। देश के 90% संसाधनों पर केवल सवर्णों– ब्रह्मण, बनिया, क्षत्रिय का कब्जा है और ये सब उसका मजा ले रहे हैं।

जाति जनगणना की आवश्यकता इसलिए है कि देश के शासन प्रशासन, पुलिस,न्याय व्यवस्था में देश के सभी जातियों उपजातियों वर्गों की समानुपातिक भागीदारी है या नहीं,इसका वैज्ञानिक आधार सुनिश्चित होगा. समानुपातिक भागीदारी यदि नहीं है तो देश की भलाई के लिए यह भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

बाबा साहेब आंबेडकर जी ने गोलमेज सम्मेलन 1931 में कहा था कि यदि शासन प्रशासन में एक जाति का प्रभुत्व स्थापित होने से लोकतंत्र खतरे में आ जाएगा और भारत के लिए जो भी कानून बने,इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए। लेकिन आजादी के बाद उनकी बात सच साबित हुई है।

जातिगत जनगणना का देश के भविष्य पर सकारात्मक असर पड़ेगा। देश के संसाधनों, शासन प्रशासन में देश के सभी जातियों उपजातियों वर्गों की जनसंख्या के अनुपात में भागीदारी सुनिश्चित होगी, समानता आएगी,कार्य दक्षता बढ़ेगी, सरकार में लोग दिल से जुड़ेंगे और इस तरह वास्तविक क्रांतिकारी बदलाव आएगा,सही मायने में लोकतंत्र स्थापित होगा जो अभी तक जोकतंत्र है। कुछ मुट्ठी भर जातियों के साथ में देश की बागडोर है, इससे देश का कबाड़ निकल रहा है। हम आजादी पूर्व कमजोरी, अराजकता,अन्याय से तभी मुक्ति पा पाएंगे जब देश के सभी लोगों को समानुपातिक भागीदारी सुनिश्चित होगी और यह डाटा सिर्फ जातीय जनगणना से ही मिल पाएगा।

धार्मिक जनगणना से दरार नहीं पैदा हुई तो जाति से क्यों होगी

श्याम बहादुर यादव, अध्यापक, जौनपुर

सभी जातियो की निष्पक्ष जनगणना होनी चाहिए । बिल्कुल नही हमारे यहाँ पहले से धार्मिक जनगणना और एससी  व एसटी की जनगणना होती है इससे तो कोई दरार पैदा नही हुई जबकि धर्म एक संवेदनशील मसला है । क्योंकि हमने एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना की है। अतः राज्य का परम लक्ष्य है हमारे यहा रहने वाले सभी जातिय समूहो का कल्याण और यह तभी सम्भव है जब सभी जातियो की वास्तविक संख्या राज्य को पता हो । सभी जातिय समूहो के प्रतिनिधित्व का भी मसला हल हो जायेगा। सभी जातिय समूहो को उनका हक मिलने से उनके भीतर राष्ट्र के प्रति निष्ठा व राष्ट्रीय भावना का विकास होगा।

समुचित प्रतिनिधित्व का मार्ग प्रशस्त होगा

चितरंजन गोप लुकाठी, अध्यापक, धनबाद

मैं जाति जनगणना का समर्थक हूं। खुले तौर पर इसके पक्ष में हूं। जाति जनगणना से सामाजिक दरार पैदा होने की कोई गुंजाइश नहीं है। जाति की मलाई चाभनेवाले लोगों द्वारा इस तरह की काल्पनिक व मनगढ़ंत आशंका जताई जा रही है। क्या अभी समाज में समरसता छाई हुई है? दरार नहीं है?

होना चाहिए। हरेक जाति की संख्या एवं समाज में उनकी भागीदारी का आंकड़ा स्पष्ट रूप से सरकार के पास रहना चाहिए ताकि सभी जातियों की सामाजिक स्थिति का पता चल सके और उसके आधार पर सबको समुचित प्रतिनिधित्व प्रदान करने की योजना एवं रूपरेखा बनाई जा सके।

जाति जनगणना से सभी जातियों को समुचित प्रतिनिधित्व प्रदान करने का मार्ग प्रशस्त होगा। समुचित हक मिलने पर वंचित समाज को भी भारतीय होने के गौरव की अनुभूति होगी। वे भी उत्साह के साथ बढ़-चढ़कर देश के विकास में अपना सहयोग देंगे और तभी देश का सर्वांगीण विकास संभव होगा।

क्रमशः

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