ब्राह्मणों के जैसे कब जागेंगे दलित, पिछड़े और आदिवासी? डायरी (30 सितंबर, 2021)

नवल किशोर कुमार

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शब्द बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। मैंने हमेशा यही माना है। हर शब्द की अपनी मर्यादा भी होती है। उपयोग करने के दौरान आवश्यक अनुशासन का पालन करने की यथासंभव कोशिशें करता हूं। कई बार विफल भी होता हूं। परंतु निराश नहीं होता। ऐसे शब्दों को सहेजता जाता हूं, जिनका उपयोग करने के दौरान मुझसे कोई त्रुटि हुई हो। शब्दों से ऐसा लगाव पहले नहीं था जब मैं कॉलेज का छात्र था। बचपन में तो शब्दों के ऊपर ध्यान भी नहीं जाता था। तब कई वजहें रहीं। सबसे महत्वपूर्ण तो यही कि घर में कोई था ही नहीं जो शब्दों के उपयोग पर ध्यान रखे। मम्मी और पापा को तो बस इतना ही मतलब होता था कि उनका बेटा पढ़ता है या नहीं पढ़ता है। उन दिनों बिजली की समस्या अधिक रहती थी। हालांकि समस्या तो अब भी है, परंतु घर में इन्वर्टर की व्यवस्था कर मैंने अपने बच्चों को बिजली की समस्या से मुक्त रखा है।

उन दिनों होता यह था कि लालटेन रहता था मेरी टेबुल पर। वह टेबुल भी नहीं था। वह पापा का संदूक था, जिसका उपयोग मैं पढ़ने के लिए करता था। पापा बताते हैं कि वह संदूक उन्हें नाना जवाहर राय ने दिया था। नीम की लकड़ी का वह संदूक आज भी मेरे घर में है। नीम की लकड़ी का होने की वजह से संभवत: उसमें घुन नहीं लगा है।

तो उन दिनों मां रोज लालटेन का शीशा साफ कर देती और इसका ध्यान अवश्य रखती कि उसमें किरासन तेल पर्याप्त रहे ताकि देर रात तक पढ़ सकूं। मैं करता भी यही था। शाम सात बजे से पढ़ने बैठ जाता। लालटेन जलाकर रखता था ताकि बिजली जाय तो मेरी पढ़ाई पर असर ना पड़े। भैया कहता कि यह किरासन तेल की बर्बादी है। जब बिजली जाय तभी जलाना चाहिए। मैं कहता कि पढ़ाई बीच में छोड़कर माचिस खोजने कौन जाय।

मां को कहा कि तुम बेकार ही पूजा करती हो। यह भी कोई पूजा करने की विधि है कि बस एक थाली में लड्डू-पेड़ा, तुलसी का पत्ता रख लिया और बिना मंत्र पढ़े हुमाद जलाकर कुएं का पानी पिंडी पर ढार (चढ़ा) दिया। पूजा तो ब्राह्मण करते हैं। आज ही देखकर आया हूं। वह कितने जतन से पूजा करते हैं। मंत्र पढ़ते हैं और शंख भी बजाते हैं। ऐसे में भगवान किसकी सुनेगा?

हम दोनों भाइयों में भिन्नताएं रहीं। भैया के लिए पढ़ाई महत्वपूर्ण नहीं थी। हालांकि बोर्ड की परीक्षा में वह मुझसे अधिक अंक लाया था। वह प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुआ था और मैं द्वितीय श्रेणी से। लेकिन इससे न तो मुझे कोई फर्क पड़ता था और ना ही मेरे जन्मदाताओं को। मैं इंजीनियरिंग करना चाहता था तो प्रतियोगिता परीक्षा पास करने के उद्देश्य से पढ़ता था। कोचिंग आदि की व्यवस्था तब भी थी, लेकिन घर में इतने पैसे कहां थे। खुद ही पढ़ना होता था। बहुत जिद करने पर पापा से कुछ पैसे मिले तब जाकर गेस पेपर आदि खरीद सका था।

खैर, उन दिनों एक बात हमेशा खास लगती थी। यह मेरे घर की संस्कृति से जुड़ी हुई बात है। मां पूजा-पाठ खूब करती थी। मुझे दिलचस्पी तो नहीं रहती थी लेकिन लोभ जरूर रहता था कि चढ़ावे का एक हिस्सा मुझे भी मिलेगा। कई बार तो सबसे छोटा होने की वजह से अधिक ही मिल जाता था। इन सबके बीच मैं मां को देखता रहता था जब वह पूजा करती। मैं सोचता था कि मेरे वे मित्र जो कि ब्राह्मण जाति के हैं, उनके घर में भी क्या ऐसे ही पूजा-पाठ किया जाता है?

मां ने कहा कि भगवान बहरा होता है और वह अंधा भी होता है। उसे कुछ भी सुनाई नहीं देता। इसलिए कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कोई मंत्र पढ़कर पूजा करता है या फिर बिना मंत्र पढ़े।

एक बार मैं अपने एक मित्र विनय तिवारी के घर गया था। वह अनिसाबाद इलाके के भीखाचक मुहल्ले में रहता था। उसके पिता सचिवालय में क्लर्क थे। खूब पूजा-पाठ करते थे। उसके घर में सभी ऐसे ही थे। पूजा करने के दौरान वे संस्कृत के मंत्रों का उच्चारण करते थे और शंख भी बजाते थे।

विनय के यहां से लौटकर आने के बाद मैंने मां को कहा कि तुम बेकार ही पूजा करती हो। यह भी कोई पूजा करने की विधि है कि बस एक थाली में लड्डू-पेड़ा, तुलसी का पत्ता रख लिया और बिना मंत्र पढ़े हुमाद जलाकर  कुएं का पानी पिंडी पर ढार (चढ़ा) दिया। पूजा तो ब्राह्मण करते हैं। आज ही देखकर आया हूं। वह कितने जतन से पूजा करते हैं। मंत्र पढ़ते हैं और शंख भी बजाते हैं। ऐसे में भगवान किसकी सुनेगा? वह तो ब्राह्मणों की बात ही सुनेगा न?

मेरी बात सुनकर मां खूब जोरों से हंसी। मां ने कहा कि भगवान बहरा होता है और वह अंधा भी होता है। उसे कुछ भी सुनाई नहीं देता। इसलिए कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कोई मंत्र पढ़कर पूजा करता है या फिर बिना मंत्र पढ़े। तो मिठाई किसके लिए? भगवान तो खाता भी नहीं है? मां ने कहा कि यह तो भगवान का कर्ज है, जो उतारना ही है। बाकी आधी से अधिक मिठाई तो तुम ही खा जाते हो।

इस देश के 85 फीसदी दलित, पिछड़े और आदिवासी, जो जातिगत जनगणना के लिए एक साथ खड़े भी नहीं हो पा रहे। ओबीसी के लोग इतने भटके हुए हैं कि यूपीएससी व राज्यों के लोक सेवा आयोगों द्वारा ली जा रही परीक्षाओं में कट ऑफ मार्क्स सामान्य श्रेणी से अधिक रखे जाने के बाद भी चुप हैं। नॉट फाउंड सुटेबुल के जरिए उनके अधिकारों को खारिज किया जा रहा है और उनके नाम पर राजनीति करने वाले इन दिनों परशुराम की पूजा करते फिर रहे हैं।

मां की बात तब अजीब सी लगी थी। अनपढ़ पूजा-पाठ कैसे कर सकते हैं? बस हाथ जोड़ लेने से पूजा हो जाता है क्या? यदि हां तो ब्राह्मण इतना मंत्र क्यों पढ़ते हैं? क्या मेरी मां जो करती है, वह दिखावा है या फिर जो ब्राह्मण करते हैं, वह दिखावा है या फिर सब दिखावा है? ऐसे सवाल जेहन में आते और मिठाई अंदर जाने के बाद शांत हो जाते।

आज बरसों बाद इस बात की याद बेवजह नहीं आई है। दरअसल, कल सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमण की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने एक मामले की सुनवाई की। मामला श्रीवरि दादा नामक एक ब्राह्मण का था। उसकी जनहित याचिका मद्रास हाईकोर्ट पहले ही खारिज कर चुकी है। वहां खारिज किए जाने के बाद श्रीवरि दादा ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी कि तिरुपति बालाजी मंदिर में पूजा कराने की जो विधियां हैं, उनमें दोष है। सुप्रीम कोर्ट में उसकी याचिका जनहित याचिका के रूप में स्वीकृत हुई थी। इसमें कहा गया है कि देवस्थानम जो कि तिरुपति मंदिर में पूजा-अनुष्ठान आदि की सेवाएं देता है, उसकी विधियों में खामियां हैं।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने तथाकथित जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए साफ कहा है कि वह इस मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है।

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लेकिन मैं तो यह सोच रहा हूं कि ब्राह्मण कितने जगे हुए हैं। वे अपने अधिकारों के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने से भी नहीं हिचकते। श्रीवरि दादा के मामले में ही कल न्यायाधीश एनवी रमण ने टािप्पणी की है। उन्होंने कहा है – आप बालाजी के भक्त हैं। आपको धैर्य रखना चाहिए। लेकिन आप तो रजिस्ट्रार को धमका रहे थे कि यदि आपका मामला सुनवाई के लिए शामिल नहीं किया गया तो आप उसकी ऐसी-तैसी कर देंगे। देवस्थानम के काम में हम कैसे हस्तक्षेप कर सकते हैं?

एक तरफ श्रीवरि दादा जैसे ब्राह्मण हैं और दूसरी तरफ इस देश के 85 फीसदी दलित, पिछड़े और आदिवासी, जो जातिगत जनगणना के लिए एक साथ खड़े भी नहीं हो पा रहे। ओबीसी के लोग इतने भटके हुए हैं कि यूपीएससी व राज्यों के लोक सेवा आयोगों द्वारा ली जा रही परीक्षाओं में कट ऑफ मार्क्स सामान्य श्रेणी से अधिक रखे जाने के बाद भी चुप हैं। नॉट फाउंड सुटेबुल के जरिए उनके अधिकारों को खारिज किया जा रहा है और उनके नाम पर राजनीति करने वाले इन दिनों परशुराम की पूजा करते फिर रहे हैं।

खैर, कल देर शाम एक कविता जेहन में आई।

रोज नियत समय पर आता है

शाम आठ बजकर पैंतालीस मिनट

फिर चाहे गर्मी हो

बरसता हो

ठंड हो या फिर बसंत

कोई ईश्वर नहीं करता हस्तक्षेप

और रोज नियत समय पर आता है

शाम आठ बजकर पैंतालीस मिनट।

घड़ी की सुइयां सब जानती हैं 

और समझती तो यह भी हैं कि

अभी-अभी जो आदमी

निकला है फैक्ट्री के अहाते से

उसके पेट को रोटियों की दरकार है

और यह भी कि

उसके पहले उसे खरीदने होंगे

घर के लिए साग-सब्जी, नोन-मसाला

आटा-दाल-चावल के अतिरिक्त

और यदि नहीं खरीद सका तो

उसे गुजारनी होगी पूरी रात

और देखने होंगे सपने कि

कल दिन के उजाले के साथ

मिलेगा गर्मागर्म भात और तरकारी

लेकिन सुइयां कुछ नहीं कर सकतीं

वह केवल समय बता सकती हैं कि

रोज नियत समय पर आता है

शाम आठ बजकर पैंतालीस मिनट।

सुइयों की चाल से बेखबर नहीं है हुक्मरान

और वह तो वाकिफ है कि

देश में आज कितनी महिलाओं के साथ हुआ बलात्कार

कितने लोग घरों को नहीं लौट सके

और कितने लोगों के घरों में

आज नहीं जलेगा चूल्हा

लेकिन सुइयों पर हुक्म नहीं चलाया जा सकता 

फिर चाहे हुक्मरान

अपनी नाक रगड़ ले

या घड़ी को तोप से उड़वा दे

वह जानता है

घड़ी की सुइयांआजाद हैं

और वह अखबारों में बयान भी नहीं दे सकता कि

विद्रोही घड़ी की वजह से

रोज नियत समय पर आता है

शाम आठ बजकर पैंतालीस मिनट।

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस मे संपादक हैं ।

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