युद्धवीर की‌ अगली यात्रा किधर

स्वदेश कुमार सिन्हा

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केन्द्र की मोदी सरकार ने अपने इस दूसरे कार्यकाल में कुछ ऐसे चौंकाने वाले फैसले लिए, जो सर्वत्र आश्चर्य तथा जनाक्रोश के कारण बने। चाहे वह कश्मीर में धारा 370 एवं 36-A जैसे कानूनों को गैरकानूनी रूप से हटाना हो या अयोध्या के राम-मंदिर शिलान्यास में प्रधानमंत्री का सरकारी खर्चे पर भाग लेना हो, ऐसे अनेक असंवैधानिक कामों को करने के बावजूद सारे देश में उनकी और भाजपा की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। भाजपा राज्य दर राज्य चुनाव को जीत रही है, उपचुनाव में भी लगातार सफलता मिल रही है। आज हालात ये हैं कि कुछ-एक राज्यों को छोड़कर उसका भगवा ध्वज सारे देश में लहरा रहा है, परन्तु इसी वर्ष जून-2022 में सेना भर्ती की प्रक्रिया में बदलाव की एक बड़ी कोशिश को, जिसे युद्धवीर नाम दिया गया, जिसने जनाक्रोश रूपी दूध में उबाल ला दिया। आज इसके विरोध में जो आक्रोश युवाओं में दिख रहा है, वह कहाँ तक जाएगा? यह तो आने वाला समय ही बताएगा, परन्तु सच्चाई यह भी है कि यह मोदी सरकार में पहली बार हुआ है कि इस फैसले से भाजपा संसदीय दल तथा उनके विधायकों में भी भारी असंतोष देखने को मिल रहा है, लेकिन शायद भयवश कोई भी मुँह खोलने को तैयार नहीं है। हरियाणा, पंजाब, बिहार और उत्तराखंड जैसे राज्यों में थल सेना में बड़े पैमाने पर विगत वर्षों में भर्तियाँ होती रही हैं। गोरखपुर भी इन भर्तियों का एक बड़ा केन्द्र है। जब मैं इस शहर में रहता था, तब एक पत्रकार के रूप में मैंने इस भर्ती को कवर भी किया था। सारा शहर एक मेले जैसा लगता था। बगल के नगरों और नेपाल से सेना में भर्ती के इच्छुक लाखों नौजवान शहर में पहुँच जाते थे। बसों और ट्रेनों में इतनी भीड़ होती थी कि लोग उनकी छतों पर भी सफर करते थे। होटल, धर्मशाला, मुसाफिरखाना और लॉज पूरी तरह भर जाते थे तथा लोग मजबूरीवश सड़कों पर रात बिताते थे। होटल, रेस्टोरेंट और ढाबों पर खाना खत्म हो जाने पर लोग ठेलों पर बिकते फलों तथा अन्य खाद्य पदार्थों की लूटमार तक करने लगते थे। अनेक बार कानून व्यवस्था की भारी समस्या पैदा हो जाती थी। यह सब उस समय की बढ़ती बेरोजगारी को दर्शाता था, आज तो ये स्थितियाँ और भी खराब हो गई हैं।

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सेना हमेशा से पक्की नौकरियों का बड़ा स्रोत रही है तथा आज भी है। भारत में सिक्ख, जाट, गोरखा कुमायु़ंनी तथा गढ़वाली लड़ाकू जातियाँ मानी जाती हैं, इसी के आधार पर अंग्रेजों ने सेना में रेजिमेंटों का गठन किया था। इन राज्यों में भारी बेरोजगारी तथा पिछड़ेपन के कारण लोग बड़े पैमाने पर सेना में जाते हैं। भूमंडलीकरण की नीतियों के कारण भारत सहित सारे विश्व में स्थायी सरकारी नौकरियाँ करीब-करीब समाप्त हो गई हैं। स्वास्थ्य-शिक्षा सहित सभी नौकरियांँ बाज़ार और निजी पूँजीपतियों को सौंप दी गई हैं। इन नीतियों ने पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कृषिबहुल राज्यों में भारी तबाही मचाई है। हरित क्रांति आने के बाद इन राज्यों में भारी समृद्धि आई, लेकिन आज स्थिति यह है कि हरित क्रांति अपने सर्वोच्च शिखर पर पहुँचकर अब उतार पर है। भारी मात्रा में जल का दोहन करने के कारण जलस्तर नीचे चला गया है, जो कृषि के कामों में भारी तबाही ला रहा है। अब कृषि को आगे बढ़ने के लिए भारी पूँजीनिवेश की ज़रुरत है, जिसके लिए ये राज्य बिलकुल तैयार नहीं हैं, इस कारण से दोनों राज्यों में; विशेष रूप से पंजाब में भारी बेरोजगारी फैल रही है, इसका फायदा नशीली दवाओं तथा अवैध शराब के व्यापारी उठा रहे हैं। पहले बेरोजगार नौजवानों को इन चीजों की लत लगाई जाती है, फिर वे कम समय में भारी मुनाफा होने के कारण इन धंधों में खुद लिप्त हो जाते हैं। अगर सेना की नौकरियों में भारी कटौती हो जाए, तो यहाँ के बदतर हालात और भी खराब हो जाएँगे। सीमावर्ती राज्य होने के कारण इन कदमों से राष्ट्रीय सुरक्षा को भी गम्भीर खतरे पैदा हो सकते हैं। बिहार इस जनाक्रोश का केंद्र बना हुआ है। अनेक बसें, ट्रेन एवं सरकारी सम्पत्तियों को जला दिया गया है। रेल की पटरियों पर धरने के कारण इन रूटों पर चलने वाली अधिकतर ट्रेनें रद्द कर दी गई हैं या घंटों देरी से चल रही हैं, जिससे यात्रियों को बहुत अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

अब आगे इस बात पर मैं विचार करता हूँ कि सेना में भर्ती की यह नई नीति युद्धवीर क्या है ? इस नई योजना में 17 वर्ष की उम्र में सेना में भर्ती किया जाएगा तथा 4 वर्ष बाद 22 वर्ष का होते ही रिटायर कर दिया जाएगा। रिटायरमेंट के समय 25 लाख की रकम एकमुश्त दी जाएगी। पेंशन- ग्रेजुएटी आदि सुविधाएँ नहीं मिलेंगी। बहुत कम मूल्य पर केंटीन से दिए‌ जाने वाले सामान अब नहीं मिलेंगे। रक्षा मंत्रालय का यह भी कहना है कि उसके विभाग की नौकरियों में ऐसे रिटायर्ड लोगों को 10 प्रतिशत आरक्षण भी मिलेगा। इस भर्ती योजना के पक्ष में दिए जा रहे तर्क वास्तव में बहुत हास्यास्पद और कमजोर हैं। सरकार कह रही है कि इन लोगों को 4 वर्ष की नौकरी के दौरान अनेक ऐसे काम सिखाए जायेंगे, जैसे- खाना बनाना, प्लम्बर, नाई, धोबी और सुरक्षा गार्ड जैसे कामों में प्रशिक्षित किया जाएगा, जिससे वे आगे चलकर नौकरियाँ पा सकें या अपना व्यवसाय खुद कर सकें। 4 वर्ष के दरमियान उनका वेतन 30 हजार‌ से शुरू होकर 45 हजार तक‌ पहुँचकर समाप्त हो जाएगा। पुरानी व्यवस्था में उसे पन्द्रह वर्ष तक पूरा वेतन मिलता था, रिटायरमेंट के बाद पूरी पेंशन मिलती थी और मृत्यु के पश्चात उसकी पत्नी को पूरी पेंशन मिलती थी। कल्पना कीजिए, नौकरी के दौरान किसी दुर्घटना में या बाह्य या आंतरिक शत्रुओं के साथ संघर्ष में अगर वह शहीद हो जाता था तो उसकी पत्नी को उम्रभर पेंशन मिलती थी तथा उसके आश्रित पत्नी और बच्चों को एक करोड़ तक की रकम मिल जाती थी तथा उनका अत्यधिक सम्मान भी होता था।

सरकारी आंकड़े ही यह बतलाते हैं कि इस दौर में बेरोजगारी की विगत 40 वर्षों में सबसे अधिक है। आज बेरोजगारी का भयानक लावा समाज में खौल रहा है तथा इन जैसे आंदोलनों के रूप में छोटे-छोटे विस्फोट लगातार हो रहे हैं।

अब केवल 4 वर्ष की नौकरी में एक सिपाही का करीब एक वर्ष तक तो ट्रेनिंग पीरियड होगा, करीब 6 महीने छुट्टियों में निकल जाएँगे। अब उसका सेना में कार्यकाल केवल ढाई वर्ष का ही होगा। अब कोई भी यह सोच सकता है कि उसे जिन अन्य कामों में प्रशिक्षित करने की बात की जा रही है, वह कब करेगा और उसके कार्यकाल के बीच में कोई युद्ध छिड़ जाए तब…..? उसे एकमुश्त मिले 25 लाख में एक दुकान तक खरीदना मुश्किल है, यदि उसे बहनों की शादी करनी हो या माता-पिता का इलाज करवाना हो, तब वह क्या करेगा?, क्योंकि उसे मिलने वाली चिकित्सा सुविधा रिटायरमेंट के तुरंत बाद बन्द हो जाएगी। सरकार कह रही है कि ‘रिटायरमेंट के बाद उसे सुरक्षा गार्ड, नाई, प्लम्बर और धोबी जैसे काम मिल जाएँगे।’ श्रम से जुड़ा कोई भी काम बुरा नहीं होता, लेकिन भारतीय समाज में इसे हेयदृष्टि से देखा जाता है। इसके खिलाफ संघर्ष की ज़रुरत है, परन्तु यह भी सही है कि सैनिक की नौकरी आज भी एक सम्मानित पेशा मानी जाती है, लेकिन अब उसे उपर्युक्त नौकरियों में से ही अपने लिए किसी एक की तलाश करनी पड़ेगी। यह एक उदाहरण मात्र है सम्भवतः इस तरह की अन्य नौकरियाँ भी हों।

इतनी बड़ी मात्रा में नौजवान सैनिकों के रिटायरमेंट के चलते श्रम बाजार में पहले से ही मौजूद बेरोजगारों की भयानक भीड़ और अधिक बढ़ जाएगी। उनके श्रम को अब कॉरपोरेट घराने तथा पूँजीपति बहुत सस्ते में खरीद सकेंगे। अभी हाल में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ‘अजीत डोभाल’ ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि तोड़फोड़ या अराजकता से कोई लाभ नहीं, अब हम इस फैसले को पलट नहीं सकते हैं। सेना की नौकरी कोई व्यवसाय नहीं है। लोग स्वेच्छा से यहाँ नौकरी के लिए आते हैं, हमने कभी किसी को बुलाया नहीं है। इसी तरह की आपत्तिजनक टिप्पणियाँ प्रधानमंत्री ने भी की हैं। कमीशन प्राप्त सेना के अधिकारियों की स्थिति इससे बिलकुल भिन्न है। रिटायरमेंट के बाद उन्हें आजीवन पेंशन तो मिलती ही है तथा नि:शुल्क यात्रा और चिकित्सा सुविधा उन्हें और उनके परिवार को आजीवन मिलती है।

अब हम यह विश्लेषण करते हैं कि आखिर इस दौर में एकाएक भर्ती की यह नीति लागू करने की‌ ज़रुरत क्यों आन पड़ी ? प्रथमत: तो मुझे यह लगता है कि सरकार की फासीवादी प्रवृत्तियों के कारण देश आज भारी आर्थिक संकट में फँस गया है तथा श्रीलंका जैसे बड़े आर्थिक-सामाजिक संकटों में फँसने की सम्भावना  सामने दिख रही है। भूमण्डलीकरण में निहित नई आर्थिक नीतियों के कारण भारी पैमाने पर बेरोजगारी फैल रही है। भयानक आर्थिक संकट से निज़ाद पाने के लिए सरकार इस नई नीति के बहाने सबसे ज्यादा रोजगार देने वाली सेना में भारी कटौती करने जा रही है। उसकी यह भी सोच है कि अब पाकिस्तान से किसी बड़े युद्ध की सम्भावना समाप्तप्राय है, सम्भव है कि अब सेना की अधिकतर डिवीजनें पाकिस्तान सीमा से हटाकर चीन सीमा में लगाई जाएँ। आज यह महसूस किया जा रहा है कि अब उसका असली मुकाबला चीन से ही है, क्योंकि आर्थिक और सामरिक दृष्टि से ये दोनों देश दक्षिण पूर्व एशिया में बड़ी तेजी से आर्थिक और सैन्य दृष्टि से एक बड़ी महाशक्ति के रूप में उभर रहे हैं। दूसरी सोच यह है कि अब पारम्परिक युद्धों का जमाना बीत गया है। टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से सीमाओं पर निगरानी रखी जा सकती है, परन्तु इन‌ सबकी भी एक सीमा है अभी भी जमीनी सैन्य कार्यवाहियों का कोई विकल्प नहीं है।

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हमें यह भी देखना होगा कि मोदी सरकार के दोनों कार्यकालों में छोटे-बड़े आंदोलन लगातार क्यों चल रहे हैं। भारी बेरोजगारी की चर्चा मैं पीछे कर ही चुका हूँ।

सरकारी आंकड़े ही यह बतलाते हैं कि इस दौर में बेरोजगारी की विगत 40 वर्षों में सबसे अधिक है। आज बेरोजगारी का भयानक लावा समाज में खौल रहा है तथा इन जैसे आंदोलनों के रूप में छोटे-छोटे विस्फोट लगातार हो रहे हैं। एक बड़ा विस्फोट जो इन सामाजिक-आर्थिक स्थितियों को पूरी तरह बदल दे, इसके लिए सभी प्रतिबद्ध छात्रों, नौजवानों बुद्धिजीवियों, दलित पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को एकजुट होना होगा, तभी परिवर्तन की कोई राह निकल सकती है।

स्वदेश कुमार सिन्हा स्वतंत्र लेखक हैं।

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