Monday, May 27, 2024
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Loksabha chunav : क्या हथियाराम मठ और संघ का गठजोड़ ग़ाज़ीपुर लोकसभा सीट पर भाजपा प्रत्याशी की नैया पार लगाएगा?

भाजपा से पारस नाथ राय को टिकट मिलने के बाद से ही जखनिया स्थित हथियाराम मठ चर्चा के केंद्र में है। गाजीपुर लोकसभा सीट पर भाजपा के प्रत्याशी उतारने में हथियाराम मठ की क्या भूमिका है?

लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान में चंद रोज ही बचे हैं। पहले चरण में उत्तर प्रदेश की कुल आठ सीटों पर मतदान होना है। इसी बीच भाजपा ने प्रत्याशियों की तीसरी सूची जारी करते हुए उत्तर प्रदेश में कुल सात प्रत्याशियों का ऐलान कर दिया है।

पूर्वांचल की बहुचर्चित गाजीपुर लोकसभा सीट पर भाजपा ने पारस नाथ राय को अपना प्रत्याशी बनाया है। दूसरी तरफ पहले से ही पूर्व बसपा सांसद अफजाल अंसारी बतौर इण्डिया गठबंधन प्रत्याशी मैदान में हैं। भाजपा पारस नाथ राय को टिकट देनेवाली है, इस बात की भनक अंत तक भाजपा के सिपहसालारों को भी नहीं लगी। आखिर इतनी चर्चित सीट पर भाजपा को इतनी शांति और गुपचुप तरीके से प्रत्याशी का ऐलान क्यों करना पड़ा?

सवाल यह है कि चुनावी राजनीति में कभी सीन में न रहने वाले पारस नाथ राय कौन हैं? राजनीतिक हलकों में एक सवाल बहुत पूछा जा रहा है कि गाजीपुर से भाजपा का पारस नाथ राय को प्रत्याशी बनाना किसी रणनीति का हिस्सा है या खालिस मजबूरी?

पारस नाथ राय जम्मू कश्मीर के राज्यपाल मनोज सिन्हा के करीबी माने जाते रहे हैं, लेकिन क्या मनोज सिन्हा के करीबी होने मात्र से पारस नाथ राय को भाजपा का टिकट मिल गया या इस टिकट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी कोई सीधी भूमिका है?

गाजीपुर लोकसभा के अंतर्गत आने वाली सातों विधानसभा सीटें पिछले विधानसभा में भाजपा हार चुकी है, कहीं देर से प्रत्याशी उतारने के पीछे की मुख्य वजहों में यह भी एक वजह तो नहीं थी?

लेकिन भाजपा से पारस नाथ राय को टिकट मिलने के बाद से ही जखनिया स्थित हथियाराम मठ भी चर्चा के केंद्र में है। गाजीपुर का हथियाराम मठ तब से पूर्वांचल की राजनीति में गाहे-बगाहे चर्चा में आता रहा है जबसे आरएसएस के सर संघचालक मोहन भागवत दो साल पहले से लगातार वहां पहुंच रहे हैं।

गाजीपुर से भाजपा प्रत्याशी के चयन में हथियाराम मठ और संघ की भूमिका?

गाजीपुर के जखनिया स्थित हथियाराम मठ देश के मशहूर सिद्धपीठों में गिना जाता है। इस सिद्धपीठ में आसीन होने वाले संत यति सन्यासी कहे जाते हैं। यह मठ गाजीपुर में हिन्दू आस्था और राजनीति का प्रमुख केंद्र रहा है जहां दूर-दराज से बड़ी संख्या में मरीज और श्रद्धालु आते रहते हैं। मान्यता यह भी है कि इस मठ में सिर झुकाने से कई रोगों से मुक्ति मिलती है और मनोकामना की पूर्ति होती है।

लेकिन गाजीपुर से भाजपा प्रत्याशी के चयन में इस मठ की क्या भूमिका हो सकती है?

यदि हम दो साल पहले मार्च-2022 और अगले ही साल जुलाई-2023 में हथियाराम मठ में पूरे 24 घण्टे के लिए पहुंचे संघ प्रमुख मोहन भागवत के कार्यक्रमों पर नज़र डालें तो हमें गाजीपुर में भाजपा के प्रत्याशी के चयन में मठ की भूमिका को समझने में आसानी हो सकती है।

hathiyaram math ghazipur
हथियाराम मठ का मुख्य द्वार

हथियाराम मठ पहुंचने के बाद मोहन भागवत का भव्य स्वागत किया गया था। मुख्य द्वार पर मोहन भागवत पर गुलाब के फूलों की वर्षा की गई थी।

मोहन भागवत ने मीडिया से कहा था, ‘सिद्धपीठ की धरती पर आना अपने लिए सौभाग्य की बात है।’

हथियाराम मठ दोबारा तब चर्चा में आया जब राम मंदिर के लिए मठ ने 1 करोड़ 1 लाख 1 हजार 101 रुपये का चंदा दिया। यहां यह बताना समीचीन होगा कि भाजपा के वर्तमान प्रत्याशी पारस नाथ राय मठ में अहम भूमिका अदा करते रहे हैं।

राजनीतिक लोग मानते हैं कि आरएसएस की पूर्वांचल में बनारस के बाद गाजीपुर पर विशेष नज़र है। वहां से संघ आस-पास के कई जिलों को साधना चाहता है। संघ सोच रहा है, यदि वह गाजीपुर से अपना प्रत्याशी उतार कर जिता लेता है तो आगामी दिनों में आजमगढ़, मऊ और बलिया के अलावा बिहार के कुछ जिलों में उसकी पहुंच आसान हो जाएगी।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि क्या संघ गाजीपुर में अपने प्रत्याशी पारस नाथ राय को जीत दिला पायेगा?

हथियाराम मठ की इसके पहले दलीय चुनाव में कोई सीधी भूमिका नहीं रही है लेकिन इस बार भाजपा के टिकट पर संघ से जुड़े पारस नाथ राय के मैदान में उतरने के बाद मठ की भूमिका देखी जा रही है। देखना दिलचस्प होगा कि अफजाल अंसारी के खिलाफ संघ की यह सीधी राजनीतिक लड़ाई आने वाले दिनों में कहां पहुंचती है?

ग़ाज़ीपुर लोकसभा इतनी चर्चित क्यों हो गई है?

गाजीपुर लोकसभा सीट पर 1984 में कांग्रेस का दबदबा ख़त्म हो गया और उसके बाद कांग्रेस इस सीट पर कभी खाता नहीं खोल सकी। यह सीट लम्बे समय से सपा, बसपा और भाजपा के बीच झूलती रही है। गाजीपुर से सबसे अधिक तीन बार चुनाव जीतने वाले मनोज सिन्हा पिछली बार बसपा के प्रत्याशी अफजाल अंसारी से चुनाव हार गये।

राजनीतिक हलके में हवा तो यह भी उड़ी थी कि मनोज सिन्हा तीन बार लोकसभा जीतने के बाद मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब देखने लगे हैं लेकिन यह भाजपा के वर्तमान शीर्ष को पसंद नहीं आया, इसलिए मनोज सिन्हा चुनाव मैदान में मात खा गये। फिर भी बात सिर्फ शीर्ष के पसंद और नापसंद की हो, ऐसा नहीं हो सकता।

पिछले चुनाव में बसपा और सपा गठबंधन से अफजाल अंसारी चुनाव मैदान में थे, वहीं भाजपा की ओर से मनोज सिन्हा चुनाव मैदान में जीत दर्ज कर लखनऊ तक पहुँचने का ख्वाब देख रहे थे।

इस बार गाजीपुर लोकसभा कई कारणों से चर्चा में है। मऊ से पूर्व बाहुबली विधायक मुख़्तार अंसारी की जेल में संदिग्ध परिस्थियों में मौत हो चुकी है, वहीं दूसरी ओर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी दोनों दलों से प्रत्याशी मैदान में होंगे। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन-प्रत्याशी अफजाल अंसारी और बसपा से उमेश सिंह मैदान में हो सकते हैं।

पारस नाथ राय और आरएसएस

भाजपा ने प्रत्याशियों की तीसरी सूची में गाजीपुर से पारस नाथ राय को प्रत्याशी बनाया है। पारस नाथ कम उम्र से ही आरएसएस से जुड़े रहे हैं। पारस नाथ राय मदन मोहन मालवीय इंटर कॉलेज के प्रबंधक और संचालक हैं, इसके आलावा पारस नाथ राय की दूसरी पहचान जम्मू कश्मीर के वर्तमान राज्यपाल और गाजीपुर से पूर्व सांसद मनोज सिन्हा के करीबी की है, लेकिन पारस नाथ राय का चुनाव लड़ने का कोई इतिहास नहीं रहा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े एक पदाधिकारी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि पारस नाथ राय संघ के पुराने स्वयंसेवक रहे हैं लेकिन जब कोई भाजपा में चला जाता है तो उसका सीधा ताल्लुक संघ से नहीं रह जाता है। जहाँ तक टिकट पाने की बात  है तो पारस नाथ मनोज सिन्हा के चुनाव प्रचार संयोजक रहे हैं। उन्हें टिकट मिलने में संघ की बजाय मनोज सिन्हा की भूमिका अधिक है।

पारस नाथ राय के बेटे आशुतोष राय भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं लेकिन आशुतोष राय ने भी अभी तक कोई चुनाव नहीं लड़ा है। पारस नाथ राय के समधी अशोक भगत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़े रहे हैं।

गाजीपुर के सीनियर पत्रकार अभिषेक मानते हैं कि प्रत्याशी तय करने के बाद भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने कार्यकर्ताओं को इकट्ठा करना और सक्रिय करना हो गया है।

अभिषेक कहते हैं, ‘गाजीपुर में अफजाल अंसारी सबसे बड़े और पुराने चेहरे हैं। उनके बराबर कद फिलहाल इस समय किसी का नहीं है। यदि बसपा किसी ठाकुर या ब्राह्मण को टिकट देती है तो बहुत उम्मीद है कि गाजीपुर में लड़ाई सपा बनाम बसपा हो जाये। भाजपा ने जिसे प्रत्याशी बनाया है उसे उसी पार्टी के अधिकांश कार्यकर्ता नहीं जानते हैं।’

वे आगे कहते हैं, ‘अफजाल का परिवार अपराध और राजनीति का कॉकटेल रहा है। उनका परिवार 24 घंटे राजनीति करता है। आज गाजीपुर के हर गाँव में उनके कार्यकर्ता मौजूद हैं। अफजाल अंसारी एक मात्र मुस्लिम लीडर हैं जिन्हें भूमिहार और दलित जातियां बड़ी संख्या में वोट करती हैं।’

क्या पारस नाथ राय मनोज सिन्हा के कृपा पात्र हैं?

गाजीपुर लोकसभा सीट से लम्बे समय तक मनोज सिन्हा और उनके बेटे अनुभव सिन्हा के भाजपा से चुनाव लड़ने की चर्चा रही है लेकिन पार्टी में भारी विरोध के कारण अनुभव सिन्हा को टिकट नहीं मिल सका। गाजीपुर से कुछ समय तक कृष्णानंद राय की पत्नी अलका सिन्हा की भी चर्चा रही।

वहीं, मुख़्तार अंसारी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के बाद ब्रजेश सिंह की चर्चा भी भाजपा से चुनाव लड़ने की रही लेकिन अंत में भाजपा ने अपना प्रत्याशी गैर-राजनीतिक पारस नाथ राय को बनाकर मौदान में उतार दिया है।

कुछ दिन पहले एक चुनावी सभा में अफजाल अंसारी ने मंच से कहा, ‘भाजपा के लोग चौड़े होकर बोल रहे हैं कि सभी 80 सीटें जीतेंगे लेकिन गाजीपुर से कौन लड़ेगा उसका सूची में नाम ही नहीं आ रहा है। हल्ला हो रहा है कि ‘बाघ सिंह’ आएंगे तब ‘बारहसिंघा’ लाया जायेगा। ले आओ भाई क्या करना है, गाजीपुर कोई वन विभाग का जंगल थोड़ी है?’

वे आगे कहते हैं, ‘यहां बिगड़े से बिगड़े सांड़ और भैंसा आये, उनको पटक के, नाथ के छोड़ दिया जाता है। ये गाजीपुर वीरों की धरती है यहां गुंडों और अत्याचारियों से डरने वाला कोई नहीं है और न डरेंगे। कायर रोज पैदा होता है रोज मरता है और वीर एक बार पैदा होता है और एक ही बार मरता है।’

जातियों के गणित में फेल या पास होंगे पारस नाथ?

गाजीपुर लोकसभा सीट यादव बाहुल्य मानी जाती है। उसके बाद दलित और मुस्लिम की आबादी है। क्षत्रिय, बिन्द, कुशवाहा और राजभर जातियों के मतदाताओं की संख्या भी अच्छी-खासी है। परिसीमन के बाद भूमिहार वोट में काफी कमी आई है। वर्तमान समय में भूमिहार वोट लगभग 50 हजार के आस-पास है।

गाजीपुर लोकसभा के अनुसार यादव, दलित और मुस्लिम मतदाताओं की संख्या कुल मतदाताओं की संख्या की लगभग आधी मानी जाती है। यही कारण है कि सपा और बसपा के गठबंधन के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में मनोज सिन्हा पर अफजाल अंसारी भारी पड़ गए थे। पिछले चुनाव में मनोज सिन्हा भाजपा के टिकट पर लड़ कर 119,392 वोट से चुनाव हार गये।

यदि गाजीपुर लोकसभा चुनाव पर 2009 से नजर डालें तो हम देख सकते हैं कि बसपा और सपा के मुकाबले भाजपा की सही स्थिति क्या है? 2009 में राधे मोहन सिंह सपा से 379,233 वोट पाकर पहले और बसपा से अफजाल अंसारी 309,924 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे जबकि भाजपा से प्रभुनाथ 21,679 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे।

वहीं 2014 में मनोज सिन्हा भाजपा से 306,929 वोट पाकर जीत दर्ज की जबकि सपा से शिव कन्या कुशवाहा 274,477 वोट पाकर दूसरे नम्बर पर रहीं। बसपा से कैलाश नाथ सिंह यादव 241645 वोट पाकर तीसरे नम्बर पर रहे। जबकि सपा और बसपा के बागी नेताओं पर नजर डालें तो राष्ट्रीय परिवर्तन दल से 59510 वोट पाकर चौथे, अरुण कुमार सिंह निर्दलीय 34093 वोट पाकर पांचवें और कांग्रेस से मोहम्मद मक़सूद खान 18908 वोट पाकर छठे स्थान पर रहे।

यानी गाजीपुर सीट पर यदि बसपा, सपा और भाजपा तीनों दलों के प्रत्याशी मैदान में होते हैं तो मुख्य लड़ाई बसपा और सपा से बीच देखी जाती है।

गाजीपुर के रहने वाले शमी सिंह इसका मुख्य कारण जातीय समीकरण मानते हैं।

शमी सिंह कहते हैं, ‘गाजीपुर लोकसभा सीट पर तीन मुख्य जातियां दलित, यादव और मुस्लिम अहम रोल अदा करती हैं। इन तीनों को जो साध लेता है वह बाजी मार जाता है। भाजपा ने पारस नाथ राय को मनोज सिन्हा के कहने पर भले ही टिकट दिया हो लेकिन जातीय गणित में वो पहले ही चुनाव हार चुके हैं। गाजीपुर में भूमिहार वोट 40 से 50 हजार तक है जिसपर पोलिंग 20 से 25 हजार तक होती है। सुनने में आ रहा है बसपा उमेश सिंह को प्रत्याशी बना सकती है तो भाजपा के कोर वोट माने जाने वाले ठाकुर वोट में भी बंटवारा होना तय है।’

वे आगे कहते हैं, ‘जहाँ तक रही बात अन्य सवर्ण और ओबीसी जातियों की तो ब्राह्मण, कुर्मी, बिन्द, कुशवाहा, मौर्या, राजभर तो उनकी संख्या इतनी प्रभावी नहीं है कि वे चुनाव की दिशा बदल सकें क्योंकि बसपा के कोर वोटर दलित हैं जो बसपा के प्रत्याशी पर विश्वास जताएंगे। वहीं ठाकुर समुदाय में पहले ही मनोज सिन्हा को लेकर नाराजगी रही है। ऐसे में गाजीपुर में अभी लड़ाई त्रिकोणीय है, लेकिन आने वाले दिनों में स्थिति और अधिक साफ़ होगी।’

गाजीपुर से कांग्रेस नेता लौटनराम निषाद मानते हैं कि भाजपा ने जो प्रत्याशी मैदान में उतारा है वह लड़ाई में नहीं है.

लौटनराम कहते हैं, ‘अफजाल अंसारी तो चुनाव पहले ही जीत रहे थे लेकिन भाजपा ने जो प्रत्याशी मैदान में उतारा है वह लड़ाई में नहीं है। भाजपा के टिकट पर मनोज सिन्हा बलिया से लड़ना चाह रहे थे क्योंकि बलिया में भूमिहार वोट अधिक है लेकिन जब वहां से टिकट नहीं मिला तो उन्होंने गाजीपुर से टिकट नहीं लिया और अपने करीबी पारस नाथ राय को यहां से टिकट दिलवा दिया।’

वे जातियों के सवाल पर कहते हैं, ‘गाजीपुर में मल्लाह-बिन्द इण्डिया गठबंधन में अधिक संख्या में जायेंगे जबकि बसपा से ठाकुर प्रत्याशी होने के कारण ठाकुर वोट बंटना तय है। बाकी पारस नाथ की कोई ख़ास छवि नहीं है, इसलिए अफजाल अंसारी अच्छा चुनाव लड़ेंगे।’

आगामी दिनों में चुनाव परिणाम कुछ भी हों लेकिन अभी भाजपा गाजीपुर लोकसभा में प्रत्याशी को मैदान में उतारते ही मनोवैज्ञानिक दबाव में आ चुकी है। दूसरी तरफ संघ पर अपने पुराने कार्यकर्ता और प्रत्याशी को जिताने का दबाव भी कम नहीं है।

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