Wednesday, May 22, 2024
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स्वच्छ भारत मिशन का हाल, एससी-एसटी के शौचालय उपयोग में आई गिरावट से विश्व बैंक नाराज़

विश्व बैंक ने भारत सरकार के ‘स्वच्छ भारत मिशन’ की रिपोर्ट पर जताई चिंता देश भर में मोदी सरकार द्वारा दो अक्टूबर 2014 को शुरू किए गए स्वच्छ भारत मिशन के नौ वर्ष बाद भी ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय का उपयोग न होना और डोर-टू-डोर कूड़ा प्रबंधन प्रणाली सवालों के घेरे में है। विश्व बैंक […]

विश्व बैंक ने भारत सरकार के ‘स्वच्छ भारत मिशन’ की रिपोर्ट पर जताई चिंता

देश भर में मोदी सरकार द्वारा दो अक्टूबर 2014 को शुरू किए गए स्वच्छ भारत मिशन के नौ वर्ष बाद भी ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय का उपयोग न होना और डोर-टू-डोर कूड़ा प्रबंधन प्रणाली सवालों के घेरे में है। विश्व बैंक ने इस पर खेद प्रकट किया है।

विश्व बैंक द्वारा स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण (एसबीएम-जी) के शुरुआती लाभ के बावजूद 2018 के बाद से भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय के उपयोग में गिरावट की सबसे चिंताजनक प्रवृत्ति को उजागर करने वाले एक विभागीय कार्य पत्र को प्रकाशित करने के कुछ सप्ताह बाद, इस पत्र और दो अन्य को आंतरिक लम्बित होने के कारण वापस ले लिया है। इस बात पर जोर देते हुए विश्व बैंक ने कहा है कि कि वेबसाइट पर प्रकाशित होने से पहले कागजात आंतरिक रूप से आवश्यक अनुमोदन से नहीं गुजरे हैं।

द हिंदू की रिपोर्ट (ग्रामीण भारत में स्वच्छता पर प्रगति और विविध साक्ष्यों का समाधान) के अनुसार, भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय निर्माण के ‘लुभावनी’ लाभ के बावजूद 2018 से ग्रामीण भारत में इन शौचालयों का उपयोग कम हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, 2018 के बाद से अनुसूचित जाति के लोगों के लिए शौचालयों के नियमित उपयोग में 20 प्रतिशत की गिरावट और अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए 24 प्रतिशत की गिरावट आई है, जबकि अन्य पिछड़ी जाति और सामान्य श्रेणियों के लिए क्रमश: 9 और 5 प्रतिशत की गिरावट आई है।

इसके पूर्व विश्व बैंक ने 15 दिसम्बर, 2015 में ग्रामीण क्षेत्रों में सभी नागरिकों को बेहतर स्वच्छता तक पहुँच सुनिश्चित करने के प्रयासों में भारत सरकार का समर्थन करने के लिए स्वच्छ भारत मिशन सहायता संचालन परियोजना के लिए 1.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर के ऋण को मंजूरी दे दिया था।

इस दौरान द वर्ल्ड बैंक के कंट्री निदेशक ओन्नो रूहल ने कहा था, ‘भारत में हर दस में से एक मौत खराब स्वच्छता से जुड़ी है। अध्ययनों से पता चलता है कि कम आय वाले परिवारों को खराब स्वच्छता का सबसे अधिक खामियाजा भुगतना पड़ता है। इस परियोजना का उद्देश्य सरकार की स्वच्छ भारत पहल के कार्यान्वयन को मजबूत करना है, जिसके परिणामस्वरूप गरीबों और कमजोर लोगों, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए महत्वपूर्ण स्वास्थ्य लाभ होंगे। राज्यों द्वारा अच्छे प्रदर्शन को प्रोत्साहित करना और व्यवहार परिवर्तन पर ध्यान देना इस परियोजना के दो महत्वपूर्ण घटक हैं।’

दूसरी तरफ, कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश ने भी दावा किया है कि ‘स्वच्छ भारत मिशन’ अपनी स्थिति पर बरकरार नहीं रह सका है और वर्ष 2018 के बाद से शौचालयों के उपयोग में निरंतर गिरावट आ रही है।

विश्व बैंक के दस्तावेज में भारत में शौचालयों के उपयोग में गिरावट पर चिंता जताई गई थी, लेकिन ‘दबाव’ के चलते उसने इन दस्तावेज को वापस ले लिया। जयराम रमेश ने माँग उठाई है कि देश में शौचालयों के उपयोग और स्वच्छता अभियान की पारदर्शी ऑडिट होनी चाहिए।

उल्लेखनीय है कि 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद ’स्वच्छ भारत मिशन’ की शुरूआत की गई थी जिसके तहत बड़े पैमाने पर शौचालयों का निर्माण करवाया गया। मोदी सरकार ने साल 2019 तक पूरे भारत को स्वच्छ करने का टारगेट भी रखा था। साथ ही सभी लोगों को व्यक्तिगत (पर्सनल) और सामुदायिक शौचालय की सुविधा देने का वायदा किया गया था।

इसी को लेकर विश्व बैंक ने इस अभियान के लिए 1.5 अरब डॉलर का कर्ज़ देने का दावा किया था लेकिन अभी तक इसकी पहली किस्त भी जारी नहीं की गई है। इसकी वजह यह है कि विश्व बैंक पहले किसी स्वतंत्र संस्था का सर्वे चाहता है, जिससे ये आँकड़े प्रमाणित हो सकें। लेकिन अब तक सरकार ने ऐसा कोई सर्वे नहीं कराया है।

वहीं, स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, ओडीएफ स्थिरता पर ध्यान केंद्रित करने और गाँवों को ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन (एसएलडब्ल्यूएम) से कवर करने के लिए 1,40,881 करोड़ रुपये खर्च किए जाएँगे, जो 2024-25 तक गाँवों को ओडीएफ से ओडीएफ प्लस में बदल देगा।

एसबीएम-जी की ओर से जारी 2022 की रिपोर्ट माने तो, देशभर में 5,13,77,176 लोगों से एक सर्वे किया गया था जिसमें घरेलू 1,78,736, वेब 1,00,72,353 और ऐप 4,11,26,087 के माध्यम से लोगों ने अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएँ दी थीं।

इस सर्वेक्षण में भाग लेने वाले लगभग 84.0% नागरिकों ने कहा कि स्वच्छ भारत मिशन शुरू होने के बाद से उनके गाँवों में स्वच्छता की स्थिति में सुधार हुआ है।

88.5% नागरिकों ने कहा कि उनके गाँवों में सभी घरों में शौचालय की सुविधा है।

सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट (एसडब्ल्यूएम) की शुरुआत के सम्बंध में और लिक्विड वेस्ट मैनेजमेंट (एलडब्ल्यूएम), 62.7% और 63.8% उत्तरदाताओं ने क्रमश: कहा कि ये सुविधाएँ उनके यहाँ शुरू की गई थीं।

गाँव और 68.4% नागरिक उनके द्वारा क्रियान्वित किए जा रहे सॉलिड वेस्ट लिक्विड वेस्ट मैनेजमेंट (एसएलडब्ल्यूएम) कार्यों से संतुष्ट थे।

वर्ल्ड बैंक ने स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण के इस सर्वेक्षण पर अपनी असंतुष्टि जाहिर की है।

वहीं, जयराम रमेश ने भाजपा के तथाकथित महत्वाकांक्षी योजना स्वच्छता अभियान को कांग्रेस की योजनाओं से प्रेरित होना बताया है। उन्होंने सोशल मीडिया ‘एक्स’ पर लिखा है कि, ‘सितंबर 2011 में शुरू किए गए ‘निर्मल भारत अभियान’ को दोबारा नए सिरे से पेश करते हुए ‘स्वच्छ भारत मिशन’ के रूप में सामने लाया गया। निर्मल भारत अभियान ने प्रत्येक ग्राम पंचायत को खुले में शौच से मुक्त बनाने के लिए बड़े पैमाने पर कार्यक्रम शुरू किए थे। इसने ट्रेन में बायोटॉयलेट के उपयोग को लोकप्रिय बनाना शुरू कर दिया था। अभिनेत्री विद्या बालन जैसे और भी लोगों को ‘स्वच्छता दूत’ बनाकर जोड़ा गया था। नए-नए नारों को लोकप्रिय बनाया गया था और स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा समवर्ती मूल्यांकन को प्रोत्साहित किया गया था।

उन्होंने कहा है, ‘अब विश्व बैंक की रिपोर्ट से पता चलता है कि इतने प्रचार के बाद शुरू किया गया ’स्वच्छ भारत मिशन’ कायम नहीं रह सका है। भारत में 2018 से ही शौचालयों के उपयोग में गिरावट आ रही है, यह गिरावट एससी और एसटी समुदायों के बीच सबसे अधिक केंद्रित है।’ रमेश ने दावा किया कि शुरुआती धूमधाम के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अन्य योजनाओं, सुर्खियों और आयोजनों की ओर बढ़ गए हैं।

उन्होंने कहा, ‘स्वच्छता के लिए कर्मचारी कम कर दिए गए हैं। उनके वेतन भुगतान में भी देरी हो रही है। दरअसल, भारत को खुले में शौच से मुक्त कराने के बड़े-बड़े दावों से कोसों दूर, 25 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण परिवार अभी भी नियमित रूप से शौचालय का उपयोग नहीं करते हैं।

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रमेश ने कहा, ‘आँकड़ों को दबाने और खुले में शौच पर जीत की घोषणा करने के बजाय, बजट में कटौती को खत्म करने के साथ-साथ भारत में शौचालय के उपयोग और स्वच्छता का एक खुला और पारदर्शी ऑडिट कराने की आवश्यकता है। यह ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण है जब भारत 2014 के बाद से एनीमिया एवं बाल कुपोषण में तेज वृद्धि के साथ कई महत्वपूर्ण स्वास्थ्य सूचकांकों में पिछड़ रहा है।’

वहीं, बीबीसी के अनुसार, नेशनल सैंपल सर्वे ऑगेर्नाइजेशन ने साल 2016 में आई अपनी रिपोर्ट में बताया था कि भारत में सिर्फ 42.5% ग्रामीण घरों के पास शौचालय के लिए पानी था। नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे (जनवरी 2015 से दिसम्बर 2016) की रिपोर्ट के मुताबिक, सिर्फ 51.6% लोगों ने शौचालय सुविधाओं को इस्तेमाल किया था।

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