एक दिहाड़ी मजदूर का जीवन

अंकुर जायसवाल

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दुनिया एक नारकीय जगह है, और बुरा लेखन हमारे दुख की गुणवत्ता को नष्ट कर रहा है। अमेरिकी गीतकार टॉम वेट्स की यह बात अक्सर लोगों के जीवन की कहानियों को लिखते वक्त जेहन में आ जाती है। पिछले छः महीनों से मैं एक फेलोशिप के अंतर्गत प्रवासी मजदूरों खासकर कंस्ट्रक्शन सेक्टर में काम करने वाले लोगों से जो कि बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों से पंजाब और जम्मू की तरफ काम की तलाश में आते हैं उनकी जीवन के संघर्षों की कहानियां सुन रहा हूँ और उनको लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। यहाँ पर मैं छत्तीसगढ़ से आये एक मजदूर की कहानी उन्हीं के शब्दों में लिखने की कोशिश कर रहा हूँ।

अपने कमरे के बाहर ईंट से बने चूल्हे पर चावल चढ़ाते हुए करीब साठ की उम्र के छोटे कद के दुबले-पतले सहरता उरांव ने मुस्कुराते हुए बताया कि पूरा जीवन बच्चों को अकेले पाला है अब ये बच्चे मुझे पाल रहे हैं। कुछ दिनों पहले चहरे के बायीं तरफ लकवा मार दिया था इसलिए अब काम कम ही करता हूँ। सहरता जी से मेरी मुलाकात पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, लुधियाना के कैम्पस में हुई ।

कैम्पस में नए हॉस्टल बन रहे हैं और उसी के साइट के बगल में हॉस्टल को बनाने वाले मिस्त्री-मजदूरों के कमरे चार लाइनों में बने हुए हैं। करीब 8×8 फीट के कमरे ईंट से बने हुए हैं और छः फीट की ऊंचाई पर टिन शेड का छत लगा हुआ है। उसी कमरे के बाहर सहरता अपने बड़े बेटे के लिए खाना बनाने की तैयारी कर रहे हैं जो कि कुछ देर पहले काम से वापस आने के बाद हाथ-मुंह धुल के आराम कर रहा है. सहरता का बेटा इस साइट पर मजदूर(बेलदार) का काम करता है। दूसरा बेटा चंडीगढ़ में शटरिंग का काम करता है और बेटी जो कि तीनों में सबसे बड़ी है वह भी अभी इसी साइट पर अपने पति के साथ रहती है और मजदूरी करती है।

सहरता को साल तो याद नहीं है लेकिन वो बताते हैं कि जम्मू और बाकी जगहों पर जब दिहाड़ी तीन रुपया थी तब वो बिलासपुर (छत्तीसगढ़) के एक गाँव से अपने माँ-बाप के साथ जम्मू में ईंट के भट्ठे पर काम करने के लिए गए थे। घर पर खेती के लिए कोई जमीन नहीं थी इसलिए माता-पिता जम्मू और पंजाब में काम के लिए आते थे और सहरता के अनुसार अपने माता-पिता की तरह ही काम करने की उम्र होते ही उन्होंने भी ईंट भट्ठे पर काम करना शुरू कर दिया था। कुछ सालों में जब माता-पिता वापस गाँव में रहने के लिए चले गए तो सहरता भी जम्मू से चंडीगढ़ कंस्ट्रक्शन साइट पर मजदूरी का काम करने के लिए आ गए।

 

सहरता ने दोनों हथेलियों ने बीच थोड़ी दूरी बनाते हुए बताया कि करीब अट्ठारह की उम्र होते होते उनके पेट में बायीं तरफ इस आकार का ट्यूमर जैसा कुछ बढ़ते हुए निकल आया। तो दिल्ली में कंस्ट्रक्शन साइट पर फोरमैन का काम कर रहे उनके बड़े भाई ने उनको दिल्ली आ कर इलाज करवाने को कहा। उनके मामा जो कि किसी शराब की फैक्ट्री में काम करते थे उनकी सिफारिश से सफदरजंग अस्पताल में किसी तरह इनके ट्यूमर का ऑपरेशन होना तय हुआ।

सहरता

सहरता बताते हैं कि पहले दिन तो लेने से मना कर दिया था. फिर हम लोग वहीं दो दिन रुके. फिर एक लोग आये उन्होंने पूछा कि जीने-मरने की जिम्मेदारी आपकी है फिर ऑपरेशन करेंगे। भाई ने रोते हुए ऑपरेशन की जिम्मेदारी ली और साइन किया। खून नहीं मिला तो अपना खून दिया। और अस्पताल वालों ने बेहोशी वाला दवाई देकर एक कमरे में उठा कर ले गए।

सहरता बताते हैं कि शुक्रवार को एडमिट हुए तो शनिवार को बेहोश कर के ऑपरेशन हो गया। रविवार को होश आया और फिर एक दिन आराम करने के बाद डॉक्टर मंगलवार तक टाँके पर पट्टी करके छुट्टी दे दी। फिर बोला कि आ कर कुछ दिन में टांका खुलवा लेना। कुछ दिन बाद हॉस्पिटल आया तो एक नर्स ने टाँके को खोला और शायद खोलते वक्त आखिर में खिंच गया। उसने कुछ नहीं कहा और पट्टी करके भेज दिया। इस हॉस्पिटल में भीड़ होती थी इसलिए पट्टी पास के ही प्राइवेट हॉस्पिटल में करवाता रहा। वो लोग भी ध्यान नहीं देते थे और पट्टी कर देते थे।

फिर एक दिन मैदान करने बाहर गया था। जब उठ रहा था तो लगा कि कुछ खुल गया है । पेट पर ही हाथ रख दिया। सारा पीप बह रहा था और हाथ में लगा हुआ था। वैसे ही पकड़े-पकड़े भाई के पास पहुंचा। उसने रात में टैक्सी की। तब वहाँ ऑटो नहीं चलता था। एक प्राइवेट हॉस्पिटल गए. वहां पर साफ करके फिर से पट्टी हुई। फिर लगातार वहीं पर एक डॉक्टरनी से पट्टी करवाता रहा। यह डॉक्टरनी भी उसी डॉक्टर की पत्नी थी जिसने मेरा ऑपरेशन किया था। एक रात फिर वही डॉक्टर मिला और उसने उस रात पट्टी नहीं कि बल्कि रुई चिपका कर खुला छोड़ दिया, और कहा कि कुछ दिन कम खाना खाना ताकि ये फूले और खुले न । फिर कुछ दिन में सूख गया और टाँका हटा लिया गया।

मैं भी भाई की ही साइट पर चोट की वजह से छोटा-मोटा काम करने लगा। भाई भी कोई ज्यादा मेहनत वाला काम करने नहीं देता था। वहां पहले पेंटिंग का काम किया और उसके बाद पहरेदारी का काम करने लगा । हम कुल छः लोग थे जो पहरेदारी का काम करते थे. उनमें कुछ हिमाचल,बिहार और नेपाल से लोग थे।

कुछ सालों बाद चंडीगढ़ से ईंट के भट्ठे का काम खत्म होने पर कुछ लोग इधर की ही साइट पर आये हुए थे। हम लोग के ही खानदान से थे तो बड़े भाई से अपनी लड़की के लिए मेरा रिश्ता माँगा. और फिर घर जा कर मेरी शादी हुई । फिर एक दो साल घर पर ही रहा। मेरे ससुर की चार लड़कियां थीं. मेरी पत्नी तीसरी लड़की थी। उनकी कुछ खेती भी थी। तो उन्होंने मेरे पिता से आ कर कहा कि मेरे यहाँ कोई देखने वाला नहीं है इसे मेरे साथ छोड़ दीजिये मेरे यहाँ खेती की भी देखभाल करेगा।

सहरता बताते हैं उनका घर और ससुराल चांपा जंक्शन और सक्ती स्टेशन के बीच में पड़ता है। उनका घर तो चांपा से दूर है पर ससुराल सक्ती से पास में है। फिर वह अपनी पत्नी के साथ वहां आ गए। पहली लड़की पैदा हुई। सहरता बताते हैं वह अकेले थे इसलिए बुआई पैसा दे कर करा लेते थे ।  सिर्फ बुआई का पैसा देना होता था उसके बाद सारी फसल इन्हीं की होती थी. सहरता बताते हैं कि वह और उनकी पत्नी बच्ची को लेकर और घर पर ससुर के लिए राशन रख कर जमादार के साथ बनारस की तरफ ईंट के भट्ठों में काम करने आते थे। बनारस बस से आ कर उनका जमादार उन्हें अन्दर के गाँवों में ले जाता था। सहरता को लार रोड और बरहज जैसे कस्बों के नाम याद हैं ।

सहरता बताते हैं कि वह ठण्ड के दिनों में काम के लिए निकलते थे और भट्ठों में कच्चे ईंट रखने और पके ईंट निकालने का काम करते थे।  सहरता बताते हैं कि वह बीस ईंट ले कर जाते तो उनको एक टोकन जैसा मिलता और फिर इस तरह पूरे दिन का हजार ईंट के हिसाब से पैसा बनता था। उनकी पत्नी दस ईंट ले कर जाती और वो बीस फिर दोनों का जोड़ कर हिसाब होता । वो बताते हैं कि उन्होंने सवा रुपया प्रति हजार ईंट के हिसाब से काम करना शुरू किया था ।

सहरता बताते हैं कि गर्मी में जब भट्ठी भी जलती थी तो सुबह शाम छः-छः घंटे काम करते थे । सुबह चार से दस बजे तक फिर शाम को चार से दस बजे तक का काम होता था। आठवें दिन राशन के लिए पैसे मिलते । और बीच बीच मालिक से दारू-मीट भी खाने को मिलता। अगर भट्ठे के पास में बाजार होता तो हम पैदल ही चले जाते नहीं तो भट्ठे की ट्राली हमको बाजार लेकर जाती।

इस तरह सालों तक छः महीने ईंट के भट्ठे में काम और फिर वापस घर पर रह कर सक्ती में बेलदारी का काम कर लिया करते थे। इसी बीच तीनों बच्चे भी पैदा हो गए थे। बच्चे छोटे थे इसलिए इस साल सहरता अकेले ही ईंट भट्ठों में काम के लिए गए थे। वहां पर ईंट के भट्ठे में कोयला डालने का काम था. उनका काम कोयले की टोकरियाँ भरने का था. और दूसरा आदमी उनको ले जाकर भट्ठी में ऊपर से डालता था। यहाँ पर भी रात में काम होता। वहां उनको चिट्ठी मिली कि पत्नी बीमार हैं । उनके स्तन में कुछ उभर आया था।

सहरता बताते हैं कि उनको नहीं पता कि ये कैंसर था कि नहीं । काम खत्म होने में एक महीना बाकी था तो उन्होंने भट्ठा मालिक से छुट्टी लेकर जाने की बात की । छुट्टी मिल गयी लेकिन जिस दिन पैसा लेना था उस दिन उनका जमादार आ गया। जमादार उन्हीं के गाँव का था। उसने बताया कि उनकी पत्नी ठीक हैं। अच्छे से चल फिर रही हैं। इस बात पर आश्वस्त होकर वापस घर नहीं गए और एक महीने बाद घर पहुंचे।

फिर पत्नी को सक्ती के हॉस्पिटल में दिखाया । वहां पर ऑपरेशन कर के टांका लगा दिया और डॉक्टर ने कहा कि टांका खुलवाने और पट्टी बदलवाने के लिए यहाँ इतनी दूर आने की जरुरत नहीं है। वहीं पास में ही बदलवा लेना। कुछ दिनों बाद पास के हॉस्पिटल में गए तो वो पूछते कि ऑपरेशन कहाँ कराया है जाओ वहीं पर पट्टी बदलेगा। इस तरह किसी ने भी पट्टी नहीं बदला। उनको खुद पट्टी बदलने आता नहीं था।

फिर एक दिन बस से सक्ती के लिए निकले। साथ में उनकी पत्नी कि चचेरी भाभी भी गयीं । बस खाली थी तो उनकी पत्नी सीट पर लेट गयीं। और रास्ता ख़राब होने कि वजह से घाव का सारा पीप-खून बस में बह गया। फिर जहाँ उतरे वहां पर दो बाल्टी पानी ला कर बस साफ़ किया। हॉस्पिटल पहुंचे तो उनकी पत्नी की हालत देख कर डॉक्टर ने खूब गालियाँ दीं ।  फिर सफाई कर के मरहम-पट्टी की । फिर वहां से घर वापस आये।

अब तक उनकी लड़की इतनी बड़ी हो गयी थी कि घर का खाना बनाने का काम कर ले। पत्नी के इलाज में इतने पैसे नहीं थे इसलिए थोड़ा सा खेत भी बेचना पड़ गया था। कुछ दिन पत्नी बिस्तर पर ही रहीं । फिर सहरता ने सोचा कि कब तक ऐसे ही घर में रहेंगे । कुछ काम भी करना चाहिए नहीं तो घर का खर्च कैसे चलेगा ?

एक दिन वह खा कर काम पर जाने के लिए तैयार हुए। पहला निवाला लेते ही उनकी पत्नी ने हिचकी ली । और काफी देर तक लेती रहीं।  सहरता बताते हैं कि वह अपनी चचेरी भाभी का इंतजार कर रही थी। जो कि काम पर गयी हुई थीं। जब वो आयीं तब उनकी पत्नी की जान निकली।

एक साल बीतते उनके ससुर की भी मृत्यु हो गयी और इधर घर पर भी माँ-बाप की मृत्यु हो चुकी थी। उनका बड़ा भाई भी पिता की मौत के बाद से घर नहीं आया था । उससे भी कोई कनेक्शन नहीं रह गया था। सहरता बताते हैं कि वो अभी दिल्ली में होगा लेकिन किसी को कुछ नहीं पता। अभी तक कोई मुलाकात नहीं हो पायी है । ससुर की मौत के बाद उनकी बाकी बड़ी बेटियां घर आयीं और उनके परिवार भी। उन लोगों ने खेत बेच दिया और सहरता से कहा कि उन्होंने अपने हिस्से का खेत पहले ही बेच दिया है ।

सहरता बताते हैं कि गाँव के लोगों ने भी कुछ नहीं बोला, जबकि उनके ससुर देखभाल के लिए उनको लेकर आये थे तो खेत उन्हीं का होना चाहिए था । और जो खेत बेचा वो तो उनकी ही लड़की के इलाज के लिए बेचा था । अब सहरता के पास उनके ससुर के बड़े भाई के लड़के के लड़के के साथ आधा-आधा साझे वाली झोपड़ी बची थी और साथ में तीन बच्चे।

एक दूसरे गाँव के जमादार ने जम्मू में कठुआ के पास के किसी गाँव में ईंट के भट्ठे में ईंट बनाने का काम दिया। सहरता ने कहा कि उन्होंने ईंट कभी नहीं बनायी है, तो उसने कहा कि धीरे-धीरे सीख जाओगे। पहले से जम्मू में रह चुके होने के नाते सहरता को जगह का पता था इसलिए जमादार से पांच हजार एडवांस लेकर तीनों बच्चों के साथ जम्मू निकल गए। बच्चों की उम्र दस-बारह-पन्द्रह थी. जमादार इधर रुक कर और लोगों को ले जाने के लिए रुक गया।

वहां पर जा कर मैं मिट्टी बनाता। मैं और छोटा बेटा ट्राली से मिट्टी पहुंचाते और दोनों बेटा-बेटी ईंट बनाते । ईंट बनाते वक़्त कमर पर जोर पड़ता है। ये दोनों कुछ ईंट बना कर फिर जमीन पर लेट जाते। वहां का मुंशी कहता कि तुम चार लोग तो मिल कर भी महीने का तीन हजार रुपया भी नहीं बना पाते कैसे काम चलेगा। इसी बीच मालिक का एक लाख रुपया जमादार के पास फंस गया । जमादार तो वहां नहीं था उसने कहा कि कुछ आदमी पैसा लेकर भाग गए हैं।

इस तरह हम लोग भट्ठा मालिक के लिए बंधुआ हो गए।  काम भी रुक गया था तो कर्जा पंद्रह बीस हजार हो कर और भी बढ़ता ही गया । कुछ भटिंडा के लोग भी भट्ठे पर काम करने आये थे। उनके पास टीवी भी थी. वो लोग भी एक सुबह वहां से भाग गये।

एक दिन उसी गाँव का ही आदमी मिला उसने कहा कि आप भी यहाँ से चले जाओ नहीं तो यहीं फंसे रह जाओगे।  मैंने कहा कि बचपन से काम कर रहा हूँ कभी नहीं भागा। उस आदमी ने कहा कि इस बार खर्ची मिले और बाजार जाओ तो भट्ठे के पहरेदार से बच कर रहना और कुछ भी मत खरीदना।

सहरता बताते हैं कि जब मजदूर बाजार जाते हैं तो उनके पीछे भट्ठे का एक आदमी भी निगरानी के लिए जाता है ताकि कोई भाग ना जाये। उस आदमी ने बताया कि पैसे बचा कर रखना और अगले दिन कुछ-कुछ काम करते रहना एक लोग खाना बनाना। एक लोग सामान बाँधना. हम लोग जिस टाइम आयें उस टाइम पहरेदार से बच के निकल जाना।

सहरता ने बताया कि अगले दिन वो लोग आ कर कोने में खड़े थे लेकिन सामने से निकल नहीं पाया. ठण्ड का महीना था हल्की बारिश थी। पहरेदार भी पानी से बचने के लिए अन्दर चले गए थे. हम चारो अपनी झुग्गी में गए. झुग्गी के पीछे से ईंट खोल के रास्ता बना कर खेत ही खेत निकले। खेतों में गेंहूँ की फसल बढ़ी हुई थी और बाली आ गयी थी।  अगर सामने से निकलते तो थोड़ी ही दूर पर पठानकोट जाने का रास्ता मिल जाता लेकिन हम पीछे से निकले और काफी देर तक घूम के रास्ते पर पहुंचे।

बस को हाथ देते तो वो रोकता नहीं था।  फिर भोर हो गयी थी। प्रेस की गाड़ियाँ चलने लगी थीं। एक छोटी गाड़ी को हाथ दिया पहले उसने रोका नहीं फिर आगे जा कर फिर पीछे आया। बोला कि पठानकोट का चालीस रुपया सवारी लेगा।  मैंने कहा दूंगा। फिर हम पठानकोट पहुंच। और फिर वहां से बस पकड़ कर चंडीगढ़ आ गए।

चंडीगढ़ में अपने ही खानदान (जाति/जनजाति) का एक जमादार मिल गया। फिर उसी के साथ चंडीगढ़ में अलग अलग जगह बेलदारी का काम करने लगा। बच्चे भी बड़े हो रहे थे वो लोग भी काम करने लगे. गाँव का घर पुराना है  टूट रहा है। जिनके साथ साझे में घर है वो कुछ पैसे मांग रहे थे ताकि दोनों लोग धीरे-धीरे कर के घर को ठीक करवा लें। जमादार से घर मांगने के लिए कुछ पैसे मांगे तो उसने उल्टा बोल दिया। बोला कि पैसे नहीं दूंगा। अपना हिसाब कर के चले जाओ। उसके पास पहले ही कर्ज था।

लेकिन मेरा मन वहां रुकने का नहीं था । मैं अपने बच्चों को वहीं छोड़ कर दूसरे जमादार के पास आ गया । अभी यहाँ का काम दिलाने वाला जो जमादार है उसी के पास । इस जमादार के आदमी भी उस साइट पर काम करते थे। तीन-चार महीने अलग जगह काम कर के और इस जमादार से पैसे ले कर उस जमादार को दिए और बच्चों को लेकर आया. उसके बाद से इसी जमादार के साथ काम कर रहे हैं। इसके पास भी अभी बारह हजार कर्ज है।

काफी देर बात करने के बाद सहरता ने बाजार जा रहे साइट के पहरेदार से नारियल मंगाया है। उन्होंने कहा कि कल मंगलवार है हनुमान जी की पूजा करूँगा फिर परसों से कोई हल्का काम करने की कोशिश करूँगा।  अंत में सहरता की उम्र पूछा तो उन्होंने बताया कि पढ़ा लिखा नहीं हूँ इसलिए कह नहीं सकता। आधार कार्ड बनाने वाले ने पचास लिख दिया है लेकिन जहाँ तक याद है उम्र साठ साल होगी।

सहरता से बात करते हुए एक और बात जो याद रही वह थी कि स्कूलों में हमारी भाषा नहीं पढाई जाती है।  आपस में तो हम बात कर लेते हैं लेकिन हिंदी ने धीरे-धीरे हमारी भाषा को खत्म कर दिया है !

अंकुर जायसवाल युवा पत्रकार और शोधार्थी हैं।

1 Comment
  1. देवेन्द्र आर्य says

    1.शीर्षक दिहाड़ी मजदूरों का जीवन
    एक क्यों ? एक के बहाने बहुतों का हाल यही है
    2. दूसरों के लिए…..दूसरे आपका ध्यान रखने…..
    3.कबीर जयंती पर मेरी कविता ‘कबीर दास की लाइब्रेरी’ उचित लगे तो लगा सकते हैं ।

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