बॉलीवुड में महिला केन्द्रित सिनेमा और समाज   

राकेश कबीर

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बॉलीवुड सिनेमा का इतिहास सौ साल से ज्यादा पुराना है और महिलाओं के मुद्दों को लेकर समय-समय पर महत्वपूर्ण फ़िल्में भी बनी हैं। एक ऑडियो-विजुअल कला माध्यम के रूप में फिल्मों के विषय वस्तु से महिलाओं के बारे में समाज की भेदभावपूर्ण दृष्टि व सोच तथा पूर्वाग्रह भी चित्रित होते हैं। निःसंदेह सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रयासों से महिलाओं की परिस्थिति में लगातार सुधार हुए हैं और इनका प्रस्तुतिकरण भी बॉलीवुड की फिल्मों में हुआ है। वर्ष 2018 में प्रदर्शित हुई फिल्म ‘स्त्री’ ने महिलाओं के सम्मान के मुद्दे को हास्य और रहस्य के आवरण में समेटकर संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत किया जो दर्शकों के मनोरंजन करने के साथ-साथ समाज में स्त्रियों के दोयम दर्जे और उन्हें भोग मात्र की वस्तु समझने और उसके दुष्परिणामों के बारे में भी आगाह करती है।

‘स्त्री’ एक रहस्यमयी और भुतहा फिल्म जरुर है लेकिन इसके केंद्र में एक मेसेज है कि ‘यदि पुरुष महिलाओं का सम्मान नहीं करेंगे तो वो अपने अपमान का बदला लेके रहेंगी’। फिल्म का कथानक मध्य प्रदेश के एक छोटे से शहर चंदेरी पर केन्द्रित है। प्रत्येक साल सालाना मेले के समय चंदेरी शहर के लोग डरे-सहमे जीते हैं और दहशत के मारे पुरुष घर से बाहर निकलना बंद कर देते हैं कि कहीं मेले के समय सक्रिय होने वाली अदृश्य ‘स्त्री’ उन्हें नंगा करके गायब न कर दे. टोटके के तौर पर सभी लोग अपने घर के बाहर ‘ओ स्त्री कल आना’ पेंट करवा देते हैं ताकि स्त्री उनके घर के पुरुष को उठा न ले जाय। लोगों  का ये मानना है कि स्त्री पुरुषों के कपड़े उतारकर फेंक देती है और उन्हें गायब कर देती है क्योंकि वो एक अतृप्त आत्मा है जो अपने देह की भूख मिटाना चाहती है और इसीलिए पुरुषों को गायब करके पुरानी हवेली में डाल देती है। स्त्री की आत्मा को तृप्त करने के लिए शहर की वीरान हवेली में सुहागरात का दृश्य क्रियेट किया जाता है लेकिन स्त्री ये सब देखकर और ज्यादा नाराज और आक्रामक हो जाती है।  दूल्हे के रोल में नायक को आभास होता है कि स्त्री सेक्स नहीं सम्मान की भूखी है। फिल्म का सारा कथानक महिलाओ के बारे में पुरुषों की जमी-जमाई धारणाओं को एक-एक कर एक्सपोज करता है। असल में भारतीय पुरुष समाज बहुत हिप्पोक्रेटिक है और दोहरा जीवन जीता है वो परदे के पीछे सब कुछ भोगना चाहता है लेकिन सार्वजनिक तौर पर नैतिकता का झंडाबरदार हो जाता है. वेश्या और तवायफ के प्रति समाज का नजरिया कुछ इस तरह का है कि :

दिन में कोढ़ कहते हो,  रात में बेजोड़ कहते हो। 

स्त्री फिल्म में एक पात्र हैं शास्त्रीजी महिलाओं के प्रति समाज की दोषपूर्ण सोच और भेदभावपूर्ण तौर तरीकों से इतने आहत हैं कि सबसे दूर एकाकी जीवन जी रहे हैं जिसके कारण फिल्म के पात्र ‘वे इमरजेंसी में रहते हैं’ कहकर उनका परिचय कराते हैं। शास्त्रीजी इमरजेंसी में जीवन को हाइबरनेट पर डालकर ‘मुक्तिबोध के ब्रह्मराक्षस’ की तरह विद्वान होकर भी निर्वासित और अप्रासंगिक जीवन जी रहे होते हैं। शास्त्रीजी के पास समाधान है ‘स्त्री’ के प्रकोप से शहर को बचाने का और इस विषय पर एक  किताब भी लिख चुके हैं लेकिन वे किसी को समाधान बताना नहीं चाहते।  इसके पीछे पुरुषों और समस्त समाज का महिलाओ के प्रति पूर्वाग्रह भरा अपमानजनक रवैया है। उनकी झुंझलाहट भरी बातें और महिलओं  के प्रति उसकी सोच को सतही और घटिया बताकर जब समाधान पाने गयी टीम वापस आ रही होती है तो शास्त्री टोकते हैं ‘मेरी सोच घटिया नहीं है, सोच घटिया है इस समाज की सारे चंदेरी शहर कि जिसने स्त्री को अपमानित किया और उसे मार डाला। अब स्त्री इस शहर से बदला लेने पर उतारू है और शहर को इस आफत से केवल एक आदमी बचा सकता है और वो कौन है: समाज से बहिस्कृत, निंदनीय समझी जाने वाली एक तवायफ का बेटा, जो कि फिल्म का नायक है-

गोरा रंग नाक है लम्बी, समझे खुद को वो शहजादा, बरगद कि कोख में जन्मा, है वो एक तवायफजादा

यह फिल्म अपने कथानक में फेमिनिस्ट दृष्टिकोण से प्रभावित दिखती है। चुड़ैल के रूप में स्त्री पुरुषों से अपने अपमान का बदला लेती है लेकिन श्रद्धा कपूर ने जिस लड़की का रोल किया है उसका कोई नाम नहीं है वह हर साल मेले के समय कहीं बाहर से आती है और स्त्री की आत्मा को शांत कर उसे मुक्त कर उसकी सकारात्मक शक्ति को अर्जित करना चाहती है। अपने इस कार्य में वह समाधान चाहने वाले पुरुषों को रिजेक्ट नहीं करती बल्कि उनका सहयोग लेकर स्त्री के राज का पर्दाफाश करती है। चोटी के रूप में काटी गयी उसकी शक्ति को क्लाइमेक्स सीन में खुद की चोटी में जोड़कर अपनी शक्ति को बढ़ाते हुई दिखती है। एक स्त्री का दूसरी स्त्री के सम्मान की रक्षा के लिए आगे आना, अपने ‘कॉमन इंटरेस्ट’ के लिए एकजुट होना ही तो ‘वीमेन पॉवर कनेक्ट’ है और ‘दुनिया के महिलाओं एक हो’ जैसे नारीवादी स्लोगन को सार्थक करता है। यह सच है कि घर की चारदीवारी में कैद करने से लेकर पति की चिता में जलकर सती हो जाने को बाध्य करने वाले पितृसत्तात्मक भारतीय समाज ने लम्बे समय तक महिलाओ पर बहुत जुल्म किये हैं और उसे धार्मिक-सांस्कृतिक जरुरत बताकर सही भी ठहराया है। आज भी ये जुल्म और भेदभाव कम नहीं हुए हैं। लगातार दो-तीन लडकियां पैदा करने पर एक महिला को घर से खदेड़ दिया जाता है, रोज ही ऐसी सताई हुई महिलाओं को हम खुद अपने दफ्तर में देखते रहते हैं।  ऐसे तमाम तरह के जुल्म का बदला लेने के लिए हर स्त्री ‘बैंडिट क्वीन’ तो नहीं बन सकती इसलिए लोकप्रचलित मुहावरों के आवरण में भूत-चुड़ैल की प्रतीकात्मक सर्वसुलभ समझ के सहारे ‘स्त्री’ जैसी फिल्मो के माध्यम से महिलाओं के प्रति एक सम्मान भरी समझ बनाने का आसान रास्ता बॉलीवुड की फिल्मे अक्सर अपनाती हैं।

प्रत्येक दस वर्षीय जनगणना में हम पाते हैं कि महिलाओं और बच्चियों की संख्या में लगातार कमी हो रही है। बेटियों को कोख में ही मार दिया जाता है या पैदा होने के बाद लगातार अत्याचार होते हैं जिसके कारण उनका अनुपात घटता जा रहा है।

वास्तविक मुद्दों का फ़िल्मी प्रक्षेपण  

फ़िल्में साहित्य की ही तरह अपने ‘समय का दस्तावेज’ (आंशिक या पूर्णतः) हैं। यदि हम महिलाओं से जुड़े मुद्दों और फिल्मों में उनके चित्रण की बात करें तो भारी गैप दिखता है। संवैधानिक संस्थाएं जहाँ महिलाओं के हितों की रक्षक और बराबरी की बात करती हैं, उनके पक्ष में फैसले देती हैं वहीँ दूसरी तरफ परम्परा के नाम पर लोग महिलाओं को बराबरी का हक देने को तैयार नहीं हैं। आज देश में एक तरफ सबरीमाला का मुद्दा है जहां  के मंदिर में महिलाओं को उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बावजूद घुसने नहीं  दिया जाता है। मजे की बात यह है कि विरोध करने वालों में महिलायें स्वयं सबसे आगे हैं। दूसरी तरफ तीन तलाक के मुद्दे को लेकर भी बहस गर्म है जबकि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में भी महिलाओं के पक्ष में ही फैसला दिया है। दोनों ही मामलों में पितृसत्तात्मक विचारधारा के पक्षधर महिलाओं को समानता के अधिकार का प्रबल विरोध करते देखे जा सकते हैं। सत्ताधारी पुरुष वर्ग अपने सदियों पुराने वर्चस्व को कम नहीं  होने नहीं देना चाहता इसलिए कोर्ट आदेश के बाद भी महिलाओं के हक में हुए फैसलों का विरोध करता और करवाता है। टेलीविजन के धारावाहिकों ने आजकल भूत-प्रेत-चुड़ैल का ऐसा अंधविश्वास भरा माहौल रोज रात में तैयार कर रखा है कि किसी महिला को चुड़ैल या जादूगरनी बताकर सरेआम नंगा कर बाज़ार में घुमाया जाता है और पीट-पीटकर हत्या भी कर दी जाती है। ऐसी नीच और निंदनीय हरकत करने वाला समाज हमारे बीच फल-फूल रहा है।  भीड़ इकठ्ठा कर प्रेमियों को पेड़ से बांधकर पीटना, अपमानित करना इज्ज़त और परम्परा बचाने लिए जरुरी काम समझा जाना एक स्वस्थ समाज के लिए बहुत ही हानिप्रद और शर्मनाक है। बॉलीवुड की कुछ गिनी-चुनी फ़िल्में भारतीय महिलाओं  के इन मुद्दों को जरुर उठाती रहती हैं परन्तु उनकी संख्या नगण्य है। आमिर खान की ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ की नाबालिग लड़की ‘इन्सिया मालिक’ अपनी माँ को अपने घटिया सोच और हिंसक व्यवहार वाले पिता से मुक्त कराने के लिए तलाक लेने न केवल सलाह देती है बल्कि फिल्म के क्लाइमेक्स पर तलाक कराने में सफल भी होती है। माँ और बेटी अपनी इस जीत को पितृसत्ता के विरूद्ध जीते गए युद्ध के रूप में सेलेब्रेट करती हैं। इस फिल्म को देखना एक सुखद एहसास देता है। ‘भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन’ ने मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक के दुष्प्रभाव से बचाने के लिए लम्बी लड़ाई लड़ी और कोर्ट से जीता भी लेकिन ये फिल्म किसी घुटन भरे रिश्ते से मुक्त होने के लिए तलाक को जरुरी बताती है। महिलाओं को मस्जिद जाने का अधिकार, काजी मौलवी होने का आधिकार भी विभिन्न आंदोलनों और असर्सन से मिला है लेकिन लव जिहाद का सिद्धांत का इतना प्रोपेगंडा किया गया है कि फिल्म के चरित्र भी इनसे डरते नजर आते हैं। जोधा-अकबर, और पद्मावत जैसी फिल्मों  का हिंसक विरोध बताता है कि लोग ऐतिहासिक और मिथकीय चरित्रों के फिल्मांकन से भी आहत होने लगे हैं। आइडेंटिटी को लेकर इस कदर सतर्क होना समाज की बीमार होती मानसिकता का परिचायक है। अभी केदारनाथ त्रासदी पर इसी शीर्षक से बनी फिल्म में मुस्लिम नायक और हिन्दू नायिका को लेकर लव जिहाद का समर्थक बताकर विरोध किया गया. ‘बोम्बे’ फिल्म के समय भी इसी तरह का विरोध मुस्लिम नायिका और हिन्दू नायक के कारण देखा गया था। हमारा समाज महिलाओं को मानसिक रूप से इतना कमजोर समझता है या उन्हें अपने प्रेमी, पति या दोस्त का चयन करने का भी अधिकार नहीं देना चाहता और उन्हें अपराधी मानकर इज्ज़त के नाम पर जिन्दा जला देने में भी परहेज नहीं करता। प्रत्येक दस वर्षीय जनगणना में हम पाते हैं कि महिलाओं और बच्चियों की संख्या में लगातार कमी हो रही है। बेटियों को कोख में ही मार दिया जाता है या पैदा होने के बाद लगातार अत्याचार होते हैं जिसके कारण उनका अनुपात घटता जा रहा है। अपहरण और सामूहिक रेप की बढ़ती घटनाएँ  इस मातृपूजक किन्तु पुरुषवादी समाज के हिपोक्रेटिक और घिनौने चेहरे को सामने रखती हैं. ‘मातृभूमि: अ नेशन विडाउट वुमन’ फिल्म में भारत भूमि को ऐसे देश के रूप में दिखाया गया था जहाँ महिलाओं की संख्या इस कदर कम हो चुकी है कि घर के सारे पुरुष एक नवविवाहिता की देह को भोग लेना चाहते हैं, उसको जानवरों के साथ बाँध कर रखा जाता है जहां गाँव के सारे पुरुष उसका बलात्कार करते हैं और लड़की विरोध भी नहीं कर पाती।  इस फिल्म को देखते हुए मंटो की भयानक कहानी ‘खोल दो’ का कथानक सामने आ जाता है। फिल्में पूर्णतः सच तो नहीं लेकिन आईना जरुर हैं। डॉ आंबेडकर ने बहुत महत्वपूर्ण बात कही है कि “किसी देश की प्रगति को आंकना हो तो वहां की महिलाओं की परिस्थिति  में आये बदलाव से मापा जा सकता है”। एक समाज, एक राष्ट्र के रूप में अपना आकलन करते ही रहना चाहिए.

महिला मुद्दों को उठाती प्रमुख बॉलीवुड फ़िल्में

सौ साल से ज्यादा समयांतराल में महिलाओं के जीवन के विभिन्न मुद्दों पर बनी फिल्मों में से कुछ फिल्मों की सूची यहाँ दी जा रही है जिनके सहारे हम बॉलीवुड में महिलओं के चित्रण में हुए बदलावों और उनके प्रति बढ़ती समझदारी और ज़िम्मेदारी को भी समझ सकते हैं:

अछूत कन्या 1936, बंदिनी 1963, सुजाता 1979, मदर इंडिया 1957, सीता और गीता 1972, भूमिका 1977, अर्थ 1982, , निकाह 1982, उमराव जान 1981, सारांश 1984, मिर्च मसाला 1987, दामिनी 1993, बैंडिट क्वीन 1994, मृत्युदंड 1997, गॉडमदर 1999,  क्या कहना 2000, अस्तित्व 2000, बवंडर 2000, फिजा 2000, जुबेदा 2001, चांदनी बार 2001, लज्जा 2001, फ़िलहाल 2002, लीला 2002, मातृभूमि: अ नेशन विदाउट वुमन 2003,  पिंजर 2003, चमेली 2003, फिर मिलेंगे 2004, ऐतराज़ 2004, स्वदेस 2004, वाटर 2005, ब्लैक 2005, परिणीता 2005, पेज 3-2005, डोर 2006, आजा नच ले 2007, चक दे इंडिया 2007, फैशन 2008, आयशा 2010,  बोल 2011, द डर्टी पिक्चर 2011, सात खून माफ़ 2011, नो वन किल्ड जेसिका 2011, काकटेल 2012, हीरोइन 2012, कहानी 2012, इंग्लिश विंग्लिश 2012, गोलियों की रासलीला रामलीला 2013, क्वीन 2013, मार्गरिटा विथ अ स्ट्रॉ 2014, फाइंडिंग फैनी 2014, गुलाब गैंग 2014, बॉबी जासूस 2014, हाईवे 2014, मर्दानी 2014, मैरी कोम 2014, खूबसूरत (1980, 2014),  एन एच 10-2015, पीकू 2015, तनु वेड्स मनु रिटर्न्स 2015, एंग्री इंडियन गोडस 2015, निल बटे सन्नाटा 2015, पिंक 2016, पार्चड 2016, दंगल 2016, नीरजा 2016, बाजीराव मस्तानी 2016, नाम शबाना 2017, सीक्रेट सुपरस्टार 2017, मोम 2017, लिपस्टिक अंडर माय बुरका 2017, पूर्णा 2017, बद्रीनाथ की दुल्हनिया 2017, अनारकली ऑफ़ आरा 2017, बेगम जान 2017, शादी में जरुर आना 2018, नूर 2018, स्त्री 2018, हेलिकोपटर इला 2018, हिचकी 2018, वीरे दी वेडिंग 2018, तुम्हारी सुलू 2018, राज़ी 2018, मणिकर्णिका 2019, एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा 2019 इत्यादि.

‘म्हारी छोरियां छोरों से कम हैं क्या’ जैसा शानदार मुहावरा देने वाली फिल्म दंगल जिसका जुनूनी पहलवान बाप दुनिया के ताने, बुराई सुनकर भी अपनी बेटियों को अन्तराष्ट्रीय स्तर का पहलवान बनाकर मानता है, एक प्रेरणा देने वाली फिल्म है। यह फिल्म पुरुष और महिलाओं के बीच के सदियों पुरानी गहरी खाई को पाटने का काम करती है और भारत ही नहीं चीन और दुनिया भर को एक सकारात्मक सन्देश देने का काम करती है। आमिर खान ने अपनी दूसरी फिल्म ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ में भी टीनएज मुस्लिम लड़की जो कि एक प्रतिभावान सिंगर है के पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष को दिखाती है। ‘बद्रीनाथ कि दुल्हनिया’ और ‘शादी में जरुर आना’ फिल्मों की नायिकाएं अपने कैरियर और पसंद के काम को प्रेम और शादी से ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हुए स्वतंत्र निर्णय लेती हैं. समाज के स्थान पर वे अपने ‘सेल्फ’ को ज्यादा तरजीह देने वाली महिलाये हैं जो अपने पब्लिक स्पेस को सुरक्षित रखने और हक़ और हुकुक कि खातिर रिस्क लेने में भी नहीं हिचकती। बहुत पहले ‘गाइड’ फिल्म की नायिका ने अपने पति को छोड़कर टूरिस्ट गाइड के साथ भागकर प्रेम के लिए विद्रोह कर विवाह कि परम्परागत संस्था को खुला चैलेन्ज दिया था। आज 2019 की फिल्म ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ फिल्म में ‘सोनम कपूर’ ने एक लेस्बियन लड़की का किरदार निभाया है जिसमे उनके पिता अनिल कपूर ने भी काम किया है। ‘वीरे दी वेडिंग’ चार दोस्त लड़कियां बिंदास अंदाज में जीवन को एन्जॉय करती हैं और किसी पुरुष का साथ होना उनके लिए जरुरी नहीं। ‘तुम्हारी सुलू’ अपने विषय वस्तु में नयी होने के बावजूद महिलाओं की सेक्सुअलिटी को रेडियो जॉकी के आवाज के माध्यम से परोसने का चित्रण करती है। मुंबई महानगर की एक सामान्य गृहिणी जिसे गंवार और अनफिट समझा जाता है अपनी अलग शैली के प्रस्तुतिकरण के कारण रात की रेडियो जॉकी के रूप में पहचान मिलती है जो फ्रस्टेटेड पुरुषो का मनोरंजन करती है। ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ की नाचने गाने वाली महिला और ‘पिंक’ की शहरी कामकाजी लड़कियां जिन्हें लेट नाइट घर से बाहर रहने, पार्टियों में जाने, पुरुषों से हंसकर बात करने के कारण उन्हें बदचलन समझ लिया जाता है और रसूख वाले मर्द उन्हें सरेआम भोग लेना चाहते हैं, एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाती हैं. वह है महिलाओं की असहमति का, ‘ना’ कहने का अधिकार जिसे इस देश के संविधान और कानून का समर्थन प्राप्त है। कहीं खुद के हौसले से तो कहीं कोर्ट और कानून से महिलाएं जीतने तक जद्दोजहद करती हैं। बवंडर की भंवरी देवी की तरह वे शोषण का शिकार होकर भी कानून से हारती नहीं, इक्कीसवी सदी के भारत में जीतकर दोषियों को सजा भी दिलाती हैं।

फिल्म वॉटर का एक दृश्य

यदि ऊपर दिए गए फिल्मों के विषय वस्तु का हम विश्लेषण करे तो पाएंगे कि महिलाओं को कुछ ‘स्टीरियोटाइप्ड परम्परागत छवि’ में ही दिखाया जाता रहा है। प्रियंका श्रीवास्तव (इंडिया टुडे 11 अक्टूबर 2014) ने अपने एक लेख में बॉलीवुड फिल्मों कि महिलाओं को निम्न प्रकार वर्गीकृत किया है: अबला नारी –सन सत्तर के दशक में ऐसी नायिकाओं का दौर था जब वे खलनायक के शोषण से बचने के लिए गुहार लगाती थीं “भगवान के लिए मुझे छोड़ दो”। नायक की बहन को अक्सर ऐसी भूमिकाओं में दिखाया गया जैसे ‘आखिरी रास्ता’ फिल्म में अमिताभ और ‘आगाज’ फिल्म में सुनील शेट्टी की बहन की भूमिकाएं। संस्कारी लड़की-राजश्री प्रोडक्शन की ‘हम आपके हैं कौन’ और ‘विवाह’ जैसी फिल्मों में ऐसी नायिकाएं अनिवार्य रूप से मिल जाएँगी जो सुबह जल्दी उठकर भजन गाती हैं, खाना बनाती हैं और माँ-बाप सभी की बात मानती हैं और हीरो उनसे शादी के लिए फट से राजी हो जाता है। ससुराल में भी वे सबकी चहेती होती हैं। ‘कालिया’ फिल्म में परवीन बॉबी के रोल को याद कीजिये जो एक जेब काटने वाली लड़की है लेकिन शादी करने के लिए साड़ी में संस्कारी लड़की बनकर परदे पर आती है। आज भी हमारे समाज में संस्कारी लड़की/बहू की चाहत में कोई कमी नहीं आई है। वास्तव में फिल्मकारों ने भारतीय संस्कृति की सुप्रीमेसी को दिखाने के लिए ऐसी बहुत सी फिल्मे बनाई कि वेस्टर्न कपड़ों और रहन-सहन में एक लड़की स्वीकार्य नहीं है, उसे साड़ी पहनकर आदर्श बहन और बहू के रूप में बदलना होगा, ‘पूरब और पच्छिम’ में सायरा बानो, दीवार और जूली जैसी फिल्मों की नायिकाएं भी संस्कारी लड़की बनकर ही स्वीकार्य हो पाती हैं।  माँ- निरूपा रॉय, सुषमा सेठ, राखी, रीमा लागू, अरुणा इरानी फ़िल्मी परदे की सम्मनित माँ हैं जिन्हें प्रत्येक हिन्दुस्तानी पहचानता है।  बुरी लड़की- दीपिका पादुकोण कॉकटेल, कंगना इन तनु वेड्स मनु।  वैम्प/आइटम गर्ल-  हेलेन, बिंदु, प्रियंका चोपड़ा इन राम-लीला, अपमानित और बदले की भावना से प्रेरित- 1980 के दशक के महिला प्रधान फिल्मों में अपने प्रेमी या पति की हत्या, खुद या परिवार कि महिला की इज्ज़त से खिलवाड़ करने वालों के विरुद्ध हथियार उठाने वाली महिलओं  ने बदले की आग में दोषियों को फ़िल्मी परदे पर सबक सिखाया और मजबूत होते महिला किरदारों के साथ समाज में आ रहे सामयिक बदलावों को भी रजत पट पर प्रस्तुत किया। श्रीदेवी (शेरनी, नगीना), रेखा (भ्रष्टाचार, खून भरी मांग) और डिंपल कपाडिया (जख्मी औरत, गुनाहों का फैसला, आज की औरत) ने ऐसी कई फिल्मों में किरदार निभाए। फूलन देवी की बायोपिक ‘बैंडिट क्वीन’ सच्ची घटना पर आधारित इस श्रेणी कि बेहतरीन फिल्म है जिसकी नायिका अपने अपमान का बदला लेने के लिए डकैत बन जाती है।

सन 1935 में आई हिंदी फिल्म ‘हंटरवाली’ जिसमे फियरलेस नाडिया (मैरी एवांस) ने एक स्टंट करने वाली एंग्लो-एशियाई नायिका का रोल किया था। महिला प्रधान यह फिल्म जबरदस्त सफल हुई थी। इसके सीक्वल के रूप में ‘हंटरवाली की बेटी’ सन 1943 में बनी। सुपर कैबरे डांसर ‘हेलेन’ की भूमिकाओं ने आजाद भारत में एंग्लो-एशियाई महिलाओं तक भारतीय मर्दों की पहुँच को परदे पर दिखाकर उनके वर्षों पुराने फ्रस्टेसन को दूर करने का कार्य किया। उस दौर से निकलकर और लम्बी दूरी तय करके बॉलीवुड में महिला मुद्दों का सिनेमा आज ‘पेज थ्री, मैरी कोम, पिंक, शादी में जरुर आना, दंगल, सीक्रेट सुपरस्टार, टॉयलेट, पैडमैन, राज़ी और मुल्क तक पहुँच चुकी हैं जिनके नारी चरित्र अपने जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय स्वयम लेते हैं. शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, शादी, दोस्ती के बारे में अपने मानक खुद तय करते हैं।  पत्रकार, वकील, खिलाडी, देशभक्त, जासूस, समाज सुधारक एक्टिविस्ट और गायक सब कुछ उन्हें बनना है और अपने प्रोफेशन में अव्वल भी रहना है। वे अपनी सेक्सुअलिटी को  लेकर सजग हैं। अपने क़ानूनी अधिकारों को वे जानती हैं और आसानी से किसी के सामने सरेंडर नहीं करती। इतना ही नहीं सिंगल वीमेन, लिव-इन-रिलेशनशिप से आगे बढकर आज की लड़कियां होमोसेक्सुँलिटी को भी लेकर शर्मिंदा नहीं है जिसे कोर्ट ने भी डी-क्रिमिनालाइज कर दिया है। परन्तु महिलाओं के मुद्दों को प्रमुखता से उठाने वाला सिनेमा अभी बहुत कम मात्रा में ही बॉलीवुड में दिखता है। प्यार-मोहब्बत, नाच-गाना, जाति-धर्म, स्कूल-कालेज, गिटार लिए खानदानी हीरो-हीरोइन बिना किसी मुद्दे और संघर्ष के चमक-दमक और विसुअल इफ़ेक्ट के सहारे अरबपति बनने में लगे हैं। जल-जंगल-जमीन और रोज-रोज के जीवन के लिए संघर्ष करने वाली दलित-आदिवासी और शहरी निम्न मध्यवर्गीय कामकाजी महिलाएं सिनेमा के परदे से गायब हैं।  तमाम परिवर्तनों के बावजूद  भारतीय समाज अभी भी जाति-धर्म के दायरों से बाहर निकलने को तैयार नहीं है और लव-जिहाद के नफरती सिद्धांत के प्रभाव में महिलाओं के ‘राइट ऑफ़ चॉइस’ के अधिकार को रिजेक्ट कर अपनी तथाकथित इज्ज़त बचाने के लिए लड़कियों को निर्मम सजाएँ देने में लगा हुआ है।

प्रमुख महिला निदेशक

भारतीय फिल्म उद्योग में अपर्णा सेन, दीपा मेहता, मीरा नैयर, कल्पना लाजिमी, तनूजा चंद्रा, फराह खान, जोया अख्तर, मेघना गुलज़ार, रीमा कागती, गौरी शिंदे, कोंकना सेन शर्मा, अश्विनी अय्यर तिवारी, नंदिता दास, लीना यादव, शैली चोपड़ा धर जैसी सफल और नामचीन महिला निदेशक हैं जिन्होंने न केवल महिला जीवन से जुड़े मुद्दों पर गंभीर विमर्शों वाली फ़िल्में बल्कि सामान्य विषयों पर भी बड़े कैनवास पर बेहतरीन और व्यावसायिक रूप से सफल फ़िल्में बनाई हैं।

अंततः     

फिल्म मैरी कॉम

सोशल मीडिया और शॉर्ट  फिल्केमों  दौर ने संवेदनशील विषयों पर महत्वपूर्ण कंटेंट उपलब्ध कराया है। आप ध्यान से एक बार दीपिका पादुकोण पर फिल्माए गए ‘माय चॉइस’ के शॉर्ट फ़िल्मों को देखिये और सुनिए। एक महिला अपने देह, कैरियर, घर, प्रेम, शादी, ड्रेस, माँ बनना न बनना जैसे जीवन के तमाम विषयों पर अपनी पसंद, निर्णय और चुनाव पर कितना एम्फेसिस देती है। पुरुष वर्चस्व के मूल्यों के प्रभाव में महिलायें चेतन या अचेतन रूप में जीवन भर दूसरों का अनुसरण करती हैं। इस फिल्म ने रातोंरात देश भर में सनसनी फैला दी थी। मी टू कैम्पेन भी अमेरिका से चलकर भारत तक पहुंचा और बॉलीवुड में तनुश्री दत्ता और कंगना रानावत जैसी महिलाओं ने बड़े साहस से फिल्म इंडस्ट्री के मठाधीशों को बेनकाब किया। क्षेत्रवाद, खानदानवाद, रंगभेद जैसे मुद्दों पर अब महिलाएं मुखर हैं। इन सबके बावजूद ‘ओब्ज्क्टिफिकेशन ऑफ़ फीमेल बॉडी’ बॉलीवुड की कड़वी हकीकत है।

बॉलीवुड फिल्मों के इतिहास का अध्ययन करने पर हम पाते हैं कि आरम्भिक दौर में पुरुष ही नायिका का भी रोल किया करते थे क्योंकि अभिनय को अच्छा कार्य नहीं माना जाता था। बाद में तवायफों ने फिल्मों में गाने और अभिनय का काम किया। धीरे-धीरे कुछ इस स्थिति में सुधार हुआ और आज ये हालात हैं कि उच्च शिक्षित और उच्च आय वाले परिवारों की लड़कियां फिल्म उद्योग में भरी पड़ी हैं। मिस इंडिया, मिस वर्ल्ड और अन्य ब्यूटी कांटेस्ट में भाग लेने व जीतने वाली लड़कियां अनिवार्य रूप से फिल्मों में काम कर करोड़ों रुपये कमाने का लक्ष्य रखती हैं। हीरोइन वैम्प, पॉजिटिव, ग्रे और नेगेटिव भूमिकायें, डांस नंबर्स और कैबरे सभी लडकियां आज करने लगी हैं इसके लिए हेलेन, अरुणा इरानी और बिंदु के अलग कैडर की अब जरुरत नहीं रही। 

बीते समय में समाज में हुए विभिन्न तरह के परिवर्तनों के क्रम में महिलओं और उनके मुद्दों के चित्रण में भी बदलाव हुआ है। ये बदलाव न केवल महिला केन्द्रित फिल्मों की संख्या के बढ़ने में हुआ है बल्कि विषयों कि विविधता में भी साफ़ तौर पर देखा जा सकता है। घर से बाहर निकलकर शिक्षा और रोजगार की तलाश में दुनियायावी जद्दोजहद में शामिल होने के साथ ही महिलाओं से जुड़े मुदों में भी विविधता आई है। आज वो पत्रकार (पेज 3) हैं, टीचर हैं, वर्किंग मदर हैं थोड़ी ‘रोल कनफ्लिक्ट’ जरुर है लेकिन ‘घर-बाहर’ और ‘परम्परागत-आधुनिक’ भूमिकाओं में सामंजस्य बिठाकर जीवन जी पा रही हैं। बॉलीवुड में ये देखना फिलहाल संतोषजनक है कि महिलाओं के जीवन से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर फिल्मे बनने लगी हैं।

मातृशक्ति के पूजन का विशाल आयोजन करने वाला भारतीय समाज महिलाओं के ‘अलौकिक शक्ति वाले’ और ‘रहस्यमयी नकारात्मक शक्ति’ वाले चुड़ैल रूपों से ही डरता है सामान्य स्त्री से नहीं। एकतरफा प्यार और प्यार में नाकाम रहने वाले पुरुष एसिड अटैक, मर्डर, और गैंग रेप कर महिलाओं को अपमानित करने का काम करते हैं. महिलाओं के खिलाफ होने वाले विभिन्न तरह के अपराधों के आंकड़े भयावह हैं।  महिलाओं के हक और हुकूक की बात रखने और सम्मान और बराबरी लाने में बॉलीवुड बहुत अहम रोल अदा कर सकता हैभगवान हर जगह नहीं पहुँच सकता इसीलिए उसने माँ को बनाया है’ (फिल्म-मोम २०१७) जैसा सम्वाद देने वाला बॉलीवुड निश्चित रूप से स्त्री अधिकारों के प्रति  प्रगतिशील दृष्टिकोण अपनाने लगा है।  उम्मीद है कुछ और बेहतरीन फिल्मे महिला मुद्दों और उनके संघर्षो पर केन्द्रित करके बनेगी और नया विमर्श रचने में भी कामयाब होंगी।

 

संदर्भ

बॉलीवुड अ हिस्ट्री: मिहिर बोस

फिल्म्स एंड फेमिनिस्म: जसबीर जैन एवं सुधा राय

स्त्री संघर्ष का इतिहास: राधा कुमार

1 Comment
  1. दीपक शर्मा says

    स्त्री के मुद्दे पर बहुत अच्छा लेख। आलेख पढ़ने के बाद सुची में शामिल सारी फिल्मों को देखने की जिज्ञासा हो रही है। फिलहाल राकेश कबीर सर को इस महत्वपूर्ण लेख के लिए बधाई।

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