मैं उर्दू बोलूं : अमन और भाईचारे का उद्घोष

राजू पाण्डेय

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किताब का शीर्षक- मैं उर्दू बोलूं– न केवल मौजूं है बल्कि यह इस या उस मुल्क और मज़हब की फिरकापरस्त और कट्टरपंथी ताकतों के लिए शायर का एक स्टेटमेंट है- उर्दू ज़बान को- या व्यापक तौर पर कहें तो किसी भी जिंदा ज़बान को- देश और धर्म की सीमाओं में कैद नहीं किया जा सकता।
जब हम अजय सहाब के- मैं उर्दू बोलूं – से गुजरते हैं तब हमें ज्ञात होता है कि देवनागरी में इस शेरी मजमूए का प्रकाशन केवल पाठकीय सुविधा की दृष्टि से नहीं किया गया है बल्कि इसके पीछे एक व्यापक, बहुत गहरा उद्देश्य भी है। अजय सहाब बहुपठित हैं और इतिहास उनका प्रिय विषय रहा है। उनके जेहन में हिंदी-उर्दू विवाद का वह लंबा तल्ख़ सिलसिला कहीं बहुत गहरे पैठा हुआ है जिसने न केवल हिंदी और उर्दू को संकीर्ण बनाने की कोशिश की बल्कि हिंदू-मुसलमानों को एक दूसरे से दूर करने की नई वजह भी गढ़ी जो ज़बान को मज़हब से जोड़ने की शरारत पर आधारित थी।

मैं उर्दू बोलूँ को समझने के लिए हमें उर्दू अदब की उस ट्रेडिशन को समझना होगा अजय सहाब जिसका प्रतिनिधित्व करते हैं। यह वह परंपरा है जो उर्दू को भारत की आज़ादी की लड़ाई की ज़बान बना देती है। समझ में नहीं आता कहाँ से शुरू किया जाए- राजा राम नारायण मौजूं, मीर, हातिम, मुशफी, मौलाना मोहम्मद अली जौहर, मौलाना आजाद और मौलाना हसरत मोहानी, प्रेमचंद, सआदत हसन मंटो, अली अब्बास हुसैनी, कृष्ण चन्द्र, इस्मत चुग़ताई और राजेंद्र सिंह बेदी- वे चंद नाम हैं जिन्हें उर्दू के माध्यम से आज़ादी की अलख जगाने वालों की बहुत लंबी फेहरिस्त से अभी याद कर पा रहा हूँ।

 

आज जब हिंदी के तत्समीकरण और उर्दू के फारसीकरण की आहट सोशल मीडिया के जरिए सुनाई देती है, हिंदी और उर्दू को दो दुश्मन जबानों की तरह पेश करने के लिए मिथ्या इतिहास पर आधारित वायरल पोस्ट्स विमर्श में फेंकी जाती हैं तब अजय पाण्डेय सहाब द्वारा साहित्य सृजन के लिए उर्दू का चयन और अपनी रचनाओं को देवनागरी में प्रकाशित करने का निर्णय इस देश के सेकुलर कैरेक्टर को बचाने की किसी मुहिम का बुलंद ऐलान लगता है। अजय ने अपनी रचनाओं का हिंदी अनुवाद नहीं किया क्योंकि उनका उद्देश्य कुछ और था। लिपि के विवाद ने देश के बंटवारे में योगदान दिया था, आज देवनागरी के माध्यम से अजय सहाब उर्दू की मोहब्बत फैलाने की और लोगों को जोड़ने की ताक़त को उजागर कर रहे हैं।
मैं उर्दू बोलूँ को समझने के लिए हमें उर्दू अदब की उस ट्रेडिशन को समझना होगा अजय सहाब जिसका प्रतिनिधित्व करते हैं। यह वह परंपरा है जो उर्दू को भारत की आज़ादी की लड़ाई की ज़बान बना देती है। समझ में नहीं आता कहाँ से शुरू किया जाए- राजा राम नारायण मौजूं, मीर, हातिम, मुशफी, मौलाना मोहम्मद अली जौहर, मौलाना आजाद और मौलाना हसरत मोहानी, प्रेमचंद, सआदत हसन मंटो, अली अब्बास हुसैनी, कृष्ण चन्द्र, इस्मत चुग़ताई और राजेंद्र सिंह बेदी- वे चंद नाम हैं जिन्हें उर्दू के माध्यम से आज़ादी की अलख जगाने वालों की बहुत लंबी फेहरिस्त से अभी याद कर पा रहा हूँ। आज़ादी की लड़ाई के ‘इंकलाब जिंदाबाद’ जैसे कुछ सबसे पॉपुलर नारे और लहू में गर्मी पैदा कर देने वाले कुछ बेहतरीन शेर उर्दू के ही तो हैं।
‘मैं उर्दू बोलूँ’ को – अगर उसकी तमाम खासियतों को नजरअंदाज भी कर दिया जाए तब भी- उर्दू भाषा को जिंदा, जनोन्मुख और सेकुलर बनाए रखने के एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में याद रखा जाएगा। यह उर्दू ही है जिसके जरिए अजय सहाब ने ग़ुलाम भारत की पीड़ा और आज़ाद भारत की विडंबनाओं का अनुभव किया है-
सीखा इसी से दर्द ये हिन्दोस्तान का
बचपन से मुझपे क़र्ज़ है उर्दू ज़बान का(पृष्ठ 181)
उर्दू अजय सहाब के लिए कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति का जरिया भी है और जड़ समाज में क्रांतिचेतना उत्पन्न करने में सक्षम विस्फोटक भाषा भी-
बात नफ़रत की हो करनी तो ज़बानें हैं कई
जब मुझे प्यार जताना हो मैं उर्दू बोलूं
बर्फ़ सी ठंडी फ़जाओं में भी लफ्जों से सहाब
आग के फूल खिलाना हो मैं उर्दू बोलूं(पृष्ठ 17)
हिन्दोस्तान की गंगा-जमनी तहज़ीब को अगर महसूस करना है तो हमें उर्दू के पास बैठना-बतियाना होगा-
है मेरे हिन्द की तहज़ीब की पैकर उर्दू
अपनी इस साझा विरासत की है दुख्तर उर्दू
हिन्द की मिट्टी का हर रंग मिला है तुझमें
सारी नदियों से बनी है तू समंदर उर्दू(पृष्ठ 70)

अजय सहाब स्त्री विमर्श के कवि तो नहीं हैं किंतु संग्रह में करीब दर्जन भर ग़ज़लें ऐसी हैं जिनमें नारी अपने पवित्रतम और और सर्वाधिक पूजनीय रूप में हमें मिलती है- वह रूप है माँ का। आतंकवाद ने भारतीय उपमहाद्वीप को बुरी तरह प्रभावित किया है और हमारा सौभाग्य है कि हर मुल्क के शायरों ने इसकी जमकर निंदा की है। अजय सहाब की रचनाएं कठोरतम अभिव्यक्तियों का प्रयोग हिंसा की निंदा के लिए करती हैं।

 

चाहे वे मुस्लिम कट्टरपंथी हों या धर्मांध हिन्दू, अगर वे उर्दू और हिंदी को किसी खास मजहब की भाषा बनाना चाहेंगे तो अजय सहाब के लिए यह नाक़ाबिलेबर्दाश्त है-
हिंदी को मत लड़ाइये उर्दू ज़बान से
दुनिया की हर ज़बान को रहना है शान से
लफ़्ज़ों का सिर्फ फ़र्क़ है, माँ है जमीन-ए- हिन्द
दोनों का बचपना कटा एक ही मकान से(पृष्ठ 151)
उर्दू का मतलब सहाब के लिए मिठास और सुकून है-
वही तिश्नगी, वही बेकली, बड़ी तल्ख़ है यहाँ जिंदगी
मेरे जेहन-ओ-दिल को मिठास दे, मुझे उर्दू जैसी ज़बान दे(पृष्ठ 35)
उर्दू भाषा की जीवंतता, प्रगतिशीलता और प्रयोगधर्मिता वह विरासत है जिसे सहाब अपनी शायरी में संरक्षित-परिवर्धित कर रहे हैं। उर्दू ने बहुत कम समय में बोली से भाषा तक का सफर तय किया है। उर्दू शायरी में शैली, भाषा और विषय वस्तु की दृष्टि से अनेक प्रयोग किए गए हैं। सॉनेट, बैलैड जैसे पश्चिम के छंद और जापान का हाइकु भी उर्दू में आजमाया गया है।1947 के बाद उर्दू साहित्य पर पश्चिम का प्रभाव पड़ा और लंबी तथा आधुनिक कविताओं की रचना हुई। इसी दौरान गीति नाट्य का दौर भी आया। तीस और चालीस के दशक में हलका ए अरबाब ए ज़ौक़ और साठ के दशक में ‘नई शायरी की तहरीक’ जैसे आंदोलन उर्दू ने देखे हैं। एक आंदोलन एन्टी ग़ज़ल का भी चला किंतु सफल न हो पाया। किश्वर नाहिद, मीराजी और और एन एम राशिद ने मुक्त छंद को लोकप्रिय बनाया। पाकिस्तानी समाज में बंधनों में जकड़ी नारी की गहन पीड़ा को अभिव्यक्ति देने वाली फहमीदा रियाज और किश्वर नाहिद जैसी कवयित्रियां भी उर्दू अदब का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
अजय सहाब भी हमें भाषा, शिल्प और कथ्य की दृष्टि से अनेक नए प्रयोग करते दिखते हैं। इस संग्रह में स्थान-स्थान पर नए काफ़िये, नई उपमाएं और नए विम्ब दिखते हैं जो उत्तर आधुनिक समाज के जटिल भावबोध की अभिव्यक्ति में सक्षम हैं।
अजय सहाब स्त्री विमर्श के कवि तो नहीं हैं किंतु संग्रह में करीब दर्जन भर ग़ज़लें ऐसी हैं  जिनमें नारी अपने पवित्रतम और और सर्वाधिक पूजनीय रूप में हमें मिलती है- वह रूप है माँ का।
आतंकवाद ने भारतीय उपमहाद्वीप को बुरी तरह प्रभावित किया है और हमारा सौभाग्य है कि हर मुल्क के शायरों ने इसकी जमकर निंदा की है। अजय सहाब की रचनाएं कठोरतम अभिव्यक्तियों का प्रयोग हिंसा की निंदा के लिए करती हैं। कश्मीरनामा(पृष्ठ 98)  कविता आतंकी हिंसा के शिकार कश्मीरी पंडितों की पीड़ा को दर्शाती है। चाहे आतंकवाद हो या धार्मिक कट्टरता अजय सहाब इनकी आलोचना में सेलेक्टिव नहीं रहना-दिखना चाहते। आजकल लोगों में एक परसेप्शन बनाया जा रहा है कि हम कश्मीरी पंडितों के दुःख-दर्द पर मौन रहते हैं। संभवतः इसी परसेप्शन को तोड़ने की कोशिश अजय सहाब ने की है।
एक अन्य आधुनिक भावबोध की रचना नदामत (पृष्ठ 56-57)  है जो पूरी तरह पर्यावरण को मनुष्य की भोग लिप्सा एवं संचय की वृत्ति के कारण पहुंचने वाले नुकसान पर केंद्रित है। हम अब प्रकृति की चेतावनी को अनदेखा नहीं कर सकते-
कब तलक जाएगा कुदरत से अदावत करके
आ गया वक़्त कि इन्सां को सुधरना होगा
चीख उट्ठी है ये धरती कि बदल लो खुद को
हमको कुदरत के इशारों से तो डरना होगा(पृष्ठ 57)

यदि सेकुलर शब्द के अर्थ को समझना है, आत्मसात करना है, जीना है तो 'मैं उर्दू बोलूँ' से अच्छी मार्गदर्शिका कोई दूसरी नहीं हो सकती। दूसरे के धर्म की आलोचना और अपने धर्म की कमियों पर चुप लगा जाना अजय को मंजूर नहीं है।

 

वैचारिक दृष्टि से यह संग्रह तर्क और वैज्ञानिक सोच की विमर्श में वापसी की एक सजग कोशिश है। आज जब संकीर्णता, धार्मिक कट्टरता और धर्मांधता देश के राजनीतिक-सांस्कृतिक विमर्श को संचालित कर रहे हैं तब अजय सहाब ने बेख़ौफ़ होकर इस सारे पाखंड का भंडाफोड़ किया है। जो साहसी न हो वह शायर कैसा?
यदि संग्रह में ‘अपनी ही एक लौ जलती है तुझमें भी और मुझमें भी’ जैसे गीत(पृष्ठ 99) और ‘नक़्श-ए-फ़रियादी-ए-सहाब’ (पृष्ठ 16) जैसे अशआर नहीं होते तो हम अजय सहाब को नास्तिक मान सकते थे। यह दो रचनाएं इस बात की प्रमाण हैं कि धर्म अजय के लिए उस अज्ञात को जानने की जिज्ञासा है, उसके क्रियाकलापों के प्रति आश्चर्य और कौतूहल है, सत्यान्वेषण की एक पद्धति है।
धर्म और विशेषकर संस्थागत धर्म के विरोधाभासों को उजागर करने का यह साहस सहाब को कहाँ से मिला? यह जानने के लिए हमें साहिर के पास जाना होगा जिनके प्रति अजय की दीवानगी किसी से छिपी नहीं है-
अक़ायद वहम है मज़हब ख़याल-ए-ख़ाम है साक़ी
अज़ल से ज़हन-ए-इन्सां बस्त-ए-औहाम है साक़ी
यदि सेकुलर शब्द के अर्थ को समझना है, आत्मसात करना है, जीना है तो ‘मैं उर्दू बोलूँ’ से अच्छी मार्गदर्शिका कोई दूसरी नहीं हो सकती। दूसरे के धर्म की आलोचना और अपने धर्म की कमियों पर चुप लगा जाना अजय को मंजूर नहीं है। न ही धार्मिक सहिष्णुता के नाम पर हर धर्म की अवैज्ञानिक मान्यताओं और अंधविश्वासों को सहन करना उन्हें गवारा है-
मज़हब की हकीकत से फरामोश रहेगा
इंसान तू कब तक यूं ही मदहोश रहेगा?
सहबा से भी बदतर है नशा धर्म का बंदे
कब तक तू यहाँ रिन्दे-बिला-होश रहेगा
मज़हब ने बना डाला है इंसान को गूंगा
सब जान के भी वो यहां खामोश रहेगा
जब तक हैं ये पंडित यहां, जब तक हैं ये मुल्ला
ये धर्म का धंधा बड़ा पुरजोश रहेगा(पृष्ठ 126)
धर्म का विमर्श अवैज्ञानिकता की बुनियाद पर गढ़ा गया है-
सारे मज़हब यहाँ पनपे हैं इसी साज़िश पर
पहले हर ज़ेहन को नादान किया जाता है
कैसे उस मुल्क में हुए सब लोग पत्थर के
जहाँ पत्थर को भी भगवान किया जाता है(पृष्ठ 123)
शायर संकेत करता है कि धर्म का उद्गम अज्ञानता और भय जैसी मानवीय प्रवृत्तियों से हुआ है-
सारे भगवान हैं इंसान के डर की तख़लीक़
तल्ख़ सच मैं यहाँ इरशाद करूँ या न करूँ(पृष्ठ 155)
दुनिया का इतिहास धर्म के नाम पर हुए भयंकर युद्धों और खून खराबे की दास्तान की तरह लगता है-
पाप इंसान का लाज़िम है बताया जाए
इन ख़ुदाओं से भी तो पर्दा हटाया जाए
जिसके दामन में न हों दाग लहू के लोगो
एक मज़हब मुझे ऐसा तो बताया जाए(पृष्ठ 125)
मनुष्य की पीड़ा और ईश्वर की निर्लिप्तता पर अजय की टिप्पणी है-
अब तक कभी न आया न वो आएगा बचाने
किस दौर-ए-मुसीबत में ख़ुदा ढूँढ़ रहे हो(पृष्ठ 127)
ऐसे माहौल में अल्लाह का चुप रह जाना
मेरे ईमान की बुनियाद हिला देता है(पृष्ठ 33)
या तो संसार के हर ज़ख़्म को भर दे या रब
या तू दुनिया से मसीहाई को वापस ले ले(पृष्ठ 27)
शायर सशंकित है कि क्या यह अवतार मानव जाति की पीड़ा को दूर करने में सक्षम हैं-
सलीबों पर चढ़ा जब तू, तो रोया तू भी कहते हैं
मसीहा तेरी आँखों में भी इंसानों सा डर देखा(पृष्ठ 156)
धर्म ने हमें बाँटने के अलावा किया क्या है किंतु सहाब के मंदिर में केवल प्यार को जगह मिलेगी-
कहीं मंदिर न बनने से किसी का राम ख़तरे में 
कहीं बस छींक दे कोई तो है इस्लाम खतरे में
यूं ही लड़ता रहा इंसा तो ऐ धरती जरा सुनले
तेरी हर सुबह ख़तरे में तेरी हर शाम ख़तरे में
मैं शाइर हूँ मुझे बस प्यार के मंदिर बनाने हैं
मेरे मंदिर में हैं सब असनाम ख़तरे में(पृष्ठ 158)

अजय सहाब ने अभिव्यक्ति के खतरे उठाए हैं और मठों और गढ़ों पर आक्रमण किया है और इसीलिए मठाधीश उन्हें चर्चा से बाहर करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा साहिर के साथ भी हुआ था। मोहम्मद सादिक ने उर्दू साहित्य के अपने प्रसिद्ध विश्लेषण में साहिर को खारिज करते हुए उन पर बहुत कम शब्द खरचे थे- शायद बस एक पैराग्राफ।

 

सुकरात का ज़िक्र ‘मैं उर्दू बोलूँ’ में कई बार आता है। सहाब के लिए सुकरात तार्किक सोच एवं सच कहने के अदम्य साहस के प्रतिनिधि हैं-
या तो सच कहने पे सुकरात को न मारे कोई
या तू संसार से सच्चाई को वापस ले ले (पृष्ठ 27)
सहाब जब उस अज्ञात से कुछ मांगते हैं तो यह सिर्फ और सिर्फ एक अमनपसंद और आपस मे मोहब्बत करने वाला हिन्दोस्तान है-
वो अवाम दे मेरे हिन्द को, जो बंटे न फ़िरक़ों के नाम पर
वो जो मंदिरों में भी गा सके, जो हुई सहर तो अजान दे(पृष्ठ 35)
सहाब के लिए मानव धर्म सर्वोपरि है-
मुझे एक रोटी मिले अगर, तेरे साथ उसको भी बांट लूं
जहाँ सिर्फ मैं ही समा सकूं, न वो इतना तंग मकान दे (पृष्ठ 35)
अजय सहाब न केवल साहिर की काव्य प्रतिभा के मुरीद हैं बल्कि साहिर के काव्य मीमांसा के सिद्धांतों का भी उन पर गहरा प्रभाव दिखता है-
मुझको इसका रंज नहीं है लोग मुझे फ़नकार न मानें
फ़िक्रों-सुखन के ताजिर मेरे शे’रों को अशआर न मानें
मेरा फ़न, मेरी उम्मीदें, आज से तुमको अर्पन हैं
आज से मेरे गीत तुम्हारे दुःख और सुख का दर्पन हैं 
‘तल्खियां’ में साहिर रहस्यात्मकता को नकार देते हैं और कविता की भौतिक उत्पत्ति का सिद्धांत देते हैं-
दुनिया ने तजरबात ओ हवादिस की शक्ल में
जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूँ मैं
इस पूरे संग्रह में अजय कविता की अलौकिक उत्पत्ति को खारिज करते दिखते हैं। शायरी उनके लिए इंसान की गहन पीड़ा की अभिव्यक्ति है।
मुझे उस ग़ज़ल की तलाश है जो मेरे दर्द को ज़बान दे
कहीं दर-ब-दर है जो आरजू, उसे एक सुकूं का मकान दे(पृष्ठ 35)
अजय की दृष्टि में सच्चा शायर वही है जो तल्ख़ सच्चाई को बयाँ करने का साहस रखता है-
तल्ख़ बातों को शेरों में बयां करता है ‘सहाब’
वो ज़माने सा रियाकार नहीं हो सकता(पृष्ठ 92)
अजय सहाब ने अभिव्यक्ति के खतरे उठाए हैं और मठों और गढ़ों पर आक्रमण किया है और इसीलिए मठाधीश उन्हें चर्चा से बाहर करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा साहिर के साथ भी हुआ था। मोहम्मद सादिक ने उर्दू साहित्य के अपने प्रसिद्ध विश्लेषण में साहिर को खारिज करते हुए उन पर बहुत कम शब्द खरचे थे- शायद बस एक पैराग्राफ।
‘मैं उर्दू बोलूं’ को विरह और उससे उपजी वेदना को अभिव्यक्त करने वाली ग़ज़लों के लिए भी जाना जाएगा। विरह वेदना का हर रंग यहाँ मिलता है। मिलन के बजाए विरह सहाब को ज्यादा आकर्षित करता है क्योंकि शायद मानवीय संवेदनाओं को प्रखरतम रूप से यहीं अनुभव किया जा सकता है। यदि यह पश्चिम होता तो बायोग्राफिकल क्रिटिसिज्म के दीवाने अजय सहाब के निजी जीवन में इन विरह गीतों की उत्पत्ति के कारण ढूंढने लगते। लेकिन यह भारत है और हम समझ सकते हैं कि विरह का स्वरूप आत्मिक भी हो सकता है।
अजय की ग़ज़लों को  देश के नामचीन ग़ज़ल गायकों ने गाया है। यहाँ भी अजय की कोशिश अपने आदर्श साहिर के पदचिह्नों पर चलने की है। साहिर ने फिल्मी गीतों को दार्शनिकता और भाव सम्प्रेषण की नई ऊंचाइयां दी थीं। उन्होंने सिद्ध किया था कि कोई रचना एक साथ लोकप्रिय एवं गुणवत्तापूर्ण दोनों हो सकती है। अब तो सोशल मीडिया भी आ गया है। अजय सहाब पर यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी है कि वे सोशल मीडिया पर अपने हजारों फॉलोवर्स की रुचि का परिष्कार करें, उन्हें उर्दू और ग़ज़ल की ताकत से परिचित कराएं।

 

राजू पाण्डेय स्वतंत्र लेखन करते हैं और रायगढ़ में रहते हैं ।

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