सुप्रीम कोर्ट की नीयत में खोट- संदर्भ : बथानी टोला नरसंहार (डायरी 23 मई, 2022)

नवल किशोर कुमार

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निस्संदेह देश जब विभाजत हुआ था तब बहुत कुछ हुआ। इस संबंध में खूब सारा साहित्य उपलब्ध है। दोनों तरफ के लोगों को परेशानियां हुईं और भयानक हिंसा भी। इसके अनेकानेक उदाहरण साहित्यों में उपलब्ध हैं। हिंसा की भयानकता का अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि दोनों तरफ से लाशों से भरी ट्रेनें भेजी गयीं। महिलाओं को जो भुगतना पड़ा, वह तो क्रूरता की पराकाष्ठा है। लेकिन यह तो उस वक्त की बात है जब देश का बंटवारा हुआ था और हिंदू-मुस्लिम समाजों के बीच दंगा मचा था। यहां तक कि बिहार, जो कि मेरा गृह प्रदेश है, वहां भी खूब हिंसा हुई। इतनी हिंसा कि गांधी को नोआखली छोड़कर पटना आना पड़ा था।

मैं यह सोच रहा हूं कि आखिर दंगे की वजह क्या रही होगी? इस सवाल की वजह यह कि बिना वजह कुछ भी नहीं होता। उस समय यह तो साफ हो गया था कि जो मुसलमान पाकिस्तान जाना चाहते हैं या फिर जो हिंदू हिंदुस्तान जाना चाहते हैं, वे जा सकते हैं। दोनों नवजात मुल्कों के तत्कालीन हुक्मरानों ने यही व्यवस्था रखी थी। फिर दंगे की वजह क्या थी? इसका जवाब मैं नहीं जानता क्योंकि विभाजन के संबंध में जो कुछ भी मैंने पढ़ा है, उनमें इसका जवाब नहीं है। तो मैं केवल अनुमान लगा सकता हूं कि दंगे की वजह क्या रही होगी?

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मेरा अनुमान है कि जमीन पर अधिकार ही वह वजह रही होगी, जिसकी वजह से हिंसा भड़की होगी। भारत के हिंदू चाहते होंगे कि मुसलमान अपनी सारी संपत्ति, जमीन–जायदाद चुपचाप छोड़कर पाकिस्तान चले जाएं और ऐसी ही मनोकामना पाकिस्तान के मुसलमानों की रही होगी। हालांकि जितना मैंने पढ़ा है, उसके हिसाब से तब लोगों को अपनी संपत्तियां बेचने का अधिकार था। बिहार में बड़ी संख्या में मुसलमानों ने अपनी संपत्तियां बेचीं और पाकिस्तान चले गए। भले ही उन्होंने कौड़ियों के भाव अपनी संपत्तियां बेची हों, लेकिन उन्होंने बेची जरूर। वहीं बड़ी संख्या में हिंदुओं ने मुसलमानों को मारपीट कर भगा दिया। जो नहीं भागना चाहते थे, उनके साथ हिंसा की। फिर यह सिलसिला शुरू हुआ होगा। हो सकता है कि इसकी शुरुआत पहले पाकिस्तान में हुई हो। लेकिन वजह यही रही होगी कि सपंत्तियों पर कब्जा कैसे किया जाय।

मैं तो भारत का नागरिक हूं, इसलिए भारत की बात कहता हूं। पटना, जहां का मैं मूलनिवासी हूं, वहां अनेक गांव हैं, जिसके नाम इस्लामिक हैं। मेरे गांव के ठीक पूरब में एक गांव है पैठानी नत्थुपुर। ऐसे ही इस्माइलपुर और अलीपुर आदि गांव मेरे गांव ब्रह्मपुर के दक्षिण में हैं। एक गांव और है चिलबिल्ली। यहां दो टोले हैं। एक टोले में कुर्मी जाति के लोगों की बहुलता है। दूसरा टोला दलितों व अन्य गैर-दलितों का है। चिलबिल्ली गांव की जमीनों पर सबसे अधिक हिस्सेदारी कुर्मी जाति के लोगों की है। दोनों टोलों के बीच में एक गैर मजरूआ भूखंड है। इसी भूखंड के एक कोने में कब्रिस्तान के प्रमाण हैं। मुमकिन है कि यह कब्रिस्तान रहा होगा, जिसे बाद में गैरमजरूआ घोषित कर दिया गया होगा।

दरअसल, भारतीय समाज शास्त्र को समझना है तो गांवों के समाज को समझना अत्यंत आवश्यक है। यह तो लगभग सभी स्वीकार करेंगे कि अशराफ मुसलमान शासक रहे हैं। मेरा ही गांव जिस जमींदार की जमींदारी का हिस्सा था, वह मुसलमान था। मेरे गांव के लोग बताते हैं कि तब जमींदार के अधिकार में आज के कम से कम 50 गांव थे। जाहिर तौर पर अशराफ मुसलमान स्वयं खेती नहीं करते थे। ठीक वैसे ही जैसे आज भी सवर्ण जिनके पास अकूत जमीन है, खेती नहीं करते। तो खेती करने का काम करनेवाले पिछड़े वर्ग के लोग थे। निश्चित तौर पर खेती करने का अधिकार दलितों को नहीं रहा होगा। दलित तो तब अछूत रहे होंगे। वैसे अछूत तो आज भी उन्हें माना जाता है। यह इसके बावजूद कि संविधान होने के कारण अब अवधारणाएं बदली हैं।

पिछड़ा वर्ग की मुख्य तीन जातियां और उनके पेशे को देखें तो एक बात स्पष्ट हो जाती है कि मुसलमान जमींदारों की जमीन पर खेती कौन करता था। ये मुख्य तीन जातियां हैं- यादव, कुशवाहा और कुर्मी। यादव जाति के लोगों का पारंपरिक पेशा मवेशीपालन रहा है। बिहार में इस जाति के अधिकांश लोग अब भी मवेशीपालन करते हैं और वे शौक से नहीं करते। बल्कि उनके लिए यह आजीविका का साधन है। ऐसे ही कुशवाहा जाति है जो कि मुख्य तौर पर साग-सब्जी-फूल आदि की खेती करते हैं। जबकि कुर्मी जाति के लोग जिनकी आबादी भले ही बिहार में 4-5 फीसदी होगी, जमीन पर सबसे अधिकार रखते हैं। उनसे कम जमीनें कुशवाहा समाज के पास है और सबसे कम यादव जाति के लोगों के पास। हालांकि उत्तर बिहार के कुछेक जिलों यथा सुपौल और मधेपुरा में स्थितियां अलग हैं। वजह यह कि वहां कुर्मी जाति के लोगों की संख्या बहुत कम है। हालांकि अब वहां धानुक आदि जातियों के लोग खुद को कुर्मी जरूर बताते हैं।

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खैर, जमीन बिहार के लिए बहुत महत्वपूर्ण संसाधन है। इसलिए इस राज्य में जमीन पर अधिकार के लिए संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है। यह संघर्ष हिंसक भी रहा है। इतना हिंसक कि हजारों लोगों की हत्याएं की जा चुकी हैं। 1990 के दशक में जब लालू प्रसाद का सितारा बुलंदी पर था, बिहार के सवर्णों ने खूब हिंसा की। रणवीर सेना नामक सवर्णों के संगठन ने तो 1994 से लेकर 2000 के बीच करीब 29 नरसंहारों को अंजाम दिया। रणवीर सेना ने करीब साढ़े चार सौ लोगों की हत्या की। इनमें एक नरसंहार बथानी टोला नरसंहार है। इस नरसंहार को 11 जुलाई, 1996 को रणवीर सेना द्वारा अंजाम दिया गया। इसमें कुल 21 लोगों को मार दिया गया। मारे जाने वालों में 12 महिलाएं, 8 छोटे-छोटे बच्चे थे। रणवीर सेना के गुंडों ने गर्भवती महिलाओं का पेट चीरकर उनके गर्भस्थ शिशुओं तक की हत्या की। वहीं एक पिछड़े वर्ग की एक महिला के स्तन को काटा और उसे फुटबॉल के रूप में खेला।

खैर, पटना हाईकोर्ट ने वर्ष 2012 में बथानी टोला नरसंहार के सभी आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया। यह भी न्याय का दूसरा ही पक्ष था। गोया 21 लोगों ने खुद को मार लिया हो। महिलाओं ने खुद अपना बलात्कार किया हो, और वह महिला, जिसका स्तन काटा गया, उसने खुद से अपना स्तन काटा हो।

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मैंने बथानी टोला नरसंहार के संबंध में अनेक रपटें लिखी हैं। इनमें एक रपट इस सवाल को लेकर भी कि आखिर बथानी टोला नरसंहार के पीछे कारण क्या था? आज फिर वही दर्ज कर रहा हूं। मुख्य कारण था कर्बला की जमीन पर भूमिहार जाति के लोगों द्वारा कब्जा, जिसका स्थानीय मुसलमान, दलित और पिछड़े वर्ग के लोग विरोध कर रहे थे। मुझे नहीं पता कि कर्बला की जिस जमीन के लिए बथानी टोला नरसंहार को अंजाम दिया गया, वह जमीन अब किसके कब्जे में है। मैं तो केवल यह जानता हूं कि बथानी टोला नरसंहार मामले में पीड़ित पक्ष ने पटना हाईकोर्ट के फैसले को वर्ष 2012 में ही चुनौती दी थी और इसकी सुनवाई करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पास वक्त नहीं है।

क्या वाकई सुप्रीम कोर्ट के पास वक्त की कमी है या फिर उसकी नीयत में खोट है?

खैर, वरिष्ठ साहित्यकार सुधा अरोड़ा ने फेसबुक पर विनोद पदरज की एक कविता को शेयर किया है। इसका शीर्षक है– इतिहास

सब के पास स्वर्णिम इतिहास था

ब्राह्मणों के पास ठाकुरों के पास वैश्यों के पास आदिवासियों के पास 

कारीगरों शिल्पकारों मूर्तिकारों चित्रकारों नर्तकों संगीतज्ञों कलावंतों दरबारियों सिपाहियों कृषकों

लगभग सबके पास स्वर्णिम इतिहास था 

और वे अब भी उसकी खोज में लगे थे

सारे देश में खुदाई चल रही थी 

मेरे पास क्या था जिसकी खोज करता 

जिस पर गर्व करता

बचपन में मेरी मां एक हाथ में झाड़ू टोकरी एक से मेरा हाथ थामे मुझे घर घर ले जाती थी

और ऐसी जगह बिठा देती थी जहां कोई मुझे न छुए या मैं किसी चीज को न छू सकूं

फिर घर के बाहर गलियारे में

आंगन में झाड़ा बुहारी करती थी

लूगड़ी का डाटा मुंह पर कसकर 

तारतें साफ करती थीं

परात भर भर मल सोरती थी

फेंक कर आती थी

तब झोली फैलाती थी 

जिसमें दूर से रोटी फेंकती थीं

उन घरों की स्त्रियां 

जिन्हें हम भूख लगने पर चबाते थे

अब इसमें स्वर्णिम इतिहास की 

क्या खोज करता मैं

क्या कहता कि सिंधु घाटी के 

हम मूल बाशिंदे हैं

हमारे पास तो ईश्वर भी नहीं था

हां, जीवन तो था हमारा भी 

हमारे भी शादियां थीं 

लगन सगाई तीज त्योहार भात पैरावणी

आना जाना मिलना जुलना  हंसी ठठ्ठा

पर यह ज़मीन में गडकर जीने जैसा था

हां यह बात गर्व के लायक हो सकती थी 

कि मेरी मां सुंदर थी

वह सचमुच  सुंदर थी, लोग अब भी कहते हैं

दुबली पतली सांवली बडरी बडरी आंखें

मोगरे के फूलों जैसे दांत

हंसती थी तो गालों में गड्ढे पडते थे

पर यह गर्व की  बात ही 

हमारे लिए  लज्जा की हुई

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मैने देखा था कि उन घरों के कई मर्द

मेरी मां को देखकर लार टपकाते थे

अंधेरे कोनों में उसे दबोच लेते थे

वह बिलौटे के पंजे में 

कबूतरी की तरह छटपटाती थी

पर बोल नहीं पाती थी

मेरा बाप उसे मारता था 

और चुप रहने को कहता था

अब इसमें स्वर्णिम इतिहास 

कहां से खोजूं

लोग कहते हैं कि मेरे छोटे भाई की शकल

फलां पंडितजी से मिलती है …”

खैर, नींद उचट गई है। वर्ष 2016 में आयी बिकास रंजन मिश्र द्वारा निर्देशित फिल्म चौरंगा देख रहा हूं। यह फिल्म भी विनोद पदरज की कविता से मेल खाती है। हालांकि यह फिल्म पहले भी देख चुका हूं। तनिष्ठा चटर्जी का अभिनय बेहद खास है। उम्मीद है फिल्म देखते-देखते नींद आ जाएगी।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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