Friday, June 14, 2024
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संग्रह से प्रकाशन तक भिखारी ठाकुर का रचना संसार

लोक कलाकार भिखारी ठाकुर की 86वी जयंती समारोह 25-26 दिसंबर 1976 को बैजनाथ सिंह उच्च विद्यालय कुल्हड़िय में धूमधाम से मनाई गई। जयंती समारोह की अध्यक्षता आश्रम के अध्यक्ष और जाने-माने साहित्यकार पंडित हंस कुमार तिवारी और उद्घाटन बिहार सरकार के मंत्री रामरतन राय कल्याण ने की। इस अवसर पर महेश्वराचार्य जी को सम्मानित किया गया। […]

लोक कलाकार भिखारी ठाकुर की 86वी जयंती समारोह 25-26 दिसंबर 1976 को बैजनाथ सिंह उच्च विद्यालय कुल्हड़िय में धूमधाम से मनाई गई। जयंती समारोह की अध्यक्षता आश्रम के अध्यक्ष और जाने-माने साहित्यकार पंडित हंस कुमार तिवारी और उद्घाटन बिहार सरकार के मंत्री रामरतन राय कल्याण ने की। इस अवसर पर महेश्वराचार्य जी को सम्मानित किया गया। तत्पश्चात महेश्वराचार्य ने अपनी लिखित पांडुलिपि देते हुए कहा कि भिखारी ठाकुर पर यह नई समीक्षा है। उद्घाटन भाषण में रामरतन ने कल्याण विभाग से दो हजार रुपए देने की घोषणा की। उस दिन एक कवि सम्मेलन हुआ था। जिसकी अध्यक्षता हिंदी विभाग के महाकवि आरसी प्रसाद और सम्मेलन का उद्घाटन सुप्रसिद्ध साहित्यकार शिल्पी उपेंद्र महारथी ने किया था। अतिथियों के स्वागत करने की जिम्मेदारी प्रधानाध्यापक मुनि सिंह को सौंपी गई । भिखारी ठाकुर की जयंती का शुभारंभ करने का श्रेय मुनि सिंह को ही जाता है। जयंती समारोह के अभिभावक आचार्य द्वारिका सिंह तथा आयोजक लोक कलाकार भिखारी ठाकुर आश्रम कुतुबपुर था।

मार्च 1977 में कल्याण विभाग बिहार से आश्रम को दो हजार रुपया मिला और अप्रैल में उसकी कार्यकारिणी की बैठक हुई। महेश्वराचार्य की पांडुलिपि भिखारी समीक्षा और 1964 में भोजपुरी परिवार सालिमपुर अहरा पटना से प्रकाशित पुस्तक जनकवि भिखारी ठाकुर दोनों का जब मिलान हुआ तो दोनों में काफी समानता थी। तब विचार हुआ कि पांडेय नर्मदेश्वर सहाय के यहाँ बैठक की जाए क्योंकि जनकवि भिखारी ठाकुर पुस्तक के प्रकाशक वही थे, साथ ही वे अजोर पत्रिका का संपादन भी कर रहे थे। पांडेय नर्मदेश्वर सहाय से विचार-विमर्श करने के बाद लोक कलाकार भिखारी ठाकुर आश्रम की कार्यकारिणी बैठक भोजपुरी परिवार के कार्यालय सालिमपुर अहरा पटना में हुई। बैठक में आश्रम के अभिभावक आचार्य द्वारिका सिंह, उपाध्यक्ष सत्यनारायण लाल और अविनाश चंद्र विद्यार्थी सहित कार्यकारिणी के सदस्यगण उपस्थित थे। उस बैठक में पांडेय नर्मदेश्वर सहाय ने अपनी भूमिका को सहर्ष स्वीकार किया। प्रकाशन की रूपरेखा कार्यकारिणी में तय हुई। पांडुलिपि की देखरेख करने की जिम्मेदारी आचार्य सत्यनारायण को दिया गया तथा उसे प्रेस में छपाने की जिम्मेदारी अविनाश चंद्र विद्यार्थी ने ली। आचार्य द्वारिका सिंह ने एक सुझाव दिया कि कुतुबपुर गाँव जहां स्थित है उसका नक्शा बनाकर किताब में छापा जाय।

[bs-quote quote=”भोजपुरी अकादमी के जब निदेशक चितरंजनजी थे, तब भिखारी ठाकुर की संपूर्ण रचना के प्रकाशन के लिए अविनाश चंद्र विद्यार्थी से बोले कि हम नौ महीने में रिटायर हो जाएंगे, इसी बीच में रचना का संपादन हो जाना चाहिए। विद्यार्थीजी अपनी ज़िद और भूमिका बांधने में ज्यादा समय ले लिए। चितरंजन रिटायर हो गए। मन में बड़ा दुःख हुआ। आश्रम के सदस्य गण एक बार फिर भिखारी ठाकुर की संपूर्ण रचना के प्रकाशन करने का निर्णय लिए। रचना आलेखन पटना में दिया गया। इसका पहला प्रूफ लेकर प्रधान संपादक को हम दिए। अविनाश चंद्र वार्तिक काटने लगे। किंतु हम हिम्मत नहीं हारे। और हमने विद्वान लोगों से लेकर आश्रम परिवार तक इस समस्या को रखा। तब सभी लोगों ने एक मुँह से कहा कि दिवंगत साहित्यकार का एक भी शब्द काटना महापाप है।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

महेश्वराचार्य शाहपुर भरौली भोजपुर के निवासी थे। वे 1940 से ही भिखारी ठाकुर पर लगातार लिखते रहे। जो कि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपती भी रही। आचार्य सत्य नारायण लाल शिक्षाविद् थे। आचार्य सत्य नारायण लाल, आचार्य द्वारका प्रसाद सिंह के शिष्य थे और सत्य नारायण लाल के शिष्य अविनाश चंद्र विद्यार्थी थे। सत्य नारायण लाल पटना में रह रहे थे। उनके यहाँ कभी-कभी महेश्वराचार्य भी ठहर जाया करते थे। लोक कलाकार भिखारी ठाकुर आश्रम के साथ महेश्वराचार्य का अनुबंध पत्र पुस्तक प्रकाशन के लिए बीस प्रतिशत रॉयल्टी पर तय हुई। महेश्वराचार्य ने भिखारी ठाकुर की रचनाएं पढ़ी। जनकवि भिखारी ठाकुर और पांडुलिपि का मिलान होने लगा। उद्धरण के शुद्धिकरण होने के बाद आचार्य सत्य नारायण लाल और अविनाश विद्यार्थी की बैठक हुई, जिसमें हम भी (रामदास राही) शामिल थे। अविनाश चंद्र की मित्रता जय दुर्गा प्रेस के मालिक नागेंद्र प्रसाद से थी। नगेंद्र प्रसाद सिंह भोजपुरी साहित्य के विद्वान और समीक्षक हैं। अविनाश चंद्र के साथ वहाँ हमेशा बैठक होती रही। इस बीच विद्यार्थी ने राजेश्वर से वहां का नक्शा तैयार करवाया। 1977 ई० में हमारा परिचय नागेंद्र से हुआ। आज तक वे हमारे मित्र और आश्रम के अध्यक्ष हैं। तब प्रकाशन के क्रम में प्रेस कॉपी और कुछ अग्रिम रुपया प्रेस को दिया गया। नागेंद्र छपाई के दौरान महेश्वराचार्य को अपने यहां एक महीना तक ठहराये रहे। पुस्तक का नाम भिखारी पड़ा। पुस्तक में विभिन्न विद्वानों की शुभकामना और लेखक की भूमिका सहित आश्रम के मंत्री होने के कारण हमारी प्रकाशकीय भूमिका भी छपी। प्रकाशक की जगह लोक कलाकार भिखारी ठाकुर आश्रम कुतुबपुर का नाम छपा। इस प्रकार आश्रम के प्रथम पुष्प के रूप में भिखारी ठाकुर समीक्षा पुस्तक 13 जनवरी, 1978 में प्रकाशित हुई। लोक कलाकार भिखारी ठाकुर आश्रम के संयोजन में 25 जनवरी, 1978 ईस्वी को शास्त्री सत्येंद्र त्रिपाठी की अध्यक्षता में बिहार सरकार के शिक्षा मंत्री गुलाम सरवर के द्वारा पुस्तक का विमोचन हुआ। आश्रम के मंत्री होने के कारण धन्यवाद मुझे देना पड़ा। इस मौके पर भिखारी ठाकुर का परिवार भी वहाँ उपस्थित था।

1936 ईस्वी में बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन हुआ था। वहाँ महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने अपने अध्यक्षीय भाषण में पहले भिखारी ठाकुर का गुणगान किया। 1940 में अंग्रेज सरकार द्वारा भी उन्हें सम्मानित किया गया। इसके पहले डीएन राय भी पश्चिम बंगाल के कचरापारा हाईस्कूल में उन्हें सम्मानित कर चुके थे। इस सम्मान से कोलकाता में काफी अच्छा प्रभाव पड़ा। 1947 ईस्वी को दिसंबर माह में गोपालगंज में जिला सारण के भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के दूसरे अधिवेशन के अध्यक्षीय भाषण के दौरान राहुल सांकृत्यायन ने भिखारी ठाकुर को अनगढ़ हीरा कहा। 26 जनवरी, 1954 में जगदीश चंद्र माथुर (तत्कालीन शिक्षा सचिव) बिहार के चतुर्थ सांस्कृतिक समारोह में बिहार के विभिन्न मंडली के बीच भिखारी ठाकुर भी अपना दल लेकर पहुंचे थे। इस अवसर पर उन्हें राज्यपाल द्वारा गणतंत्र दिवस सम्मान पत्र भेंट किया गया था। 29 अगस्त, 1964 के भारतीय नृत्य कला मंदिर, पटना में महान शिल्पी हरिउप्पल जी भी उन्हें सम्मानित किए। बिहार सरकार के शिक्षा मंत्री सत्येंद्र सिंह की धर्मपत्नी किशोरी देवी और तत्कालीन राज्यपाल अयंगर साहब अंगवस्त्र और ताम्रपत्र भेंट किए। भिखारी ठाकुर बिहार भूषण के रूप में भी सम्मानित हुए। 1965 में कोलकाता के थापा में सत्यनारायण भवन में कलाकार और विद्वान लोग द्वारा आयोजित समारोह में भिखारी ठाकुर को सम्मानित किया गया था। 1965 ई. में ही रांची कॉलेज के प्रोफेसर राम सुहाग सिंह भिखारी ठाकुर का साक्षात्कार लिए जो रांची से ही बटोही पत्रिका में प्रकाशित हुई। 10 जुलाई, 1971 में भिखारी ठाकुर का स्वर्गवास हो गया। 1971 ई० में हिंदुस्तान पत्रिका के दीपावली विशेषांक में जगदीश चंद्र माथुर का भरतमुनि के परंपरा के ग्रामीण कलाकार भिखारी ठाकुर शीर्षक से लेख प्रकाशित हुआ। माथुरजी का यह लेख काफी महत्वपूर्ण था। बाद में उन्होंने अपनी पुस्तक में इस लेख को स्थान दिया। 1972 ईस्वी में भिखारी ठाकुर की जयंती के अवसर पर राधे मोहन ‘राधेश’ ने अपनी पत्रिका पहरुआ भिखारी ठाकुर स्मृति विशेषांक निकाली। भोजपुरी और अंग्रेजी के विद्वान प्राचार्य मनोरंजन प्रसाद सिन्हा भिखारी ठाकुर को भोजपुरी का शेक्सपियर कहा और माना। संस्कृत और हिंदी के प्रकांड विद्वान आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री ने कहा कि भिखारी ठाकुर से जब भेंट हो जाएगी तब अंग्रेजी के महान नाटककार बर्नाड शा भी अपनी श्रेष्ठता का डींग हाकना भूल जाएंगे।

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1978 ई० में बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की मदद से बिहार और केंद्र सरकार दोनों के शिक्षा और संस्कृति विभाग हम लोक कलाकार भिखारी ठाकुर आश्रम कुतुबपुर का सर्वेक्षण करायें। तभी से भिखारी ठाकुर समिति योजना आज तक चल रही है। पटना सचिवालय के सामने ओवर ब्रिज का नाम भिखारी ठाकुर पड़ा। छपरा तेलपा चौक पर विशाल मूर्ति स्थापित होने से वह अब भिखारी ठाकुर चौक कहलाता है। बिहार सरकार के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह ने 1983 ई० में डोरीगंज के पास जनकवि भिखारी ठाकुर मोड़ का शिलान्यास किया। आरा सरदार पटेल बस पड़ाव में मूर्ति की स्थापना हुई, भिखारी ठाकुर शोध संस्थान बना। 2011 ई० में लोक कलाकार भिखारी ठाकुर आश्रम पर भिखारी ठाकुर की भव्य मूर्ति स्थापित हुई।

1978 में बिहार सरकार के कल्याण मंत्री राम रतन जिनसे मुलाकात करके हम उन्हें भिखारी ठाकुर पुस्तक दिए, पुस्तक देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए और कल्याण विभाग से 1978-79 ई० में लोक कलाकार भिखारी ठाकुर आश्रम के नाम दो हजार रुपये देने की घोषणा किये। यह पैसा मार्च 1979 ईस्वी में आश्रम को मिला। इसके बाद हम आश्रम की कार्यकारिणी बैठक किये। जिसमें सब लोग मिलकर भिखारी ठाकुर के रचना का प्रकाशन कराने का प्रस्ताव पास किया और इसके लिए एक संपादक मंडल बनाया गया। संपादक मंडल में अविनाश चंद्र विद्यार्थी, नागेंद्र प्रसाद सिंह, तैयब हुसैन पीड़ित, रामदास राही और जनेश्वर ठाकुर को रखा गया। उस समय आचार्य द्वारिका सिंह ने सलाह दिया कि अभी टीका टिप्पणी की बात छोड़ दी जाए और रचना का शुद्ध-शुद्ध पाठ किया जाए। इसके लिए पुराने कलाकारों के मंच प्रयोग और भिखारी ठाकुर की रचना का सिलसिलेवार (क्रमबद्ध) ढंग से संयोजन करके मिलान करना बहुत अच्छा रहेगा।

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भिखारी ठाकुर ने 1917 से लेकर 1965 तक 29 किताबों की रचना की। इन सभी किताबों को जल्द ही एक जिल्द में लाने की तैयारी चल रही है। सारी रचनाएं कोलकाता के हावड़ा के फुटपाथी साहित्य के रूप में छपी थी। जिसके कागज और बाइन्डिंग की गुणवत्ता ठीक नहीं थी। भिखारी ठाकुर एक ऐसे रचनाकार हैं कि अपने संपूर्ण रचना को क्रमशः आधार देकर चौपाई में बाँधे हुए हैं। भिखारी ठाकुर अपनी रचनाओं का एक मोटा रजिस्टर बनाए हुए थे। हमने रचना को देखा तब उसमें तमाशा की चौपाइयां मिली, वार्तिक न था। तमाशा के गीत कई जगह बिखरे हुए थे। एक तमाशा के नाम पर छपी किताब के अंदर दूसरे तमाशे का गीत मिला। किताब प्रकाशन के सवाल पर संपादक मंडल की बैठक नगेंद्र प्रसाद सिंह के यहां हुई। विचार हुआ कि रचना को तीन भाग में बांटा जाए। 2 खंड में नाटक रखा जाए और तीसरा खंड में फुटकल रचना। पहले खंड में (1) बिदेशिया (2) भाई विरोधी (3) कलयुग प्रेम (4) राधेश्याम बाहर और (5) कृष्ण लीला रखा जाए। संपादक मंडल ने तय किया कि भिखारी ठाकुर की रचना से सब नाटकों की अलग-अलग पोथी बनाकर संग्रह कर दिया जाए। संपादक मंडल आश्रम के मंत्री रामदास राही को भार दिया कि रचनाओं को लिपिबद्ध करने में अविनाशजी से सहयोग लेते रहे। हमने उसे स्वीकार कर लिया। पहले बिदेशिया के लिए कलयुग बहार, बहरा बहार, रामरतन परिचय, यशोदा सखी संवाद रचना को एक जगह इकट्ठा किया। पाठकों को जानकारी दे देता हूँ कि पहले बिदेसिया पात्र के नाम की इतनी प्रसिद्धि हो गयी थी कि लोगों की ज़ुबान पर बिदेसिया बस गया था। लोग कहते थे कि चलो बिदेसिया का नाच देखने। सबसे पहले बिदेसिया नाम दिया गया और पाँचों नाटकों की अलग-अलग प्रति तैयार की गई।

नाटकों के सही पाठ की तैयारी में पहला शिविर भिखारी ठाकुर परिवार के द्वार पर हुई। भिखारी ठाकुर के बाद उनके भतीजे गौरीशंकर ठाकुर मंडली के नायक के साथ नकल-तमाशा करने में भी माहिर थे। उस दिन रात को पुराने कलाकारों और संपादक मंडल के साथ सभा हुई। जिसमें मंडली से आग्रह किय गया कि आप सब बिदेसिया तमाशा कैसे कर रहे हैं? कृपया वह सब कुछ हम लोग को लिखवा दीजिए! गौरीशंकर ठाकुर और भिखारी ठाकुर के पुत्र शीलानाथ ठाकुर द्वारा बताया गया बिदेसिया नाटक के गीत, वार्तिक, गद्य-पद्य का तालमेल किया गया। छपे  हुए  और गाये हुये गीत की शुद्धता को ध्यान में रखते हुए पात्रों के आधार पर बिदेसिया के गीत जोड़े गये। कोई गीत छूटने न पाए इसका पूरा ध्यान रखा गया। भिखारी ठाकुर के बहुत से गीत पहले भी गाये जाते थे। बाद में उनके कई गीतों को छोड़कर दूसरा गीत बनाकर लोग गाने लगे। संपादक मंडल ने भिखारी ठाकुर के गद्य या पद्य के मूल रचना को संग्रहित किया। कई गीत तो कलाकारों के कंठ में ही थे, उसे भी संग्रह में शामिल किया गया तथा इसकी प्रमाणिकता का भी खयाल रखा गया। संपादक मंडल के लोग पुराने कलाकारों से लगातार संबंध बनाए हुए थे। जगह-जगह शिविर करके पांचों नाटकों का संग्रह किया गया। गौरीशंकर ठाकुर की मंडली जहां-जहां जाती थी वहां-वहां हम और जनेश्वर ठाकुर पांचों नाटकों की प्रति लेकर पहुँच जाते थे और मिलान करते थे। उनके मंडली से बात करते थे। इस तरह पाँचों नाटकों को इकट्ठा करके प्रधान संपादक अविनाश चंद्र विद्यार्थी को सुपुर्द किया गया। प्रेस कॉपी जब तैयार हुई तब छपाई के लिए जय दुर्गा प्रेस नया टोला पटना के मालिक नागेन्द्र प्रसाद के यहां बैठक हुई। छपाई की जिम्मेदारी नागेंद्र प्रसाद को दिया गया। किताब किस तरह से छापी जाए यह जिम्मेदारी अविनाश ली। आश्रम पैसों की व्यवस्था करके प्रकाशन को देने लगा और छपाई का काम आरम्भ हो गया। किताब के आवरण की जिम्मेदारी उपेंद्र महारथी को दिया गया, महारथी भिखारी समीक्षा में रेखाचित्र बनाए हुए थे। वे वहां के नामी-गिरामी शिल्पी भी थे और भारत सरकार से पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित थे। किंतु महारथी द्वारा बनाये गए  चित्र को प्रधान संपादक ने स्वीकार नहीं किया। तब आर्ट कॉलेज के प्राचार्य पाण्डेयजी आवरण चित्र बना कर दिए, जिसका ब्लाक बनाकर प्रेस को दिया गया। उस समय कंप्यूटर का युग नहीं था। पुस्तक में छापने के लिए गोपालगंज के अधिवेशन में राहुल सांकृत्यायन का भाषण, संपादकीय विचार और मंत्रीजी की प्रकाशकीय भूमिका सब कुछ प्रेस को सौंप दिया गया। रचना के संकलनकर्ता में शिलानाथ ठाकुर और गौरीशंकर ठाकुर का नाम संपादक मंडल के पांचों सदस्य का नाम और प्रकाशक के रूप में लोक कलाकार भिखारी ठाकुर आश्रम कुतुबपुर सारण का नाम दिया गया।

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1979 ईस्वी को विजयदशमी के अवसर पर द्वितीय पुष्प के रूप में भिखारी ठाकुर ग्रंथावली  का पहला खंड प्रकाशित हुआ। पुस्तक विमोचन के लिए लोक कलाकार भिखारी ठाकुर आश्रम और भोजपुरी अकादमी से बातचीत हुई। अकादमी के निदेशक हवलदार त्रिपाठी ने मुख्यमंत्री से अपाइनमेंट लिया। 25 जनवरी को अकादमी के कार्यालय में विमोचन कार्यक्रम रखा गया। विमोचन समारोह में शिक्षा आयुक्त शिव कुमार श्रीवास्तव समय से पहले आ गए थे और उन्होंने निदेशक से सवाल किया कि किताब कैसे छापी गई? आश्रम के अध्यक्ष हंस कुमार तिवारी और साहित्यकार लोग तब तक वहाँ आ चुके थे। मुख्यमंत्री राम सुंदर दास उस समय उपस्थित हुए। हंस कुमार तिवारी ने कहा कि आश्रम अपने सीमित साधन से भिखारी ठाकुर ग्रंथावली का पहला खंड प्रकाशित करके आपके हाथों में सौंप रहा है। लाल मखमली कपड़ा से बंधी हुई किताब जब मुख्यमंत्री खोलें, तब सभागार में तालियों की गड़गड़ाहट के साथ भिखारी ठाकुर की जयकारा गुजरने लगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि भोजपुरी के सिरमौर भिखारी ठाकुर का साहित्य विद्वान से लेकर जन-जन पढ़े और समझे। अब इस  पुस्तक के माध्यम से आगे आने वाली पीढ़ी भी भिखारी ठाकुर के बारे में ठीक से जान सकेगी और मूल्यांकन करेगी। आज भिखारी ठाकुर की रचना से भोजपुरी बोली का खजाना भर गया है। अंत में धन्यवाद ज्ञापन प्रधान संपादक अविनाश चंद्र ने दिया।

भिखारी ठाकुर ग्रंथावली का पहला खंड प्रकाशित होने के बाद लेखकों, विद्वानों और कलाकारों को भिखारी ठाकुर के बारे में विस्तृत रूप से जानकारी हुई। हिंदी साहित्य की सूची में भिखारी ठाकुर का साहित्य भी शामिल हो गया। भारत सरकार के साहित्य अकादमी के यहां पुस्तक भेजी गई। इस प्रकार ग्रंथावली को हर जगह से आदर स्नेह मिला। पहला खंड के प्रकाशन के बाद संपादक मंडल फिर से सक्रिय हो गया और बैठक करके दूसरे खंड पर काम शुरू कर दिया गया। छः नाटक (1) गंगा स्नान (2) विधवा विलाप (3) पुत्र वध (4) गबर घिचोर (5) ननद भोजाई और (7) बिरहा बहार की प्रति क्रमबद्ध ढंग से तैयार की गई।

दूसरे खंड के दो कार्यशाला का इतिहास आज भी स्मरणीय है। पहला दो दिवसीय शिविर कोल्हारामपुर निवासी डॉ. जख्मीकांत निराला के यहां हुई। वहाँ दो दिनों में तीन नाटकों का मिलान किया गया। संपादक मंडल के सदस्यों के अलावा गौरीशंकर ठाकुर और शीलानाथ ठाकुर सब लोग वहां उपस्थित थे। शिविर सफल हुई। जख्मीकांत अपने पत्नी का गहना गिरवी रखकर शिविर के खर्च का भार उठाये थे। दूसरा शिविर का आयोजन रसूलपुर के केदार सिंह रसूलपुर हाई स्कूल में कराए थे। हम, नागेन्द्र प्रसाद सिंह, तैयब हुसैन, शत्रुघ्न ठाकुर सब लोग स्कूल पर इकट्ठे हुए। रात भर गौरीशंकर ठाकुर का इंतजार हुआ। किंतु वे सुबह ही स्कूल पर पहुंचे। उस समय सोनपुर छपरा में सवारी गाड़ी का समय था। नागेंद्र ने कहा कि अब छपरा चलकर वही नाटकों का मिलान होगा। वहाँ से गुल्टेनगंज स्टेशन पास में ही था। सब लोग छपरा कचहरी स्टेशन पर उतर कर भिखारी ठाकुर के पौत्र राजेंद्र ठाकुर के आवास पर पहुंचे। वहां कहीं से दीनानाथ माझी भी आ गए। गबर घिचोर, ननद भोजाई का सांगोपांग कॉपी किया गया। इसके बाद नागेंद्र पटना चले गए।

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अब पाँचों नाटकों की संकलित प्रति लेकर हम और जनेश्वर ठाकुर जहां-जहां नाटक मंडली जाती थी वहां जाकर जो हिस्सा छूटा हुआ था, उसे मिलान करते हुए जोड़ते जा रहे थे और रचना का शुद्धिकरण भी साथ-साथ करते थे। एक नाटक बिरहा बहार छुट गया था। पांचों नाटकों की प्रति प्रधान संपादक मंडल को सौंप दी गई। प्रधान संपादक पुस्तक प्रकाशन के लिए प्रेस कॉपी तैयार कर लिए। इसको बाद संपादक मंडल की बैठक नागेंद्र के यहां हुई। उसमें निर्णय लिया गया कि मुख्य अतिथि के रूप में बिहार संगीत कला अकादमी के सचिव गजेंद्र नारायण सिंह को बुलाया जाए, क्योंकि उन्हीं के अनुमोदन पर भारत सरकार के नाटक अकादमी से तीन हजार रुपया मिला था। उस बैठक में प्रेस कॉपी नागेंद्र को दिया गया तथा पहले खंड के आधार पर प्रधान संपादक के देख-रेख में दूसरे खंड का भी प्रकाशन हो गया। यह अवसर 1986 ई० में बसंत पंचमी के दिन का था, जब आश्रम के द्वितीय पुस्तक के रूप में दूसरा खंड प्रकाशित हुआ। पुस्तक विमोचन तत्कालीन बिहार सरकार के शिक्षा मंत्री अर्जुन विक्रम शाह किए। दूसरा खंड निकलने के बाद साहित्य और कला जगत में और भी हलचल मच गया। शोधार्थी लोग भी भिखारी ठाकुर को लेकर आकर्षित हुए।

लोक कलाकार भिखारी ठाकुर आश्रम कुतुबपुर के संविधान और कार्य उद्देश्य में भिखारी ठाकुर ग्रंथावली का प्रकाशन भी शामिल है। 1986- 87 में भिखारी ठाकुर का जन्म शताब्दी वर्ष था। इसी बीच आश्रम और भिखारी ठाकुर के परिवार के बीच कई मुद्दों पर अंतर्विरोध उभर गया। जिस पर ग्रामीण राजनीति का प्रभाव था। जिससे कि तीसरे खंड के प्रकाशन पर ग्रहण लग गया। शीलानाथ आश्रम के साथ हुए इकरारनामा को वापस मांग लिए। जिससे आश्रम निर्जीव हो गया। लालू प्रसाद यादव जब मुख्यमंत्री हुए, तब भिखारी ठाकुर के परिवार के लोग उनसे मिलके चर्चा किए कि भिखारी ठाकुर की रचना ठीक से नहीं छपी है। शीलानाथ ठाकुर और शत्रुघ्न ठाकुर दोनों लोग मिलकर भिखारी ठाकुर की पुस्तक का समूह से पाण्डुलिपि और आश्रम का ब्लॉक लेकर मुख्यमंत्री से मिलकर उन्हें दे दिए। लालूजी मुकुलजी से बोले की इस धरोहर को संजोकर रख दीजिए। आज तक पता ही नहीं चला कि उसका क्या हुआ?

भोजपुरी अकादमी के जब निदेशक चितरंजनजी थे, तब भिखारी ठाकुर की संपूर्ण रचना के प्रकाशन के लिए अविनाश चंद्र विद्यार्थी से बोले कि हम नौ महीने में रिटायर हो जाएंगे, इसी बीच में रचना का संपादन हो जाना चाहिए। विद्यार्थीजी अपनी ज़िद और भूमिका बांधने में ज्यादा समय ले लिए। चितरंजन रिटायर हो गए। मन में बड़ा दुःख हुआ। आश्रम के सदस्य गण एक बार फिर भिखारी ठाकुर की संपूर्ण रचना के प्रकाशन करने का निर्णय लिए। रचना आलेखन पटना में दिया गया। इसका पहला प्रूफ लेकर प्रधान संपादक को हम दिए। अविनाश चंद्र वार्तिक काटने लगे। किंतु हम हिम्मत नहीं हारे। और हमने विद्वान लोगों से लेकर आश्रम परिवार तक इस समस्या को रखा। तब सभी लोगों ने एक मुँह से कहा कि दिवंगत साहित्यकार का एक भी शब्द काटना महापाप है।

1974 में लोक कलाकार भिखारी ठाकुर आश्रम कुतुबपुर कि मैंने स्थापना की थी। जून 1975 में बिहार सरकार से निबंधन हुआ। 1978 ईस्वी में स्मृति योजना बनी, जिसके कई अनुभाग हैं। आश्रम के संपादक और मंत्री होने के कारण हम भिखारी ठाकुर रचनावली जनता को यदि नहीं दे पाये तो सब करना धरना बेकार हो जाएगा। यह बात मेरे मन में हमेशा कचोटता रहता था। आचार्य द्वारिका सिंह हमेशा कहते थे कि राहीजी साहित्य का महल अज़र-अमर होता है। इस चिंता में हम डूबते-उत्तरते रहते थे। डॉ. वीरेंद्र नारायण यादव बिहार राष्ट्रभाषा के निदेशक हुए। उनसे मेरी पहले से ही मित्रता थी। वे छपरा से निकलने वाली स्मारिका का संपादन करते थे। हमारा बिहार राष्ट्रभाषा के कार्यालय में आना जाना शुरू हो गया। वे भिखारी ठाकुर के सम्पूर्ण रचनावली के प्रकाशन के लिए तैयार हो गए। भिखारी ठाकुर के प्रति उनके भीतर पीड़ा थी। सारा वातावरण बनने के बाद यह बात सामने आई कि डॉ. रामबचन राय से अनुमति लेना जरूरी है। डॉ. रामबचन से मेरा लगाव पहले से था। हम राजद के कार्यालय में गए। डॉ. रामचंद्र विधान परिषद के सदस्य और राजद के महासचिव के साथ पटना विश्वविद्यालय से अवकाश प्राप्त हिंदी के विद्वान थे। डॉ. रामबचन भिखारी ठाकुर की रचनाओं को प्रकाशित करने के सवाल पर खुश हुए और इस तरह 2004 के नवंबर महीने में राष्ट्रभाषा कार्यालय में सब लोग इकट्ठा होकर प्रकाशित करने की बात तय कर लिए। जिसमें संपादन की जिम्मेदारी लोक कलाकार भिखारी ठाकुर आश्रम के अध्यक्ष नागेन्द्र प्रसाद सिंह को दिया गया। रचना सामग्री जुटाने की जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई। तय हुआ कि 2004-05 के वर्ष में छप जाएगी। एक दिन राष्ट्रभाषा के निदेशक डॉ. विरेन्द्र नारायण यादव के यहां बैठकी हुई। जिसमें रचना प्रकाशन हेतु हर बिंदु पर योजना बनाई गई कि आगे का कार्य कैसे-कैसे किया जाए? इसमें पहले भिखारी ठाकुर के पौत्र राजेंद्र ठाकुर राष्ट्रभाषा परिषद के कार्यालय में जाकर इकरारनामा सहर्ष स्वीकार करके हस्ताक्षर कर दिए। राह खुल गया। आलेखन लेकर प्रेस पटना में हम और नागेंद्र गए। प्रेस छापने के लिए तैयार हो गया। डॉ. वीरेंद्र नारायण उसी प्रेस में मैनेजर से बातचीत किए और इस तरह से राष्ट्रभाषा रचनावली छापने का काम स्वीकार कर लिया।

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रचना के प्रकाशन के विषय में एक महत्वपूर्ण बात यह थी कि हम 1977 ई० से ही भिखारी ठाकुर रचना और कलाकारों के मुख से सुनी हुई, छूटी हुई, बिखरी हुई बातें जहां-जहां से मिली, साहित्य में संग्रह के रूप में इकट्ठा करते जाते थे। ताकि भिखारी ठाकुर की रचना बेकार न होने पाए। हम पहले ही शिव राम कृष्ण और फुटकर रचनाओं के साथ वार्तिक संग्रह तैयार कर लिए थे। केवल संपादन का रास्ता दिखाने को रह गया था। संपादक नाटकों का कथासार और कठिन शब्दार्थ हिंदी में कर दिए भिखारी ठाकुर के समय के जीवित और मृतक कलाकारों की सूची प्रशस्ति पत्र के साथ मेडल से भरा हुआ जैकेट का फोटो दिया गया। 1978 से 2005 ई० तक की अथक प्रयास से  भिखारी ठाकुर की संपूर्ण रचना भिखारी ठाकुर रचनावली मार्च 2005 ई.  में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद पटना से प्रकाशित हुई। इस तरह हमारा सपना पूरा हुआ। इस पुस्तक के प्रकाशन से देश-विदेश के कलाकार, शोधार्थी, विद्वान, साहित्यकार सबको लाभ मिल रहा है और दुनिया भर के लोग  भिखारी ठाकुर के बारे में जानने को उत्सुक हैं।

अप्रैल 2014 में रंगयात्रा पत्रिका में प्रकाशित ‘रामदास राही के लेख’ का भोजपुरी से हिंदी में दीपक शर्मा द्वारा अनुवादित।

गाँव के लोग
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