बिहार, तेरे हाल पर रोना आया  (डायरी 29 मई, 2022)

नवल किशोर कुमार

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सपने बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। इतने महत्वपूर्ण कि यदि सपने न हों तो किसी को सजीव नहीं माना जा सकता है। लंबे समय से मैं अपने सपनों को लिखित रूप में दर्ज करता रहता हूं। हालांकि सारे सपने दर्ज नहीं कर पाता। कई सारे सपने आंख खुलने के पहले तक जेहन में मौजूद रहते हैं और फिर आंख खुलने के बाद एकदम से गायब। ऐसे सपनों को याद रखने से भी क्या फायदा जो इतना भी इंतजार नहीं कर सकते। सपने तो वे ही हैं जो आपके साथ उस वक्त भी रहें जब आंखें खुली हों।
आज मैंने सपना देखा। वह भी भोर होने के बाद। करीब पांच बजे नींद खुल गयी। लगा कि जैसे अब दिन की शुरुआत हो ही गयी। परंतु, केवल मन जगा था, शरीर अब भी सोने के मूड में था। सो शरीर की जीत हुई और वह सो गया। लेकिन मन भी आखिर मन है। उसने ठान रखी थी कि वह नहीं सोएगा और वह नहीं सोया। मन घर चला गया।
सपने में घर यानी मेरा पटना में मेरा घर। पत्नी, मम्मी, पापा, भैया, भाभी और बच्चे सब थे। मेरा अपना कमरा बंद महीनों से बंद पड़ा है। पत्नी से पूछा तो जानकारी मिली कि अब इस कमरे में कोई नहीं रहता। बच्चे कुछ इधर-उधर न कर दें, इस कारण से कमरा बंद ही रहता है।

हकीकत में भी आदमी को पहले अपने बारे में सोचना चाहिए। इसको ऐसे देखिए कि यदि आप स्वयं पढ़ेंगे नहीं तो आप दूसरों को कैसे समझेंगे और कैसे दूसरे को पढ़ा सकते हैं। वैसे ही जैसे यदि आपके पेट में अनाज के दाने न हों तो आप दूसरों के लिए अनाज का उत्पादन कैसे कर सकेंगे। लेकिन बिहार में ऐसा क्या है कि लोगों को अनाज के लिए दूसरे राज्यों की ओर रुख करना पड़ता है? जबकि प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज से देखें तो शायद ही भारत का कोई राज्य इतना समृद्ध होगा। यहां तक कि वर्ष 2000 में झारखंड के अलग होने के बावजूद बिहार इस मामले में आगे है।

सचमुच कमरा बंद ही था। सबकुछ वैसा ही जैसा छोड़कर आया था। टेबल लैंप अब भी जल रहा था। पंखा भी गतिमान था। मेरी किताबें बिखरी पड़ी थीं। नजारा मानों ऐसा था जैसे वक्त इतने समय तक ठहरा पड़ा था उस कमरे में। समझ में नहीं आ रहा था कि किस तरह की प्रतिक्रिया दूं? मतलब यह कि पत्नी को डांट लगाऊं कि कमरे को बंद रखने का तुक क्या है? मेरा कमरा और मेरी किताबें, मेरा कंप्यूटर व मेरे सामान सब के सब घर में कैद क्यों रखे गए? क्या होता यदि बच्चे मेरी किताबों को इधर से उधर कर देते? संभव था कि सब उस कमरे में पढ़ते-खेलते-सोते? मेरे कमरे से उसका जीवन छीनने का अधिकार क्या तुम्हें इस कारण मिल जाता है कि तुम घर की स्वामिनी हो?
सपने में दिखने वाले दृश्य और वास्तविक जिंदगी के दृश्य लगभग एक जैसे ही होते हैं। अंतर केवल इतना होता है कि सपने में फ्रेमों के चलने की रफ्तार बहुत तेज होती है। मैं अपने कमरे में सब ठीक कर रहा था कि अचानक मेरी नजर कमरे के बाहर एक लत्तर पर पड़ी। लत्तर मतलब मनी प्लांट नहीं। कद्दू का पौधा अब छत पर पहुंच गया है। कुछ फूल भी खिले हैं। संभव है कि सप्ताह में घर का कद्दू खाने को मिले।
पापा सपने में भी नहीं बदलते। हमेशा तैयार रहते हैं मुझे डांटने के लिए। आज भी उन्होंने पूछ ही लिया कि आखिर क्या जरूरत थी इतना खतरा उठाकर आने की। रहते अभी वहीं। यहां कौन सा काम बिगड़ा जा रहा है। अब उन्हें कैसे समझाऊं कि उन सबके बगैर खतरा भी खतरा महसूस नहीं होता। फिर उनके साथ बैठकर चाय पीते हुए मैंने गांव के बारे में पूछा। जवाब मिला कि गांव में सब ठीक है। गांव-समाज के बारे में बाद में सोचना पहले जाकर कुछ खा लो।
खैर, यह तो मेरे सपने की बात हुई। हकीकत में भी आदमी को पहले अपने बारे में सोचना चाहिए। इसको ऐसे देखिए कि यदि आप स्वयं पढ़ेंगे नहीं तो आप दूसरों को कैसे समझेंगे और कैसे दूसरे को पढ़ा सकते हैं। वैसे ही जैसे यदि आपके पेट में अनाज के दाने न हों तो आप दूसरों के लिए अनाज का उत्पादन कैसे कर सकेंगे। लेकिन बिहार में ऐसा क्या है कि लोगों को अनाज के लिए दूसरे राज्यों की ओर रुख करना पड़ता है? जबकि प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज से देखें तो शायद ही भारत का कोई राज्य इतना समृद्ध होगा। यहां तक कि वर्ष 2000 में झारखंड के अलग होने के बावजूद बिहार इस मामले में आगे है। बिहार में ऊर्वर जमीन है। नदियां हैं। इनसे बढ़कर अधिक नेमत क्या हो सकती है?
सवाल यही है कि आखिर बिहार पंजाब क्यों नहीं बन सका? कारण की चर्चा बाद में करते हैं। पहले यह विचारते हैं कि जवाब कहीं बिहार के इतिहास में तो नहीं।

बिहार में अंग्रेजों के कुशल जल प्रबंधन के प्रमाण आज भी मौजूद हैं। पटना में ही कई जगह नहरों पर लॉक है। यह तो एकदम दिलचस्प है। दरअसल होता यह था कि सोन नहर का इस्तेमाल जल परिवहन के लिए किया जाता था। लॉक के जरिए पहले पानी का जलस्तर बढ़ाया जाता और उसे ऊपर से नीचे या फिर नीचे से ऊपर ले जाया जाता था। यह सब केवल पांच मिनट में होता था। इस तरह का लॉक सिस्टम ब्रिटेन में आज भी देखे जा सकते हैं। दक्षिण अमेरिका के पनामा नहर पर बना लॉक आज विख्यात टूरिस्ट स्पॉट है। लेकिन बिहार तो बिहार है। यहां राजधानी पटना के खगौल और नौबतपुर में यह अद्भुत संरचना और उसकी बदहाली आज भी देखी जा सकती है।

दरअसल, बिहार का इतिहास आजीवकों से जुड़ा है। उसके पहले भी धरती का यह हिस्सा जरूर रहा होगा लेकिन इतिहास के लिए तो वही कालखंड महत्वपूर्ण रहा होगा जब मक्खलि गोसाल, पुकुद कात्यायन, अजित केशकंबलि, निगंठ नाथपुत्त तथा संजय वेलट्ठिपुत्त सरीखे दार्शनिकों से यह भूभाग गुलजार रहा होगा। फिर बुद्ध और महावीर का उदय। फिर मगध में स्थापित हुई शासन व्यवस्था ने अपना विस्तार किया। चंद्रगुप्त मौर्य से लेकर पुश्यमित्र शुंग तक का इतिहास जानने-समझने योग्य है।
पुश्यमित्र शुंग को मैं हत्यारे की श्रेणी में नहीं रखता। हालांकि उसने वृहतरथ की हत्याकर मौर्य वंश को खत्म जरूर कर दिया। लेकिन यह तो सत्ता की राजनीति थी। नंद वंश जो कि असल में नाई समाज के लोग थे, उनका खात्मा तो चंद्रगुप्त ने चाणक्य के साथ मिलकर किया था। इस प्रकार यदि हम पुश्यमित्र शुंग को खलनायक मानेंगे तो चंद्रगुप्त को भी खलनायक मानना ही होगा। फिर सम्राट अशोक को भी खलनायक के रूप में ही स्वीकार करना होगा। सिंहासन से उसका लगाव आज के सत्तालोलुप नेताओं के जैसा ही है। कोई खास अंतर नहीं।
खैर, यह तो मानना ही होगा कि बिहार को ‘चरवैति-चरवैति’ का प्रांत रहा है। नदियों में असीम जल इसके लिए संकट बनता रहा है। आज भी बाढ़ प्रत्येक वर्ष बिहार की अर्थव्यवस्था पर करारा प्रहार करता ही है। यह उस समय भी रहा जब नदियों पर आज की तरह हाई डैम नहीं थे। हां तब अंतर यह जरूर था कि नदियां स्वतंत्र थीं। वह अपनी धारायें बदलती रहती थीं। खासकर नेपाल साइड से आने वाली नदियां जैसे कोसी, गंडक, कमला बलान आदि। हाई डैम बनाकर इन नदियों को बांधने की कोशिश जरूर की गयी लेकिन नतीजा सकारात्मक नहीं है। गाद के कारण नदियों का पेट भरता जा रहा है और बाढ़ कुप्रबंधन के कारण बांध टूटते रहते हैं।
कृषि की भूमिका हमेशा से बिहार की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण रही है। लेकिन इसकी अनिश्चितता के कारण लोगों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा है। भिखारी ठाकुर के ‘बिदेसिया’ को एक साक्ष्य के रूप में पेश किया जा सकता है। उन दिनों देश में अंग्रेजों का राज था। अंग्रेज समझदार शासक थे। वे यह जानते थे कि जल प्रबंधन के बगैर इस भूभाग पर खुशहाली नहीं लायी जा सकती है। हमारे यहां कैमूर की पहाड़ियों से आने वाला अथाह जल सोन नहर के जरिए खेतों में पहुंचाने का काम तो अंग्रेजों ने ही किया। उसके पहले भी नहरों के संबंध में काम हुआ। तब मुगल शासक रहे होंगे।

पुश्यमित्र शुंग को मैं हत्यारे की श्रेणी में नहीं रखता। हालांकि उसने वृहतरथ की हत्याकर मौर्य वंश को खत्म जरूर कर दिया। लेकिन यह तो सत्ता की राजनीति थी। नंद वंश जो कि असल में नाई समाज के लोग थे, उनका खात्मा तो चंद्रगुप्त ने चाणक्य के साथ मिलकर किया था। इस प्रकार यदि हम पुश्यमित्र शुंग को खलनायक मानेंगे तो चंद्रगुप्त को भी खलनायक मानना ही होगा। फिर सम्राट अशोक को भी खलनायक के रूप में ही स्वीकार करना होगा

एक उदाहरण मेरे गांव के दक्खिन में एक नहर है। इसे बादशाही नहर कहा जाता है। जाहिर तौर पर इसे किसी बादशाह ने ही बनवाया होगा। अतीत में यह नहर गंगा और पुनपुन नदी को जोड़ती होगी। पुनपुन बरसाती नदी है। संभव है कि जब बरसात में पुनपुन नदी में जल स्तर बढ़ता होगा तब उसका पानी नहरों के माध्यम से गंगा नदी में ले जाया जाता होगा ताकि आसपास गांवों को डूबने से बचाया जा सके। इसी प्रकार जब पुनपुन में जलस्तर न्यून होता होगा और किसानों को सिंचाई के लिए पानी की आवश्यकता होती होगी तब गंगा नदी का पानी नहर में छोड़ा जाता होगा।
बहरहाल, बिहार में अंग्रेजों के कुशल जल प्रबंधन के प्रमाण आज भी मौजूद हैं। पटना में ही कई जगह नहरों पर लॉक है। यह तो एकदम दिलचस्प है। दरअसल होता यह था कि सोन नहर का इस्तेमाल जल परिवहन के लिए किया जाता था। लॉक के जरिए पहले पानी का जलस्तर बढ़ाया जाता और उसे ऊपर से नीचे या फिर नीचे से ऊपर ले जाया जाता था। यह सब केवल पांच मिनट में होता था। इस तरह का लॉक सिस्टम ब्रिटेन में आज भी देखे जा सकते हैं। दक्षिण अमेरिका के पनामा नहर पर बना लॉक आज विख्यात टूरिस्ट स्पॉट है। लेकिन बिहार तो बिहार है। यहां राजधानी पटना के खगौल और नौबतपुर में यह अद्भुत संरचना और उसकी बदहाली आज भी देखी जा सकती है। अन्य जिलों के हालात क्या होंगे, इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है।
खैर, बिहार का इतिहास जितना शानदार रहा है, वर्तमान उतना ही बदहाल। शासकों को जरूर यह विचारना चाहिए कि बिहार उनकी बपौती नहीं है।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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