प्रशासनिक अधिकारियों का मनोगत चित्रण करता है सिनेमा

राकेश कबीर

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प्रशासनिक अधिकारी भारतीय सार्वजनिक जीवन में अनिवार्य भूमिका निभाते हैं । उनकी अपनी विशेषताएँ , दिक्कतें और सीमाएं होती हैं । मानवीय और प्रशासनिक स्तरों पर वे लगातार चुनौतियों का सामना करते हैं । लेकिन सिनेमा ने उनका प्रोटोटाइप बनाया है जबकि उनकी प्रस्थिति और भूमिकाओं को लेकर बेहतरीन सिनेमा बनाया जा सकता है । दो खंडों में प्रकाशित होने वाले के लेख का पहला हिस्सा –

सिनेमा दृश्य-श्रव्य मनोरंजन माध्यम होने के कारण बहुत ही प्रभावी जनशिक्षण का भी माध्यम है। फिल्मकार विविध विषयों को अपनी फिल्मों की विषय वस्तु बनाते हैं। बॉलीवुड फिल्मों को देखें तो आफिस के बाबू और पुलिस के हवलदार से लेकर कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक-कमिश्नर तक को परदे पर प्रस्तुत किया गया है। अधिकारी भी हमारे परिवार, शिक्षण संस्थानों और समाज से जुड़े होते हैं और समाज ही उनके कार्यक्षेत्र का हिस्सा भी होता है। उनकी शिक्षा-दीक्षा और नौकरी में ट्रेनिंग भी समाज के शिक्षण/प्रशिक्षण संस्थानों में ही होती है। जिस तरह समाज में अच्छे-बुरे काम करने वाले लोग होते हैं उसी तरह अधिकारियों में भी दोनों तरह के लोग पाए जाते हैं। कुछ अपने पद के दायित्वों के प्रति बेहद सजग और आम जनता की समस्याओं के प्रति सम्वेदनशील होते हैं जबकि कुछ लोग बहुत ही स्वकेंद्रित, स्वार्थी और असम्वेदनशील होते हैं। पद और कार्य से जुडी प्रेरणाएं और अपने कार्य के प्रति समर्पण और स्वाभिमान की भावना अलग-अलग मात्रा में लोगों में पाई जाती हैं। इसी कारण फिल्में भी दोनों तरह के चरित्रों का चित्रण करती रही हैं। परन्तु एक बात ध्यान देने योग्य है कि प्रदेश/राष्ट्रीय स्तर पर अधिकारियों और उनके विभागों में भारी विविधता होने के बावजूद बॉलीवुड का फोकस पुलिस और सेना से जुड़े विषयों पर ज्यादा रहा है। हिंदी और अन्य भाषाओं के सिनेमा में पुलिस विभाग के अच्छे और बुरे कार्यों पर हजारों फिल्मे मिल जायेंगी लेकिन अन्य अधिकारियों और उनके कार्यों पर गिनती भर की फिल्मे बनी हैं। कार्यकारी एवं न्यायिक मजिस्ट्रेट, विकास विभाग, समाज कल्याण, दिव्यांग कल्याण, पिछड़ा वर्ग कल्याण, महिला और बाल कल्याण, कृषि विभाग, लोक निर्माण, स्वास्थ्य, विद्युत, उद्योग, परिवहन, खाद्य सुरक्षा, खाद्य एवं रसद, वन विभाग, शिक्षा विभाग, इत्यादि विभागों में कार्य करने वाले अधिकारीयों-कर्मचारियों और उनके कार्यों के बारे में कहानियों और फिल्मों का बॉलीवुड में अभाव सा है।

सन 1946 में प्रीमियर कांफ्रेंस में केन्द्रीय कैबिनेट ने इंडियन सिविल सर्विस के स्थान पर इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस और इम्पीरियल पुलिस के स्थान पर इंडियन पुलिस सर्विस की स्थापना हुई। सरदार बल्लभ भाई पटेल ने संविधान सभा में अखिल भारतीय सेवाओं पर अपने विचार रखते हुए आईएएस सेवा को बनाये रखने के समर्थन में कहा था, “भारतीय प्रशासनिक सेवा का कोई विकल्प नहीं है…हमारे संघीय ढांचे को अखंड बनाये रखने के लिए एक अच्छी और स्वतंत्र विवेक से काम करने वाली अखिल भारतीय सेवा की जरूरत है। ऐसी सेवा के बिना आप संविधान को लागू नहीं करा सकते. ये हमारे लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण अंग हैं, यदि आपने इनको हटा दिया तो देश में हर तरफ अव्यवस्था और अराजकता फ़ैल जायेगी”। परिणामस्वरूप भारतीय संविधान के अनुच्छेद 312 (2) में इन सेवाओं की व्यवस्था की गयी। इसीलिए सरदार वल्लभ भाई पटेल को सिविल सेवाओं का संरक्षक संत कहा जाता है। अखिल भारतीय सेवा अधिनियम 1951 में भी इन सेवाओं की व्यवस्था का विस्तृत उल्लेख है।

आईएएस और राज्य सिविल सेवा के अधिकारी मुख्यतः राजस्व संग्रह और अपराध नियन्त्रण का कार्य करते हैं।  साथ ही वे संघ और राज्य सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों के निर्माण और क्रियान्यवन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जनता की शिकायतों और समस्याओं के निस्तारण की भी ज़िम्मेदारी भी मुख्य रूप से इन्हीं सेवकों के उपर होती है। सिविल सेवा एवं अन्य सेवाओं पर बनी फिल्मों में से कुछ का विश्लेषण नीचे दिया गया है।

हिंदी और अन्य भाषाओं के सिनेमा में पुलिस विभाग के अच्छे और बुरे कार्यों पर हजारों फिल्मे मिल जायेंगी लेकिन अन्य अधिकारियों और उनके कार्यों पर गिनती भर की फिल्मे बनी हैं। कार्यकारी एवं न्यायिक मजिस्ट्रेट, विकास विभाग, समाज कल्याण, दिव्यांग कल्याण, पिछड़ा वर्ग कल्याण, महिला और बाल कल्याण, कृषि विभाग, लोक निर्माण, स्वास्थ्य, विद्युत, उद्योग, परिवहन, खाद्य सुरक्षा, खाद्य एवं रसद, वन विभाग, शिक्षा विभाग, इत्यादि विभागों में कार्य करने वाले अधिकारीयों-कर्मचारियों और उनके कार्यों के बारे में कहानियों और फिल्मों का बॉलीवुड में अभाव सा है।

सिनेमा में मजिस्ट्रेट साहब : अंदर और बाहर की दुनिया

सूर्या (1989) फिल्म में राजकुमार, विनोद खन्ना, राजबब्बर और अमरीश पुरी जैसे कलाकार हैं। फिल्म का  कथानक राजस्थान के एक जनपद में जमींदारी व्यवस्था को समाप्त करने को लेकर परम्परागत प्रभु जातियों के जमींदारों, पुलिस और प्रशासन के कार्य और जनता के मध्य घटित घटनाक्रमों पर आधारित है। जिला कलेक्टर और मजिस्ट्रेट के रोल में राजकुमार हैं जिनकी एक जेब में तम्बाकू की पाइप और दूसरी जेब में इस्तीफा रेडीमेड रखा रहता है। उनकी उम्र और अनुभव देखकर पता चलता है कि वे राज्य सिविल सेवा के अफसर हैं। उनका ताल्लुक अजमेर के राजा पृथ्वी राव चौहान से है जैसा कि वे कई बार बताते हैं। कलेक्टर के कमरे में कोई जमींदार चौधरी बिना इजाजत नहीं घुस सकता। इसकी तमीज वे अमरीश पूरी को अच्छे से समझा देते हैं।  जमींदारी टूटने और हदबंदी कानून के तहत 15 एकड़ से ज्यादा जमीन कोई नहीं रख सकता। इस कानून के तहत जब चौधरी अमरीश हस्ताक्षर करने से मना कर देता है और तहसीलदार को अपने घर से वापस कर देता है तो कलेक्टर सूरज चौहान खुद चौधरी के घर जाते हैं और बहस में एक मजेदार घटना घटती है। जब कलेक्टर हुक्म देते हैं कि चौधरी कागजात पर दस्तखत कर दे तो वह मना कर देता है “मै तुम्हारा मातहत कारिन्दा नहीं जो तुम्हारे हुक्म की तालीम करूँ”। जवाब में कलेक्टर साहब कहते हैं, “तुम्ही नहीं, ये सारा इलाका हमारे मातहत है, बतौर कलेक्टर हम अपने इख्तियार का इस्तेमाल करना भी जानते हैं”।

आईएएस और राज्य सिविल सेवा के अधिकारी मुख्यतः राजस्व संग्रह और अपराध नियन्त्रण का कार्य करते हैं। साथ ही वे संघ और राज्य सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों के निर्माण और क्रियान्यवन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जनता की शिकायतों और समस्याओं के निस्तारण की भी ज़िम्मेदारी भी मुख्य रूप से इन्हीं सेवकों के उपर होती है। सिविल सेवा एवं अन्य सेवाओं पर बनी फिल्मों में से कुछ का विश्लेषण किया गया है।

आजादी के बाद जमींदारी प्रथा खत्म हुई, भूमि अधिकारों के सम्बन्ध में सीलींग एक्ट भी लागू हुआ। बड़े जमींदारों और काश्तकारों की जोतों से निकाली गयी जमीनों का वितरण भूमिहीनों और छोटे किसानों में किया गया परन्तु जमींदार इतने मजबूत थे कि उनकी जमीन जोत लेना आसान नहीं था। परिणामस्वरूप किसानों और जमींदारों के बीच देश भर में संघर्ष भी हुए। कानून के मुताबिक कलेक्टर साहब जमींदार की अतिरिक्त जमीन लेकर गरीब किसानों में बाँट तो देते हैं लेकिन पूर्व जमींदार चौधरी अपने स्थापित डर का इस्तेमाल कर सबके कागजात जमा करवा लेता है। जनपद के पुलिस अधीक्षक जमींदार के प्रशंसक है। इलाके का इंस्पेक्टर इकबाल (राजबब्बर) एक नौजवान है जो चौधरी की बदतमीजी को भी बर्दाश्त कर लेता है। वह कलेक्टर को को सलाह देता है कि चौधरी से बदला लेने के मकसद से सेना की नौकरी छोड़कर लौटे जवान सूरज सिंह (विनोद खन्ना) को गाँव में किसान बनाकर भेजा जाये। सदियों से दबकर जीने के आदी किसानों और मजदूरों के सोये हुए स्वाभिमान और सदियों की गुलामी भरी सोच से स्वतंत्र कराने के लिए एक नेता की जरूरत होती है। कलेक्टर साहब के निर्देशानुसार सूरज सिंह गाँव वालों को जमींदार के खिलाफ गोलबंद करने की कोशिश करता है लेकिन धूर्तों का तिलिस्म तोड़ना आसान कहाँ होता है! चौधरी की गर्भवती पत्नी जब किसानों पर अन्याय रोकने को कहती है तो उसका जवाब देखिये, “मेरा बाप मुझे शेर की पीठ पर बिठाकर गया है और अगर ये सवारी मैं छोड़ दूँ तो कहीं का नहीं रहूँगा। ये सब करना मेरी मजबूरी है”।

अपने कई प्रयासों में असफल होने के बाद सूरज गाँव के मंदिर के सहारे जनता को अपने पक्ष में एकजुट करता है। धर्मभीरु और भंग स्वाभिमान वाली जनता केवल धर्म और भगवान के नाम पर ही जागती है। शासक अपने शासितों पर जुर्म भी उन्हीं के लोगों को पालतू बनाकर करवाता है। ये पालतू लोग अपने ही किसान भाइयों की फसल लूट ले जाने में चौधरी की मदद करते हैं और शेष में आग लगा देते हैं। वर्ग चेतना का घोर अभाव शोषण के शिकार लोगों को शोषकों के विरुद्ध एकजुट नहीं होने देता है। इन्स्पेक्टर इकबाल जब अपने पद पर रहते किसानों की लूटी हुई फसल वापस नहीं करा पाता और उसका जबरन ट्रांसफर कर दिया जाता है तो वह अपनी नौकरी से इस्तीफा देकर अपने गाँव लौट आता है ताकि वह गाँव वालों के साथ मिलकर जमींदार के अत्याचारों से मुक्ति दिला सके। विरोध प्रदर्शन के दौरान चौधरी की बंदूक से उसकी जान चली जाती है लेकिन मरने के पहले वह उसकी बंदूक को छीन लेता है और शोषक को वहाँ से भागना पड़ता है। भीड़ उसे दौड़ा लेती है और उसे मार देती है। डीएम और एसपी मयफोर्स मौके पर पहुंचते है। पुलिस का आदेश होता है कि सूरज और उनके साथी सरेंडर कर दें लेकिन जागी हुई जनता के सामने उन्हें झुकना पड़ता है। कलेक्टर (राजकुमार) साहब कहते हैं किसी की गिरफ्तारी नहीं होगी, हम सरकार को रिपोर्ट भेज देंगे। यह फिल्म बताती है जनता को अपने हक के लिए खुद लड़ना पड़ता है। कानून और प्रशासन मदद तभी कर सकते हैं जब लोग अपने अधिकारों के प्रति सचेत हों और अपने खिलाफ हो रहे जुर्म का प्रतिकार करने को तैयार हों।

कानून अपना अपना (1989) जगत प्रताप सिंह (दिलीप कुमार) जनपद अनोखापुर के जिलाधिकारी हैं।  वे कानून की इज्ज़त करन वाले एक ईमानदार एवं कर्तव्य निष्ठ अफसर हैं। भूषणनाथ बडबोले (कादर खान) एक मंत्री हैं। कलेक्टर का बेटा (संजय दत्त) एक तेज-तर्रार पुलिस इंस्पेक्टर है जो अपराधियों को तुरंत सबक सिखाने में यकीन करता है। माँ की भूमिका में नूतन का कोई जोड़ नहीं । वह जरूरत पड़ने पर बेटे या पति को जीवन के पाठ पढ़ाने में कोताही नहीं करती। दिलीप कुमार राज्य सिविल सेवा के प्रोन्नत आईएएस और कलेक्टर हैं जो दैनिक कार्यों में अपने अनुभव का बखूबी इस्तेमाल करते हैं। एक सडक छाप दलाल (कादरखान) जैसा कि फिल्म में दिखाया गया है, के चुनाव जीतने के बाद मंत्री बनकर लौटने और बदले की भावना से उकसाने पर भी कलेक्टर साहब बड़े संयम से उसका जवाब देते हैं। जो भी कहना है कानून के दायरे में कहते हैं। वह किसी के दबाव न गलत काम करते हैं और न ही झूठा वादा करते हैं।

पृथ्वी आईएएस (2010) इस फिल्म में अवैध खनन कम्पनियों से दूषित हुए जल को पीने के कारण लोग बीमार हो रहे लोगों की समस्या को विषयवस्तु बनाया गया है। एक जिलाधिकारी के तौर पर फिल्म का नायक पृथ्वी प्रदूषण के कारणों का पता लगाकर सभी अवैध कम्पनियों को सीज कर देता है। माइनिंग माफिया उसे मार देना चाहते हैं लेकिन वह सरकार के फैसलों के खिलाफ भी सवाल खड़ा करता है और जनता के पक्ष में क़ानूनी तरीके से लड़ते हुए सफल भी होता है। अभिमन्यु आईएएस (2006) एक ईमानदार अधिकारी के संघर्षों की कहानी है। दुर्गावती (2018) में भूमि पेडनेकर आईएएस के रोल में, अरम (2017) नयनतारा- लेडी आईएएस, कोयलांचल (2014) फिल्म में सुनील शेट्टी, इंग्लिश अगस्त (1994) में राहुल बोस आईएएस अधिकारी की भूमिकाओं में हैं. रेड (2018) फिल्म में अजय देवगन आईआरएस अफसर की भूमिका में हैं। रेड फिल्म एक इनकम टैक्स के ईमानदार अधिकारी और एक राजनेता के बीच दांवपेच की प्रभावी कहानी कहती है

कलेक्टर का इंस्पेक्टर बेटा भी अन्याय को बर्दाश्त नहीं करता लेकिन अधिकारी पिता बार-बार उसे कानून अपने हाथ में लेने से रोकते हैं। फिल्म के अंतिम दृश्य में भी कलेक्टर पिता अपने इंस्पेक्टर बेटे को अपराधियों की हत्या करने से रोककर उन्हें पुलिस की कस्टडी में देकर कानूनी तरीके से कार्य करने का संदेश देते हैं। एक ज़िम्मेदार अधिकारी का यही दायित्व भी होता है। एक लड़की की इज्जत बचाने की लड़ाई में जब एक अपराधी उनके हाथों मारा जाता है तो वे स्वयं को पुलिस को सौंप देते हैं।

जब कलेक्टर पिता एक दिन अपने इंस्पेक्टर बेटे के आफिस में आता है तो मेज से फाइल गिरने के बहाने बेटा अपने पिता का पैर छूता है। सूर्यवंशम फिल्म में कलेक्टर बहू अपने ससुर का पैर छूने के लिए यही तरकीब अपनाती है। वर्दी पहने हुए पुलिस का अधिकारी और कलेक्टर की कुर्सी पर बैठी बहू अपने बड़ों का पैर नहीं छू सकते ये ठीक बात है लेकिन ये दोनो सीन ड्रामेटिक हैं। अधिकारियों के ऑफिस में रिटायरिंग रूम होते हैं जहाँ वे विशिष्ट लोगों से अलग मुलाक़ात करते हैं। वे अपनी सीट से खड़े होकर अपने से बड़ों को नमस्ते या सैलूट कर सकते हैं, इसमें किसी ‘रोल कनफ्लिक्ट’ या द्विविधा में पड़ने की जरूरत नहीं होती। दर्शकों को अतिरिक्त ‘नैतिकता का डोज’ देने के लिए ऐसे सीन क्रियेट करना बॉलीवुड के फिल्मकारों का अपना ईजाद किया हुआ तरीका है। जब हम पढ़ाई कर रहे थे और अफसर बनने का ध्येय रखकर तैयारी में जुटे तो रिश्तेदारों एक कहानी सुनाई जाती थी, “एक किसान का बेटा पढ़ लिखकर कलेक्टर बन गया, एक बार जाब उनके पिता जी उनके आफिस पहुंचे मैले-पुराने कपड़ों में तो गेट से ही उनके चपरासियों और गार्डों ने भगा दिया। किसी तरह अंदर पहुंचे तो बेटे ने बाप को पहचानने से मना कर दिया। इस व्यवहार से दुखी होकर पिताजी वापस अपने गाँव-घर चले गए”। ऐसी घटनाएं अपवादस्वरूप ही होती हैं। लोग अपने माँ-बाप या अन्य रिश्तेदारों को प्रेम से बुलाते और सम्मान देते हैं। घर पर साथ में रखते हैं और उनका पूरा ध्यान रखते हैं।

फिल्म सूर्यवंशम

एक अधिकारी सार्वजनिक पद पर रहकर कानूनी दायरे में अपने दायित्व निभाते हुए अक्सर निजी दुश्मनी में उलझ जाते हैं और उनको अपनी लड़ाई खुद लडनी पड़ती है। गुंडों और माफियाओं से अपने परिवार के लोगों की जान और प्रतिष्ठा बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। जेल में बंद बड़े अपराधी-माफिया के डर से जेलों के अधीक्षक उन्हें जेल परिसर में भी प्रतिबंधित एवं गैर कानूनी काम करने देता है क्योंकि माफ़िया, जेलर और अधीक्षक को धमकी देता रहता है कि बात न मानने पर उसकी कोचिंग जाने वाली बेटी तथा अमुक शहर में रहने वाले परिवार को परिणाम भुगतने होंगे। ये फिल्म और बेहतर हो सकती थी अगर जनहित के मुद्दों पर और केन्द्रित किया जाता। घर-परिवार का झगड़ा ज्यादा फ़ैल जाने के कारण एक उम्दा फिल्म कमतर हो जाती है। निजी रिश्तों और कर्तव्यों को लेकर परिवार के सदस्यों से संघर्ष होते हैं लेकिन उन्हें जरूरत से ज्यादा महत्व देने से फिल्म अपने मूल उद्देश्य से भटक सी जाती है। यशवंत (1997) में नाना पाटकर यशवंत लोहार नाम से पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका में हैं। उन्हें जब फर्जी तरीके से जेल भेज दिया जाता है तो अपनी पत्नी मधु को बड़ा अधिकारी बनने की प्रेरणा देते हैं और वह आईएएस बन भी जाती है। एक महिला आईएएस अफसर के गनर के तौर पर उसके कालेज टाइम के दोस्त (अतुल अग्निहोत्री) की नियुक्ति करके उन दोनों के अफेयर की खबरें  उडायी जाती हैं। यह फिल्म बताती है कि अधिकारियों को अपने दायित्वों के निर्वहन में किस तरह की चुनौतियों का सामना करना है।

ट्रेन टू पाकिस्तान (1998) इस फिल्म में मोहन अगाशे (हुकूम चंद) ब्रिटिश कालीन जिला मजिस्ट्रेट की भूमिका में हैं जिनसे फिल्म आरम्भ होती है। वह देश के बंटवारे के बारे में जिक्र करते हैं। इंद्रा द टाइगर (2002) इस फिल्म में प्रकाश राज (चेन्ना केशव रेड्डी ) एक कलेक्टर की भूमिका में हैं। आन्ध्र प्रदेश क्षेत्र में पानी बंटवारे की समस्या को लेकर यह फिल्म बनाई गई है। सूर्यवंशम (1999) फिल्म की नायिका सौंदर्या एक कलेक्टर (आईएएस) की भूमिका में हैं। जब उनके ससुर ठाकुर भानुप्रताप सिंह उनके कार्यालय में किसी काम से आते हैं तो फाइल गिराने के बहाने से वह अपने ससुर के पैर छूती हैं। खट्टा मीठा (2010) फिल्म का नायक सचिन त्रिचकुले (अक्षय कुमार) एक गांधीवादी आदर्शों वाला छात्र नेता जीवन की तपिश में झुलसकर एक भ्रष्ट और समझौतावादी ठेकेदार बन जाता है। इस फिल्म की नायिका (तृषा कृष्णन-गहना गंपुले) एक आईएएस अफसर (नगर आयुक्त) है। सचिन धोखे से अपनी ही पूर्व प्रेमिका और वर्तमान म्युनिसिपलिटी कमिश्नर को घूस लेने के आरोप में फंसाने की कोशिश करता है। इस फिल्म की अफसर कुछ ख़ास प्रभाव नही छोड़ पाती। सिंह साहब द ग्रेट (2013) सिंह साहब, भदौरी ज़िले के एक ईमानदार कलेक्टर सरनजीत तलवार (सनी देओल) होता है जो पूरी तरह से ईमानदार और भ्रष्टाचार के सख्त खिलाफ है। सरनजीत अपनी पत्नी और बहन के साथ रहते हैं। बाहुबली  भूदेव (प्रकाश राज) को कलेक्टर के इस रवैये से काफ़ी नुकसान होता है और बदला लेने के लिए वह उसकी पत्नी को धोखे से ज़हर देकर मरवा देता है। यही नहीं, इससे बौखलाए कलेक्टर को भी उलटे रिश्वत का इल्ज़ाम लगाकर 14 साल के लिए जेल भेज दिया जाता है। जेल से छूटने के बाद वह अपने दुश्मनों से बदला लेना चाहता है परन्तु अपनी दिवंगत पत्नी की आखिरी चिट्ठी में लिखे संदेश उसे बदलने पर मजबूर कर देती है और अपने खोए हुए सम्मान को वापस पाने के लिए वह सिंह साहब दी ग्रेट बन जाता है। वह हिंसा का रास्ता छोडकर अहिंसा और अच्छे व्यवहार से गलत लोगों को बदलने की कोशिश करता है।

फिल्म ट्रेन टू पाकिस्तान

फिल्म नील बटे सन्नाटा (2016) को अन्तराष्ट्रीय स्तर पर ‘द न्यू क्लासमेट’ के नाम से रिलीज किया गया। एक दसवीं फेल अकेली माँ चंदा सहाय की कहानी है जिसकी एक अपेक्षा नाम की एक बेटी है। यह कमजोर सामाजिक-आर्थिक प्रस्थिति वाले लोगों के सपनों पर आधारित है जो अपनी जिन्दगी में बेहतर बदलाव लाना चाहते हैं।  माँ की लगन और प्रयासों से अपु/अपेक्षा संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास कर इंटरव्यू में पहुँच जाती है और सफल होती है। इंटरव्यू के एक सवाल के जवाब में वह बताती है कि वह अपनी माँ की तरह घरों में काम करने वाली नहीं बनना चाहती है। माँ की प्रेरणा से ही वह यहाँ तक पहुंची है। शादी में जरूर आना (2017) फिल्म में राजकुमार राव (सतेन्द्र) आईएएस के और कृति खरबंदा (आरती) सब-रजिस्ट्रार (अलाइड पीसीएस) की भूमिकाओं में हैं। शादी की रात पीसीएस मुख्य परीक्षा में पास होने की खबर सुनकर नायिका बिना किसी को बताये घर से भाग जाती है। इस फिल्म का नायक अपने अपमान का बदला आईएएस अधिकारी बनकर लेता है और उसकी पोस्टिंग लखनऊ में होती है। नायिका भी उसी जनपद में सब-रजिस्ट्रार है। एक प्रोपर्टी डीलर द्वारा भूमि खरीद में हुई धोखाधड़ी में नायिका के खिलाफ जांच शुरू होती है। नायक जिलाधिकारी के तौर पर जाँच अधिकारी होता है और ऐसा लगता है कि वह अपने अपमान का बदला नायिका से लेगा लेकिन अंततः वह सभी आरोपियों पर कार्यवाही कराकर निर्दोष नायिका को बचा लेता है। यह एक अच्छी फिल्म हो सकती थी लेकिन एक अधिकारी के सार्वजनिक जीवन में निर्णय लेने की क्षमता, जरूरतमन्द लोगों के जीवन में उल्लेखनीय परिवर्तन लाने जैसे गुणों पर केन्द्रित करने की जगह नाच गाना और निजी सम्बन्धों पर आधारित भावनात्मक दृश्यों को ही प्रधानता दी गयी है। यह फिल्म इलाहाबाद-प्रयागराज, बनारस और लखनऊ शहरों में घूमती रहती है। लखनऊ जनपद के तत्कालीन जिलाधिकारी श्री सत्येन्द्र कुमार सिंह के नाम पर हीरो का नाम सत्येन्द्र रखा गया है क्योंकि फिल्म का नायक लखनऊ का कलेक्टर बनकर आता है।  नायिका उसे सत्येन्द्र की जगह अपनी ख़ास स्टाइल में सतेन्द्र बोलती है.

पृथ्वी आईएएस (2010) इस फिल्म में अवैध खनन कम्पनियों से दूषित हुए जल को पीने के कारण लोग बीमार हो रहे लोगों की समस्या को विषयवस्तु बनाया गया है। एक जिलाधिकारी के तौर पर फिल्म का नायक पृथ्वी प्रदूषण के कारणों का पता लगाकर सभी अवैध कम्पनियों को सीज कर देता है। माइनिंग माफिया उसे मार देना चाहते हैं लेकिन वह सरकार के फैसलों के खिलाफ भी सवाल खड़ा करता है और जनता के पक्ष में क़ानूनी तरीके से लड़ते हुए सफल भी होता है। अभिमन्यु आईएएस (2006) एक ईमानदार अधिकारी के संघर्षों की कहानी है। दुर्गावती (2018) में भूमि पेडनेकर आईएएस के रोल में, अरम (2017) नयनतारा- लेडी आईएएस, कोयलांचल (2014) फिल्म में सुनील शेट्टी, इंग्लिश अगस्त (1994) में राहुल बोस आईएएस अधिकारी की भूमिकाओं में हैं. रेड (2018) फिल्म में अजय देवगन आईआरएस अफसर की भूमिका में हैं। रेड फिल्म एक इनकम टैक्स के ईमानदार अधिकारी और एक राजनेता के बीच दांवपेच की प्रभावी कहानी कहती है। अपनी विषयवस्तु पर अच्छे से फोकस करने के कारण यह फिल्म प्रभावित करती है।

 

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