आज पैंथरों की भूमिका को और विस्तार देने की जरूरत है !

एचएल दुसाध

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आज दलित पैंथर की स्थापना स्वर्ण जयंती वर्ष है। आज से पचास पूर्व, 1972 में 29 मई को नामदेव लक्ष्मण ढसाल और राजा ढाले, जेवी पवार इत्यादि जैसे उनके लेखक साथियों ने मिलकर दलित पैंथर की स्थापना की थी। इस संगठन ने डॉ. आंबेडकर के बाद मान-अपमान से बोधशून्य, आकांक्षाहीन दलित समुदाय को नए सिरे से जगाया। इससे जुड़े प्रगतिशील विचारधारा के दलित युवकों ने तथाकथित आंबेडकरवादी नेताओं की स्वार्थपरक नीतियों तथा दोहरे चरित्र से निराश हो चुके दलित समुदाय में जोश भर दिया, जिसके फलस्वरूप दलितों को अपनी ताकत का अहसास हुआ और उनमें ईंट का जवाब पत्थर से देने की मानसिकता पैदा हुई। इसकी स्थापना के कुछ माह बाद ही 15 अगस्त, 1972 को राजा ढाले ने साधना के विशेषांक में काला स्वतंत्रता दिवस लेख लिखा। दूसरी तरफ, ढसाल ने यह घोषणा कर दी कि यदि विधान परिषद या संसद सामान्य लोगों की समस्यायों को हल नहीं करेगी तो पैंथर उन्हें जलाकर राख कर देंगे, शासक दलों में हडकंप मचा दिया।

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दलित पैंथर के निर्माण की पृष्ठ में अमेरिका के उस ब्लैक पैंथर आन्दोलन से मिली प्रेरणा थी जो अश्वेतों को उनके मानवीय, सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक अधिकारों को दिलाने के लिए 1966 से ही संघर्षरत था। इस आन्दोलन का नामदेव ढसाल और राजा ढाले जैसे क्रांतिकारी युवकों पर इतना असर पड़ा कि उन्होंने ब्लैक पैंथर की तर्ज़ पर दलित मुक्ति के प्रति संकल्पित अपने संगठन का नाम दलित पैंथर रख दिया। जहाँ तक विचारधारा का सवाल है पैंथरों ने डॉ. आंबेडकर की विचारधारा को न सिर्फ अपनाया बल्कि उसे विकसित किया तथा उसी को अपने घोषणापत्र में प्रकाशित किया, जिसके अनुसार संगठन का निर्माण हुआ। उसके घोषणापत्र में कहा गया, ’दलित पैंथर आरपीआई के नेतृत्व की सौदेबाजी के खिलाफ एक विद्रोह है। अनुसूचित जातियां, जनजातियां, भूमिहीन श्रमिक, गरीब किसान हमारे मित्र हैं… वे सब लोग जो राजनीतिक और आर्थिक शोषण के शिकार हैं, वे सभी हमारे मित्र हैं। जमींदार, पूंजीपति, साहूकार और उनके एजेंट तथा सरकार जो शोषण के समर्थक तत्वों का समर्थन करती है, वे पैंथरों के दुश्मन हैं।’ उसमें यह भी कहा गया, ’हम आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में नियंत्रणकर्ता की हैसियत का प्राधान्य चाहते हैं… हम ब्राह्मणों के मध्य नहीं रहना चाहते।हम पूरे भारत पर शासन के पक्षधर हैं। मात्र ह्रदय परिवर्तन अथवा उदार शिक्षा अन्याय और शोषण को समाप्त नहीं कर सकते। हम क्रान्तिशील जनता को जागृत करेंगे और उन्हें संगठित करेंगे ताकि परिवर्तन हो सके। हमें विश्वास है कि जनसमूह में संघर्ष द्वारा क्रांति की ज्वाला जरुर जलेगी, क्योंकि हम जानते हैं कि कोई भी समाज-व्यवस्था मात्र रियायतों की मांग, चुनाव और सत्याग्रह के जरिये नहीं बदली जा सकती। हमारी सामाजिक क्रांति का विद्रोही विचार हमारे लोगों के दिलों में उत्पन्न होगा तथा तुरंत ही वह गर्म लोहे की भांति अस्तित्व में आयेगा। अंत में हमारा संघर्ष दासत्व की जंजीरों को तोड़ डालेगा।’

अपने घोषणापत्र पर अमल करते हुए दलित पैंथरों ने दलित आन्दोलन के लिए राजनैतिक मुकाम की खातिर परिवर्तनकामी अर्थों में नई जमीन तोड़ी। उन्होंने दलितों को सर्वहारा के परिवर्तनकामी वेग की पहचान प्रदान की और उनके संघर्षों को पूरी दुनिया के अन्य दमित लोगों के संघर्षों से जोड़ दिया।’ बहरहाल, कोई चाहे तो दलित पैंथर की इन उपलब्धियों को ख़ारिज भी कर सकता है, किन्तु दलित साहित्य के विस्तार में इसकी उपलब्धियों को नज़रअंदाज़ करना किसी के लिए भी संभव नहीं है। दलित पैंथर आन्दोलन और दलित साहित्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इसकी स्थापना करनेवाले नेता पहले से ही दलित साहित्य से जुड़े हुए थे

 

दलित पैंथर के घोषणापत्र में कुछ और बेहद महत्वपूर्ण बातें थी। उसमें कहा गया था, ’घोषणा-पत्र बौद्ध धर्म को दलितों के सभी दुखों के निवारण का माध्यम स्वीकार नहीं करता। यह आन्दोलन मानता है कि वर्त्तमान सामजिक व्यवस्था के ढाँचे के अंतर्गत अनुसूचित जाति के आम लोगों की समस्यायों का निराकरण नहीं हो सकता।’ घोषणापत्र  में यह बात बहुत ही महत्व के साथ रेखांकित की गयी था, ’दलितों पर अत्याचार करने में मुस्लिम काल या ब्रिटिशकाल के मुकाबले आज का हिन्दू सामंती शासन के हाथों में उत्पादन, नौकरशाही, न्यायपालिका, फ़ौज और पुलिस बल सभी कुछ तो है।’ दलित पैंथर के घोषणापत्र ने, ’जहां जागरूक दलितों और प्रगतिशील आम युवा पीढ़ी में हलचल पैदा की, वहीं समाजवादी, साम्यवादी, प्रगतिशील लेखकों-विचारकों को झकझोर दिया। दलित पैंथरों में इसे सामाजिक परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ माना गया। उसकी मान्यताओं ने आरपीआई के चरित्र को जगजाहिर कर दिया।’

दलित पैंथरों की विचारधारा ने यद्यपि आरपीआई नेतृत्व की वर्षों तक नींद उड़ा दी, लेकिन बड़बोले चतुर राजनीतिज्ञों के व्यापक प्रचारतंत्र को देखते हुए यह बौद्धिक आन्दोलन क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्तन का दर्शन बनकर रह गया और तमाम खूबियों के बावजूद यह अपना घोषित लक्ष्य पाने में विफल रहा। दलित पैंथर आन्दोलन पुस्तक के लेखक अजय कुमार के शब्दों में, ‘यह आन्दोलन देश में दलित नेताओं और गैर-दलित नेताओं द्वारा अनुसूचित जाति के उद्धार के लिए चलाये गए आन्दोलनों से बिलकुल हटकर है तथा अपनी एक अमिट छाप छोड़ता है। दलित पैंथर आन्दोलन के प्रतिनिधियों ने पैंथरों की भांति ही काम किया तथा सरकार को अपनी मांगे मनवाने के लिए पूर्णत: तो नहीं, लेकिन सिर झुकाने को मजबूर जरुर कर दिया। दूसरी तरफ, आंदोलनकारियों के आपसी मतभेदों के कारण यह संगठन अपने चरम बिंदु तक नहीं पहुँच सका। जो चिंगारी के रूप में भड़का वह जंगल में फैलनेवाली आग का रूप धारण नहीं कर सका, क्योंकि इसके अंदर संगठनात्मक, संरचनात्मक, वित्त सम्बन्धी, सामंजस्य सम्बन्धी तथा विचारधारा विरोधी कमियां थी। यदि यह आन्दोलन इन सभी विरोधों को समाप्त करके एकल विचारधारा पर चलता तो शायद एक ऐसा आन्दोलन बन जाता कि भारतवर्ष से छुआछूत, अलगाव, अमीर-गरीब, नीच-उच्च, नैतिक-अनैतिक, पवित्र-अपवित्र का बैरभाव मिट जाता।’

वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम की 2021 के रिपोर्ट के मुताबिक भारत लैंगिक समानता के मोर्चे पर नेपाल, भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश जैसे पिछड़े प्रतिवेशी मुल्कों से भी पीछे हो गया है और देश की आबादी को पुरुषों के बराबर आर्थिक समानता पाने में 257 साल लग जाएँगे। कहने का मतलब यह है कि मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या, आर्थिक और सामाजिक विषमताजनित समस्याओं से सर्वाधिक आक्रांत देश भारत है। किन्तु भारत के वंचित वर्गों का नेतृत्व इससे पूरी तरह ऑंखें मूंदे हुए है।

 

यह सही है कि यह संगठन अपने उत्कर्ष पर नहीं पहुँच सका, तथापि इसकी उपलब्धियां गर्व करने लायक रहीं। बकौल चर्चित मराठी दलित चिन्तक डॉ.आनंद तेलतुम्बडे, ’इसने देश में स्थापित व्यवस्था की बुनियादों को हिला कर रख दिया और संक्षेप में यह दर्शाया कि सताए हुए आदमी का आक्रोश क्या हो सकता है। इसने दलित राजनीति को एक मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान की जोकि पहले बुरी तरह छूटी हुई थी। अपने घोषणापत्र पर अमल करते हुए दलित पैंथरों ने दलित आन्दोलन के लिए राजनैतिक मुकाम की खातिर परिवर्तनकामी अर्थों में नई जमीन तोड़ी। उन्होंने दलितों को सर्वहारा के परिवर्तनकामी वेग की पहचान प्रदान की और उनके संघर्षों को पूरी दुनिया के अन्य दमित लोगों के संघर्षों से जोड़ दिया।’ बहरहाल, कोई चाहे तो दलित पैंथर की इन उपलब्धियों को ख़ारिज भी कर सकता है, किन्तु दलित साहित्य के विस्तार में इसकी उपलब्धियों को नज़रअंदाज़ करना किसी के लिए भी संभव नहीं है। दलित पैंथर आन्दोलन और दलित साहित्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इसकी स्थापना करनेवाले नेता पहले से ही दलित साहित्य से जुड़े हुए थे। दलित पैंथर की स्थापना के बाद उनका साहित्य शिखर पर पहुँच गया और देखते ही देखते मराठी साहित्य के बराबर का स्तर प्राप्त कर लिया। परवर्तीकाल में डॉ. आंबेडकर की विचारधारा पर आधारित मराठी दलित साहित्य, हिंदी पट्टी सहित अन्य इलाकों को भी अपने आगोश में ले लिया।

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बहरहाल, जिन दिनों नामदेव ढसाल और उनके साथियों ने दलित पैंथर की स्थापना की, उन दिनों देश में विषमता की आज जैसी चौड़ी खाई नहीं थी। देश अपने स्वाधीनता की रजत जयंती ही मन रहा था और उस वक्त यह उम्मीद कहीं बची हुई थी कि देश के कर्णधार निकट भविष्य में दलितों को शक्ति के स्रोतों में उनका प्राप्य दिलाने के साथ उस आर्थिक और सामाजिक असमानता से पार पा लेंगे, जिसके खात्मे का आह्वान संविधान निर्माता ने 25 नवम्बर, 1949 को किया था। लेकिन आज आजादी के प्रायः साढ़े सात दशक बाद विषमता पहले से कई गुना बढ़ गई है और उसी परिमाण में उन दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यकों और महिलाओं की स्थिति बदतर हो चुकी है, जिनकी मुक्ति के लिए ढसाल-राजा ढाले-जेवी पवार इत्यादि जैसे लेखकों ने दलित पैंथर जैसे उग्र संगठन को जन्म दिया था। आज यदि भारत में नजर दौड़ाई जाय तो पता चलेगा कि उत्तर काल में जो स्थितियां और परिस्थितियां बनी या बनाई गई हैं, उसमें मूलनिवासी बहुजन समाज के समक्ष एक नया स्वाधीनता संग्राम संगठित करने से भिन्न कोई विकल्प ही नहीं बचा है। क्योंकि यहाँ शक्ति के स्रोतों पर भारत के जन्मजात शासक वर्ग का प्रायःउसी परिणाम में कब्जा हो चुका है, जिस परिमाण में उन सभी देशों में शासकों का कब्जा रहा, जहां-जहां मुक्ति आंदोलन संगठित हुये।

 

आज की तारीख में दुनिया के किसी भी देश में भारत के जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग जैसा शक्ति के स्रोतों पर औसतन 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा नहीं है। आज यदि कोई गौर से देंखे तो पता चलेगा कि पूरे देश में जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हैं, उनमे 80-90 प्रतिशत फ्लैट्स इन्हीं के हैं। मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग मॉलों में 80-90 प्रतिशत दूकानें इन्हीं की है। चार से आठ-आठ लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है, उनमें 90 प्रतिशत से ज्यादे गाड़ियां इन्हीं की होती हैं। देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल प्राय इन्ही के हैं। फिल्म और मनोरंजन तथा ज्ञान-उद्योग पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा इन्ही का है। संसद, विधानसभाओं में वंचित वर्गों के जनप्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो, किन्तु मंत्रिमंडलों में दबदबा इन्हीं का है। मंत्रिमंडलों में लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने वाले 80-90 प्रतिशत अधिकारी इन्हीं वर्गों से हैं। न्यायिक सेवा, शासन-प्रशासन, उद्योग-व्यापार, फिल्म-मीडिया,धर्म और ज्ञान क्षेत्र में भारत के सुविधाभोगी वर्ग  जैसा दबदबा आज की तारीख में दुनिया में कहीं नहीं है. इस दबदबे ने बहुसंख्य लोगों के समक्ष जैसा विकट हालात पैदा कर दिया है, ऐसे ही हालातों में दुनिया के कई देशों में शासक और गुलाम वर्ग पैदा हुए। ऐसी ही परिस्थितियों में दुनिया के कई देशों में स्वाधीनता संग्राम संगठित हुए।

 

मौजूदा सरकार की समस्त गतिविधियाँ इसी सुविधाभोगी वर्ग को और शक्तिसंपन्न करने पर केन्द्रित हैं। इसी वर्ग के हित में ही वह देश बेच रही है, लैटरल इंट्री जैसे संविधान विरोधी सिस्टम चला रही है, इसी वर्ग के हित में में वह मंदिर आन्दोलन का मुद्दा उठाकर बहुसंख्य लोगों में उन मुसलमानों के खिलाफ आक्रोश फैलाती है, जो सवर्ण शासकों द्वारा दलित, आदिवासी, पिछड़ों की भांति ही गुलामों की स्थिति में पंहुचा दिए गए हैं। आज मौजूदा सरकार की आर्थिक नीतियों से बहुजन पूरी तरह गुलामों की स्थिति में तो पहुँच ही गए हैं, सबसे बदतर स्थिति आधी आबादी की हो गयी है। वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम की 2021 के रिपोर्ट के मुताबिक भारत लैंगिक समानता के मोर्चे पर नेपाल, भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश जैसे पिछड़े प्रतिवेशी मुल्कों से भी पीछे हो गया है और देश की आबादी को पुरुषों के बराबर आर्थिक समानता पाने में 257 साल लग जाएँगे। कहने का मतलब यह है कि मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या, आर्थिक और सामाजिक विषमताजनित समस्याओं से सर्वाधिक आक्रांत देश भारत है। किन्तु भारत के वंचित वर्गों का नेतृत्व इससे पूरी तरह ऑंखें मूंदे हुए है। वह चुनाव दर चुनाव वर्तमान हिन्दुत्ववादी सरकार को वॉक ओवर देकर अप्रतिरोध्य बना दिया है और सरकार शूद्रातिशुद्र और महिलाओं को उस स्थिति में पहुँचाने में राजसत्ता का इस्तेमाल किये जा रही है, जो स्थिति इन वंचितों के लिए हिन्दू धर्म में निर्दिष्ट है। इस विकट स्थिति में वंचित जातियों के नेता अपना कर्तव्य निर्वहन में सत्तर के दशक के आरपीआई नेताओं से भी बदतर स्थिति में पहुँच गए हैं। तब आरपीआई नेतृत्व जिसतरह सौदेबाजी में लिप्त हो गया था, उससे बहुत बेहतर चरित्र आज के बहुजन नेतृत्व की भी नहीं है! ऐसे में इतिहास की ज़रुरत है कि बदले हुए हालात में देश के वंचित वर्गों के लेखक, एक्टिविस्ट नामदेव ढसाल, राजा ढाले, जेवी पवार, अर्जुन डांगले इत्यादि ने 1970 के दशक में जो भूमिका अदा की उसे और विस्तार दें। अर्थात वे वर्तमान बहुजन नेतृत्व को रिप्लेस कर बहुजनों की आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक-सांस्कृतिक मुक्ति के लिए सत्तर के दशक के पैन्थरों से भी बड़ी भूमिका अदा करने का संकल्प लें। बिना ऐसा किये नामदेव ढसाल, राजा ढाले जैसे महान पैन्थरों ने भारतभूमि से छुआछूत, अलगाव, अमीर-गरीब, नीच-ऊँच, नैतिक-अनैतिक, पवित्र-अपवित्र का बैरभाव मिटाने तथा मूलनिवासियों शुद्रातिशुद्रों और महिलाओं को लिबरेट करने का जो सपना देखा था, वह पूरा नहीं हो सकता।

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

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