बिरहा के बेजोड़ कवि-गायक लक्ष्मी नारायण यादव

केशव शरण 

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बिरहा लोकगायकी की एक विशिष्ट विधा है। भोजपुरी बोलने वाले इलाक़ों में इसकी लोकप्रियता ज़बरदस्त रही है। कुछ दशक पहले तक बिरहा गायन की धूम थी। जनता के मनोरंजन के लिए संस्थाएँ इसका आयोजन बड़े पैमाने पर करती थीं। बिरहा-प्रेमी जन अपने पारिवारिक और मांगलिक कार्य-अवसरों पर इसका आयोजन करते थे। बड़े पैमाने पर होने वाले आयोजन को बिरहा दंगल भी कहते थे। इसमें बिरहा गायकों के दो दल और मंच होते थे। यह रात नौ-दस बजे से शुरू होकर सुबह सात-आठ बजे तक चलता रहता था और बिरहा-स्थल आख़िर तक श्रोताओं से भरा रहता था। इस बिरहा दंगल में दो जाने-माने बिरहा गायक आमने-सामने के मंचों से गायकी पेश किया करते थे जिसमें वे अपने प्रतिद्वंद्वी की बोलती बंद करने का उपक्रम अपनी गायकी और गीतात्मक हाज़िरजवाबी से करते थे। मिथकों के एक से एक कथानकों, उनकी अनूठी व्याख्याओं के द्वारा वे एक -दूसरे को पछाड़ने का प्रयास करते थे। उनकी टकराहटों से एक समां बंध जाता था। झाल-मंजीरे, ढोल, सारंगी, करताल और हारमोनियम की मदमाती लय पर मगन-मन लोग रात-भर झूमते रह जाते थे। गायन की कथा का रस लेते हुए और उसके मर्म को गुनते हुए वे आनंद के साथ अपनी संस्कृति और देश-काल को जानने का अवसर भी प्राप्त करते थे।
ध्यातव्य है कि भोजपुरी इलाक़ों की पिछड़ी और अनपढ़ जनता की एक विशाल संख्या गांव-गांव में बसती थी जिसके लिए काला अक्षर भैंस बराबर था। तब ऐसी जनता को सामाजिक, राष्ट्रीय और मानवीय मूल्यों का बोध और उसमें इसका पुष्टिकरण लोक गायकी की इस अप्रतिम विधा के माध्यम से हुआ करता था। तब बिरहा गायक इस जनता को रामायण, महाभारत, इतिहास और वर्तमान की महत्वपूर्ण घटनाओं और उनके स्याह और सफ़ेद से अपडेट किया करते थे। बिरहा मनोरंजन के साथ लोक-शिक्षण का भी साधन था। इसके माध्यम से सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं के बारे में भी बिरहा गायक जनता को बताया करते थे। इसलिए बिरहा के कवियों का लोक-समाज में इतना सम्मान होता था कि वैसा सम्मान आधुनिक कवियों के लिए स्वप्न-सा है। गायकों के सम्मान का मर्तबा भी ऐसा ही था। इनमें कुछ सिर्फ़ गायक होते थे तो कुछ कवि और कुछ दोनों ही।

बिरहा दंगल में दो जाने-माने बिरहा गायक आमने-सामने के मंचों से गायकी पेश किया करते थे जिसमें वे अपने प्रतिद्वंद्वी की बोलती बंद करने का उपक्रम अपनी गायकी और गीतात्मक हाज़िरजवाबी से करते थे। मिथकों के एक से एक कथानकों, उनकी अनूठी व्याख्याओं के द्वारा वे एक -दूसरे को पछाड़ने का प्रयास करते थे। उनकी टकराहटों से एक समां बंध जाता था। झाल-मंजीरे, ढोल, सारंगी, करताल और हारमोनियम की मदमाती लय पर मगन-मन लोग रात-भर झूमते रह जाते थे।

 

सौभाग्य से मेरे मौसा स्व. लक्ष्मी नारायण यादव भी बिरहा से जुड़े हुए थे। उनके परदादा रम्मन गुरु का अखाड़ा आज भी चलता है। जैसे शास्त्रीय संगीत में घराना चलता है, वैसे ही बिरहा में अखाड़ा चलता है। वे इस अखाड़े या घराने के एक मंजे हुए बड़े गायक थे पर इससे भी बढ़कर वे बिरहा के मूर्धन्य कवि भी थे। स्नातकोत्तर शिक्षा-संपन्न वे एल आई सी ( जीवन बीमा निगम) में प्रशासनिक अधिकारी भी थे। वे मृदुभाषी और हाज़िरजवाब व्यक्ति थे। मझोले क़द के कसे हुए शरीर वाले वे पहलवानी के भी शौक़ीन थे। जीवन बीमा निगम में प्रशासनिक सेवा करते हुए भी वे नियमित रूप से बिरहा लिखते रहते थे। बराबर उनकी दृष्टि सामयिक घटनाओं और इतिहास तथा मिथकों पर बनी रहती थी। इन विषयों पर वे लिखते ही थे, साथ में देश-काल,  गांव-देहात की वर्तमान स्थितियों पर भी क़लम चलाते रहते थे। मेरा सुना हुआ उनका एक लम्बा बिरहा ऊंगली पर है। शरीर में ऊंगली का क्या महत्व है यह सब बताते हुए वे रामायण में जाते हैं, महाभारत में जाते हैं, भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में जाते हैं और ऊँगली से जुड़े तमाम प्रसंगों को बिरहा में ले आते हैं। सही मायनों में वे बिरहा के एक असाधारण कवि थे। एक-दो नहीं, न जाने कितने बिरहा गायकों के लिए उन्होंने बिरहा लिखे। उनके लिखे बिरहे को गा-गाकर कई बिरहा गायक लोकप्रिय हुए। चूंकि, मैं आधुनिक साहित्य और कविता से शुरू से ही जुड़ा हुआ था इसलिए बिरहा मेरी दिलचस्पी के केंद्र में नहीं था। लेकिन उनके यहां आते-जाते रहने से मैं उनके बिरहा-लेखन और गायन को देखता-सुनता रहा इसलिए बिरहा मुझे आकर्षित करता रहा। वे एक ही बिरहा में कितनी तरह के छंदों का प्रयोग करते थे, मैंने यह भी देखा। उनसे ही मैंने जाना कि बिरहा का छंद शास्त्र कितना विशद है। बिरहा गंवारों का काव्य बिल्कुल नहीं है जैसा कि पढ़े-लिखे समाज में सोच बनी हुई है। यह ग्रामीण राग और चेतना का काव्य है। काव्य की किसी भी लोक शैली की तुलना में बिरहा की विषय-विविधता, छांदसिक-विपुलता, समाज का विश्लेषण और विवेचना, इतिहास और मिथक की सोच और दृष्टि बहुत आगे और ऊपर है। कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं आधुनिक कवि होने के साथ-साथ थोड़ा-बहुत बिरहा से भी जुड़ा होता तो मेरा लोक से जुड़ाव गहरा होता और उसका लाभ मुझे अपनी कविता में भी मिलता।

लक्ष्मी नारायण यादव जी एक मस्तमौला व्यक्ति थे। हमेशा चमकते और चहकते और दूसरों को भी चमकाते और चहकाते रहते थे। जब भी मैंने उन्हें किसी जमावड़े में देखा, उसमें उन्हीं को नायक पाया। वे जहां होते सब उन्हीं को देखते और उन्हीं को सुनते तथा ठहाके लगाते। सिर्फ़ बातों से ही नहीं वे अपने किसी ताज़ा या प्रसिद्ध बिरहे को पूरा या आंशिक सुनाकर भाव-विभोर कर देते थे। वे सामाजिक कार्यों में भी लगे रहते थे। वे अपने ही बच्चों को नहीं, अड़ोस-पड़ोस के बच्चों को भी नियमित रूप से पढ़ाते थे। पढ़ाने की उनकी शैली भी मनोरंजन से भरपूर होती थी। उनकी मुस्कुराहटें याद कीजिए तो आंसू आते हैं। मैंने उनमें कभी किसी के प्रति वैर-भाव नहीं देखा। वे एक अलग सर्जक और गायक थे जिनके जैसी कर्म, विचार और वचन की एकमयता समाज में दुर्लभ है। डॉ मन्नुलाल यादव और अन्य उनके कितने शिष्य थे लेकिन उन्हें कभी किसी ने गुरुडम के गुमान में नहीं देखा। वे सबसे मित्रवत थे चाहे उनके सामने कोई बूढ़ा हो या बच्चा। जवानों से ज़्यादा वे बूढ़ों और बच्चों की ख़ुशी थे।

सिर्फ़ बातों से ही नहीं वे अपने किसी ताज़ा या प्रसिद्ध बिरहे को पूरा या आंशिक सुनाकर भाव-विभोर कर देते थे। वे सामाजिक कार्यों में भी लगे रहते थे। वे अपने ही बच्चों को नहीं, अड़ोस-पड़ोस के बच्चों को भी नियमित रूप से पढ़ाते थे। पढ़ाने की उनकी शैली भी मनोरंजन से भरपूर होती थी। उनकी मुस्कुराहटें याद कीजिए तो आंसू आते हैं। मैंने उनमें कभी किसी के प्रति वैर-भाव नहीं देखा।

लक्ष्मी नारायण जी सन् 2018 में यह संसार छोड़ गये। उनके पीछे 2020 में उनकी पत्नी अर्थात मेरी मौसी भी संसार छोड़ गयीं। लक्ष्मी नारायण जी के दो पुत्र और पाँच पुत्रियाँ हैं। लक्ष्मी नारायण जी का जन्मस्थान वरुणा नदी के तट पर बसा चौकाघाट है। यह बनारस का वरुणा पार इलाक़ा है। उनके मकान का दरवाज़ा शहर की पक्की सड़क की ओर खुलता था लेकिन इलाक़ा ग्रामीण था वरुणा के कछार में फैला था। इसी में उनके परदादा बिरहा के पुरोधा रम्मन जी रहते थे जिनका संबोधन आज भी रम्मन गुरु है। आज भी उनके नाम के अखाड़े वाले बिरहा गायकों द्वारा गाये जाने वाले गानों में उनका नाम अनिवार्य और भावात्मक रूप से लिया जाता है। इसी खानदान में लोक प्रसिद्ध बिरहा गायक पद्मश्री हीरालाल यादव का भी जन्म हुआ था जो लक्ष्मी नारायण जी के चचेरे भाई थे। लक्ष्मी नारायण जी के लिखे बिरहा-गीतों को हीरालाल यादव जी ने ख़ूब गाया है और वाहवाही लूटी है। लक्ष्मी नारायण यादव जी आकाशवाणी और दूरदर्शन पर बिरहा के विशिष्ट कलाकार थे। वे संगीत अकादमी उत्तर प्रदेश द्वारा सम्मानित किए गए थे। वे बिरहा संघ उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष भी थे। इसी खानदान और अखाड़े के हीरालाल यादव की तरह आज ये दोनों नहीं हैं और बिरहा का ऊँचा महल ढह रहा है। लेकिन क्या कोई इनकी जगह ले सकता है ? बिरहा का वर्तमान और उसके प्रति कम होता रुझान देखकर तो लगता यही है कि अब यह संभव नहीं है। लक्ष्मी नारायण जी के कई क़ाबिल शिष्य हैं, कमी उनमें नहीं है। कमी लोक-वातावरण में है जिसमें बिरहा का आकाश निरन्तर सिकुड़ रहा है। पुरानी पीढ़ी के ख़त्म होने के साथ उन्हीं की तरह बिरहा भी स्मृतियों से निकल रहा है। हमें बिरहा के रस और मर्म को समझना होगा। इसकी उपयोगिता को व्यापक बनाना होगा। बिरहा बचा रहेगा तो हमारी संगीतमय लोक संस्कृति बची रहेगी। बिरहा बचा रहेगा तो लक्ष्मी नारायण यादव जैसा प्रबुद्ध और प्रतिबद्ध कवि-गायक की स्मृतियाँ भी बची रहेंगी। जनमानस में जीवित रहेंगे बिरहा के अप्रतिम गायक हीरालाल यादव। और चलता रहेगा बिरहा का रम्मन अखाड़ा।

 

केशव शरण जाने माने कवि हैं।

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