Friday, February 23, 2024
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बिहार में भाजपा का दावा कि वे मंडल और कमंडल दोनों के साथ, कितना मिलेगा सियासी फ़ायदा?

सर्वज्ञात है कि भाजपा ने मंडल के खिलाफ कैसे एक षड्यंत्र कारी अभियान शुरू किया और अपनी ताकत को पूरी तरह कमंडल की राजनीति में क्यों झोंक दिया? क्या भाजपा ने केंद्र या प्रदेश स्तर पर कभी मंडल आयोग की सिफारिशों के प्रति अपनी सदिच्छा ज़ाहिर की।

‘इस देश में मंडल कमीशन आया। मंडल कमीशन के बारे में कुछ नेता जो कि बिहार में मुख्यमंत्री हो गए। वे बराबर कहते रहते हैं कि उन्होंने मंडल लागू कराया। अब उन्हें पता ही नहीं है कि 1989 में देश का जो लोकतंत्र था, उसमें कांग्रेस पार्टी को 200 सीटें थीं। 143 सांसद वीपी सिंह के नेतृत्व में जनता दल के थे और 84 सांसद भारतीय जनता पार्टी के थे। तो हमने (भाजपा) मंडल का भी समर्थन किया और कमंडल का भी समर्थन किया।’

उक्त बातें महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, बिहार में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और फिलवक्त बिहार के उप-मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के भाषण की जो उन्होंने (08 फ़रवरी- 2024) को बिहार भाजपा की ओर से आयोजित पटना के ‘धन्यवाद-सम्मान-संकल्प समारोह’ में कहीं।

हालांकि, सम्राट इस बात को बड़ी साफ़गोई से छिपा जाते हैं कि मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों के लागू होते ही सरकार कैसे गिर गई? किन्हें मंडलवादी राजनीति का विस्तार नहीं सुहा रहा था? कौन पिछड़ों के आरक्षण के ख़िलाफ़ था? सर्वज्ञात है कि भाजपा ने मंडल के खिलाफ कैसे एक षड्यंत्र कारी अभियान शुरू किया और अपनी ताकत को पूरी तरह कमंडल की राजनीति में क्यों झोंक दिया? क्या भाजपा ने केंद्र या प्रदेश स्तर पर कभी मंडल आयोग की सिफारिशों के प्रति अपनी सदिच्छा ज़ाहिर की। बेशक इस मुद्दे पर सम्राट चौधरी बात को गोल गोल घुमा जाते हैं।

वैसे तो कर्पूरी ठाकुर के जन्मशती समारोह के पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार की ओर से उन्हें मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किए जाने की घोषणा के साथ ही सियासी गलियारे से लगायत आम जन के बीच ऐसी बातें उठने लगी थीं कि क्या ऐसा करके भाजपा ‘कमंडल’ के साथ ही ‘मंडल’ को भी साधने की कोशिशें कर रही, और ऐसा करके वे दोनों वोटबैंक को कितना और किस तरह साध पाएँगे, लेकिन तब तक मंडलवादी राजनीति के दो धुरंधर लालू और नीतीश एक साथ थे।

कार्यक्रम स्थल पर कर्पूरी ठाकुर की होर्डिंग

ऐसी बातें तब इसलिए भी तेज़ी से उठी थीं क्योंकि उससे ठीक एक दिन पहले (22 जनवरी) को अयोध्या में रामलला की प्रतिष्ठा के जलसे को पूरे देश ने देखा और महसूस किया, और इस बीच जहां विपक्षी ख़ेमा राम मंदिर आंदोलन के प्रणेता लाल कृष्ण आडवाणी के सम्मान-अपमान को लेकर सरकार को गाहें-बगाहे घेरने की कोशिशें ही कर रहा था कि केन्द्र सरकार ने उनके नाम की भी घोषणा भारत रत्न के लिए कर दी।

अब जब कि नीतीश फिर से पाला बदलकर एनडीए के साथ चले गए हैं। कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न से सम्मानित किए जाने पर पीएम मोदी को धन्यवाद और लाल कृष्ण आडवाणी से खुद ही मुलाकात करने लगे हैं। बिहार की सियासत सिर के बल खड़ी हो गई है। कल (12 फरवरी) को सरकार को सदन में बहुमत सिद्ध करना है।

बात यदि बिहार औऱ भाजपा की करें तो उन्होंने इस बीच (08 फ़रवरी) को उपरोक्त दोनों नेताओं यथा जननायक कहे जाने वाले कर्पूरी ठाकुर तो राम मंदिर आंदोलन के प्रणेता लाल कृष्ण आडवाणी के ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किए जाने को लेकर भाजपा ने एक जुटान का आयोजन किया था। इस जुटान का नाम था ‘धन्यवाद-सम्मान-संकल्प समारोह’। वैसे तो भाजपा ने एक कार्यक्रम उनको ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किए जाने के बाद भी किया था, लेकिन तब वह कार्यक्रम लगभग फ़्लॉप ही रहा था।

तो इस बीच महज़ एक पखवाड़े के भीतर बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच जब पटना की सड़कों को पोस्टरों और बैनरों से पाट दिया गया। तब इस कार्यक्रम का मक़सद पहले कीतुलना में जुदा था। धन्यवाद कर्पूरी ठाकुर और लाल कृष्ण आडवाणी को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किए जाने को लेकर और संकल्प इस बात का कि कैसे एनडीए को लोकसभा चुनाव में 400 के पार और अकेले दम पर 370 सीटें जीती जाएं।

हालांकि, भाजपा नेताओं की ओर से एक तरफ़ जहां 400 पार जाने की बात कही जा रही, तो वहीं दूसरी तरफ़ वे हर छोटे-बड़े समझौते करने पर तुले हैं। जैसे आप सभी को याद हो कि नीतीश कुमार के पिछली बार एनडीए से हटकर महागठबंधन का दामन थामने पर भाजपा के अग्रणी नेता और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बिहार आकर कई बार कहा कि नीतीश के लिए अब रास्ते सदा के लिए बंद हो गए हैं। वे अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को आश्वस्त कर रहे थे लेकिन फिर से एक समझौता।

अब सवाल उठता है कि क्या यह समझौता बिहार की बेहतरी के लिए है फिर भाजपा और नरेन्द्र मोदी को फिर से सत्तासीन करने का। जो नीतीश कल तक कुर्सी कुमार थे, फूटी आँख नसुहाते थे वे फिर से कैसे स्वीकार्य हो गए? तो साफ़-सीधे शब्दों में समझिए कि रामलला की प्रतिष्ठा के बाद जहां कमंडल को साधा गया तो वहीं नीतीश को साधकर निशाना बिहार में अति पिछड़ा समुदाय को साधने की क़वायद हो रही। जाति आधारित गणना के बाद जो एक निर्णायक वोटबैंक साबित होगा।

वरिष्ठ पत्रकार अरुण पांडेय

क्या भाजपा नेतृत्व की नज़र कमंडलवादी राजनीति के विस्तार के साथ ही मंडल को साधनेपर है। इसमें वे कितना सफल होंगे. होंगे भी या नहीं के सवाल पर बिहार के वरिष्ठ पत्रकार अरुण पांडे कहते हैं, ‘मंडल का एक ज़माना था, जब मंडल आया था तब अगड़ों ने प्रतिक्रिया दी थी। अब तो भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के तौर पर नरेन्द्र मोदी और अमित शाह दिखाई देते हैं। तो ये कौन लोग हैं? ये कोई अगड़े तो हैं नहीं, तो उनकी भी राजनीति और प्रतिबद्धता वही है, जो लालू यादव या शरद यादव की रही। कभी महिला बिल फाड़ा गया था और इस बीच वो बिल भी पास हुआ और किसी ने विरोध नहीं किया।’

वहीं बिहार के संदर्भ को लेकर किए गए सवाल पर वे कहते हैं, ‘यदि आप बिहार की बात पूछते हैं तो यहाँ अगड़े तो लाचार हैं, लालू विरोध की राजनीति करते हुए और वे अधिकांशतः भाजपा के साथ हैं। अब इसमें राजद जैसी पार्टियाँ भले ही ए टू जेड की बातें कहती हों, लेकिन व्यवहार में तो नहीं दिखता। जैसे ईडब्लयूएस आरक्षण के सवाल पर संसद में सिर्फ़ राजद ही थी, जिसने इसका विरोध किया। हालिया परिस्थिति में तो भाजपा के पास अगड़ों के वोट का बड़ा हिस्सा तो जाता दिख ही रहा. बाकी के लिए उन्होंने ओबीसी+ईबीसी आरक्षण के सवाल पर मुखर रहने और दलित आधार वाली पार्टियों को साध ही रखा है।’

यहाँ इस बात को बताना भी ज़रूरी है कि बिहार से लगायत देश भर में होने वाले चुनावों से पहले देश का विपक्ष (कांग्रेस) यह बातें उठा रहा कि सत्ता में आने के बाद वे जाति आधारित गणना कराएँगे। साथ ही साथ पॉलिसी मेकिंग में ओबीसी समुदाय की भागेदारी की भी बातराहुल गांधी कह रहे। सामाजिक और आर्थिक न्याय की बात कह रहे. कुछ ऐसी ही बातें बिहार में तेजस्वी भी कह रहे।

यह बात भाजपा को असहज तो ज़रूर कर रही। क्योंकि सदन में पीएम मोदी ख़ुद को पिछड़ा करार दे रहे। तो वहीं बिहार में मुख्य विपक्षी पार्टी के नेता (लालू+तेजस्वी) इस बात को मुखरता से कहते रहे हैं कि बिहार में उनके दबाव की वजह से जाति आधारित गणना हुई, और आगामी लोकसभा चुनाव में इस सवाल पर भी विमर्श खड़ा हो सकता है, यदि विपक्ष अपनी गोटियाँ क़ायदे से खेले। उम्मीदवारों का चयन क़ायदे से करे।

भाजपा भले ही कमंडल और मंडल को एक साथ साधने की बात कह रही हो, लेकिन बिहार के मुख्य विपक्षी दल (राजद) के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी के हिसाब से यह भाजपा का दोहरा चरित्र है। वे कहते हैं, ‘जनता सब जानती-समझती है और देख रही है। यदि भाजपा कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न से सम्मानित करने के बाद से समझती है कि कर्पूरी ठाकुर का समाज या फॉलोवर उनको वोट दे देंगे तो वे भ्रम में हैं। तेजस्वी यादव ने तो बिहार विधानसभा के प्रांगण में प्रधानमंत्री जी के सामने मांग किए थे कि कर्पूरी जी को भारत रत्न दिया जाए। यह मांग तो हमारी लंबे समय से रही। रही बात भाजपा की तो ये तो कर्पूरी ठाकुर को गाली देते रहे तो ये किस मुंह से उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किए जाने के बाद अपना कह रहे?’

कार्यक्रम में लगा कर्पूरी ठाकुर का चित्र

वहीं आगामी लोकसभा में नीतीश कुमार के महागठबंधन के बजाय एनडीए के साथ जाने और भाजपा को उसका सियासी फायदा मिलने के सवाल पर वे कहते हैं, ‘यदि पिछले चुनाव (2020 विधानसभा चुनाव) को देखेंगे तो तब भी तो नीतीश एनडीए का ही हिस्सा रहे। तब भी हम (राजद) सबसे बड़ा दल बनकर उभरा। हम एनडीए से सिर्फ साढ़े बारह हजार वोट ही पीछे थे। तीन-चार सीट ही हम कम थे, लेकिन जब बाद के दिनों में तेजस्वी को सरकार में काम करने का मौका मिला, तो उन्होंने जनता के विश्वास को और भी जीता। अब तो हमारे पास पिछले 17 महीने के काम का आधार है और यह आधार एनडीए के 17 साल के काम पर भारी पड़ेगा। चाहे लाखों नौकरियां देने की बात हो या फिर जाति आधारित गणना की बात। तेजस्वी ने जो कहा वो किया. रही बात नीतीश जी को तो वे अब न खुद का फायदा करा पाएंगे न भाजपा का।

हालाँकि इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक केन्द्र सरकार ने तीन और शख़्सियतों यथा चौधरी चरण सिंह, पी.वी. नरसिम्हा राव और डॉक्टर एम.एस. स्वामीनाथन को मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किए जाने की घोषणा कर दी है। देश के भीतर हो रही धारा और प्रतीकों की राजनीति के लिहाज़ से चौधरी चरण सिंह को भी ‘मंडल’ की राजनीति के अहम चेहरे के तौर पर देखा जाता रहा है, और इस घोषणा के बाद से ही उनके पौत्र और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ठीकठाक सियासी दखल रखने वाले जयंत चौधरी का भाजपा की ओर झुकाव ज़ाहिर करना आगामी लोकसभा चुनाव के परिणामों का पूरा नहीं तो भी कुछ-न-कुछ संकेत तो ज़रूर देता है-बाद बाकी यह देखने वाली बात होगी कि भाजपा की ओर से कमंडल और मंडल को एक साथ साधने की कोशिशें कितनी सफल होती हैं…

विष्णु नारायण
विष्णु नारायण स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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