Thursday, February 29, 2024
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मृत्युभोज का बहिष्कार-रूढ़ियों और सड़ी-गली परम्पराओं से बाहर आ रहा समाज

मेरे गाँव में अनेक ऐसे परिवार थे जिनके पास अपने परिजनों की तेरहवीं करने की स्थिति नहीं थी। लेकिन पुरोहितों के दबाव के आगे वे इतने मजबूर हो जाते थे कि उन्हें तेरही करनी पड़ती थी। पुरोहित पूर्वजन्म और पुनर्जन्म का भय दिखाता कि अगर ठीक से तेरही नहीं करोगे तो मृतक प्रेत बनकर भटकता रहेगा। महाजन इस ताक में रहता कि पुरोहित के कहने पर ये किसान-मजदूर कर्ज़ लेने उसी के पास आएंगे।

वाराणसी। पिछले दिनों वाराणसी जिले की पिंडरा तहसील के गाँव वाजिदपुर (स्थानीय उच्चारण के अनुसार बाजीपुर) में ग्रामवासियों ने एक पंचायत बुलाई, जिसमें इस बात की प्रतिज्ञा की गई कि अब इस गाँव में किसी की तेरही और मृत्युभोज नहीं किया जाएगा। ग्रामप्रधान लालमन यादव ने बताया कि ‘हमारे गांव के लोग पढ़े-लिखे हैं। वे शुरू से कह रहे थे कि ये ब्राह्मण भोज तेरही की परंपरा बंद करिए।  मौत ख़ुशी का पर्व थोड़े न है। नौजवान मरे तो, बुजुर्ग मरे तब मिठाई-पूड़ी-सब्जी खिलाने का कोई मतलब नहीं है। नौजवान लड़का अस्तपताल में भर्ती है, इलाज में तीन-चार लाख रुपया लगा, पता चला कि लड़का मर गया। उसके घर वालों के पास अंतिम संस्कार के लिए भी पैसा नहीं है। इसके लिए वो कर्ज लेगा। कर्ज लेकर अंतिम संस्कार करने के तेरह दिन बाद उसको तेरही भी करनी है। इसके लिए अगर उसके पास बाप-दादा का बनाया खेत है तो कुछ बिस्वा बेचेगा। अगर खेत नहीं है तो किसी से सूद-ब्याज पर पैसा लेगा।

यह पूछने पर कि क्या पूरा गांव तेरही प्रथा बंद करने पर सहमत है? वह बताते हैं कि गांव के सभी लोग तेरही प्रथा बंद करने पर सहमत हैं। गांव में ब्राह्मण भूमिहार भी हैं। तेरही करना, न करना उन लोगों की मानसिकता पर निर्भर करता है। बहिष्कार की घोषणा के समय एक-दो लोग आये थे। हमारे यहां एक-दो पंडितजी और ठाकुर साहब आये और कहा कि प्रधानजी यह तो बहुत अच्छा काम किया।’

लालमन यादव कहते हैं ‘जो गरीब-गुरबा है अगर वह शादी-विवाह कर रहा है और हमसे मदद मांगेगा तो हम मदद करेंगे। उसे दान दे देंगे। मृतक/ मृतका के नाम से पेड़ लगा देंगे। इससे ऑक्सीजन भी मिलेगी और पर्यावरण भी साफ़ होगा।’

हमने पूछा कि ऐसा तो नहीं होगा कि महिला की मृत्यु पर तेरही न हो और पुरुष की मृत्यु पर हो? उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसा नहीं होगा। तेरही पूरी तरह बंद होगी।

एक बड़े जुटान के मौके पर उन्होंने ग्रामवासियों की ओर से यह घोषणा की कि जो पैसे तेरही के आयोजन में खर्च होता था अब उसका उपयोग शिक्षा और गरीब परिवारों की भलाई के लिए किया जाएगा। उन्होंने कहा कि ‘हम लोगों ने सामूहिक रूप से यह निर्णय लिया है कि अब से तेरही का बहिष्कार किया जाएगा। इस काम में खर्च होने वाला धन बच्चों की पढ़ाई और गरीब बच्चियों की शादी में किया जाएगा। मृतक की स्मृति में एक श्रद्धांजलि सभा करके उसके अच्छे कार्यों से लोगों को परिचित कराया और लोगों को सामाजिक कामों के लिए प्रेरित किया जाएगा।’

वाजिदपुर गाँव के निवासी इलेक्ट्रिशियन राम अचल यादव कहते हैं कि ‘जब कोई आदमी बीमार होकर अस्पताल में भर्ती होता है तब बहुत पैसा खर्च होता है। ऐसे में उसकी मृत्यु हो जाती है तो परिवार पर बज्र ही टूटता है। यह सब झेलकर मृत्युभोज करना वास्तव में कितना खराब होता है, इसे समझना चाहिए। लोग तो भोज खाकर डकार लेते चले जाते हैं, लेकिन उस घर की हालत सोचिए जहां यह घटना हुई होती है। इसलिए हमारे गाँव ने निर्णय लिया कि अब तेरही का बहिष्कार किया जाना चाहिए और जो पैसा इस तरह बर्बाद किया जाता है, उसे हम अच्छे कामों में लगाएँ।’

यह एक साहसिक कार्य है। पूर्वांचल के जौनपुर, वाराणसी और गाजीपुर में तेरही के बहिष्कार की अनेक घटनाएँ हुई हैं। कुछ महीने पहले गाजीपुर जिले के हब्बासपुर गाँव के निवासी इंजीनियर विजय शंकर यादव ने अपनी माताजी की मृत्यु के बाद तेरही न करने का फैसला किया और कई सामाजिक विचारकों और कार्यकर्ताओं को बुलाकर एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया, जिसकी जिले में काफी चर्चा हुई थी और दूरदराज़ से लोग इसमें शामिल होने के लिए आए थे।

इसी तरह वाराणसी के शिवपुर क्षेत्र के वैश्य समाज के लोगों ने तरही के बहिष्कार का निर्णय लिया। इस संबंध में हमने शिवपुर रेलवे फाटक के पास एक खंभे पर टंगे होर्डिंग को देखा और यह हमारे लिए सुखद आश्चर्य का विषय था कि ब्राह्मणवाद के प्रबल पोषक माने जानेवाले वैश्य समाज ने तेरहवीं के बहिष्कार का साहसिक निर्णय लिया है।

जौनपुर जिले में लगातार तेरही का बहिष्कार हुआ

पूर्वांचल के जौनपुर जिले को इस मामले में अग्रणी और क्रांतिकारी माना जा सकता है जहां दर्जनों लोगों ने तेरही का बहिष्कार किया और उसमें लगनेवाले धन को रचनात्मक कार्यों में लगाने का कार्य किया। मड़ियाहूँ के पूर्व ब्लॉक प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्ता लाल प्रताप यादव इसके प्रमुख सूत्रधार बनकर उभरे। कई वर्षों से सामाजिक रूढ़ियों से टकराने वाले लाल प्रताप ने सबसे पहले गांवों में लोगों को जुटाकर अपने घरों से देवी-देवताओं की तस्वीरों को निकालकर आग के हवाले करने का आह्वान किया और फिर अपने सामाजिक नायकों के व्यक्तित्व और कृतित्व से परिचय कराया। इस काम के कारण ब्राह्मणवाद के पोषकों ने उनके ऊपर अनेक मुकदमे भी दर्ज़ कराये और लाल प्रताप की गिरफ़्तारी भी हुई। लेकिन भारी जनदबाव के चलते उन्हें बिना शर्त रिहा करना पड़ा।

लाल प्रताप ने और अधिक सक्रियता के साथ तेरही जैसी कुप्रथा के खिलाफ मुहिम छेड़ दी और लोगों को इससे बाहर निकलने को प्रेरित करना शुरू किया। मृत्युभोज खाना उनकी नज़र में एक मानवमांस भक्षण के बराबर था। जल्द ही कुछ लोगों ने साहस किया और अपने परिजनों की मृत्यु होने पर तेरहवीं अथवा ब्राह्मणभोज पूरी तरह बंद कर दिया और बिलकुल साधारण आयोजन करके मृतक के सुकर्मों को याद किया और उसकी तस्वीर पर पुष्पांजलि अर्पित की। किसी भी तरह के खान-पान का कोई कार्यक्रम नहीं हुआ। जब एक व्यक्ति ने यह कर दिखाया तो दूसरे लोगों ने भी इससे प्रेरणा ली और इस प्रकार तेरहवीं और मृत्यभोज का बहिष्कार एक बड़ा अभियान बनता गया।

इस अभियान के विषय में लाल प्रताप यादव एक घटना का ज़िक्र करते हैं जब वह अपने एक युवा रिश्तेदार की मृत्यु पर तेरहवीं में शामिल होने गए थे। उन्होंने देखा कि लोग बड़े चाव से पकवान खा रहे हैं और भोजन की तारीफ कर रहे हैं। इसी बीच एक छोटा बच्चा पापा पापा कहते हुये रोता हुआ बाहर निकला और एक कुर्सी पर रखी मृतक की तस्वीर के सामने खड़ा हो गया।

लाल प्रताप बताते हैं कि इस हृदयविदारक दृश्य ने मुझे झकझोर कर रख दिया। उस दिन से मैं सामान्य नहीं रह पाया। मुझे लगा कि किसी के युवा परिजन का न रहना उस पर पहाड़ टूटने जैसा है। ऐसे में भोज खाना कितना घृणित और वीभत्स है इसकी कल्पना की जा सकती है। उस दिन के बाद ही मैंने प्रण किया कि इस घृणित परंपरा से लोगों को बचाना है।

पूरी तरह जड़ जमा चुकी एक परंपरा से लड़ना आसान नहीं है

गौरतलब है कि पूर्वाञ्चल में और भी अनेक लोग हैं जिन्होंने अपने परिजनों की तेरहवीं नहीं की। वाराणसी के वरिष्ठ टूरिस्ट गाइड, सामाजिक कार्यकर्ता और पिछले चालीस वर्षों से बौद्ध रीति-रिवाज से शादियाँ कराने वाले अशोक आनंद भी ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने निजी रूप से तेरहवीं का बहिष्कार किया।

अशोक आनंद बौद्ध हैं और बौद्ध धम्म में तेरही जैसी कोई अवधारणा नहीं है लेकिन यादवों और वैश्यों में तेरही के विरुद्ध चेतना पैदा होना बहुत अलग बात है। ये समाज प्रायः धर्मभीरु माने जाते हैं। इनकी वार्षिक अर्थव्यवस्था का अच्छा-खासा हिस्सा धार्मिक कर्मकांडों की भेंट चढ़ता रहा है।

कुछ ही दिनों पहले खेतासराय इलाके के एक प्रतिष्ठित परिवार के एक वरिष्ठ सदस्य की मृत्यु होने पर घर के लोगों ने तेरही की जगह श्रद्धांजलि सभा करने का निर्णय लिया। इस संबंध में पूरे जौनपुर जिले में सूचना प्रसारित हो गई। श्रद्धांजलि समारोह में भाग लेने दूर-दूर से लोग आए लेकिन यह देखकर बहुतों को धक्का लगा कि वहाँ यज्ञ चल रहा था।

थोड़ी देर बाद पंडाल में हरे रामा हरे कृष्णा का भजन गाया जाने लगा लेकिन पाँच मिनट भी नहीं बीता कि लगभग सारे लोग बाहर निकाल गए और दूसरा भजन नहीं हो सका। यह पूछने पर कि श्रद्धांजलि सभा की जगह यह कर्मकांड क्यों तो परिवार के एक सदस्य ने बताया कि घर के अनेक लोग इसके विरुद्ध थे कि श्रद्धांजलि सभा करने से मृतात्मा को मुक्ति नहीं मिल पाएगी। इसलिए बाकी लोगों ने भी उदासीनता ओढ़ ली।

मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूँ जिन्होंने बड़े उत्साह से तेरही का बहिष्कार करने का ऐलान किया लेकिन सतनहना बीतते-बीतते उनका मिजाज़ ठंडा पड़ गया और फिर धूमधान से मृत्युभोज हुआ। बात करने पर ज़्यादातर लोग घर की महिलाओं पर दोष मढ़ते हैं लेकिन सच्चाई यही है कि लोक-परलोक के मामले में भारतीय पुरुष समाज ही ज्यादा डरपोक है।

तेरही के बहिष्कार के मामले में ज़्यादातर लोग एक कदम आगे और चार कदम पीछे हट रहे हैं। हालांकि कुछ लोग साहस के साथ बहिष्कार को अमली जामा भी पहना रहे हैं। ऐसे में जौनपुर से चली परंपरा का गाजीपुर, वाराणसी अथवा अन्य जिलों तक फैलना एक परिघटना है।

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मध्य प्रदेश में तेरही का बहिष्कार बरसों पहले शुरू हुआ था

बरसों पहले नागपुर में एक कार्यक्रम के दौरान मध्य प्रदेश के नीमच जिले से आई एक महिला बसंती से मुलाक़ात हुई थी। हमारे मेजबान ने उनसे परिचय कराते हुये बताया कि इन्होंने अपने इलाके में तेरहवीं के विरुद्ध आंदोलन छेड़ा हुआ है। बसंती विधवा थीं और सबसे पहले उन्होंने अपने पति की तेरहवीं करने से मना कर दिया। लोगों के दबाव बनाने पर भी वे नहीं झुकीं और तर्क दिया कि वह मेरा पति था। अब जब वह चला गया तो मैं उसका उत्सव मनाकर किसी को भोज नहीं खिलाऊँगी।

उन्होंने बताया कि मेरे गाँव में अनेक ऐसे परिवार थे जिनके पास अपने परिजनों की तेरहवीं करने की स्थिति नहीं थी। लेकिन पुरोहितों के दबाव के आगे वे इतने मजबूर हो जाते थे कि उन्हें तेरही करनी पड़ती थी। पुरोहित पूर्वजन्म और पुनर्जन्म का भय दिखाता कि अगर ठीक से तेरही नहीं करोगे तो मृतक प्रेत बनकर भटकता रहेगा। महाजन इस ताक में रहता कि पुरोहित के कहने पर ये किसान-मजदूर कर्ज़ लेने उसी के पास आएंगे। लोग ब्याज पर कर्ज़ लेते और अपनी ज़मीनें रेहन पर रख देते और फिर कभी न छुड़ा पाते।

उन्होंने बताया कि असल में यह पुरोहित-महाजन गंठजोड़ था और दोनों मिलकर ऐसा षड्यंत्र करते कि किसान अपनी ज़मीनों से हमेशा के लिए हाथ धो बैठते। लेकिन मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि लोग क्यों इस बात का भरोसा कर लेते हैं कि लोगों को भोज न खिलाने पर मरनेवाला प्रेत बनकर भटकता रहेगा। आखिर मरनेवाले को मरने के बाद किसने देखा?

उनका मानना था कि मनगढ़ंत किस्सों में उलझाकर भोले-भले लोगों को अच्छी तरह से तेरही का भोज देने के लिए प्रेरित किया जाता और इस काम के लिए वे महाजनों से कर्ज़ लेते। बाद में न चुका पाने पर उनके खेत आसानी से हड़प लिए जाते। लोग यह सबकुछ साफ-साफ देखते लेकिन अपनी भावुकता और भोलेपन के कारण वे षड्यंत्र के आसानी से शिकार हो जाते हैं।

उन्होंने बताया कि पहली बार जब मैंने मृत्युभोज का विरोध किया तो मुझे अनेक लोगों के ताने सुनने पड़े। लोगों ने पीठ पीछे गालियाँ दी। लेकिन मैंने हार न मानी। जल्दी ही और लोगों ने मृत्युभोज का विरोध शुरू किया लेकिन परिवारों में इसे लेकर सबलोग एकमत नहीं थे। कई गुट बन गए और जिस परिवार में मातम चल रहा था उसी में कई लोग तेरही करने पर ज़ोर देते। लेकिन मृत्युभोज का सिलसिला कमजोर पड़ने लगा।

नीमच के पुरोहितों-महाजनों में खलबली मच गई। वे सारी फसाद की जड़ मुझे ही मानते थे। मेरे ऊपर कई बार जानलेवा हमले हुये। यहाँ तक कि मुझे गाँव में कोई सामान नहीं मिलता था लेकिन मैंने हार नहीं मानी। मैं अब तक चार सौ परिवारों को पुरोहितों-महाजनों के चंगुल से बचा चुकी हूँ।

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धीरे-धीरे यह चेतना दूर-दूर तक फैल रही है

हालाँकि अभी भी तेरही के बहिष्कार को लेकर समाज में अनेक किन्तु-परंतु है लेकिन लोगों में इसके बहिष्कार को लेकर पनपती चेतना को रोक पाना मुश्किल है। अनेक समाज सुधारक और सामाजिक कार्यकर्ता घूम-घूमकर इस विषय में लोगों को जागरूक कर रहे हैं और सुविधाजनक दिन देखकर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन कर रहे हैं।

मुंबई निवासी देवेंद्र यादव लगातार उत्तर प्रदेश के विभिन्न स्थानों पर कैडर कैंप आयोजित करते हैं और लोगों में सामाजिक न्याय की भावना भरते हैं। सामाजिक गैरबराबरी और जातिवाद के विरुद्ध मुहिम छेड़नेवाले देवेंद्र फुले-पेरियार-अंबेडकर की विचारधारा से लोगों का परिचय करा रहे हैं और अंतरजातीय विवाहों तथा तेरही जैसी कुप्रथा के बहिष्कार के लिए प्रेरित कर रहे हैं। वह कहते हैं कि ‘बहुजन समाज अपने ऊपर लादी गई अनेक कुप्रथाओं को बिना तर्क ढो रहा है। आज उसे सबसे ज्यादा अपने नायकों को जानने की जरूरत है ताकि उनके जीवन और विचारों से प्रेरणा लेकर वह अपने हड़पे गए अधिकारों को प्राप्त करे और अपना जीवन उन्नत बनाए।’

और भी अनेक लोग हैं जो अपने-अपने तरीके से इस कार्य में लगे हुये हैं। तेरही का बहिष्कार असल में लोगों को एक नयी सामाजिक समझ देता है और सड़ी-गली मान्यताओं से उन्हें निकालकर नया और रचनात्मक काम करने का रास्ता भी देता है। मसलन शिक्षा के लिए पैसा खर्च करने और गरीब लोगों की मदद करना तथा मृतक की याद में पेड़ लगाना इसका एक उज्ज्वल पक्ष है।

रामजी यादव
रामजी यादव वरिष्ठ कहानीकार और गाँव के लोग के संस्थापक व सम्पादक हैं।

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