बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता की सियासत के खिलाफ बोलना होगा कांग्रेस को

सलमान अरशद

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कांग्रेस के चिंतन शिविर से निकली बातों पर सोशल मीडिया में ठीक-ठाक चर्चा हो रही है, बहुत से लोग जो भाजपा के शासन काल में त्रस्त हैं, कांग्रेस की तरफ़ उम्मीद भरी नज़र से देख रहे हैं। अगर आप भी इन्हीं में से एक हैं तो यह लेख आपके लिए ही है। भाजपा के कुशासन को देखते हुए मोटा-मोटी तीन समस्याग्रस्त एरियाज़ हैं जिन पर हम कांग्रेस या किसी दूसरी पार्टी के ज़रिये बेहतर काम की उम्मीद करते है। एक है कॉर्पोरेट हित में नीतिनिर्माण, दूसरा पूरे देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंकना और तीसरा है अन्यायपूर्ण प्रशासन।

अब इन तीनों पर संक्षेप में बात करते है, कॉर्पोरेट लूट की आधारशिला ही कांग्रेसी हुकूमतों में रखी गयी थी, उस वक्त भी बौद्धिक जगत से जनता और सियासी दलों को चेताया गया था लेकिन सत्तावर्ग ने इस पर ध्यान नहीं दिया था। आज भी कांग्रेस के पास इस लूट से देश को बचाने के लिए कोई प्रोग्राम नहीं है, यही नहीं ऐसा कुछ करने का कांग्रेस कोई इरादा हो, ऐसा भी नज़र नहीं आता। इसे और ज़्यादा समझने के लिए आपको कांग्रेस शासित राज्यों में पूंजीपतियों और आम जनता के प्रति कांग्रेस के रवैये को देखना चाहिए, यहाँ मैं उसके विस्तार में नहीं जाऊंगा। लेकिन एक बात तो बिलकुल साफ़ है कि जिस पूंजीवादी लूट को भाजपा ने बेलगाम किया हुआ है उसे रोकने के लिए कांग्रेस के पास न तो प्रोग्राम है और न ही इच्छाशक्ति।

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अब रही बात देश को जोड़ने के लिए देशव्यापी यात्रा करने की तो देश में बहुसंख्यक तुष्टिकरण की सियासत से निकली बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता जिसे आजकल राष्ट्रवाद कहा जाता है, को लेकर कांग्रेस में कोई महत्वपूर्ण चिंतन न तो हो रहा है और न ही ऐसी कोई संभावना दिखाई देती है। क्या ये गंभीर चिंतन का विषय नहीं है कि देश को तोड़ने वाली सियासत को छूए बिना देश को जोड़ने की सियासत पर बात करने की हिमाक़त की जाये! लेकिन कांग्रेस ये काम कर रही है। याद कीजिये जब बाबरी मस्जिद विवाद का फैसला आया था तो कानून के जानकारों ने इसे ‘फैसला’ कहा था न्याय नहीं, खुद फ़ैसले की भाषा भी इस मत की पुष्टि करती है, बावजूद इसके कांग्रेस ने इस फैसले की क्रेडिट लेने की भरपूर कोशिश की, जबकि देश की सबसे पुरानी और केन्द्रीय सत्ता में विपक्ष में होने की वजह से कांग्रेस को इतना तो कहना ही चाहिए था कि ये फैसला है न्याय नहीं। मध्य प्रदेश के तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री के उस फुल पेज़ के विज्ञापन को याद कीजिये जिसमें उन्होंने स्वर्गीय राजीव गाँधी के बाबरी मस्जिद विवाद से जुड़े कार्यों का ज़िक्र करते हुए उन्हें राम मंदिर के हक़ में काम करने वाला बताया था। दरअसल, कोर्ट के इस फैसले (न्याय नहीं) का क्रेडिट लेने के लिए कांग्रेस ने भरपूर कोशिश की थी और ख़ुद को हिन्दू हितैसी साबित करने का भी प्रयास किया था।

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यहाँ दो बातें साफ़ तौर पर दिखाई देती हैं, प्रथम कांग्रेस पार्टी अब धर्मनिरपेक्षता की अलमबरदार नहीं है और न ही वो ऐसा दिखने की कोशिश कर रही है, बल्कि धार्मिक ध्रुवीकरण के ज़रिये जनता के जो धड़े बन गये हैं, उसमें वो भी हिन्दू बहुसंख्यक की साम्प्रदायिकता को अन्य कई पार्टियों की तरह ही सहलाना चाहती है। यहाँ ये भी याद रखने की ज़रूरत है कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री जनाब जवाहरलाल नेहरू साहब के बाद ही कांग्रेस सॉफ्ट हिंदुत्व की सियासत के राह पर चल पड़ी थी। ऐसे में जब देश के सामने हार्ड हिंदुत्व का विकल्प आया तो सॉफ्ट हिंदुत्व में ट्रेंड भारतीय मानस को हार्ड हिंदुत्व अपनाने में कोई दिक्क़त नहीं हुई। दरअसल, कांग्रेस हिंदुत्व और धर्मनिरपेक्षता एक साथ साधना चाहती थी जबकि भाजपा खुलकर हार्ड हिंदुत्व की सियासत को आगे बढ़ा रही थी ऐसे में देश की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी पार्टी देखते ही देखते खात्मे के कगार पहुँच गयी, कांग्रेस की सियासत को यहीं पहुँचना था। अफ़सोस, कांग्रेस आज भी सॉफ्ट हिंदुत्व को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। आज जब मुसलमानों का उत्पीड़न राजनीतिक सफ़लता का पर्याय बना हुआ है तब कांग्रेस का ये रवैया न सिर्फ़ कांग्रेस के लिए बल्कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए भी घातक है। यहाँ ये बात साफ़ होनी चाहिए कि कांग्रेस भाजपा के लेवल पर उतरकर हिंदुत्व की सियासत नहीं कर सकती और सॉफ्ट हिंदुत्व की सियासत का वक्त फ़िलहाल बीत चुका है। सच तो ये है कि मुसलमानों के सन्दर्भ में कांग्रेस का रवैया आजाद भारत में शुरू से ही संदेहास्पद रहा है। मुसलमानों को एक संदिग्ध और अपराधी कौम की छवि में ढालने का मुख्य दोष भाजपा पर नहीं बल्कि कांग्रेस पर है और कांग्रेस को अपने इस अपराध का एहसास तक नहीं है।

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प्रशासन का रवैया भी मुसलमानों के प्रति भेदभावपूर्ण रहा है, यहाँ भी ये देखना महत्वपूर्ण है कि किसी भी पार्टी की हुकूमत हो प्रशासन में बैठे लोग मुसलमानों के प्रति अपने पूर्वाग्रहपूर्ण रवैये में कोई बदलाव नहीं करते। राजस्थान और छतीसगढ़ में हालिया दिनों में हुए मुस्लिम विरोधी दंगों में अगर आप प्रशासन के रवैये का भाजपा शासित राज्यों से तुलना करें, तो इनमें कोई अंतर दिखाई नहीं देगा।

आज ज़रूरी है कि कॉर्पोरेट लूट पर लगाम लगाईं जाये, लेकिन कांग्रेस ऐसा कुछ करने का इरादा नहीं रखती, ज़रूरी है कि प्रशासन द्वारा दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों के साथ किये जा रहे भेदभाव पर रोक लगे, लेकिन कांग्रेस शासित राज्यों में इस दिशा में कुछ होता हुआ दिखाई नही देता। कॉर्पोरेट लूट को सुनिश्चित करने के लिए बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता को सियासत का आधार बनाया गया लेकिन कांग्रेस इसके भी खिलाफ़ कुछ करने के लिए तैयार नहीं है। सार ये है कि कांग्रेस खुद को एक सियासी विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने में लगातार नाकाम हो रही है।

अंत में एक और तथ्य पर ध्यान देना चाहिए, निःशुल्क और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, निःशुल्क बुनियादी चिकित्सा और रोज़गार की गारंटी जनता की बुनियादी ज़रूरत है, हुकूमत किसी की भी हो, इन्हें पूरा करना प्राथमिक जिम्मेदारी है, अब देश के नागरिक के रूप में सोचिये कि क्या देश में ऐसा कोई राजनीतिक दल है जिससे आप ये उम्मीद कर सकते हैं? ये प्रश्न, इसका उत्तर और इसके नतीजे में आपका संकल्प देश के भविष्य का निर्धारण करेगा।

डॉ. सलमान अरशद स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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