उत्तराखंड की अस्मिता को ध्वस्त करने में लगे कॉर्पोरेट और सरकारें

विद्या भूषण रावत

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9 फरवरी 2021 को उत्तराखंड के लोगों ने एक बार फिर उस आपदा को देखा जिसने उनके आगे वह  भयावह मंजर खड़ाकर दिया था जैसे जून 2013 में हुआ जिसे तत्कालीन मुख्यमंत्री ने ‘हिमालयी सुनामी’ कहा और जिसके फलस्वरूप हजारों लोग, पशु, घर-बार तबाह हो गए. हकीकत ये थी कि सारी आपदाएँ हमें अपने अन्दर आत्ममंथन के लिए कहती हैं लेकिन ऐसा करना तो दूर, सरकार में बैठे लोग विकास के नाम पर अभी भी लोगों को बड़े बड़े सपने बेच रहे हैं। जिस बेरहमी से पहाड़ों को काटा जा रहा है, पेड़ उखाड़े जा रहे हैं और सारा गर्दा नदियों में डाला जा रहा है वह यही दिखाता है के देश के राजनेताओं के लिए उत्तराखंड के सिर्फ दो मायने हैं। एक तरफ उसे ‘हिन्दुओं की आस्था’ के नाम पर दूहते रहो और दूसरे वहाँ की नदियों, घाटियों, पहाड़ों को अपने व्यापारिक लाभ के लिए चूसते रहो। उसका नतीजा यह हुआ है कि आज उत्तराखंड का अस्तित्व खतरे में है।

देश भर में रेणी गाँव भारत के पर्यावरण प्रेमियों के लिए प्रेरणा का ऐसा स्रोत है जिसकी विरासत को जितना बचा सकें और सम्मानित कर सकें, वह कम होगा। वैसे तो हम लोगों की याददाश्त अब रात्रि में क्या खाया उसे भी याद करने की नहीं है, लेकिन रेणी गाँव के इतिहास और संघर्ष को यदि पहाड़ के लोग याद नहीं रखेंगे तो उनके पास बचाने के लिए फिर कुछ और है नहीं।

रेणी गाँव आदिवासी जनजातियों का गाँव है और भारत चीन सीमा के पास है। रेणी के जंगलों में उत्तर प्रदेश और भारत सरकार की नजर थी, ठेकेदार जंगलों को काटने का कॉन्ट्रैक्ट ले आते थे। 25 मार्च 1974 को गाँव की आदिवासी महिला गौरा देवी ने 25 अन्य महिलाओं के साथ पेड़ काट रहे ठेकेदारों को ललकारा कि यदि उन्होंने पेड़ काटने का दुस्साहस किया तो पहले उन्हें काटना पड़ेगा।  सभी महिलाएँ पेड़ों से चिपक गईं  और किसी भी तरह से नहीं हटीं। तीन दिन के संघर्ष के बाद ठेकेदार वहाँ से भाग गए। बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने 10 वर्ष के लिए जंगलों के काटने पर प्रतिबन्ध लगा दिया।  1150 वर्ग किलोमीटर का रेणी फारेस्ट बायो डाइवर्सिटी के हिसाब से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है।

रेणी गाँव के लोग निराश हैं। गाँव में गौरा देवी की आदमकद प्रतिमा थी जो अब वहा से हटा दी गयी है। नेताओं को इसका कोई दर्द नहीं कि एक आदिवासी महिला, जिसने हमारे देश को दुनिया के पर्यावरणवादियों की नज़र में ऊंचा स्थान दिलवाया उसका गाँव ख़त्म होने वाला है। वह जगह हमारे नक़्शे से गायब हो सकती है जहाँ से दुनिया को चिपको का सन्देश मिला।

गौरा देवी लीजेंड बन गईं और उन्होंने पूरा जीवन पेड़ों और प्रकृति की सेवा में लगा दिया। वह कहती थीं कि पहाड़ हमारी जीविका है। यदि आप पहाड़ों को बर्बाद करोगे तो पहाड़ हमारे ऊपर गिरेंगे और हमारे गाँव को बर्बाद करेंगे। वह कहतीं– ‘माटू हमारू, पानी हमारू, हमार छीन ये बौना भी, पितरो न लगाईं बौण, हमुन ही ता बचाण भी….’  इसका अर्थ यह कि मिट्टी हमारी, पानी हमारा और हमारे पूर्वजों ने ये पेड़ लगाए, अब इनको बचाने की जिम्मेवारी भी हमारी है।

 

पर्यावरण की सेनापति गौरा देवी, रेनी गाँव,उत्तराखंड

गौरा देवी पहाड़ों की सेवा करते-करते 66 वर्ष की आयु में सन 1991 में दिवंगत हो गईं। हालांकि उतराखंड में पर्यावरण के सवाल को फिर से बड़ी मजबूती से सुन्दर लाल बहुगुणा ने आगे बढ़ाया लेकिन सत्ता और प्रसाशन ने उनकी न सुनी। शायद लोगों को भी ‘विकास’ के सपने दिखाई दे रहे थे और आज उत्तराखंड के बनने के 21वर्ष बाद यह महसूस हो रहा है कि हमारे पहाड़ और नदी-झरनों पर दिल्ली के दलालों की गिद्ध दृष्टि लग गयी है। ऐसा लगता है कि वे इसी प्राकृतिक सौन्दर्य का पूरा ब्याज सहित हिसाब-किताब करना चाहते हैं। धर्म का सहारा लेकर वे उत्तराखंड में विकास के नाम पर ‘पूंजी’ फेंक रहे हैं और बदले में प्रकति को नष्ट कर रहे हैं।

ऐसी परिस्थितियों में प्रकति ने दो बार अपना निर्णय सुना दिया। 2013 में आई आपदा को तत्कालीन मुख्यमंत्री ने ‘हिमालयी सुनामी’ बोला था लेकिन वास्तव यह दिल्ली में बैठे नीति-निर्माताओं की लालची नीतियों को प्रकति का रिजेक्शन लेटर था। फिलहाल सरकारें उत्तराखंड के पानी और पहाड़ों का दोहन करने की अपनी रणनीति पर चलाती जा रही हैं।

रेणी गाँव के कुछ लोगों और स्थानीय समाजसेवियों ने साथ मिलकर उत्तराखंड हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की जिसमें कहा गया कि इन सरकारी परियोजनाओं पर तुरंत रोक लगाई जाए लेकिन न्यायालय के आदेश ने इतना निराश किया कि कहा नहीं जा सकता। आखिर लोग न्याय के लिए कहाँ जाएँ। कोर्ट ने 4 जुलाई 2021 को अपने आदेश में याचिकाकर्ताओं से कहा के उनके पास क्या सबूत है कि वे ‘सामाजिक कार्यकर्ता’ है और इस पर पूरे एक पेज का लेक्चर है। कोर्ट का समय जाया करने के लिए सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं पर दस हज़ार रुपये का जुर्माना भी लगा दिया गया।

इस वर्ष के प्रारंभ में रेणी गाँव पर अभूतपूर्व संकट आ गया। 7 फरवरी को सुबह-सुबह ऐसी खबरें आईं कि ‘बादल फटने’ के कारण से रेणी गाँव में भयावह आपदा आ गयी जिसके कारण वहाँ और वहाँ से 7 किलोमीटर दूर तपोवन में लगभग 200 लोग मारे गए। अधिकांश शव नदी की तेज धारा में बह गए और उन्हें निकाला भी नहीं जा सका। रेनी और अन्य गावों का देश के अन्य हिस्सों से संपर्क टूट गया। रेणी गाँव पर एनटीपीसी का एक बाँध ढोली गंगा और ऋषि गंगा नदियों पर बन रहा था जो पूरी तरह से बह गया।  गाँव में इन बांधों के निर्माण के कारण हो रही ब्लास्टिंग से बहुत नुकसान पहले से ही हो रहा था।  गाँव के लोग कहते हैं कि यह आपदा कोई प्राकृतिक आपदा नहीं थी अपितु सरकार द्वारा अपनाई जा रही नीतियों के फलस्वरूप ऐसा हुआ है लेकिन सरकार है कि सुनने को तैयार नहीं। वह फिर अपनी जिद पर अड़ी हुई है।

फरवरी की आपदा के बाद जून में रेणी गाँव में लगातार बारिश हुई है और अब लोगों का वहाँ रहना मुश्किल हो रहा है। प्रशासन ने गाँव को एक वैकल्पिक स्थान देने की बजाय उन्हें स्कूलों में रहने को मजबूर किया गया लेकिन पहाड़ों में लोग इतनी आसानी से अपने स्थान से विस्थापित होकर जिंदगी गुजारने के लिए तैयार नहीं होते हैं। इसलिए रेणी गाँव के कुछ लोगों और स्थानीय समाजसेवियों ने साथ मिलकर उत्तराखंड हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की जिसमें कहा गया कि इन सरकारी परियोजनाओं पर तुरंत रोक लगाई जाए लेकिन न्यायालय के आदेश ने इतना निराश किया कि कहा नहीं जा सकता। आखिर लोग न्याय के लिए कहाँ जाएँ। कोर्ट ने 4 जुलाई 2021 को अपने आदेश में याचिकाकर्ताओं से कहा के उनके पास क्या सबूत है कि वे ‘सामाजिक कार्यकर्ता’ है और इस पर पूरे एक पेज का लेक्चर है।  कोर्ट का समय जाया करने के लिए सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं पर दस हज़ार रुपये का जुर्माना भी लगा दिया गया। यह कितने बड़े दर्द की बात है कि लोग अपने उजड़ते गाँव को बचाने के लिए भी न्यायालय नहीं जा सकते और उन्हें कही से ढूंढ कर कोई प्रमाणपत्र लाना पड़ेगा कि वे सामजिक कार्यकर्त्ता हैं। दिल्ली में ऐसे कई महानुभाव हैं, जो किसी भी विषय में कभी भी ‘जनहित याचिका’ लेकर सुप्रीम कोर्ट चले जाते हैं और कोई उनसे नहीं पूछता कि वह कौन सा सामाजिक कार्य कर रहे हैं?

ढोली गंगा और ऋषि गंगा जिस पर बाँध बनाया जा रहा था

रेणी गाँव के लोग निराश हैं।  गाँव में गौरा देवी की आदमकद प्रतिमा थी जो अब वहा से हटा दी गयी है। नेताओं को इसका कोई दर्द नहीं कि एक आदिवासी महिला, जिसने हमारे देश को दुनिया के पर्यावरणवादियों की नज़र में ऊंचा स्थान दिलवाया उसका गाँव ख़त्म होने वाला है।  वह जगह हमारे नक़्शे से गायब हो सकती है जहाँ से दुनिया को चिपको का सन्देश मिला।

इस वर्ष के प्रारंभ में रेणी गाँव पर अभूतपूर्व संकट आ गया। 7 फरवरी को सुबह-सुबह ऐसी खबरें आईं कि ‘बादल फटने’ के कारण से रेणी गाँव में भयावह आपदा आ गयी जिसके कारण वहाँ और वहाँ से 7 किलोमीटर दूर तपोवन में लगभग 200 लोग मारे गए। अधिकांश शव नदी की तेज धारा में बह गए और उन्हें निकाला भी नहीं जा सका। रेनी और अन्य गावों का देश के अन्य हिस्सों से संपर्क टूट गया। रेणी गाँव पर एनटीपीसी का एक बाँध ढोली गंगा और ऋषि गंगा नदियों पर बन रहा था जो पूरी तरह से बह गया। गाँव में इन बांधों के निर्माण के कारण हो रही ब्लास्टिंग से बहुत नुकसान पहले से ही हो रहा था। गाँव के लोग कहते हैं कि यह आपदा कोई प्राकृतिक आपदा नहीं थी

एक कार्यक्रम में उत्तराखंड के प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्त्ता सुरेश भाई ने कहा के भारत के न्यायालय ने जो भी कहा लेकिन प्रकति ने अपना फैसला सुना दिया कि वह अपने ऊपर हो रहे अत्याचार को सहन नहीं करेगी और उसका बदला भयावह होगा।

कुछ दिनों बाद प्रशासन रेणी के लोगों को दूसरे गाँव में बसा देगा लेकिन वह उनको उसकी वह खूबसूरती नहीं दे पायेगा। वह वारा गाँव, वो चारागाह, या जंगल जहाँ पेड़ों से लिपटकर गौरा देवी ने उन्हें बचाया। कितनी बड़ी त्रासदी है कि हम व्यक्ति को पूजते हैं या इज्जत देते हैं, जब उसकी पहचान अन्तर्राष्ट्रीय हो जाती है लेकिन इस पर कोई दर्द नहीं कि वह गाँव अब इतिहास के पन्नों में जाने वाला है। इसका अर्थ यही है कि गाँव और गाँव वाले चाहे बर्बाद हो जाएँ लेकिन लूटने वाले अपना काम करते रहेंगे। रेणी गाँव बचाने की लड़ाई में जुड़े अतुल सती कहते हैं कि पिछले तीन दिनों से पूरे जोशीमठ में बिजली नहीं थी। पूरा उत्तराखंड दरअसल देश को बिजली देता है और उसके चलते उसके अपने लिए कुछ भी नहीं बचता।  उत्तरखंड के पहाड़ों, नदियों पर दिल्ली-मुंबई के पूंजीपतियों की नज़र लगी है जिन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं कि पहाड़ बचेंगे भी या नहीं।

आंदोलनकारी और जनकवि गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’

आज गौरा देवी के उस संघर्ष की याद आ रही है जब उन्होंने लुटेरों को जंगलों से खदेड़ा था लेकिन अब लुटेरों का रूप और तौर-तरीके बदल चुके हैं। अब वे आपके साथ खड़े दिखाई देंगे, विकास का सपना दिखायेंगे और धर्म की ध्वजा भी लहरायेंगे।  आज विश्व आदिवासी दिवस पर मैं क्रांतिकारी गौरा देवी को सलाम करता हूँ और उत्तराखंड के महान कवि गिरदा की यह कविता यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ कि यदि हम अभी भी नहीं चेते तो फिर बहुत देर हो चुकी होगी।

ख्यात रंगकर्मी, लोकविद, राज्य आंदोलनकारी और जनकवि गिरीश तिवारी गिर्दा की प्रसिद्ध कविता

एक तरफ बर्बाद बस्तियाँ – एक तरफ हो तुम।

एक तरफ डूबती कश्तियाँ – एक तरफ हो तुम।

एक तरफ हैं सूखी नदियाँ – एक तरफ हो तुम।

एक तरफ है प्यासी दुनियाँ – एक तरफ हो तुम।

अजी वाह! क्या बात तुम्हारी, तुम तो पानी के व्योपारी,

खेल तुम्हारा, तुम्हीं खिलाड़ी,

बिछी हुई ये बिसात तुम्हारी,

सारा पानी चूस रहे हो,

 

नदी-समन्दर लूट रहे हो,

गंगा-यमुना की छाती पर कंकड़-पत्थर कूट रहे हो,

उफ! तुम्हारी ये खुदगर्जी,

चलेगी कब तक ये मनमर्जी,

जिस दिन डोलगी ये धरती,

सर से निकलेगी सब मस्ती,

महल-चौबारे बह जायेंगे

खाली रौखड़ रह जायेंगे

बूँद-बूँद को तरसोगे जब – बोल व्योपारी – तब क्या होगा?

नगद – उधारी – तब क्या होगा??

आज भले ही मौज उड़ा लो,

नदियों को प्यासा तड़पा लो,

गंगा को कीचड़ कर डालो,

लेकिन डोलेगी जब धरती – बोल व्योपारी – तब क्या होगा?

वर्ल्ड बैंक के टोकनधारी – तब क्या होगा ?

योजनकारी – तब क्या होगा ?

नगद-उधारी तब क्या होगा?

एक तरफ हैं सूखी नदियाँ – एक तरफ हो तुम।

एक तरफ है प्यासी दुनियाँ – एक तरफ हो तुम।

विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर आज आदिवासी जीवन शैली को समझने की आवश्यकता है अपितु दुनिया के बचे रहने के लिए वही हमारी एकमात्र गारंटी है। नहीं तो विकास के नाम पर प्राकृतिक संशाधनों की लूट से न केवल हमारा जीवन खतरे में होगा अपितु प्रकति अपना बदला लेती रहेगी और लोग इसका शिकार बनते रहेंगे। आज गौरा देवी उत्तराखंड की अस्मिता का प्रतीक बन चुकी हैं और यदि लोगों ने अभी भी विकास के इस मॉडल पर सवाल नहीं खड़ा किया तो पहाड़ों में कई और ‘रेणी’ गाँव बनेंगे और निर्दोष जाने जाते रहेंगी।

 

विद्याभूषण रावत प्रखर सामाजिक चिंतक और कार्यकर्ता हैं। उन्होंने भारत के सबसे वंचित और बहिष्कृत सामाजिक समूहों के मानवीय और संवैधानिक अधिकारों पर अनवरत काम किया है।

 

 

 

 

 

 

2 Comments
  1. जनार्दन says

    बेहद जरूरी आलेख।

  2. सुजीत कुमार सिंह says

    उत्तराखंड के लोगों को अब जागना होगा। जब मैं पिथौरागढ़ में था तो बच्चों को पढ़ाते पढ़ाते मैं चिहुंक जाता था। बच्चे कहते कि क्या हुआ सर? मैं उस भीषण आवाज की चर्चा करता। तो वे कहते कि सर, डायनामाइट से पहाड़ तोड़े जा रहे हैं।

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