Friday, June 26, 2026
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पूर्वांचल का चेहरा - पूर्वांचल की आवाज़

साहित्य

वीरेंद्र यादव बनाम ज्वालामुखी यादव

आज सुबह अभी हम इलाहाबाद से आई प्रो राजेंद्र कुमार के न रहने की दुखद खबर से उबरे भी नहीं थे कि लखनऊ से प्रख्यात आलोचक वीरेंद्र यादव के जाने की स्तब्धकारी खबर आई। सहसा भरोसा करना मुश्किल था कि यह कैसे हो सकता है? दो दिन पहले उनके बीमार होने की सूचना मिली थी, लेकिन यह बीमारी इतनी घातक है यह न मालूम था। उनके जाने से बहुत कुछ खाली हो गया. वह गर्मजोशी से भरे बुद्धिजीवी थे जो केवल किताबी आलोचना तक सीमित नहीं थे, बल्कि लगभग सभी समकालीन मुद्दों पर लिखते और बोलते थे और बेलाग बोलते थे। उनके व्यक्तित्व के इन्हीं पहलुओं को छूता प्रख्यात कथाकार मधु कांकरिया की एक छोटी टिप्पणी जो उनके बहत्तरवें जन्मदिन पर चार साल पहले प्रकाशित की गई थी। आज पुनः उनको श्रद्धांजलिस्वरूप प्रकाशित की जा रही है।

मूँदहु आंख भूख कहुं नाहीं

अब गरज तो विश्व गुरु कहलाने से है, भूख बढ़ाने में विश्व गुरु कहलाए तो और भूख मिटाने में विश्व गुरु कहलाए तो। उसके ऊपर से 111 की संख्या तो वैसे भी हमारे यहां शुभ मानी जाती है। भारत चाहता तो पिछली बार की तरह, भूख सूचकांक पर 107वें नंबर पर तो इस बार भी रह ही सकता था। पर जब 111 का शुभ अंक उपलब्ध था, तो भला हम 107 पर ही क्यों अटके रहते? कम से कम 111 शुभ तो है। भूख न भी कम हो, शुभ तो ज्यादा होगा।

विश्वगुरु की सीख का अपमान ना करे गैर गोदी मीडिया

इन पत्रकारों की नस्ल वाकई कुत्तों वाली है। देसी हों तो और विदेशी हों तो, रहेंगे तो कुत्ते...

तुम्हारी लिखी कविता का छंद पाप है

मणिपुर हिंसा पर केन्द्रित कवितायें  हम यहाँ ख्यातिलब्ध बांग्ला कवि जय गोस्वामी की कुछ कवितायें प्रकाशित कर रहे हैं।...

हरिशंकर परसाई और शंकर शैलेंद्र की जन्मशती पर हुआ संगोष्ठी का आयोजन

ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में  हरिशंकर परसाई और शंकर शैलेंद्र की जन्मशती पर संगोष्ठी का...

विद्रोही ऐसे कवि थे जो अपने गलत चित्रण का हमेशा विरोध करते थे

विद्रोही पर लेख लिखने की शुरुआत उन पर बनी फिल्म मैं तुम्हारा कवि हूँ देखने के बाद हुई। फिल्म देखने के बाद लगातार 2-3...

भील विद्रोह की ऐतिहासिक घटनाओं की बिखरी कड़ियों को जोड़ता महत्वपूर्ण दस्तावेज़

क्सर हमें 'बताया' जाता था कि स्वतंत्रता आंदोलन के कुछ 'नायक' और कुछ 'खलनायक' थे और फिर 'इतिहास' की 'राजनीतिक लड़ाई' लड़ने वाले इतिहासकार थे जो अपने-अपने तरीकों से इसकी व्याख्या कर रहे थे और दिलचस्प बात यह है कि वे सभी एक ही खित्ते के हैं। दोनों में से किसी ने भी वास्तव में इस बात की परवाह नहीं की कि भारत जैसे विशाल देश का इतिहास या ऐतिहासिक आंकड़ों को प्रस्तुत करने का अलग-अलग दृष्टिकोण हो सकता है। इतिहास दरअसल घटनाओं के बारे में जानकारी देता है न कि हम व्यक्तिगत रूप से क्या पसंद  या नापसंद करते हैं। तथ्य यह है कि इतिहास वर्तमान में हमारे 'भविष्य' को तय करने के लिए सबसे शक्तिशाली हथियार बन गया है। 

दीवारों में चिनी हुई चीखें -3

तीसरा और अंतिम हिस्सा  उन दिनों नूं रानियां ( बहूरानियां ) सिर्फ कहने को रानियां थीं, औकात दासियों से बदतर थी। अपनी मर्जी से कोई...

एक लाइन में कई कमरों वाला वह तीसरा तल्ला -2

दूसरा हिस्सा मौसी मां की बड़ी लाड़ली थी। मुझे अपने होश संभालने के बाद जो पहली शादी याद है, वह मौसी की शादी थी। विदाई...

मां की कविताएं उन किताबों में से गुम होती चली गईं जिन्हें छिपाकर दहेज के साथ ले आई थीं-1

पहला हिस्सा  मैं जब भी यहां, अपने मायके कलकत्ता आती हूं,  इस कमरे के बिस्तर के इस किनारे पर जरूर लेटती हूं- जहां मां लेटा...

हितैषी

कानून बना कर ऐतिहासिक काम किया था सरकार ने सरकार किसान कानून वापस लेकर ऐतिहासिक काम करने जा रही हैऐतिहासिक का अर्थ यूँ समझिये कि नया घर बनवाना और...
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