एक लाइन में कई कमरों वाला वह तीसरा तल्ला -2

सुधा अरोरा

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दूसरा हिस्सा

मौसी मां की बड़ी लाड़ली थी। मुझे अपने होश संभालने के बाद जो पहली शादी याद है, वह मौसी की शादी थी। विदाई की रस्म जेहन में क्यों दर्ज रह गई, क्या मालूम। शायद पापा की आवाज का असर था कि उन्होंने मौसी की शादी में जो शिक्षा- पंजाबी में जिसे ‘सिखिया’ कहा जाता था- रुंधे गले से पढ़ी, उसने सबको सिसकियां भरने पर मजबूर कर दिया। बीजी और भाबी जी यानी मां और नानी तो जो रोये सो रोये, मैंने रो-रोकर आसमान सिर पर उठा लिया। इतना कि मैं मौसी के लाल किनारी वाले दुपट्टे का पल्लू ही न छोड़ूं। आखिर मौसी की सास ने बड़ी दयानतदारी दिखाते हुए कहा- ‘ऐस कुड़ी नूं ते सानूं दाज चे दे द्यो ( इस लड़की को तो हमें दहेज में दे दो )’ और मेरी ओर मुखातिब हुई, ‘चल कुड़िए, मोटर विच मासी दे नाल बै जा। कल छड्ड आवांगे। कमलेश नाल खेड लईं।’ मौसी की ननद कमलेश मेरी हमउम्र थी। तब जाकर मेरा रोना बंद हुआ।

सफेद मोगरा के फूलों की लड़ियों और गुलाब के फूलों से सजी धजी सुंदर सी गाड़ी में मैं मौसी का पल्लू पकड़ कर बैठ गई। राजाकटरा इलाके में गाड़ी जाकर जहां रुकी, वहां सामने चार मंजिला बिल्डिंग थी लेकिन उस लंबे से मकान की सीढ़ियों तक पहुंचने का रास्ता अजीब सा था- मिट्टी से भरी कच्ची पगडंडी पर ऊँची चढ़ाई। उस कच्चे रास्ते पर मैं मौसी के लाल दुपट्टे को पकड़े मौसी के पीछे पीछे चलती रही। रोना बंद होकर आक्रोश में बदल रहा था कि इतनी सुंदर गाड़ी से उतर कर ऐसी जानलेवा चढ़ाई क्या हर बार मौसी को चढ़नी पड़ेगी ?

मौसी के ससुराल में मौसा की जारी की गयीं बड़ी सख्त हिदायतें थीं कि मौसी दिन में चाहे अपने भाई के घर जाएं या बहन के, पर रात को उन्हें अपने घर लौटना ही है और इस हिदायत को मौसी ने ताजिन्दगी निभाया। मां पर पापा की ऐसी कोई पाबंदी नहीं थी।

एक लाइन में कई कमरों वाला वह तीसरा तल्ला रईसी की कहानी तो कह रहा था पर मेरा मन बुझ चुका था। यहां सारे चेहरे नये थे और किसी का मुझ पर ध्यान ही नहीं था। मौसी खुद ही घूंघट से लिथड़ी पड़ी थीं। दरवाजे पर तेल चुवाने और नये परिवार में प्रवेश करने की सारी रस्मों के बाद मौसी और उनके दूल्हे के तिल भल्ले और लस्सी में अंगूठी ढूंढने की हर रस्म में मौसी हार गयी थीं और जब वे कमरे में बंद होने चली गईं तो मैं बिल्कुल लावारिस सामान सी पीछे छूट गई। मौसी की ननद कमलेश भी दूसरे सब लोगों की तरह थकथका कर सो गई थीं। अब मेरी आंखों में नींद कहां। मैं सारी रात बिसूरती रही और मौसी के सुबह कमरे से बाहर निकलते ही सिसकियों और हिचकियों के बीच बोली कि मुझे ‘अपने’ घर जाना है। बस, उसके बाद मैं कभी मौसी के ‘सौहरे’ घर रहने नहीं गई। मौसी ने भी मुझे साथ ले जाने की जिद नहीं की।

इधर हर डेढ़-दो साल के अंतराल में एक नया बच्चा दोनों बहनों की कोख में आता रहा।

मां और मौसी में जितना जुड़ाव था, उसके लिए अच्छा यह हुआ कि उम्र में दस साल का फर्क और कद – काठी में एक दूसरे का विलोम होने के बावजूद मौसा और पापा की बहुत गहरी छनती थी। दोनों को साथ चलते देख कई लोगों ने उन्हें लॉरेल एंड हार्डी की संज्ञा दे रखी थी। फौलादी जिस्म और देखने में ऊँचे लंबे होने के बावजूद मौसा जी दिल के बड़े नरम और स्नेहिल व्यक्ति थे और उनमें सेंस ऑफ ह्यूमर लाजवाब था। पापा के साथ मौसा बेहद बेतकल्लुफी से पेश आते, गाली गलौज, हंसी ठट्ठा करते, तू तड़ाक में बात करते।

दोनों साढू भाइयों में एक समानता थी – अपनी-अपनी बीवी के प्रति दोनों एक से तानाशाह थे। पापा कुछ कम। मौसा कुछ ज्यादा। दोनों बहनों को अपना दुख-सुख रोने के लिए अकेले छोड़कर मौसा और पापा सिनेमा देखने चले जाते। पापा शुद्ध  शाकाहारी थे और मौसा मुर्ग मुसल्लम खाने के बड़े शौकीन। अपर चितपुर रोड पर एक मुस्लिम शेख का रॉयल इंडियन कैफे था, जहां की बिरयानी, चॉप, तंदूरी मुर्ग और कबाब मशहूर थे। वहां से खुद खा पीकर हम सबके लिए फिरनी के कुल्हड़ पार्सल से आते। मां तो उन्हें हाथ नहीं लगातीं, पर हम बच्चे बड़े शौक से खाते। आखिर मां ने भी घर में फिरनी को वैसे ही कुल्हड़ों में जमाना शुरु कर दिया और ऊपर चांदी का वर्क लगाकर इलायची, पिस्ते का बूरा और केसर छिड़क देतीं ताकि फिरनी मुसलमान के होटल से लाई गई फिरनी से बीस ही हो, उन्नीस नहीं। मौसा ने उस रॉयल इंडियन कैफे के मालिक का नाम रखा- पंडित इब्राहीम। धीरे-धीरे यह नाम इतना मशहूर हुआ कि लोग उस कैफे को ‘पंडित इब्राहिम का होटल’ ही कहने लग गए। खैर, मां और मौसी शुरू से ही शाकाहारी थीं और अंत तक रहीं बल्कि पापा और मौसा को भी बाद में अपनी-अपनी बीवियों के नक़्शे कदम  पर चलकर कटहल मसाला को मटन शोरबा, अरबी फ्राइ को भेटकी माछ और मोचा यानी कच्चे केले के फूलों के कोफ्तों को मटन कबाब समझ कर चटखारे ले लेकर खाना सीखना ही पड़ा।

मौसी के ससुराल में मौसा की जारी की गयीं बड़ी सख्त हिदायतें थीं कि मौसी दिन में चाहे अपने भाई के घर जाएं या बहन के, पर रात को उन्हें अपने घर लौटना ही है और इस हिदायत को मौसी ने ताजिन्दगी निभाया। मां पर पापा की ऐसी कोई पाबंदी नहीं थी। कई बार नानी के बांसतल्ला वाले घर में हम बच्चे मामा के बच्चों के साथ और मौसेरी बहनों के साथ मस्ती कर रहे होते पर मौसी को मन मार कर उठना पड़ता क्योंकि उन्हें रात कहीं भी बिताने की इजाजत नहीं थी। यों मौसा दिखने में जितने लंबे ऊंचे पहलवान थे, दिल भी उनका उतना ही बड़ा,उदार और मुहब्बती था पर पैसे का रुआब तो था ही । उनकी टक्कर का रईस आसपास कोई और था नहीं। घर में हुक्म उदूली भी उन्हीं की होती थी, फरमान भी उनका चलता था। उनके सामने मौसी की आवाज कभी खुलकर नहीं निकलती थी। बहुत सालों बाद जब मैंने कहानी डेजर्ट फोबिया उर्फ समुद्र में रेगिस्तान लिखी तो मेरे जेहन में छवि की जगह मौसी और साहब की जगह मौसा की ही तस्वीर थी। यों कहानी में और कोई समानता कहीं नहीं थी सिवाय इसके कि मौसा की दायें हाथ की तर्जनी मौसी की ओर उठने की देर और मौसी का हाथ जहां का तहां रुक जाता था। इस मौसी ने अपने कालरा खानदान में एक बेहद आज्ञाकारिणी और जिम्मेदार बहू और आंखें ‘नीवीं’ कर चलने वाली बीवी का रोल ताउम्र बखूबी निभा का रोल अदा कर बिरादरी में कालरा परिवार का नाम उंचा किया। एक आदर्श बहू के रूप में मौसी की मिसाल हमेशा दी जाती। उनसे छोटी उनकी पांच देवरानियां आईं। मैंने अगर अपना इनकार मां के सामने जाहिर न किया होता और मां पूरी तरह मेरी ढाल बनी न खड़ी होतीं तो मैं भी मौसी की पांच देवरानियों में से एक होती और कान, गर्दन और उंगलियों पर चकाचौंध पैदा करने वाले हीरे जड़वा कर रसोइए को शाकाहारी कबाब बनवाने की हिदायतें दे रही होती। पर मेरी किस्मत में तो शादी का लाल सफेद चूड़ा पहने मुंबई के आईआईटी के एच टू क्वॉर्टर के इकलौते छोटे से कमरे के झूलते हुए जाले साफ करना लिखा था जिसका मुझे कतई कोई मलाल नहीं था। लेकिन यह इनकार उस रईस खानदान के सीने में खूब कर रह गया।

हमने शादी के लिए खास घाघरे बनवाए थे, दो घंटे का सफर कर भूख से हमारी अंतड़ियां कुलबुला रही थीं लेकिन हमें शरबत का एक गिलास भी उठाने नहीं दिया गया और हम रोते बिसूरते, बिना मुंह से पानी छुआए घर लौट आए। मां लौटकर रोते-रोते खाना बनाती रहीं, पर याद नहीं किसी ने खाना खाया भी या नहीं। मां के साथ-साथ पापा भी खूब रोए। हफ्तों घर में मातम का सा माहौल रहा।

मौसा के पांच छोटे भाइयों की एक के बाद एक शादी शुरू हुई। पापा से चूंकि मौसा की रिश्तेदारी भी थी और वे सबसे अजीज दोस्त भी थे इसलिए उन्हें बहुत सी जिम्मेदारियां सौंप दी जाती थीं मसलन गुलाबी साफे रंगवा के अबरक और कलफ लगा कर तैयार करवाना, रहमत बैंड वाले और सलामती घोड़ी का बंदोबस्त करना, पंडित इब्राहिम से बारात की अगवानी में, गरमागरम कबाब और तंदूरी पेश करवाना वगैरह वगैरह …पर इसमें सबसे जरूरी था दूल्हे को घोड़ी पर बैठने के बाद उसका सेहरा गाकर पढ़ना। पापा गाते बहुत अच्छा थे और मासी की शादी में जब उन्होंने सिखिया पढ़ी थी तो सबको हिलका हिलका कर रुला दिया था । ….

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बहरहाल, हादसा यह हुआ कि मौसा के भाई नम्बर तीन की बारात निकलनी थी और पापा ने कलकत्ता के जिस सबसे खास बैंड वाले और घोड़ी का बंदोबस्त किया था, वह समय से एक घंटा बाद भी न पहुंचा और मौसा के बाऊ जी का गुस्सा सातवें आसमान को छूने लगा। यों भी अपने बड़े बेटे की अपने साढू भाई से ऐसी दांत काटी रोटी सी गहरी दोस्ती उन्हें शुरू से ही अखर रही थी। पापा शादी में पहले ही पहुंच गए थे। आखिर गुस्से में आगबबूला होते हुए बाऊजी ने आदेश दिया कि बारात पैदल ही चले। बारात अभी दो कदम ही चली थी कि घोड़ी और बैंड बाजे का लश्कर आ पहुंचा पर पापा का तब तक बैंड बज चुका था। आखिर हरीसन रोड से लिलुआ – सड़कों की दुर्दशा देखते हुए पहुंचना, वह भी शादी ब्याह के सीज़न में, सजी धजी घोड़ी और उसके साईस के लिए कोई आसान काम नहीं था। इस सारे केयास के बावजूद पापा ने सुर और लय में शिक्षा (सिखिया) पढ़ने की ज़िम्मेदारी भी निभायी ।

लेकिन मां के साथ हम सब बच्चे इतनी दूर, भवानीपुर से लिलुआ शादी में शामिल होने पहुंचे तो देखा- पापा की अच्छी खासी लानत सलामत हो चुकी थी। बड़े कालरा साहब का कहना था कि इतने ऊंचे खानदान की लड़की वे ला रहे हैं तो उनकी नाक नीची करवाने के लिए जानबूझ कर पापा ने घोड़ी और बैंड न पहुंचने देने की साजिश रची है। बात इतनी दूर तक पहुंच गई थी और पापा का मन इस कदर बुझ गया था कि हम दोनों बहनें और पांच छोटे बाल गोपाल जिसमें से छोटे जुड़वां अभी गोद में ही थे, जैसे ही पहुंचे, हमें शादी छोड़कर लौटाने के लिए पापा टैक्सी ढूंढने लगे। हमने शादी के लिए खास घाघरे बनवाए थे, दो घंटे का सफर कर भूख से हमारी अंतड़ियां कुलबुला रही थीं लेकिन हमें शरबत का एक गिलास भी उठाने नहीं दिया गया और हम रोते बिसूरते, बिना मुंह से पानी छुआए घर लौट आए। मां लौटकर रोते-रोते खाना बनाती रहीं, पर याद नहीं किसी ने खाना खाया भी या नहीं। मां के साथ-साथ पापा भी खूब रोए। हफ्तों घर में मातम का सा माहौल रहा। मां हर वक्त रोती रहतीं कि इस घटना के बाद पता नहीं उनकी जान जहान बहन के साथ उसके रईस ससुराल वाले कैसा बर्ताव कर रहे हैं ।

बस, उसके बाद दोनों बहनों के ससुराल के परिवारों में बड़ों की आपसी रंजिश ऐसी ठनी कि मौसी का घर से निकलना बंद हो गया। मौसी को हमारे घर आने की सख्त मनाही थी। जो बहनें महीने में एक दो बार तो मिल ही लेती थीं, एक दूसरे की सूरत देखने को तरस गईं। मौसी के ससुराल वालों को, मौसा को मनाने की सब कोशिशें कर करके हार गए पर नतीजा कुछ नहीं निकला। दोनों बहनें छिप-छिप कर फोन पर बात करतीं और रोती जातीं।

कुछ महीनों बाद हमारे यहां दोनों जुड़वां भाइयों के मुंडन का आयोजन था। मौसी के ससुराल जाकर पापा और दादा ने मौसी के ससुर के सामने मत्था टेक दिया कि पुरानी रंजिशे भुलाकर फिर गले मिल लें पर मौसी के ससुर टस से मस न हुए। उन्होंने कह दिया-‘ठीक है, नूं रानी ( बहूरानी ) की मर्जी होगी, भानजों के मुंडन पर आ जाएगी।’

अब मुंडन बाकायदा सारे रस्म रिवाज के साथ शुरू हुआ। पंडितों ने मंत्रोच्चार किया। अढ़ाई साल की उम्र के दोनों बच्चों के बालों पर उस्तरा फिरना शुरु हुआ। बड़े को अपने कंधों तक लटकते भूरे भूरे रेशमी बालों पर बड़ा नाज था। उसने जैसे ही नाई की कैंची लगते ही अपने खूबसूरत बालों को लकड़ी के पटरे पर गिरते देखा, चिंघाड़ना शुरु किया। छोटे ने भी बड़े के सुर में सुर मिलाया। सिर मुंडवाते समय दोनों बुक्का फाड़कर रोए। अब मां दोनों रुंड मुंड बच्चों को गोद में लिए बड़ी गर्वीली मां दिख रही थीं। पर आंखें उनकी लगातार फूलों के बंदनवार से सजे प्रवेश द्वार पर लगी रहीं। मामा मामी, नाना नानी सबके चेहरे उतर जाते जब कोई रिश्तेदार पूछता – तोषी और उसके घरवाले नजर नहीं आ रहे। बस, आती होगी – कहकर सब टकटकी बांधे दरवाजे पर देखते रहे। उधर मासी का बुरा हाल था। कहनेे को तो ससुर जी ने कह दिया – जाना हो तो चली जा, पर हमारे घर से तेरे उस जीजे के यहां और कोई नहीं जाएगा। जितनी देर मुंडन होता रहा, मौसी अपने कमरे में घुटी बैठी रोती रही और उनकी बड़ी बेटी रीता अपनी नन्हीं-नन्हीं हथेलियों से उनके आंसू पोंछती रही।

हमारे परिवार में, मेरी शादी से पहले का, वही आखिरी आयोजन था, सो पापा ने जी खोलकर खर्च किया – चांदी का वर्क लगी खालिस पिस्ते की हरी हरी बर्फियां। दही बड़ों और समोसों में भी जमकर काजू किशमिश डाले गए। मौसा की पसंद के शाकाहारी कबाब बने। पर मौसी के परिवार से किसी को न आया देख हमारे घर से भी किसी ने नमकीन या मिठाई का एक टुकड़ा मुंह में नहीं डाला।

क्रमशः

sudha arora

 

 

 

 

सुधा अरोड़ा जानी-मानी कथाकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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