ध्रुवीकरण का ज़हर घोलती ‘धर्म संसद’

विद्या भूषण रावत

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उत्तराखंड का  हरिद्वार इस समय तथाकथित ‘धर्मसंसद’ की एक बैठक के वीडियो से विवादित चर्चा मे है, जो बहुत तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जहां पर ‘वक्ताओं’ ने अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों के खिलाफ पूरी तरह से आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया है जो संवैधानिक रूप से बहुत बड़ा अपराध है। बेहद भद्दी भंगिमाओं के साथ  मुसलमानों के नरसंहार के लिए वक्ताओं ने जिस तरह वहाँ उपस्थित लोगों को ललकारते हुए उत्तेजित किया है, वह सांप्रदायिक घृणा का सबसे संगीन उदाहरण है। ऐसा नहीं है कि इन लोगों ने पहली बार ऐसी बात कही हो। वे पिछले कई वर्षों से ऐसा कर रहे हैं लेकिन मई 2014 में हमारी ‘आजादी’ के बाद से, उन्होंने अपनी ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का ‘वास्तव में’ बहुत आनंद लिया है और अपने से असहमत लोगों और अल्पसंख्यकों को डराने-धमकाने के लिए इस ‘असीमित’ स्वतन्त्रता का भरपूर  उपयोग किया है। इसके विपरीत, सरकार के ट्रैक रिकॉर्ड को देखें तो पायेंगे कि जब भी कोई व्यक्ति, बुद्धिजीवी या राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता इस तरह के आपराधिक कृत्यों के खिलाफ कुछ भी बोलता है तो उसे ‘आधिकारिक क्रोध और विरोध’  का सामना करना पड़ता है और कानून की इतनी धाराएँ उस पर थोप दी जाती हैं  कि उनसे निकलने में उसे बहुत लंबा समय खर्च करना पड़ता है। सरकार के अवैध और असंवैधानिक तरीकों का विरोध करने वाले कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों के खिलाफ देशद्रोह कानूनों, यूएपीए आदि  का इस्तेमाल  किया जा रहा  है। सच बोलने वाले लोगों के खिलाफ अधिकारियों की क्रूरता और असंवेदनशीलता वर्तमान शासन की पहचान बनी हुई है जो लोकतांत्रिक संस्थानों पर पूर्ण नियंत्रण कर उन्हें अपने हितों के लिए उपयोग कर रही है।

भारत के मुसलमानों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ जोर से चिल्लाना, उन्हें धमकी देना, कांस्पीरेसी थ्योरी निकालना और उनको जवाब देने के लिए मजबूर करना ताकि झगड़ा बढ़ सके। उनमें से अधिकांश तो भारत के संविधान का सम्मान भी नहीं करते हैं। यहाँ तक कि उसको स्वीकार भी नहीं करते हैं क्योंकि उनका आदर्श मनुस्मृति है।

सत्ताधारी पार्टी वर्तमान चुनावी प्रणाली को मैनिपुलेट कर उसे अपने ही नागरिकों के खिलाफ इस्तेमाल कर रही है ताकि यहाँ के अल्पसंख्यक और दलित वर्ग  तथाकथित बड़ी जातियों पर निर्भर रहे। बुद्धिजीवियों को जेल में सड़ने के लिए छोड़ दिया गया है, जबकि  नरसंहार की धमकी देने वाले गुंडों को पूरी आजादी है। हरिद्वार की धर्म संसद में पुलिस ने एफ़आईआर उस व्यक्ति के खिलाफ की जो अभी कुछ दिनों पहले ही हिन्दू बना। लेकिन जो इस पूरे काण्ड के ‘नायक’ हैं वे अभी भी अपना ज़हर चैनलों और प्रचार माध्यमों के जरिये उगल रहे हैं।

उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए एजेंडा सेटिंग

हरिद्वार की धर्म संसद देश में गैर-ब्राह्मणों, विशेषकर बहुजन समाज को नियंत्रित करने का विशुद्ध रूप से ब्राह्मणवादी एजेंडे के अलावा और कुछ नहीं है। इस प्रकार की संसद और कुछ नहीं बल्कि मीडिया का ध्यान आकर्षित करने का एक बड़ा प्रयास है क्योंकि वे यह अच्छी तरह जानते हैं कि ‘नकारात्मक’ प्रचार भी उनके लिए एक बड़ा प्रचार है। वे सभी जानते हैं कि इतनी गाली-गलौच, धमकियों के बावजूद उन्हें कुछ नहीं होगा अपितु ‘सेक्युलर’ दिखने वाले पत्रकार भी उन्हें अपने स्टूडियो में बुलाते हैं और उनकी बातों को  दिखाते हैं। इस प्रकार हम सभी गैर संवैधानिक जातिवादी आपराधिक लोगों को न्यायोचित ठहरा रहे हैं और उन्हें कहीं न कहीं महिमामंडित कर रहे हैं। अपराधियों की जगह टीवी स्टूडियो नहीं जेल है, लेकिन कहीं न कहीं सेक्युलर दिखाने वाला मीडिया भी उनके ट्रैप में फंस रहा है। इस प्रकार की भाषा बोलने वाले लोग जानते हैं कि उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा क्योंकि उनके पास केवल एक विशेष  गुण है और वह है भारत के मुसलमानों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ जोर से चिल्लाना, उन्हें धमकी देना, कांस्पीरेसी थ्योरी निकालना और उनको जवाब देने के लिए मजबूर करना ताकि झगड़ा बढ़ सके। उनमें से अधिकांश तो भारत के संविधान का सम्मान भी नहीं करते हैं। यहाँ तक कि उसको स्वीकार भी नहीं करते हैं क्योंकि उनका आदर्श मनुस्मृति है। इनकी जाति-बिरादरी भी देख लेंगे तो पता चल जाएगा कि नफ़रत का एजेंडा कौन लोग पाल-पास रहे हैं। उन्हें परवाह नहीं है क्योंकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि जिन लोगों को उनके खिलाफ कार्रवाई करनी है, वे वास्तव में उनके साथ हैं और उन्हें आशीर्वाद दे रहे हैं।  इसलिए मीडिया में वे चिल्ला-चिल्ला कर वे बातें कह रहे हैं जो वे हरिद्वार में कह चुके हैं। यानी मीडिया के जरिये वे अपने ज़हर को और अधिक फैला रहे हैं।

सत्तारूढ़ दल के तौर-तरीकों का यहाँ वर्णन किया जाने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि यह सर्वविदित है। उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं और सत्ताधारियों  के पास दिखाने के लिए कुछ भी नहीं है। इसलिए वे हिंदू मुस्लिम एजेंडे पर वापस जाना चाहते हैं। सच कहूं तो वे इससे कभी दूर नहीं हुए और ‘विकास’ के ‘गुजरात मॉडल’ के बारे में सभी फर्जी बातें अब भुला दी गई हैं और उत्तर प्रदेश ने केवल पिछले पांच वर्षों में विरोधियों को धमकी और राज्य सत्ता के दुरुपयोग के हिंदुत्व के विभाजनकारी मॉडल को बढ़ावा देने के लिए देखा है। अब अयोध्या, काशी को ‘ब्राह्मणमय’ बना दिया गया है और पुरोहित खुश हैं क्योंकि सत्ता के साथ विपक्षी भी उनका आशीर्वाद चाहते हैं।

बाबा लोगों की चिल्लाने धमकाने वाली ब्रिगेड भले ही हरिद्वार में इकट्ठी हुई हो, लेकिन इसका उत्तराखंड की राजनीति में बहुत कम प्रभाव पड़ा है, जहां भाजपा वास्तव में गंभीर संकट का सामना कर रही है। सच कहूं तो, मैदानी इलाकों के कुछ शहरी इलाकों को छोड़कर, राम मंदिर आंदोलन और हिंदू मुस्लिम बाइनरी उत्तराखंड में ज्यादा काम नहीं करता है और राज्य में भाजपा के खिलाफ काफी असंतोष है। हरिद्वार की यह सभा वास्तव में उत्तर प्रदेश की राजनीति को ध्यान मे रखते हुए आयोजित हुई है, जहां दलित-ओबीसी-अल्पसंख्यक अपनी राजनैतिक शक्ति दिखा रहे हैं और साथ आ रहे है।

यह भी सत्य है कि हिंदुत्व का मुस्लिम विरोधी एजेंडा हर समय लाभकारी नहीं होगा क्योंकि अब समुदाय अपनी भागीदारी और नेतृत्व मांग रहे हैं और यह प्रश्न केवल दलित-पिछड़ों का नहीं है अपितु सवर्णों जातियों में भी नेतृत्व और सत्ता के लिए तनातनी है। केवल ‘देशभक्ति’ और ‘हिंदुत्व’ की गोली इसका समाधान नहीं है। ब्राह्मणों ने  उत्तर प्रदेश में राज्य की सांप्रदायिक-धर्मनिरपेक्ष-उदारवादी सभी किस्म की राजनीति का आनंद लिया है क्योंकि हर प्रकार की व्यवस्था में उनकी भूमिका ‘महत्वपूर्ण’ रही है और विशेषकर आरएसएस और भाजपा के तंत्र में ब्राह्मण बहुत महत्वपूर्ण भूमिका में हैं। योगी आदित्यनाथ से उनके कोई वैचारिक मतभेद नहीं हैं अपितु सत्ता में भागीदारी के हैं और ऐसा नहीं है कि आदित्यनाथ ने आकर ब्राह्मणों को उनके पदों या नौकरियों से बाहर कर दिया हो। हो सकता है कि योगी आदित्यनाथ अपने जातीय हितों को या अपनी बिरादरी के कुछ लोगों को अपने इर्द-गिर्द लाये हों लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों पर अत्याचार हो रहा है। उत्तर प्रदेश में हाशिये पर तो मुसलमान और दलित ही हैं और यह बात किसी से छिपी नहीं हो सकती। दरअसल, कोई भी ब्राह्मणवादी ‘उदारवादी’ कभी यह सवाल नहीं करता कि प्रधानमंत्री कार्यालय में ब्राह्मणों की सबसे बड़ी संख्या क्यों है या हमारे मंत्रालयों, नौकरशाही, मीडिया, न्यायपालिका और शिक्षाविदों में ब्राह्मणों की अत्याधिक उपस्थिति क्यों है और दूसरी जातियों की क्यों नहीं है। इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि राम मंदिर निर्माण के लिए ‘राष्ट्रीय समिति’ में ब्राह्मण बनियों को छोड़कर किसी अन्य समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं है? ब्राह्मण पत्रकार-बुद्धिजीवी योगी आदित्यनाथ से इतने खफा क्यों हैं? क्या वे भी बीजेपी से खफा हैं? क्या वे नरेंद्र मोदी और उनकी नीतियों से भी निराश हैं? अगर पार्टी आदित्यनाथ की जगह लेती है तो क्या वे किसी अन्य नेता का समर्थन नहीं करेंगे? हिंदुत्व के साथ कई जाति समूह और महत्वाकांक्षी नेता शीर्ष पद के लिए लड़ रहे हैं इसलिए योगी आदित्यनाथ से असहमत होने वाले सभी सामाजिक न्याय या समाजवाद के चैंपियन नहीं बनते हैं। इलाहाबाद के एक प्रतिष्ठित  संस्थान में हाल ही में हुई भर्ती के उदाहरण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, जहां ‘उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मिला’ के बहाने ओबीसी समुदाय से एक भी भर्ती नहीं हुई। जिन सज्जन के ऊपर ये नियुक्तियां करने की जिम्मेवारी थी वे ‘सामाजिक न्याय’ के सबसे बड़े पुरोधा माने जाते हैं लेकिन समय आने पर उन्होंने दिखा दिया के ‘जाति’ वाकई में बेहद खतरनाक चीज है और क्यों भारत में सभी ‘वाद’ फ़ेल हो गए क्योंकि जातिवादियों ने इन वादों को भी अपने जातीय हितों के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।

बहुत पहले, विवेकानंद ने कहा था, एक मजबूत भारत के लिए, हमें दो महान सभ्यताओं के संगम की आवश्यकता है।वेदांतिक मस्तिष्क और इस्लामिक शरीर। लेकिन आज हिंदुत्व की राजनीति की गतिशीलता को समझना होगा जो ब्राह्मणवादी ‘मस्तिष्क’ और ‘बहुजन’ ‘शरीर’ के इर्द-गिर्द घूमती है। इसलिए मुस्लिम विरोधी प्रचार वास्तव में मुसलमानों के खिलाफ उतना नहीं है जितना बहुजन समाज के विरुद्ध है। अल्पसंख्यक प्रत्यक्ष लक्ष्य हैं लेकिन असल उद्देश्य तो बहुजन जनता को नियंत्रित करना है, जो सार्वजनिक जीवन और राष्ट्र  के सभी क्षेत्रों में अपना हिस्सा और प्रतिनिधित्व चाहते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सितंबर अक्टूबर 1990 में लाल कृष्ण आडवाणी द्वारा शुरू की गई सोमनाथ से अयोध्या तक राम मंदिर यात्रा अनिवार्य रूप से मंडल आयोग की रिपोर्ट के प्रभाव का मुकाबला करने के उद्देश्य से थी, जिसकी सिफारिशों को तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने संसद में स्वीकार कर लिया था। पूरे देश के सवर्ण जातियों के बच्चे और बुजुर्ग, महिला पुरुष, सभी सड़कों  पर आ गए थे और रिपोर्ट को वापस लेने की मांग करने लगे।

चंपावत जिले के दलित छात्रों ने ब्राह्मण महिला द्वारा पकाए जा रहे भोजन का बहिष्कार करने का फैसला किया है जो एक अच्छा संकेत है। दिल्ली सरकार ने भोजनमाता को नौकरी की पेशकश की है लेकिन हम सभी जानते हैं कि महिला के लिए खाना पकाने का काम करने के लिए दिल्ली आना इतना आसान नहीं है। ये 'प्रस्ताव' वास्तविकता में एक राजनैतिक नाटक से ज्यादा कुछ नहीं है।

दलितों के साथ भेदभाव पर चुप क्यों?

हमें हिंदू धर्म के इन समर्थकों से कुछ सवाल पूछने की जरूरत है। उत्तराखंड के चंपावत जिले में स्कूली बच्चों के लिए मध्याह्न भोजन बनाने वाली रसोइया भोजनमाता के बहिष्कार की एक रिपोर्ट मीडिया में आई। सवर्ण बच्चों ने उनके बनाए भोजन का बहिष्कार किया क्योंकि वे एक दलित थीं। अभी तक हमने जाति व्यवस्था और छुआछूत के खिलाफ कोई निंदा या अभियान नहीं सुना। वे इस बारे में बोलना भी पसंद नहीं करेंगे। दरअसल, जो व्यक्ति जाति व्यवस्था और छुआछूत के खिलाफ काम करता है, उससे  मनुवादी  घृणा करता है। आप इसे देवभूमि कहते हैं और फिर भी ऐसी घटनाओं की निंदा करने के लिए तैयार नहीं हैं, जहां दलितों को मंदिर में प्रवेश करने या अन्य बच्चों के साथ बैठने की अनुमति नहीं है। वे किस तरह के धार्मिक संत हैं जो वर्ण धर्म को उजागर करने वाले मुद्दों पर अपनी आंखें और मुंह बंद रखते हैं। तथ्य यह है कि दलितों के प्रति इस तरह की हिंसा और अवमानना की जड़ मनुस्मृति से प्राप्त वर्णाश्रम धर्म का हिस्सा है। हिंदुत्व के क्रांतिकारियों ने कभी भी इस तरह की गलत प्रथाओं के खिलाफ बात नहीं की है। बल्कि उन्होंने जाति व्यवस्था को बहुत ‘वैज्ञानिक’ बताया है और वास्तव में ‘जन्म आधारित’ नहीं बल्कि आपके ‘व्यक्तित्व’ और ‘गुणवत्ता’ के आधार पर उचित ठहराया है। अब उनमें से कुछ जातिप्रथा, छुआछूत को मुस्लिम राजाओं और अंग्रेजों द्वारा प्रदत्त मानते हैं। मेरा यह कहना है कि मान लिया कि ये सभी सत्य है तो हिंदुत्व के ये मठाधीश ये बताये कि उन्होंने आजादी के 75 वर्षो में इस बीमारी को ख़त्म करने के लिए क्या किया। चलो इतना ही बता दे के ‘वर्तमान’ ‘आज़ादी’ के बाद यानी मई 2014 के बाद सरकार ने क्या किया। रोहित वेमुला से लेकर पायल तड़वी और विश्विद्यालयो के आन्दोलन है, विश्वविद्यालयों में आरक्षण का प्रश्न है, सभी इस सरकार और संघ की नीतियों को दर्शाते है के वे दलितों से कितना प्यार करते हैं।

कुछ साल पहले उत्तराखंड में एक दलित व्यक्ति की शादी की पार्टी में हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गयी थी क्योंकि वह ‘गलती’  से ‘बड़े’ लोगों के बीच  बैठकर खाना खा रहा था। राज्य की राजधानी देहरादून से सटे जौनसार क्षेत्र में, दलितों को अभी भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है लेकिन  गुंडे कानून से दूर हो जाते हैं क्योंकि पूरे क्षेत्र को अनुसूचित जनजाति क्षेत्र के रूप में ‘वर्गीकृत’ किया गया है, जिसके परिणामस्वरूप अनुसूचित जाति-जनजाति के अत्याचारों की रोकथाम का कानून वहां लागू नहीं होता। आज भी, गांवों में ढोल बजाने का काम दलित ही करते हैं जिन्हें बहुत कम पैसा दिया जाता है। शादियों में ही नहीं बल्कि सभी पारंपरिक और धार्मिक कार्यों में भी उनकी उपस्थिति अनिवार्य है लेकिन साथ बैठकर खिलाना या बराबरी का समझना अभी भी दूर की बात है।  इनके बिना कोई भी काम पूरा नहीं होता है फिर भी उन्हें बहिष्कृत समझा जाता है और कम पैसा दिया जाता है। अलग उत्तराखंड के आंदोलन में वे कई महीनों तक भारी भीड़ के सामने ढोल पीटते रहे और कई बार इसका नेतृत्व करते रहे, फिर भी उन्हें ‘राज्य आन्दोलनकारी’ के रूप में ‘स्वीकृत’ नहीं किया गया ताकि निर्धारित पेंशन मिल सके।

असली निशाना उत्तर प्रदेश में दलित बहुजनों की मुखर आवाजें हैं 

यहाँ  मैं  एक बात स्पष्ट करना चाहता हूँ। बाबा लोगों की चिल्लाने-धमकाने वाली ब्रिगेड भले ही हरिद्वार में इकट्ठी हुई हो, लेकिन इसका उत्तराखंड  की राजनीति में बहुत कम प्रभाव पड़ा है, जहां भाजपा वास्तव में गंभीर संकट का सामना कर रही है। सच कहूं तो, मैदानी इलाकों के कुछ शहरों को छोड़कर, राम मंदिर आंदोलन और हिंदू-मुस्लिम बाइनरी उत्तराखंड में ज्यादा काम नहीं करता है और राज्य में भाजपा के खिलाफ काफी असंतोष है। हरिद्वार की यह सभा वास्तव में उत्तर प्रदेश की राजनीति को ध्यान मे रखते हुए आयोजित हुई है, जहां दलित-ओबीसी-अल्पसंख्यक अपनी राजनैतिक शक्ति दिखा रहे  हैं और साथ आ रहे है। उनका साथ आना ही हिंदुत्व की शक्तियों की पराजय निर्धारित कर देगा इसलिए उनकी एकता को तोड़ने के षड्यंत्र होंगे। उत्तर प्रदेश और बिहार में बहुजन पहचान के प्रति सच्ची समर्पित सरकार अंततः ‘भारतीय संस्कृति’ के नाम पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ युद्ध के नारों के माध्यम से अपनी जाति के आधिपत्य को बनाए रखने की कोशिश करने वालों के लिए ‘आपदा’ साबित हो सकती है इसलिए ये पूरे कार्यक्रम उसी उद्देश्य से हो रहे हैं ताकि हिन्दू-मुस्लिम का खेला कर चुनाव लड़ा जा सके और फिर ‘देश’ की ‘संस्कृति’ के नाम पर वोट ले सकें जैसे संस्कृति की ठेकेदारी एक बिरादरी की है और बाकी लोगों ने कुछ किया ही नहीं हो?

भारत में राजनीतिक लोकतंत्र की जड़ें अभी भी मजबूत हैं, भले ही हम यह भी कह सकते है कि हम एक अत्यधिक अलोकतांत्रिक समाज के हिस्से हों। बाबा साहेब अम्बेडकर ने सुझाव दिया कि सामाजिक लोकतंत्र के बिना हमारा राजनीतिक लोकतंत्र संकट में पड़ जाएगा। पिछले कुछ वर्षो में बहुजन समाज ने सांस्कृतिक राजनैतिक जगहों पर अपनी ताकत दिखाई है और सत्ता प्राप्त की है। हिंदुत्व के माध्यम से सवर्ण सत्ता उनके पास वापस आ गई लेकिन अब शीर्ष पदों पर पहुँचने के लिए उनके बीच भी संकट होना तय है। ब्राहमणों का योगी आदित्यनाथ का विरोध वैचारिक नहीं बल्कि सवर्ण राजनीति में सत्ता संघर्ष है। गुजरात मॉडल के माध्यम से भारतीय राजनीति पर बनियों के बढ़ते प्रभाव के कारण आज  ब्राह्मण राजनीति के सत्ता शीर्ष पर नहीं है और कई राज्यों में भाजपा ने जातीय समीकरणों के चलते अन्य जातियों को नेतृत्व सौंपा है जिसके चलते ब्राह्मण नाराज हैं। उनकी मूल पार्टी कांग्रेस अभी बहुत अच्छी स्थिति में नहीं है इसलिए वे सपा-बसपा की राजनीति के सहारे अपनी ताकत दिखाना चाहते  हैं कि हमारे बिना उत्तर प्रदेश की राजनीति में कोई चल नहीं सकता। इस नैरेटिव को मीडिया के जरिये तैयार किया जा रहा है और सपा-बसपा नेतृत्व भी यह मान रहा है। हकीकत यह है के सवर्ण अभिजात वर्ग का बहुमत अभी भी भाजपा के साथ है, बावजूद इसके कि पार्टी शासन स्तर पर काम करने में विफल रही है। बात यह है कि लोग यह अच्छी तरह जानते हैं कि कैसे सरकार ने आरक्षण को कम किया है, कैसे हमारे विश्वविद्यालय एससी-एसटी-ओबीसी को प्रतिनिधित्व से वंचित कर रहे हैं। मीडिया आज भी उसी वर्ग और जातियों का दबदबा है और वे सभी इन प्रश्नों पर बात भी नहीं करना चाहते।

भारत में राजनीतिक लोकतंत्र की जड़ें अभी भी मजबूत हैं, भले ही हम यह भी कह सकते है कि हम एक अत्यधिक अलोकतांत्रिक समाज के हिस्से हों। बाबा साहेब अम्बेडकर ने सुझाव दिया कि सामाजिक लोकतंत्र के बिना हमारा राजनीतिक लोकतंत्र संकट में पड़ जाएगा।

प्रधानमंत्री और यूपी के मुख्यमंत्री ने जो अभियान शुरू किया है, उसे देखिए। लाखों रुपये खर्च कर अयोध्या और काशी को ‘चमकाया ‘ गया है। अब उनका फोकस मथुरा पर भी है। वे यह अच्छी तरह जानते हैं कि  प्रदेश और किसी भी अन्य राज्य में आम आदमी, शासन, नौकरी, रोजगार और सुरक्षा के बारे में सवाल पूछेगा लेकिन यहां हमें हर समय ‘धर्म’ का पूरा डोज दिया जा रहा है। भारत के इतिहास में कभी भी किसी सरकार ने इस प्रकार सांप्रदायिक  धार्मिक एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए संसाधनों का इस्तेमाल नहीं किया।

तो, हरिद्वार में जो हुआ उससे हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि इन ‘उदारवादियों’ ने भी हिंदू मुस्लिम नूरा कुश्ती का आनंद लिया। ब्राह्मणवाद की गतिशीलता को समझने के लिए जोतिबा फुले, बाबा साहेब अम्बेडकर और  ईवीआर  पेरियार के जीवनकाल और  भारतीय समाज व्यवस्था के विषय में उनके विश्लेषण के माध्यम से समझने की जरूरत है। शुक्र है कि दुनिया भर में अम्बेडकरवादी  युवा आंदोलन के विकास के साथ-साथ इन मुद्दों को उठा रहे हैं और अपनी मीडिया विकसित कर रहे हैं, अपने स्वयं के विश्लेषण ला रहे हैं। अम्बेडकरवाद, पेरियारवाद, भगत सिंहवाद, मानववाद का यह परिवार जितना बड़ा होगा, सभी प्रकार के धार्मिक सांप्रदायिक लोगों की चिंताएं उतनी ही बड़ी होंगी। उत्तर प्रदेश ने अम्बेडकरवादी आंदोलन का विकास देखा है और यह आने वाले चुनावों के लिए हर जगह सामाजिक न्याय, राजनीतिक भागीदारी और आनुपातिक प्रतिनिधित्व के एजेंडे को स्थापित करने में सफल होगा। इसलिए समझ लेना कि उत्तर प्रदेश और बिहार में दलित बहुजन नेता जितने मजबूत होंगे, वर्तमान सत्ताधारी पार्टी के आशीर्वाद से अल्पसंख्यकों के खिलाफ आवाजें और जुमले भी बढ़ते चले जायेंगे। इसलिए सभी को समझदारी दिखा कर अपनी एकता बनाये रखना है।

अम्बेडकरवाद ब्राह्मणवादी आधिपत्य को चुनौती देगा

इस बीच एक आशा देने वाली खबर आई। चंपावत जिले के दलित छात्रों ने ब्राह्मण महिला द्वारा पकाए जा रहे भोजन का बहिष्कार करने का फैसला किया है जो एक अच्छा संकेत है। दिल्ली सरकार ने भोजनमाता को नौकरी की पेशकश की है लेकिन  हम सभी जानते हैं कि महिला के लिए खाना पकाने का काम करने के लिए दिल्ली आना इतना आसान नहीं है। यह ‘प्रस्ताव’  वास्तविकता में एक राजनीतिक नौटंकी से ज्यादा कुछ नहीं है। केजरीवाल ने पहले रोहित वेमुला के भाई को भी नौकरी की पेशकश की लेकिन उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया। किसी व्यक्ति के अपने शहर से बाहर जाने से पहले कई अन्य मुद्दे हैं। वहां के मुद्दे को संबोधित करने के बजाय, राजनेता वास्तव में  नाटक और नौटंकी अधिक कर रहे हैं। सवाल यह है कि इस मुद्दे पर उत्तराखंड में आम आदमी पार्टी का क्या रुख है और क्या यह सिर्फ नौकरी या जातिगत भेदभाव अथवा दोनों का मुद्दा है। मैं उत्तराखंड के इन दलित छात्रों को इस साहसिक कदम के लिए बधाई देना चाहता हूं जो दर्शाता है कि वे संस्कृति और परंपराओं के नाम पर और अपमान स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। भारत को बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा बनाए गए हमारे संविधान के सिद्धांतों पर चलना है क्योंकि वे ही हमारी एकता और विकास की गारंटी हैं। बाबा साहेब की पुस्तक जातियों के उन्मूलन कैसे हो को प्राथमिक स्तर से स्नातक स्तर तक पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए ताकि हमारे बच्चों और प्रशासकों को इस विषय में जानकारी हो और सभी दिल से इस भेदभाव को ख़त्म करने की बात करें। क्या हमारा स्कूल छात्रों में यह भावना पैदा कर सकता है कि जाति व्यवस्था खराब है, असमानता असंवैधानिक है, अस्पृश्यता हमारे संविधान के अनुसार एक अपराध है? क्या हमारे शिक्षक  कक्षा में समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के मूल्यों को गंभीरता से पढ़ाना शुरू कर देंगे? हम सभी जानते हैं कि यह उस प्रणाली के लिए कठिन होगा जो दोगलेपन पर पनपती है और इसलिए अम्बेडकरवादियों, मानववादियों और समानता और संवैधानिकता में विश्वास करने वाले सभी लोगों के लिए अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव के खिलाफ एक बड़ा अभियान शुरू करना चाहिए। 21वीं सदी के भारत को केवल धर्मनिरपेक्षता, समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मैत्री के संवैधानिक मूल्यों पर ही मजबूत किया जा सकता है, न कि ऐसे मूल्यों से जो जातिव्यवस्था को सही ठहराते हो और अन्यायपूर्ण अतीत का महिमामंडन करते हैं। आज हमारे संवैधानिक मूल्य और उनका ईमानदारी से पालन करना ही हमारे राष्ट्र की शक्ति और एकता को मज़बूत कर सकते हैं। हरिद्वार से निकले देश विरोधी स्वरों पर तुरंत संवैधानिक कार्यवाही कर ही सरकार सभी समुदायों में विश्वास और सौहार्द्र की भावना मज़बूत कर सकती है।

विद्याभूषण रावत प्रखर सामाजिक चिंतक और कार्यकर्ता हैं। उन्होंने भारत के सबसे वंचित और बहिष्कृत सामाजिक समूहों के मानवीय और संवैधानिक अधिकारों पर अनवरत काम किया है।

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