दलित जज और ब्राह्मण जज का फर्क डायरी (22 सितम्बर 2021)

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आज की सुबह मेरे लिए बहुत खास है। शरीर के उपरी हिस्से में उठनेवाली पीड़ा का अंत हो गया है। आज पीड़ा नहीं हुई। जगा तो सामने आसमान में सूरज भी मानो हंस रहा था। वैसे उगते हुए सूरज को बहुत दिनों बाद देखा आज। पटना में यह नजारा बहुत सामान्य है। लेकिन दिल्ली में सूरज को देखना मुश्किल हो जाता है। लेकिन इसके भी अपने फायदे हैं। इन फायदों की बात फिर कभी। आज तो बंबई हाई कोर्ट के एक निर्णय से मन प्रसन्न है। हाईकोर्ट का फैसला पाखंडवाद को खारिज करता है।

दरअसल, बंबई हाई कोर्ट के न्यायाधीश एस. के. शिंदे की एकल पीठ ने कल अपने एक फैसले में शादी का झांसा देकर यौन संबंध बनाने को बलात्कार माना और आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाने का निर्देश दिया। यह पूरा मामला अभिषेक मित्रा नामक एक व्यक्ति और उसकी प्रेमिका रही एक युवती से जुड़ा है। दोनों 2012 से ही एक-दूसरे को जानते थे और एक ही होटल में काम करते थे। दोनों के बीच सहमति बनी और लिव-इन रिलेशनशिप में रहने लगे। युवती ने मुंबई के बोरीवली थाने में शादी का झांसा देकर बलात्कार करने का मुकदमा दर्ज कराया था।

अपने बचाव में आरोपी अभिषेक मित्रा ने जो तर्क दिया, वह हैरान करनेवाला है। उसकी ओर से उसके वकील ने पीठ से कहा कि उसका मुवक्किल बलात्कारी नहीं है। दोनों के बीच शारीरिक संबंध आपसी सहमति से बने। साथ ही उसने यह भी कहा कि उसका मुवक्किल युवती से शादी करना चाहता था, परंतु ज्योतिषीय असंगतियां सामने आ गईं, जिसके कारण शादी करना संभव नहीं था। इसलिए उसके मुवक्किल के खिलाफ मुकदमे को खारिज किया जाय।

पाखंड को खारिज किए जाने के मामले भी सामने आते रहेंगे। लेकिन मेरी जेहन में न्यायाधीश एस.के. शिंदे हैं। मुंबई में रहनेवाले एक पत्रकार साथी से पूछा तो उन्होंने कन्फर्म किया कि एस. के. शिंदे दलित हैं। अब मैं यह सोच रहा हूं कि यदि उपरोक्त मामला जस्टिस एस. के. शिंदे के बजाय किसी द्विज जज के पास गया होता तो क्या होता?

न्यायाधीश एस के शिंदे की एकल पीठ ने अपने फैसले अभिषेक मित्रा के दोनों तर्कों को खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि ज्योतिषीय असंगतियां शादी से मुकरने का कारण नहीं माना जा सकता है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने और इसके लिए आरोपी ने शादी करने का आश्वासन दिया था। बाद में वह इससे मुकर गया जो कि एक तरह से दोनों के बीच हुई सहमति का उल्लंघन है और इस स्थिति में इसे बलात्कार ही माना जाएगा।

दरअसल, बंबई हाईकोर्ट के संज्ञान में आया यह मामला एक नजीर मात्र है। ऐसी घटनाएं आए दिन प्रकाश में आती रहती हैं। मैं तो बिहार के एक बड़े नेता को जानता हूं जिन्होंने आजतक एक महिला को अपना सेक्स गुलाम बनाकर रखा है। अब वह महिला बगावत करना चाहती है। लेकिन उसकी समस्या यह है कि उसकी बात कोई सुनेगा ही नहीं और दूसरा उसे अपनी जान की भी परवाह है। उसे डर है कि उसने यदि अपना मुंह खोला तो उसकी हत्या करवाई जा सकती है।

खैर, समाज में ऐसी घटनाएं होती रहेंगीं और पाखंड को खारिज किए जाने के मामले भी सामने आते रहेंगे। लेकिन मेरी जेहन में न्यायाधीश एस.के. शिंदे हैं। मुंबई में रहनेवाले एक पत्रकार साथी से पूछा तो उन्होंने कन्फर्म किया कि एस. के. शिंदे दलित हैं। अब मैं यह सोच रहा हूं कि यदि उपरोक्त मामला जस्टिस एस. के. शिंदे के बजाय किसी द्विज जज के पास गया होता तो क्या होता?

निचली अदालत के एक द्विज जज अविनाश कुमार ने अजीबोगरीब फैसला दिया। उन्होंने छेड़खानी के आरोपी को यह कहते हुए जमानत दी कि आरोपी ललन कुमार रजक अगले छह माह तक अपने गांव की सभी महिलाओं के कपड़े साफ करेगा और उन्हें इस्त्री कर वापस करेगा। इसके लिए वह किसी से मजदूरी नहीं लेगा।

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मुझे लगता है कि द्विज जज के पास भी पाखंड कि ज्योतिषीय असंगतियों के कारण शादी नहीं कर सका, को खारिज करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। या यह संभव है कि वह इसे एक आधार मानता और फैसला शायद दूसरा होता। लेकिन इस मामले में मैं केवल अनुमान लगा सकता हूं और मेरे अनुमान के पीछे ऐसी अनेक घटनाएं हैं।

एक घटना तो कल की ही है। बिहार के मधुबनी जिले के झंझारपुर की एक निचली अदालत के एक द्विज जज अविनाश कुमार ने अजीबोगरीब फैसला दिया। उन्होंने छेड़खानी के आरोपी को यह कहते हुए जमानत दी कि आरोपी ललन कुमार रजक अगले छह माह तक अपने गांव की सभी महिलाओं के कपड़े साफ करेगा और उन्हें इस्त्री कर वापस करेगा। इसके लिए वह किसी से मजदूरी नहीं लेगा। मामला 17 अप्रैल, 2021 का है। ललन कुमार रजक के खिलाफ झंझारपुर के लौकहा थाने में मामला दर्ज कराया गया कि उसने गांव की एक महिला के साथ छेड़खानी की और बलात्कार करने का प्रयास किया। इस आरोप में पुलिस इतनी तेजतर्रार निकली कि उसने ललन कुमार रजक को दूसरे ही दिन गिरफ्तार कर लिया और वह तभी से जेल में था।

सरई फूल का जिक्र है जो कि झारखंड के आदिवासियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यही फूल उनके जीवन के हर उत्सव में शामिल रहते हैं। जाहिर तौर पर इश्क के मामले में भी।

है न दिलचस्प बात? ललन कुमार रजक यदि दलित नहीं होता, कोई ब्राह्मण होता तो क्या एडीजे अविनाश कुमार का फैसला क्या होता?

खैर, अपना मूड आज दिन भर ठीक रखना है। कल ही एक रोमांटिक कविता जेहन में शायद इस वजह से आई कि प्रेम का कोई विकल्प नहीं है। कविता में सरई फूल का जिक्र है जो कि झारखंड के आदिवासियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यही फूल उनके जीवन के हर उत्सव में शामिल रहते हैं। जाहिर तौर पर इश्क के मामले में भी।

सरई के फूल तुम्हारे लिए मेरी जान

तुम्हारा आना

जैसे धान के पौधों में बालियों का आना

या फिर

सरई के फूलों का खिलना।

देखो, सरई के फूल 

तुम्हारे बालों में चांद के जैसे लगते हैं

और तुम्हारी हंसी

बारिश की शुरूआत हो।

मैं इस शहर के बारे में सोच रहा हूं 

जहां मैं कमाता हूं

तुम्हारे लिए भरपेट रोटियां

खरीद सकता हूं

लाल पाट की साड़ी

लाल टहक्का बिंदी।

क्या सरई का पेड़ 

मैं यहां लगा सकूंगा 

ठीक वैसे ही जैसे

तुम्हारे प्रथम चुम्बन की खुशी में

घर के आगे लगाया था?

 

 नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं

2 Comments
  1. दीपक शर्मा says

    अदालत के अनेख फैसले ज्योतिष के आधार पर हो चुके हैं, यहाँ दलित जज न रहा होता तो फैसलि का आधार ज्योतिषी ही बन जाता।
    सरई का फूल खूबसूरत कविता

  2. Gulabchand Yadav says

    बहुत बढ़िया विश्लेषण और साथ में एक छोटी किंतु बढ़िया कविता बतौर बोनस। बधाई।

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