किसान आंदोलन देश की टूटती हुई उम्मीदों को बचाने का आंदोलन है

उत्तर प्रदेश के सुप्रसिद्ध किसान नेता रामजनम से पूजा की बातचीत

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उत्तर प्रदेश के किसानों के बीच कई दशकों तक काम करने के अनुभवों ने रामजनम की राजनीतिक समझ को अलग ढंग से विकसित किया है। बनारस सहित पूर्वाञ्चल के हर छोटे-बड़े आंदोलनों और अभियानों में उनकी हिस्सेदारी रही है। विगत नौ महीनों से वे किसान आंदोलन में अनवरत सक्रिय रामजनम ने इसको मजबूत बनाने की दिशा में कई काम किया है और वे मानते हैं कि सरकार की हठधर्मिता के बावजूद किसानों की दृढ़ता ने उन्हें दुनिया के सबसे प्रेरक किसान आंदोलन को चलाने की गरिमा दी है। किसान आंदोलन और जाति जनगणना के मुद्दे पर उनसे गाँवकेलोगडॉटकॉम की विशेष संवाददाता पूजा की बातचीत का अंतिम हिस्सा प्रकाशित किया जा रहा है:

अंतिम हिस्सा

आपके अनुसार यह कानून लागू नहीं होता है तो कॉर्पोरेट हमारी खेती पर कब्जा नहीं कर सकेंगे। इसके बाद भी जो आज़ादी के समय से लेकर अब तक खेती समस्या है वह जस की तस बनी हुई है, जैसेकि बिचौलियों की समस्या तो इसका समाधान क्या होना चाहिए आपके हिसाब से?

जितना हम समझ पाते हैं उसके हिसाब से हम एक उदाहरण दे रहें हैं। ये जो पांच-सात साल में सत्ता आयी है वह बीमार आदमी की बीमारी ठीक करने के नाम पर उसको आईसीयू में पहुंचा रही है और कह रही है कि बीमारी ठीक कर रही है। जबकि आदमी पहुंच गया आईसीयू में। 2016 में बरेली में प्रधानमंत्री ने कहा था कि हम किसानों की आमदनी 2022 तक दोगुनी कर देंगे। 2022 आनेवाला है। अब क्या करेंगे? जब तक ये कानून नहीं लागू करेंगे तब तक यह नैरेटिव चला रहे हैं कि जो कानून हम लाए हैं वह आमदनी बढ़ाने का कानून है। वही बात हुई, बीमार आदमी की बीमारी दूर करने के बजाए उसे ही खत्म कर देना है सीधी सी बात। जितना मैं समझता हूं, मैं किसान कार्यकर्ता किसान नेता होने के साथ- साथ खेती भी करता हूं। खेती के दर्द को महसूस करता हूं। सभी सरकारों में और इस सरकार में एक अंतर है, कि सारी सरकारें हमारे दर्द को मानती थीं, इलाज करें या ना करें लेकिन य सरकार तो बीमार मानती ही नहीं। आईसीयू में भेज करके कहती है कि ठीक हो रहे हैं। य इतनी ढीठ सरकार है। य तो किसी भी हद तक जा सकती है।

इस कानून को लाने की बात बीस साल से हो रही थी, लेकिन किसी सरकार की इतनी हिम्मत नहीं हुई कि इस तरह का कड़ा कानून पास करे। ऐसा नहीं है कि किसान किसानी कर रहा है तो कोई चीज नहीं समझता है। लोगों को लगता है कि किसान गांव का अज्ञानी आदमी है। लेकिन ऐसा नहीं है व बहुत ज्ञानी है, उसके श्रम की कीमत नहीं मिलती तो उसके ज्ञान की बात कौन करेगा? ज्ञान की बात तो जोड़ी ही नहीं जाती है, बस श्रम की बात की जाती है। जब कि किसान अपने ज्ञान के बल पर खेती करता है। किसान के श्रम की चर्चा एमएसपी में होती है लेकिन ज्ञान की चर्चा नहीं। तो फिर उसको अज्ञाऩी मानकर किसी तरह से कुछ भी थोपने की बात हो रही है। देखिए, थोड़ा सचेत थे हरियाणा-पंजाब के किसान। उस मिट्टी के किसान सचेत हैं, क्योंकि उस मिट्टी में आज़ादी के आंदोलन के दौरान सबसे ज्यादा लोग शहीद हुए थेभगत सिंह की धरती है। वहां के लोग सचेत थे। पहले समझ गए हैं। पहले साहस कर दिए हैं। एक किसान होने के नाते उनको मैं सलाम करना चाहता हूं। उन्होंने साहस किया अपनी जान, अपना सब कुछ कुर्बान करके इतना लाठीचार्ज, आंसूगैस, इतना गोला छोड़ने के बाद भी वे सभी दिल्ली पहुंचे। बार्डर को नौ महीने तक घेर कर बैठे रहे। दुनिया में इस तरह का आंदोलन कभी नहीं देखा गया।

इतने लंबे समय तक राजधानी को घेरकर बैठने वाला कोई आंदोलन दुनिया में नहीं हुआ। हमारे जैसे लोग जो नई दुनिया, नई व्यवस्था या परिवर्तन का सपना देखते हैं, उनके लिए तो यह आंदोलन एक नई दुनिया का सपना दिखा रहा है। देखिए हम इसको इस तरह से देखते हैं, हम तो गए हैं बार्डर।

 

इतने लंबे समय तक राजधानी को घेरकर बैठने वाला कोई आंदोलन दुनिया में नहीं हुआ। हमारे जैसे लोग जो नई दुनिया, नई व्यवस्था या परिवर्तन का सपना देखते हैं, उनके लिए तो य आंदोलन एक नई दुनिया का सपना दिखा रहा है। देखिए हम इसको इस तरह से देखते हैं, हम तो गए हैं बार्डर। एक गजब का भाईचारा है, गजब का न्याय और त्याग का भाव है। जिसके पास दो करोड़ की संपत्ति है पूरा का पूरा पैसा आन्दोलन में लगा दे रहा है। ऐसे-से सरदार भी हमको देखने को मिले जो पूरा दो करोड़, जो होटेल से कमाया था, पूरा का पूरा उसमें लगा दिया। थोड़ा सिक्खों का जो भाव है व भी उमें दिखता है। गुरुनानक साहब का त्याग और बलिदान सब कुछ उसमें दिखता है। आप उसको गहराई से देखेँ तो सबकुछ दिखता है ।

आपके हिसाब से 20 सालों से इस बिल को लाने का प्रयास किया जा रहा था तो इससे स्पष्ट है कि पक्ष और विपक्ष दोनों की धुरी इसके इर्द- गिर्द ही थीअगर इस बिल को साड कर दें तो उसके बाद भी किसानों साथ समस्याएँ जस की तस बनी हुई हैं। जैसे आपसे व्यापारी की खरीदता है 1200 में और दूसरे राज्य में बेंचता है 3000 में तो इस अंतर को खत्म करने के लिए आपकी क्या पहल होगी?    

देखिए जो ये तीन कृषि कानून हैं और जो एमएसपी का सवाल है व तात्कालिक सवाल है। और य जो पूरा ग्रामीण भारत है आप इसे बहुसंख्यंक समाज भी कह सकते हैं। सच में इनके साथ कभी न्याय नहीं हुआ किसी सरकार ने न्याय नहीं किया। तो सारे लोग जो बनी बना व्यवस्था, सत्ता, शासन चलाने का जो ढाँचा है उसी पर वे चलते रहे हैं। चूंकि वोट चाहिए उनको पिछड़ों, किसानों, दलितों का चाहिए ही, तो सबकी बात भी कर लेते हैं आज़ादी के बाद से यदि इनको विकास की मुख्यधारा में लाने की बात होती तो खेती की हालत इतनी नहीं बिगड़ती। अब जैसे क्या है कि सरकार पूरी तरह से कॉर्पोरेट के पक्ष में बात कर रही है। कॉर्पोरेट जैसा चाहती है वह वैसा काम करते हैं। क्योंकि अभी तो बिल लाए हैं 2020 में, लेकिन इनके जो बड़े-बड़े गोदाम हैं अडानी और अंबानी के, ये पहले से ही बनना शुरू हो गए थे। अन्य सरकार और इस सरकार में यही फर्क है, कि यह बहुत ढीठ सरकार है। इनको तो हिंदू-मुस्लिभारत और पाकिस्तान में चुनाव में जाना है। किसान, नौजवान, पिछड़ा, दलित, गांव-शहर पर इनको कहीं से भी चुनाव में नहीं जाना है, इस सरकार का एजेंडा है। किसी भी सरकार के एजेंडे में गरीब नहीं रहा, भले गरीबी हटाओ, गरीबों का कल्याण करो, ये सब नारे सबलोग लगाते हैं। गरीबों की मुक्ति के लिए रास्ता बनाओ, सब करते हैं, लेकिन सच में इनकी सत्ता उसपर काम नहीं करती। ये सरकार तो इतनी ढीठ है, सबकुछ करने पर आमादा है। देखिए पीछे सीएए एनआरसी का जो मुद्दा आया, सारी सत्ताएं संविधान के हिसाब से काम नहीं करती हैं, लेकिन किसी सत्ता की हिम्मत नहीं होती थी कि बाबा साहेब के संविधान के साथ छेड़छाड़ करे। यह सरकार जो एनआरसी सीएए का कानून लाहै, संविधान के मूल पर हमला है। संविधान किसी को इजाजत नहीं देता कि आप किसी को हिंदू-मुस्लिम के नज़रिए से देखें। किसी को सिक्खईसाई के नजरिए से देखेँ। सरकार तो देखने को कौन कहे, संविधान में भी परिवर्तन कर दिया। य तो संविधान पर चोट कर रही है। आज यहां कर रही है तो कल वहां पर भी कर सकती है। पिछड़ों के लिए न्याय की चीजें संविधान में हैं, उस पर भी हमला कर सकती है तो य सरकार ज्यादा खतरनाक लोकतंत्रविरोधी है, और य ज्यादा दुख की बात है।

यह जो किसान आन्दोलन है, इसकी दो मांगे हैं कृषि कानून वापस लो और एसएसपी से छेड़छाड़ मत करो। किसान आन्दोलन सच में आज उससे भी आगे बढ़ चुका है किसान आन्दोलन अब लोकतंत्र बचाने की बात भी करता है। य संविधान बचाने की भी बात करता है। हम इससे तो आशा रखते हैं, अभी तो बहुत कुछ करना बाकी है, लेकिन एक उम्मीद जगाया है किसान आन्दोलन ने, क्योंकि लोगों की उम्मीद टूट चुकी थी। लोगों के मन में था कि देश कैसे बचेगा? कहां से बचेगा? तो उसका एक सूत्र आन्दोलन ने दिया है। अब इस सूत्र के सहारे आगे बढ़ेंगे और यह आंदोलन देश बचाने तक का आन्दोलन होगा मेरा अपना मानना यही है।

देखिए, सच बात यह है कि ये पूरी व्यवस्था राजनीति से चलती है। यहां तक कि हमारे व्यक्तिगत जीवन पर भी राजनीति का ही नियत्रंण है। राजनीति पर चोट सरकार कर रही है और विपक्ष को टारगेट कर रही है। किसान आन्दोलन की स्पष्ट बात यह है कि विपक्ष ने भी कुछ नहीं किया है। तो इस आन्दोलन पर राजनीति जितना चोट करेगी उससे रास्ता बनता हुआ चला जाएगा।

 

देखिए, सच बात यह है कि ये पूरी व्यवस्था राजनीति से चलती है। यहां तक कि हमारे व्यक्तिगत जीवन पर भी राजनीति का ही नियत्रंण है। राजनीति पर चोट सरकार कर रही है और विपक्ष को टारगेट कर रही है। किसान आन्दोलन की स्पष्ट बात यह है कि विपक्ष ने भी कुछ नहीं किया है। तो इस आन्दोलन पर राजनीति जितना चोट करेगी उससे रास्ता बनता हुआ चला जाएगा।

आपके हिसाब से वर्तमान की सरकार सही नहीं है2022 में पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं, तो आने वाले समय में कौन पार्टी है जो आपके हक में काम कर सकती है?

2022 में चुनाव, अभी तो हमारी बात ठीक से कोई सुनने वाला नहीं है, लेकिन अभी तो हमारी गर्दन फंसी हुई है। अभी ये आएंगे तो इस देश में किसान की जो ताकत है उसके डर से ह ये मारा फांस छोड़ देंगे।

आपके हिसाब से ऐसा कौन है विपक्ष में जो कि आपके पक्ष में कार्य करेगा, जिसको आप चुनक लाने वाले हैं? 2022 में, पक्ष की तो बात ही छोड़ दीजिए क्योंकि वे तो इसके लायक ही नहीं रहे 

अभी तो हम केवल इनको हटाने की बात करते हैं। इनको हटाने से हमारे गले की फांस कट जाएगी। अभी जितने तरह के लोग सत्ता में हैं और जितने डंडे-झंडे की राजनीति है शायद ही किसी राजनीति में मेरे जैसे कार्यकर्ता हों। हो सकता है किसान आन्दोलन के और नेताओं को किसी से कोई उम्मीद भी हो मैं नहीं कह सकता। लेकिन मेरे जैसे कार्यकर्ता, मैं जितने तरह की राजनीति मैं देख रहा हूं। जो मेन स्ट्रीम की राजनीति है, मैं आंदोलन करता हूं, मुझप गुंडा एक्ट लगता है। 1213 मुकदमें लादे जाते हैं। अखिलेश की सरकार आए या कांग्रेस गठबंधन की सरकार या  मायावाती की सरकार आए तो ये सब ना करें, बस यही उम्मीद है।

अभी वर्तमान में एक और मुद्दा चल रहा है जो लोगों के अनुसार 2022 के चुनाव का बड़ा मुद्दा हो सकता है वो है जातिगत जनगणना। इस पर लगातार कई संगठन और कई लोग सभाओं के माध्यम से काम कर रहे हैं, आपकी क्या राय है इस पर?

मेरी व्यक्तिगत राय है कि इस देश में जो बहुसंख्यक समाज हैं वे कृषि में लगे हुए लोग हैं। बहुसंख्यक समाज को सामाजिक रूप से देखें तो इस देश का पिछड़ा समाज दलित समाज बहुसंख्यक है। व बहुसंख्यक समाज है और हमेशा सत्ताएं इस बहुसंख्यक समाज की उपेक्षा करती रहती हैं। इनके अधिकारों पर चोट करती हैं और इनके अधिकारों पर खत्म कर रही हैं। इन पर अत्याचार और दुराचार भी बढ़ा है तो हम तो उसी नजरिए से देखते हैं। 1881 में जनगणना शुरू हुई और जातिगत जनगणना जो आखिरी हुई है व 1931 में हुई है। उसके बाद भारत में संविधान बना संविधान में कुछ चीजें तय की गईं। कुछ लोगों के लिए अवसर की बात, कुछ अधिकारों की बातें की गईं लेकिन उसकी गणना कभी नहीं हुई। इस देश में आरक्षण भी लागू हुआ लेकिन उसकी गणना ठीक से नहीं हुई। दलितों की गणना की गई लेकिन एक जो बहुसंख्यक समाज है, पिछड़ा समाज, उसका आरक्षण भी 1990-92 में लागू हो गया। लेकिन उकी गणना नहीं हुईअब ये कैसे चलाते हैं, भगवान जाने। एक पिछड़ा वर्ग आयोग भी है, कैसे प्लानिंग करता है, कैसे इसके वित्त एलाट करता है, कैसे इनके लिए योजनाएं लागू करता है? किस संख्या के आधार पर ये तो गजब का चीज है। हर हालत में जातिगत जनगणना होनी चाहिए। और क्यों नहीं होती है? हमको तो य लगता है कि इस देश में जो एक सत्ता है, जिसको हम आप अपने वोट से चुनते हैं एक ऐसी सत्ता है भारत में जो सामाजिक सत्ता है जो लंबे समय से इस देश में चली आ रही है, सारी संपत्ति संसाधन जिनके मुट्ठी में है। उको डर लगता है कि दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। य भेद खुल जाएगा कि संपत्तियां, संसाधन, नौकरियां किनके पास हैं। हाईकोर्ट, सुप्रीमकोर्ट, कार्पोरेट के सर्कल में कौन है। ये जो जातियों के हिसाब से गणना होगी तो ये भेद खुल जाएगा। सामाजिक सत्ता हमारी चुनी हुई सत्ता को कंट्रोल में रखती है। इनको राजनीति करने के लिए पैसा देती है, संसाधन देती है। यहां तक कि हमारे दलित और पिछड़ी राजनीति पर इसका कंट्रोल है, क्योंकि इसको चलाती है। ये  उनको स्थापित करती है। मुझे तो लगता है कि इसलिए हमारे पिछड़े और दलित नेता इस पर ज्यादा जोर नहीं देते। वे भले दलित-पिछड़ा चिल्लाते रहते हैं लेकिन करते कुछ नहीं हैं। का बेसिक काम है कि इस बात पर ज़ोर दें कि जाति की जनगणना होनी चाहिए।

जिस तरह से आप कृषि कानून के विरोध में लगातार आंदोलन चला रहें हैं, क्या जातिगत जनगणना क मुद्दे पर भी आपकी रणनीति ऐसी रहेगी?

एक अभियान चल रहा है जातिगत जनगणना को लेकर केदेखिए, मैं किसान आंदोलन में लगा हुआ हूं। लेकिन जो भी जातिगत जनगणना बनारस के आस-पास होगी, जो भी उत्तर प्रदेश सब अभियान चल रहा है उसकी बैठकों उसके सम्मेलनों में जाया करता हूं। जितना हमारी क्षमता है उसके हिसाब से इस अभियान को भी बल देता रहता हूं।

आपके साथ जितने लोग हैं किसान आंदोलन में क्या सभी लोग इसका समर्थन करते हैं?

देखिए इस पर अभी बहुत खुल के बात नहीं हुई है। लेकिन उसके कुछ नेता जो राष्ट्रीय संयुक्त मोर्चा में जो नवसदस्यीय समिति है, आचारी सदस्यीय समिति है, उनको मैं जानता हूं। कुछ लोगों को व्यक्तिगत रूप से और वैसे भी जानता हूं, कई लोग इसके पक्षधर हैं। जातिगत जनगणना को लेकर मुझे य लगता है कि दोनों अभियानों को एक साथ जोड़ देने से ठीक नहीं होगा। विवाद भी बहुत होगा और हर रोज़ सफाई भी देना होगा। जैसे बनारस में जो हमारा संयुक्त किसान मोर्चा है उसमें मैं बात ले जाऊँ तो वो तो सौ प्रतिशत तैयार हो जाएंगे इसको लेकर, लेकिन इसको उत्तर प्रदेश के स्तर पर ले जाएंगे तो इसमें बहुत समस्या खड़ी होने लगेगी। मेरा मानना है कि इससे दोनों आंदोलनों की क्षति होगी। अब किसी कीमत पर इन अभियानों को जो भी चला रहा है जैसे भी चला रहा हो, ये अभियान हर हालात में मजबूत होना चाहिए।

वर्तमान भाजपा सरकार क्या इसके पक्ष में हो सकती है?

मुझे जहां तक लगता है कि य सरकार जातिगत जनगणना नहीं कराने वाली। लेकिन यदि अभियान मजबूत हो गया। आर-पार की लड़ाई हो गई, जैसे 2022 का चुनाव है पिछड़ा समाज महत्वपूर्ण भूमिका में है, विपक्ष के लिए पक्ष के लिए भी। यदि पिछड़ा समाज आंदोलित हो जाए जैसे किसान पश्चिम, पंजाब, हरियाणा या देश के कई हिस्सों में आंदोलित हो गया, सड़क पर आ गया, उस तरह का अभियान बन जाए तो सरकार बैकफुट पर जाएगी। और जातिगत जनगणना कराने की घोषणा कर सकती है। क्योंकि जो गृहमंत्री थे उस समय के राजनाथ सिंह, वो 2018 में घोषणा किए कि हमारी सरकार 2021 में जातिगत जनणना कराएगी, अब फिसल गए। 2011 में कांग्रेस की सरकार थी उसनेकुछ आंकड़े लिए भी थे। वे मूल गणना में नहीं थे। ये जो सामाजिक सत्ता मैं कह रहा हूं उनका दलित नेता पर भी दबाव है। व हर तरह कि राजनीति पर वर्चस्व जमाए हुए हैं। आज की तारीख में राजनीति पैसे के दम पर की जाती है। पैसा कौन देता है? जो सामाजिक सत्ता वाले लोग हैं पैसा उन्हीं के पास है। वे अच्छा-खासा असर रखते हैं। चाहे निषादों की, दलितों की, कुशवाहों की पार्टी बन जाए सबको पैसा चाहिए। क्योंकि आप बिना पैसे का कहीं चले जाइए चुनाव लड़ने, बिना साधन का चुनाव लड़ने, तो आज की तारीख में आप कुछ नहीं कर सकते। और इतना कम समय मिलता है, इतने तौर-तरीके बन गए हैं उसमें बिना पैसे का कुछ संभव ही नहीं है।

 

 

 

 

2 Comments
  1. महत्वपूर्ण विषय पर बातचीत।

  2. Rajesh says

    किसान विरोधी, जनतंत्र विरोधी, ग़रीब विरोधी, पूंजीपतियों की गोद में खेलने वाली विचारधारा वाली सरकार को उखाड़ फेंकने का वक्त आ गया है।

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