Thursday, February 29, 2024
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दलितों की पीड़ा का सजीव चित्रण है ‘गरीबा की तिज़ोरी’

दिल्ली। नव दलित लेखक संघ (नदलेस), दिल्ली के तत्वावधान में बंशीधर नाहरवाल के लघु उपन्यास गरीबा की तिज़ोरी पर परिचर्चा-गोष्ठी का आयोजन हुआ। गोष्ठी दो चरणों में विभक्त रही। प्रथम चरण में उपन्यास पर परिचर्चा और दूसरे चरण में उपस्थित कवियों द्वारा कविताओं की प्रस्तुति की गई। प्रथम चरण की अध्यक्षता आरसी विवेक ने और […]

दिल्ली। नव दलित लेखक संघ (नदलेस), दिल्ली के तत्वावधान में बंशीधर नाहरवाल के लघु उपन्यास गरीबा की तिज़ोरी पर परिचर्चा-गोष्ठी का आयोजन हुआ। गोष्ठी दो चरणों में विभक्त रही। प्रथम चरण में उपन्यास पर परिचर्चा और दूसरे चरण में उपस्थित कवियों द्वारा कविताओं की प्रस्तुति की गई। प्रथम चरण की अध्यक्षता आरसी विवेक ने और दूसरे चरण की अध्यक्षता पुष्पा विवेक ने की। गोष्ठी के दोनों चरणों का संचालन डॉ. अमित धर्मसिंह ने किया। मुख्य वक्ता पुष्पा विवेक, मामचंद सागर और जोगेंद्र सिंह रहे। गोष्ठी में मुख्य रूप से डॉ. गीता कृष्णांगी, बृजपाल सहज, ज्ञानेंद्र कुमार, राधेश्याम कंसोटिया, फूलसिंह कुस्तवार और गौरव नाहरवाल आदि गणमान्य साहित्यकार मौजूद रहे। सर्वप्रथम उपन्यास पर अपनी बात रखते हुए पुष्पा विवेक ने कहा कि ‘उपन्यास में पात्रों का जो सामाजिक चित्रण किया गया है, वह सच है। आज भी देश के बहुत से हिस्सों में रहने वाले दलितों की बिलकुल वैसी ही स्थिति है, जैसी कि उपन्यास में बयाँ की गई है। बात चाहे गरीबा की हो, सूरज की हो, चाहे लक्ष्मी की। सभी की सामाजिक स्थिति का सटीक वर्णन उपन्यास में किया गया है। मुझे तो यह उपन्यास, अधिकांश दलितों की पीड़ा से जुड़ा हुआ उपन्यास लगा।’

बैठक के दौरान नव दलित लेखक संघ के सदस्य

अगले वक्त के तौर पर अपनी बात रखते हुए मामचंद सागर ने कहा कि ‘उपन्यास मूलतः ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ है। इसकी भाषा की देशज शब्दावली बताती है कि लेखक की अपनी भाषा हरियाणा और राजस्थान से जुड़ी हुई रही है। इसी कारण उपन्यास की भाषा में दोनों राज्यों के देशज शब्द प्रयोग हुए हैं। इनमें से कुछ को समझना भी मुश्किल रहा। उपन्यास की भाषा की दूसरी समस्या यह रही कि इसमें पुनरावृत्ति बहुत है। इसी तरह सर्गों के शीर्षक संस्कृत में लिखे जाना भी अखरता है। बावजूद इसके उपन्यास चौथे सर्ग से रुचिकर लगने लगता है।’ तीसरे वक्ता जोगेंद्र सिंह ने कहा कि ‘बुद्ध और कबीर के विचार का पक्षधर यह उपन्यास भारतीय दलितों के आर्थिक और सामाजिक जीवन का चित्रण करने में काफी हद तक सफल रहा है। मुझे यह उपन्यास पढ़ना अत्यंत रुचिकर लगा। अच्छी बात यह है कि इस तरह के उपन्यास के माध्यम से दलितों की वास्तविक स्थिति का ज्ञान हो जाता है। उपन्यास में गरीबा, जहां कर्ज में डूबा रहा, वहीं सूरज के आगे बढ़ना आशान्वित करने वाला लगा। इस नाते उपन्यास एक सार्थक संदेश समाज में प्रचारित करता है। इस तरह के उपन्यासों पर कथा आदि का आयोजन करना भी समाज हित में होगा।’

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इसके बाद उपस्थित रचनाकारों ने उपन्यास पर हुई परिचर्चा के माध्यम से सारगर्भित टिप्पणियां रखते हुए उपन्यासकार को बधाई दी। उपन्यासकार बंशीधर नाहरवाल ने लेखकीय व्वक्तव्य में नदलेस, वक्ताओं और टिप्पणी रखने वालों का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि ‘उन्होंने यह उपन्यास मूलतः ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद को केंद्र में रखकर लिखा है। ये दोनों ही दलितों के जीवन की बड़ी त्रासदी रही हैं और आज भी हैं।’ तत्पश्चात फूलसिंह, जोगेंद्र सिंह, डॉ. अमित धर्मसिंह, बंशीधर नाहरवाल, हुमा खातून, राधे श्याम, आरसी विवेक और बृजपाल सहज आदि ने दलित जीवन से जुड़ी सशक्त अभिव्यक्ति करती हुई कविताएं प्रस्तुत की। दोनों चरणों की क्रमशः अध्यक्षता करने वाले अध्यक्ष आरसी विवेक और पुष्पा विवेक ने गोष्ठी को हर एंगल से सफल गोष्ठी बताया। सभी उपस्थित रचनाकारों का अनौपचारिक धन्यवाद गोष्ठी की संयोजक हुमा खातून ने किया।

डॉ. गीता कृष्णांगी सामाजिक कार्यकर्ता हैं।
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