Tuesday, February 27, 2024
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दीनदयाल उपाध्याय की भव्य प्रतिमा वाले शहर में पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की उपेक्षा

पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के नाम पर बने पार्क में दुर्व्यवस्था। लोकार्पण के एक-दो साल बाद ही गायब हो गया पुस्तकालय, गंदगी से भरे उसी कमरे में अब सोते हैं पुलिसकर्मी।  मुग़लसराय। भारत देश के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के बगल में लोहे के बोर्ड पर लगे जंग के बीच पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री का नाम देखकर […]

पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के नाम पर बने पार्क में दुर्व्यवस्था। लोकार्पण के एक-दो साल बाद ही गायब हो गया पुस्तकालय, गंदगी से भरे उसी कमरे में अब सोते हैं पुलिसकर्मी। 

मुग़लसराय। भारत देश के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के बगल में लोहे के बोर्ड पर लगे जंग के बीच पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री का नाम देखकर मैंने अपनी दुपहिया को ब्रेक लगा दिया। दीनदयाल उपाध्याय के भव्य प्रतिमा वाले शहर मुग़लसराय में सड़क किनारे वाहन खड़ाकर शास्त्रीजी के नाम पर बने पार्क को निहारते हुए दो सीढ़ियाँ चढ़कर अंदर घुसा तो पहले मैं वहाँ पर शास्त्रीजी की प्रतिमा या चित्र खोजने लगा। कुछ सेकंड इधर-उधर खोजने के बाद एक पतले रास्ते से दूसरी तरफ पर शास्त्रीजी की प्रतिमा दिखी। प्रतिमा तो मुस्करा रही थी लेकिन हफ्तों पहले चढ़ी हुई फूलों की माला ज़रूर मुरझा गई थी। प्रतिमा थी इसलिए मुस्करा भी रही थी शास्त्रीजी ज़िदा होते तो उनका ऐसा अपमान शायद ही कोई करता। बहरहाल, वर्तमान में देश के पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्रीजी की यह उपेक्षा और अपमान नगर पालिका परिषद के पाले में ही आता है।

पार्क में दुर्व्यवस्थाओं का नजारा

मुग़लसराय के एक कायस्थ परिवार में दो अक्टूबर, 1904 को जन्मे लालबहादुर शास्त्री के जन्मदिन के अवसर पर ही 1988 में उक्त प्रतिमा का लोकार्पण हुआ था। उसके बाद 11 जनवरी, 2010 में नगर पालिका परिषद के 12वें वित्त योजनान्तर्गत प्रतिमास्थल के बगल में सार्वजनिक पार्क का विस्तारिकरण और सौंदर्यीकरण का लोकार्पण हुआ। पार्क में साफ-सफाई के नाम पर दुर्व्यवस्था देखकर हैरत हो रही थी। चारों तरफ गंदगी ही गंदगी। अतिक्रमण तो ऐसे जैसे कोढ़ में खाज। जगह-जगह फैले पत्ते, कुर्सियों पर गंदगी, दीवाल पर पेशाब के निशान और थूक, पार्क के ठीक पीछे बड़े नाले से आ रही दुर्गंध, शौचालय में एकत्र मल, चरों तरफ काई से युक्त पानी का नल और बंद स्नान घर। ऐसी दुर्व्यवस्था वाले परिसर को ‘पार्क’ कैसे कहा जा सकता है यह तो मुग़लसराय नगर पालिका परिषद ही जाने। सफाई की बात की जाए तो पार्क परिसर में लगे पाँच शिलापट्टों की ही सफाई की जाती होगी, उन्हें देखकर तो ऐसा ही लग रहा था।

सिर्फ शिलापट्ट पर है पुस्तकालय

पार्क के लोकार्पण के दिन यानी 11 जनवरी, 2010 को परिसर में एक पुस्तकालय का भी उद्घाटन हुआ था, जिसमें शास्त्रीजी की जीवनी सहित अन्य विधाओं की पुस्तकों की व्यवस्था की गई थी। पार्क में बैठे कुछ लोगों के अनुसार एक-दो वर्षों तक पुस्तकों का पठन-पाठन भी चला लेकिन धीरे-धीरे पुस्तकें शायद गायब हो गईं। हालांकि ‘शायद’ शब्द का जवाब कोई नहीं दे सका। वर्तमान स्थिति यह थी कि कमरे में एक पुलिसकर्मी टेबल और दूसरा व्यक्ति जमीन पर गमछा बिछाकर सोए हुए थे। टूटी-फूटी और धूल भरी जमीन नगर पालिका परिषद की सफाई व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रही थी। कमरे में दो सायकिल के साथ दो कुर्सियाँ भी थीं। मेरी आहट पाकर पुलिसकर्मी हड़बड़ाहट में उठकर बैठ गया। पूछने पर उन्हें भी नहीं मालूम कि उस कमरे में कभी पुस्तकालय भी हुआ करती थी।

पार्क परिसर के बाहर भी दुर्व्यवस्था

पार्क परिसर के बाहर भी कई दुर्व्यवस्थाएँ थीं। एक समय में पार्क के गेटे के ठीक बगल में प्याऊ की व्यवस्था थी। स्थानिय लोगों के अनुसार, उस समय कहीं पानी मिले या न मिले लेकिन पार्क परिसर के इस स्थान पर प्यासे लोग अपनी प्यास जरूर बुझा लेते थे। वर्तमान में पानी छोड़िए नल तक गायब हो चुके हैं। पानी कनेक्शन के लिए बिछी पाईप अभी तक पड़ी हुई है, जो कचरों से जाम भी हो गया है। गेट के बगल की दीवाल से सटकर कूड़ा ढोने वाली गाड़ियों के साथ पुलिस और अन्य लोगों के वाहन मनमाने तरीके से पार्क किए गए थे। कूड़े भी एकत्र किए गए थे। यातायात पुलिस की पिकेट तो थी लेकिन पुलिसकर्मी पुस्तकालय वाले कमरे में आराम फरमा रहे थे। पुलिसकर्मियों को बैठने के लिए पिकेट के बगल में दो खाली कुर्सियाँ रखीं हुईं थीं। पिकेट केबिन के ठीक बगल में पार्क के मिनी द्वार को ईंटें लगाकर बंद कर दिया गया था। स्थानीय लोगों ने बताया कि इसे पुलिस ने ही बंद कर दिया है। लोगों के आने-जाने से पुलिस को ऐतराज होता था। मिनी द्वार की दिवाल पर कई बाँस भी बाँधे गए थे। इस बाबत पूछने पर लोगों ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि यहाँ पुलिस को कुछ ‘खर्चा-पानी’ देकर दुकान लगाए जाते हैं।

इस बाबत नगर पालिका परिषद के पूर्व चेयरमैन राजकुमार जायसवाल ने गाँव के लोग डॉट कॉम को बताया, ‘मेरे कार्यकाल में लालबहादुर शास्त्री पार्क में साफ-सफाई की व्यवस्था की गई थी। पार्क का जीर्णोद्धार भी मैंने ही करवाया था। उस समय यहाँ कई लोगों का कब्जा भी था। कब्जे से मुक्त करवाकर परिषद के माध्यम से लालबहादुर शास्त्रीजी के पार्क से सुभाष चंद्र बोसजी के पार्क तक कई कार्य करवाए। पुस्तकालय की भी व्यवस्था करवाई गई थी।’

पार्क परिसर के बाहर ऐसे किया गया है अतिक्रमण

‘पार्क से पुस्तकालय कब गायब हो गई?’ राजकुमार भी इस सवाल का कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सकें।  उन्होंने उन पर इस दुर्व्यवस्था का आरोप मढ़ दिया जो 2011 के बाद जो लोग नगर पालिका परिषद के चेयरमैन बने। राजकुमार जायसवाल के बाद रेखा जायसवाल और संतोष खरवार नगर पालिका परिषद मुग़लसराय के चेयरमैन रहे। वर्तमान में हुए चुनाव/ मतगणना में ‘नग्न हंगामे’ के बाद सोनू किन्नर नगर पालिका परिषद के चेयरमैन बनने जा रहे हैं।

अमन विश्वकर्मा
अमन विश्वकर्मा गाँव के लोग के सहायक संपादक हैं।

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