गुलामी से मुक्ति नहीं बना चुनावी मुद्दा !

एचएल दुसाध

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2022 में सात चरणों में संपन्न होने वाले पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव समाप्ति की ओर अग्रसर है, इस दरम्यान भाजपा ने मंडल उत्तरकाल में मंदिर आंदोलन के जरिये मुसलमानों के खिलाफ हिन्दुओं में नफरत के सुप्त भाव को जगाकर चुनाव दर चुनाव सफलता के जो नए अध्याय रचे, उसे इस चुनाव में भी जमकर सदव्यवहार किया है, खासकर देश की राजनीति को दिशा प्रदान करने वाले उत्तर प्रदेश में। उत्तर प्रदेश में 10 फ़रवरी को पहले चरण का वोट पड़ने के एक माह पहले यानि 8 जनवरी को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यह कहकर अपने इरादे जाहिर कर दिए थे कि यह चुनाव 80 बनाम 20 अर्थात हिन्दू बनाम मुसलमान का है। और जनवरी 2022 के दूसरे सप्ताह के पहले दिन योगी ने विधानसभा चुनाव को हिन्दू बनाम मुसलमान पर केन्द्रित करने की जो घोषणा की। उसके बाद चुनाव प्रचार में उतरे प्रधानमत्री मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह, स्वतंत्र देव सिंह से लगायत कोई भी भाजपा नेता एक सूत भी पीछे नहीं हटा।

यदि विश्व इतिहास में पराधीन बनाने गए तमाम देशों के गुलामों की दुर्दशा पर नज़र दौड़ाई जाय तो साफ नजर आएगा कि सारी दुनिया में ही पराधीन बनाए गए मूलनिवासियों की दुर्दशा के मूल में शक्ति के स्रोतों पर शासकों का एकाधिकार ही प्रधान कारण रहा। अगर शासकों ने पराधीन बनाये गए लोगों को शक्ति के स्रोतों में वाजिब हिस्सेदारी दिया होता, दुनिया में कहीं भी स्वाधीनता संग्राम संगठित नहीं होते। शक्ति के समस्त स्रोतों पर अंग्रेजों के एकाधिकार रहने के कारण ही पूरी दुनिया मे ब्रितानी उपनिवेशन के खिलाफमुक्ति संग्राम संगठित हुये।

आज जब यह पंक्तियाँ लिख रहा हूँ तो अख़बारों के मुख पृष्ठ पर योगी के ये बयान दिख रहे हैं- ‘योगी ने दिया रामराज्य का सपना’ कोई माई का लाल कांवड़ यात्रा रोकने की हिम्मत नहीं कर सकता।’ ये बयान हेट पॉलिटिक्स को हवा देने वाले मदिर और मुसलमानों से जुड़े हैं। योगी ने भाजपा की ओर से 8 जनवरी को चुनाव को 80 बनाम 20 पर केन्द्रित किया तो सपा की ओर से कुछेक दिनों के मध्य ही उसकी काट के लिए 85 बनाम 15 तथा समानुपातिक भागीदारी का मुद्दा सामने आ गया। इससे ऐसा लगा कि इस बार का विधानसभा चुनाव जिन दो पार्टियों के मध्य है, वे आगामी पाँच मार्च तक, जिस दिन सातवें चरण का चुनाव प्रचार बंद होगा, 80 बनाम 20 तथा 85 बनाम 15 पर एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ लगाती रहेंगी। लेकिन भाजपा तो आज भी 80 बनाम 20 पर टिकी है, पर, उसका प्रतिपक्ष जिस तरह 14 जनवरी से 85 बनाम 15 और समानुपातिक भागीदारी पर ख़ामोशी अख्तियार किया, वह आज तक बरक़रार है। लेकिन भाजपा के प्रतिपक्षी बहुजनवादी दलों ने उसके ‘हेट पॉलिटिक्स’ की काट के लिए 85 बनाम 15 जैसे मुद्दे को ही विस्मृत नहीं किया। उनकी ओर से अन्य कई बेहद जरुरी मुद्दों की भी अनदेखी की गयी, जिनकी जोर से उसके नफरती राजनीति की प्रभावी काट हो सकती थी। भाजपा को रोकने लायक जिन जरुरी मुद्दों की बहुजनवादी दलों ने उपेक्षा किया, उनमें से एक है गुलामी से मुक्ति का मुद्दा, जिसे समझने के लिए गुलाम और शासकों के मध्य पार्थक्य को जान लेना जरुरी है।

शासक और गुलाम के बीच मूल पार्थक्य शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक) पर कब्जे में निहित रहता है। गुलाम वे हैं जो शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत रहते हैं, जबकि शासक वे होते हैं, जिनका शक्ति के स्रोतों पर एकाधिकार रहता है। यदि विश्व इतिहास में पराधीन बनाने गए तमाम देशों के गुलामों की दुर्दशा पर नज़र दौड़ाई जाय तो साफ नजर आएगा कि सारी दुनिया में ही पराधीन बनाए गए मूलनिवासियों की दुर्दशा के मूल में शक्ति के स्रोतों पर शासकों का एकाधिकार ही प्रधान कारण रहा। अगर शासकों ने पराधीन बनाये गए लोगों को शक्ति के स्रोतों में वाजिब हिस्सेदारी दिया होता, दुनिया में कहीं भी स्वाधीनता संग्राम संगठित नहीं होते। शक्ति के समस्त स्रोतों पर अंग्रेजों के एकाधिकार रहने के कारण ही पूरी दुनिया मे ब्रितानी उपनिवेशन के खिलाफ मुक्ति संग्राम संगठित हुये। इस कारण ही अंग्रेजों के खिलाफ भारतवासियों को स्वाधीनता संग्राम का आन्दोलन संगठित करना पड़ा; ऐसे ही हालातों में दक्षिण अफ्रीका के मूलनिवासीकालों को शक्ति के स्रोतों पर 80-90% कब्ज़ा जमाये अल्पजन गोरों के खिलाफ कठोर संग्राम चलाना पड़ा। अमेरिका का जो स्वाधीनता संग्राम सारी दुनिया के लिए स्वाधीनता संग्रामियों के लिए एक मॉडल बना, उसके भी पीछे लगभग वही हालात रहे। गुलामों और शासकों के मध्य का असल फर्क जानने के बाद आज यदि भारत पर नज़र दौड़ाई जाय तो पता चलेगा कि मंडल उत्तर काल में जो स्थितियां और परिस्थितियां बन या बनाई गई हैं, उसमें मूलनिवासी बहुजन समाज के समक्ष एक नया स्वाधीनता संग्राम संगठित करने से भिन्न कोई विकल्प ही नहीं बंचा है। क्योंकि यहाँ शक्ति के स्रोतों पर भारत के जन्मजात शासक वर्ग का प्रायः उसी परिमाण में कब्जा हो चुका है, जिस परिमाण में उन सभी देशों में शासकों का कब्जा रहा, जहाँ- जहाँ मुक्ति आंदोलन संगठित हुये।

आरक्षण के जरिये शक्ति के स्रोतों का स्वाद चखते-चखते ही शक्ति के स्रोतों पर सम्पूर्ण एकाधिकार के लिए देश के सवर्णों ने पूर्ण स्वाधीनता का आन्दोलन छेड़ा और लम्बे समय तक संघर्ष चलाकर अंग्रेजो की जगह काबिज होने में सफल हो गए। ऐसा दक्षिण अफ्रीका में हुआ, जहां गोरों को हटाकर मूलनिवासी कालों ने शक्ति के समस्त स्रोतों पर कब्ज़ा जमा लिया और आज वे गोरों को प्रत्येक क्षेत्र में उनके संख्यानुपात 9-10 प्रतिशत पर सिमटने के लिए बाध्य कर दिए हैं। इससे गोरे वहां से पलायन करने लगे हैं।

आज की तारीख में दुनिया के किसी भी देश में भारत के सवर्णों जैसा शक्ति के स्रोतों पर पर औसतन 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा नहीं है। आज यदि कोई गौर से देखे तो पता चलेगा कि पूरे देश में जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हैं, उनमे 80-90 प्रतिशत फ्लैट्स इन्हीं के हैं। मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग मॉलों में 80-90 प्रतिशत दूकाने इन्हीं की है। चार से आठ-आठ लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है, उनमें 90 प्रतिशत से ज्यादे गाड़ियां इन्हीं की होती हैं। देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल प्राय इन्ही के हैं। फिल्म और मनोरंजन तथा ज्ञान-उद्योग पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा इन्ही का है. संसद, विधानसभाओं में वंचित वर्गों के जनप्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो, किन्तु मंत्रिमंडलों में दबदबा इन्हीं का है। मंत्रिमंडलों में लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने वाले 80-90 प्रतिशत अधिकारी इन्हीं वर्गों से हैं। न्यायिक सेवा, शासन-प्रशासन, उद्योग-व्यापार, फिल्म-मीडिया, धर्म और ज्ञान क्षेत्र में भारत के सवर्णों जैसा दबदबा आज की तारीख में दुनिया में कहीं नहीं है। आज की तारीख में दुनिया के किसी भी देश में परम्परागत विशेषाधिकारयुक्त व सुविधाभोगी वर्ग का ऐसा दबदबा नहीं है। इस दबदबे ने बहुसंख्य लोगों के समक्ष जैसा विकट हालात पैदा कर दिया है, ऐसे ही हालातों में दुनिया के कई देशों में शासक और गुलाम वर्ग पैदा हुए: ऐसी ही परिस्थितियों में दुनिया के कई देशों में स्वाधीनता संग्राम संगठित हुए।

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भाजपा की समस्त गतिविधियाँ इसी सुविधाभोगी वर्ग को और शक्तिसंपन्न करने पर केन्द्रित है। इसी वर्ग के हित में वह देश बेचती रही है, इसी वर्ग के हित में में वह मंदिर आन्दोलन का मुद्दा उठाकर बहुसंख्य लोगों में उन मुसलमानों के खिलाफ आक्रोश फैलाती है, जो सवर्ण शासकों द्वारा दलित, आदिवासी, पिछड़ों की भांति ही गुलामों की स्थिति में पंहुचा दिए गए हैं। इसी वर्ग हित में उसने उस सापेक्षिक वंचना (रिलेटिव डिप्राइवेशन) को एवरेस्ट पर पहुँचा दिया है, जो क्रांतिकारी बदलाव का सबब बनती है। सापेक्षिक वंचना का यह आलम न तो फ्रेच रेवोल्यूशन पूर्व था और न ही जारशाही के खिलाफ उठी वोल्सेविक क्रांति में। आज की तारीख में इस सापेक्षिक वंचना का सदव्यवहार कर बहुजनवादी दल बहुत आसानी से देश और मानवता के लिए चुनौती बन चुकी भाजपा को सत्ता से आउट कर सकते थे लेकिन वे ऐसा तब करते जब उनमें बहुजनों की गुलामी को लेकर कोई संवेदना होती। बहरहाल आज जबकि बहुजन जनता भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ रही है तो उसे गुलामी से मुक्ति से जुड़ी कुछ खास बातें जरुर याद रखनी होगी।

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सवालों के कटघरे में लालू प्रसाद (डायरी 22 फरवरी, 2022)

दुनिया में जहाँ-जहाँ भी गुलामों ने शासकों के खिलाफ मुक्ति की लड़ाई लड़ी, उसकी शुरुआत आरक्षण से हुई। काबिलेगौर है कि आरक्षण और कुछ नहीं शक्ति के स्रोतों से जबरन दूर धकेले गए लोगों को शक्ति के स्रोतों में कानूनन हिस्सेदारी दिलाने का माध्यम है। आरक्षण से स्वाधीनता की लड़ाई का सबसे उज्ज्वल मिसाल भारत का स्वाधीनता संग्राम है। अंग्रेजी शासन में शक्ति के समस्त स्रोतों पर अंग्रेजों के एकाधिकार दौर में भारत के प्रभुवर्ग के लड़ाई की शुरुआत आरक्षण की विनम्र मांग से हुई। तब उनकी निरंतर विनम्र मांग को देखते हुए अंग्रेजों ने सबसे पहले 1892 में पब्लिक सर्विस कमीशन की द्वितीय श्रेणी की नौकरियों में 941 पदों में 158 पद भारतीयों के लिए आरक्षित किया। एक बार आरक्षण के जरिये शक्ति के स्रोतों का स्वाद चखने के बाद सन 1900 में पीडब्ल्यूडी, रेलवे, टेलीग्राम, चुंगी आदि विभागों के उच्च पदों पर भारतीयों को नहीं रखे जाने के फैसले की कड़ी निंदा की। कांग्रेस तब आज के बहुजनों की भांति निजी कंपनियों में भारतीयों के लिए आरक्षण का आन्दोलन चलाया था। हिन्दुस्तान मिलों के घोषणा पत्रक में उल्लेख किया गया था कि ऑडिटर, वकील, खरीदने-बेचने वाले दलाल आदि भारतीय ही रखे जाएँ। तब उनकी योग्यता का आधार केवल हिन्दुस्तानी होना था, परीक्षा में कम ज्यादा नंबर लाना नहीं। बहरहाल आरक्षण के जरिये शक्ति के स्रोतों का स्वाद चखते-चखते ही शक्ति के स्रोतों पर सम्पूर्ण एकाधिकार के लिए देश के सवर्णों ने पूर्ण स्वाधीनता का आन्दोलन छेड़ा और लम्बे समय तक संघर्ष चलाकर अंग्रेजो की जगह काबिज होने में सफल हो गए। ऐसा दक्षिण अफ्रीका में हुआ, जहां गोरों को हटाकर मूलनिवासी कालों ने शक्ति के समस्त स्रोतों पर कब्ज़ा जमा लिया और आज वे गोरों को प्रत्येक क्षेत्र में उनके संख्यानुपात 9-10 प्रतिशत पर सिमटने के लिए बाध्य कर दिए हैं। इससे गोरे वहां से पलायन करने लगे हैं।

तो शक्ति के समस्त स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक और धार्मिक) में संख्यानुपात में हिस्सेदारी पाकर ही दलित, आदिवासी, पिछड़े और मुसलमान गुलामी से मुक्त हो सकते हैं। ऐसे में यदि ये तबके अपनी गुलामी से मुक्ति के लिए चिंतित हैं तो उन्हें हर हाल में भाजपा को सत्ता से आउट करना होगा। यदि भाजपा सत्ता से आउट हो गयी तब आप अखिलेश यादव पर संख्यानुपात में हिस्सेदारी के लिए दबाव बना सकते हैं, क्योंकि उन्होंने इस चुनाव में इसका वादा किया है।

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

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