क्या 2022 में सामाजिक न्याय की राजनीति से गायब चेहरों को जनता ने सबक दिया है?

एचएल दुसाध

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गत 10 मार्च को 4 राज्यों, विशेषकर देश की दिशा तय करने वाले उत्तर प्रदेश में जिस तरह भाजपा ने पुनः सत्ता में आकर इतिहास रचा है और जिस तरह बहुजनवादी दलों, खासकर चार बार यूपी की सत्ता पर काबिज होने वाली बहुजन समाज पार्टी एक सीट पर सिमटी है, उससे सामाजिक न्याय के समर्थकों में अभूतपूर्व मायूसी छा गयी है.कारण, सामाजिक न्यायवादी इस बार हर हाल में यूपी में भाजपा को हारते हुए देखना चाहते थे। क्योंकि सब को ऐसा लगता था कि यदि इस बार भाजपा सत्ता में आ गयी तो 2025 में संघ के स्थापना के सौवें वर्ष के अवसर पर वह देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने में सफल हो जाएगी। इसलिए वे बहुजनवादी दलों से करो या मरो की लड़ाई की उम्मीद पाल हुए थे। लेकिन जिस तरह सपा जीत से काफी दूर रही एवं बसपा लगभग शून्य पर पहुंची, लोग मायूसी के शिकार हुए बिना न रह सके। इस निराशा को बढ़ाने में प्रधानमंत्री मोदी का भी बड़ा हाथ रहा। उन्होंने चुनाव परिणाम बाद भाजपा मुख्यालय में जश्न के दौरान कह दिया कि ‘राजनीतिक पंडित यूपी को यह कहकर बदनाम करते थे कि यूपी में जाति ही चलती है। 2014, 2017, 2019 और अब 2022: हर बार उत्तर प्रदेश की जनता ने सिर्फ विकासवाद की राजनीति को ही चुना है। उत्तर प्रदेश के हर नागरिक ने ये सबक दिया है कि जाति की गरिमा, जाति का मान, देश को जोड़ने के लिए होना चाहिए, तोड़ने के लिए नहीं।’ प्रधानमंत्री के बयान का अनुसरण करते हुए कई राजनीतिक विश्लेषकों ने भी सामाजिक न्याय की राजनीति के अंत की घोषणा कर दिया।

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सामाजिक न्याय के राजनीति की हार !

यह पहली बार नहीं है कि राजनीतिक विश्लेषकों ने सामाजिक न्याय की राजनीति के अंत की घोषणा किया है, मेरे ख्याल से ऐसा लोकसभा चुनाव 2009 से ही हो रहा है। तब उस चुनाव में बिहार में  लोजपा के शून्य एवं राजद के 4 पहुचने तथा यूपी में सपा-बसपा के सीटों साथ के वोट प्रतिशत में गिरावट से भारी निराशा का माहौल पैदा हुआ था। वैसी स्थिति में मैंने अपने संपादन में निकलने वाली आज के भारत की ज्वलंत समस्याएं श्रृंखला की सातवीं किताब निकाला था। नाम था ‘सामाजिक न्याय की राजनीति की हार’, जिसमे मैंने 2009 में बहुजनावादी दलों की हार के कारणों पर आलोकपात करते हुए लिखा था, ’जिनके समर्थन के दायरे में विशाल बहुजन समाज आता हो, उनका अल्पजनों के समर्थन पर निर्भर दलों के सामने आत्मसमर्पण के मुद्रा में आना निश्चय ही लोगों को विस्मित करेगा। पर, इसमें विस्मित होने की कोई बात नहीं है। दरअसल विगत वर्षों में इन्होनें बहुजन समाज को अपने वोटों के गुलाम से भिन्न रूपों में देखा ही नहीं। ये यह मानकर निश्चिन्त थे कि इनके लिए कुछ नहीं भी करने पर उनका वोट उन्हें मिलेगा ही मिलेगा। इसलिए उन्होंने अपना सारा ध्यान न सिर्फ सवर्णों पर लगाया, बल्कि उनके हिसाब से अपना एजेंडा भी तय किया। यही कारण  है चुनाव के बहुत पहले से उन्होंने जितना शोर सवर्णों के आरक्षण के लिए मचाया, उसके मुकाबले बहुजनों की भागीदारी पर प्रायः चुप्पी साधे रखा। यह सारी कवायद उन्होंने खुद की छवि जाति-मुक्त नेता के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए किया। इस स्कीम के तहत ही इन लोगों ने तिलक-तराजू और तलवार… भूराबाल साफ़ करों इत्यादि नारों से पल्ला झाड़ने की कोशिश की। यह भारतीय समाज के सदियों के विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न तबकों, जिनका सम्पदा-संसाधनों पर आज भी 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा है, के विरुद्ध उछाले गए वे नारे थे, जिनसे सामाजिक अन्याय के खात्मे की उम्मीद जगी थी। यही वे नारे थे जिसने लोहिया और कांशीराम के सपनों को साकार करने का बीड़ा उठाने वालों को फर्श से अर्श पर पहुंचा दिया था। यह बात जोर गले से कही जा सकती है कि सामाजिक अन्याय के खात्मे की लड़ाई से दूर भागने  के कारण ही लोहिया और कांशीराम की विरासत सँभालने वालों का बुरा हाल हुआ।

मुलायम सिंह के पार्टी का प्रदर्शन पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले खराब होने का भी निर्णायक महत्त्व नहीं है। अहम बात यह है कि इनसे राजनीति के जिस मॉडल की बागडोर सँभालने की अपेक्षा की जा रही थी और इनके जनाधार की जो महत्वाकांक्षाएं थी, उसे पूरा करने में सभी नाकामयाब हो चुके हैं। यह एक सपने के टूटने की दास्तान है। यह सपना था भारत को बेहतर और सबकी हिस्सेदारी वाला लोकतंत्र बनाने और देश के संसाधनों पर खासकर वंचित समूहों की हिस्सेदारी दिलाने का।

लेकिन हमने सामाजिक न्याय के नायक नायक-नायिकाओं की हार को सामाजिक न्याय के राजनीति की हार मान  लिया। जबकि सच्चाई यह है कि हार सामाजिक न्याय के राजनीति की नहीं, सामाजिक न्याय के नाम पर राजनीति करने वाले ऐसे नेताओं की हुई है जो राजनीति को मिशन से प्रोफेशन बना लिए थे। इन्होने अगर चुनाव में सामाजिक न्याय का मुद्दा जोर-शोर से उठाया होता और चुनाव परिणाम ऐसा ही रहता, तब माना जा सकता है कि सामाजिक न्याय की राजनीति की हार हुई है। ऐसे में उपरोक्त तथ्यों के आईने में यह बात साफ़ है कि लोकसभा चुनाव 2009 में सामाजिक न्याय का कार्ड बिलकुल ही नहीं खेला गया। ऐसे में यह कहना कि मतदाताओं ने सामाजिक न्याय की राजनीति को ठुकरा दिया, दुराग्रह के सिवाय और कुछ नहीं है। विपरीत इसके यह बात जोर गले से कही जा सकती है कि सामाजिक अन्याय के खात्मे की लड़ाई से दूर भागने के कारण ही लोहिया और कांशीराम की विरासत सँभालने वालों का बुरा हाल हुआ।’ (एचएल दुसाध द्वारा सम्पादित, सामाजिक न्याय के राजनीति की हार, पृष्ठ- 12)।

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है सब्ज:जार हर दर-ओ-दीवार-ए-गमकद (डायरी 7 मई, 2022) 

ऐसा नहीं कि 2009 में सामाजिक न्यायवादी नेताओं की राजनीति पर मैंने ही निराशा व्यक्त किया था। नहीं! उस चुनाव परिणाम पर ढेरों बहुजन और गैर-बहुजन विद्वानों की जो असंख्य टिप्पणियां प्रकाशित हुई थी, उनमेंभी कुछ-कुछ ऐसी ही बात कही गयी। उनकी भावना का सही प्रतिबिम्बन महान बहुजन पत्रकार दिलीप मंडल की इस टिपण्णी में हुई था। उन्होंने ‘मंद पड़ने लगी है सामाजिक न्याय  की राजनीति’ शीर्षक से 25 मई, 2009 को नवभारत टाइम्स में लिखा था- ‘वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में हिंदी पट्टी के दो राज्यों, बिहार और यूपी के राजनीति की एक हकीकत उजागर हो गयी है। लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, मायावती और यूपी में सबसे ज्यादा सीटें जीतने के बावजूद मुलायम सिंह यादव, ये सभी महारथी अपनी चमक खो चुके हैं। इसके साथ ही भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में वंचित समूहों की हिस्सेदारी बढ़ने की जो प्रक्रिया लगभग 20 साल पहले शुरू हुई थी, उस मॉडल के नायक-नायिकाओं का निर्णायक रूप से पतन हो चुका है। हालांकि यह सब एक दिन में नहीं हुआ है लेकिन अब वह समय है, जब इसके पतन और विखंडन की प्रक्रिया पूरी हो रही है। सामाजिक न्याय की राजनीति का सफ़र जिस उम्मीद से शुरू हुआ था, उसे याद करें तो इन मूर्तियों का इस तरह गिरना और नष्ट होना तकलीफ देता है। बात सिर्फ इतनी-सी नहीं है कि लालू प्रसाद यादव का राजनीतिक वजूद घट गया है और उनकी पार्टी सिर्फ चार सीटें जीत पाई हैं, या रामविलास पासवान की पार्टी का अब लोकसभा में अब कोई नामलेवा नहीं बचा है। न ही इस बात का निर्णायक महत्त्व है कि प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँचने का ख्वाब सजों रही मायावती की पार्टी का प्रदर्शन इस लोकसभा चुनाव में बेहद ख़राब रहा। मुलायम सिंह के पार्टी का प्रदर्शन पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले खराब होने का भी निर्णायक महत्त्व नहीं है। अहम बात यह है कि इनसे राजनीति के जिस मॉडल की बागडोर सँभालने की अपेक्षा की जा रही थी और इनके जनाधार की जो महत्वाकांक्षाएं थी, उसे पूरा करने में सभी नाकामयाब हो चुके हैं। यह एक सपने के टूटने की दास्तान है। यह सपना था भारत को बेहतर और सबकी हिस्सेदारी वाला लोकतंत्र बनाने और देश के संसाधनों पर खासकर वंचित समूहों की हिस्सेदारी दिलाने का। मायावती की बात करें तो दो दशक पहले जिस तेजतर्रार नेता को देश ने उभरते हुए देखा था, अबकी मायावती उसकी छाया भी नहीं लगतीं।’

2009 से भी बदतर: लोकसभा चुनाव-2014

मंडल साहब ने 2009 में सामाजिक न्यायवादी नेतृत्व के निर्णायक तौर पर पतन की जो मोहर लगाया था, उससे काफी हद तक सहमत होते हुए मैंने 2009 के बाद, खासकर लोकसभा चुनाव 2014 के दौरान मैंने ढेरों लेख लिखे, जो मेरी 184 पृष्ठीय पुस्तक ‘लोकसभा चुनाव -2014: भारतीय लोकतंत्र के ध्वंस की दिशा में एक और कदम‘ में संकलित हैं। इन अधिकाँश लेखों में मैंने मंडल साहब को उद्धृत करते हुए बार-बार यह याद दिलाया था- ‘यदि माया-मुलायम, लालू-पासवान  इत्यादि को अपनी स्थिति नए सिरे से पुख्ता करनी है तो उन्हें शक्ति के सभी स्रोतों में लोहिया, जगदेव प्रसाद और सर्वोपरि कांशीराम के भागीदारी दर्शन पर अपनी राजनीति खड़ी करनी होगी। खासतौर से मायावती के लिए ऐसा करना इसलिए जरुरी है, क्योंकि घर-गृहथी न बसाकर, उन्होंने अपना सारा जीवन सामाजिक न्याय के महानायकों, फुले- शाहूजी-पेरियार- बाबासाहेब-कांशीराम के सपनों के भारत निर्माण के प्रति समर्पित कर रखा है (एचएल दुसाध, लोकसभा चुनाव-2014: भारतीय लोकतंत्र के ध्वंस की दिशा में एक और कदम, पृ- 54)। 2014 के आम चुनाव में मेरी ही तरह असंख्य बहुजन बुद्धिजीवियों ने अखबारों में तो नहीं, किन्तु सोशल मीडिया पर बेहिसाब लेखन करके बहुजन नेताओं को सामाजिक न्याय के मुद्दे पर चुनाव केन्द्रित करने का दबाव बनाया, किन्तु सब व्यर्थ साबित हुआ। बहुजनवादी नेताओं ने 2009 की शर्मनाक पराजय से कोई सबक न लेते हुए 2014 में भी सवर्णपरस्ती का दामन थामे रखा। फलतः बहुत जोरदार तरीके से मोदी सत्ता में आये।

2014 में सबसे बुरी स्थित बसपा की हुई। सामाजिक न्याय से कई गज की दूरी बनाये रखने वाली मायावतीजी की बसपा शून्य सीट पर सिमट गयी। इस पर दलित दस्तक के संपादक अशोक दस ने एक बहुत मार्मिक टिप्पणी की थी। उन्होंने लिखा था,’ 16 मई को जब वोटो की गिनती हो रही थी और शाम तक यह साफ़ हो गया था कि बहुजन समाज पार्टी अपना खाता भी नहीं खोल पा रही है तो मेरे मन में यह ख्याल आया था कि बसपा प्रमुख इस वक्त क्या कर रही होंगी? क्या वह चुनाव परिणाम से दुखी होंगी, पार्टी नेताओं की क्लास ले रही होंगी, या फिर चिंतन- मनन कर रही होंगी। या फिर अपने राजनीतिक गुरु कांशीराम और समाज के प्रणेता बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर को याद कर इस बात के लिए शर्मिंदा हो रही होंगी कि दलित आन्दोलन का अग्रणी होने के दम भरने वाली बसपा संसद में एक प्रत्याशी को भी नहीं जीता सकीं जो बहुजन समाज पार्टी का झंडा पकड़कर देश की उस सांसद में खड़ा हो सके, जिसको फतह करना बाबा साहेब का सपना था। उत्तर प्रदेश में जिस तरह भाजपा का अपेक्षा से ज्यादा बेहतर प्रदर्शन चौंकाने वाला रहा, उसी तरह बसपा का अपेक्षा से बहुत नीचे का प्रदर्शन भी चौंकाने वाला रहा… जब सामने नरेंद्र मोदी जैसा वाचाल प्रतिद्वंदी हो जो लाखों लोगों से सीधा संवाद करता है तो फिर कागज़ के पन्नों तक अपनी नजरें सीमित रखने वालीं ‘बहनजी’ का भला क्या हस्र हो सकता था। बहुजन समाज पार्टी की रैलियों में पहुँचने वाला हर बसपाई और अम्बेडकरवादी इस बात के लिए तरसता दिखता है कि काश बहनजी की एक नजर उनकी ओर भी उठती। वह उनसे आँखे मिलाकर बात करतीं, सार्वजनिक तौर पर उनसे हाल-चाल पूछती: कभी किसी पार्टी कार्यकर्त्ता के सर पर हाथ फेर देतीं, लेकिन ऐसा होता कभी नहीं दिखा.. जिन ब्राह्मण, ठाकुरों और मुसलमानों के भरोसे बसपा जीत का सपना संजोये थी, उन्होंने ऐसा गुल खिलाया कि दलित वोटर भी पार्टी से छिटक गया। यूपी की 80 सीटों में से आधी से ज्यादा पर सवर्णों और मुसलमानों को उतारने को बहुजन समाज ने अपने अपमान के रूप में लिया। लोकतंत्र के इस खेल में बहुजनों की अनदेखी ही बसपा को भारी पड़ गयी। एक वक्त में तिलक, तराजू और तलवार को जूते मारने वाली बसपा ने जब अपनी जीत का श्रेय इन्हीं को देना शुरू किया तो तय था कि उसे उसका खामियाजा भुगतना था। मान्यवर कांशीरामजी बहुजन समाज के बूते सत्ता तक पहुँचने की परिकल्पना को जब मायावतीजी सर्वजन में तब्दील करना शुरू किया तो सारे समीकरण पहले से ही डगमगाने लगे थे। बहुजन के बूते खड़ी हुई बसपा के किले की कोतवाली जब सर्वजन को मिल गयी तो उन्होंने इसे अन्दर ही अन्दर खोखला कर दिया था। जाहिर है, इसे एक दिन भरभराकर गिरना था और इस आम चुनाव में वह किला ढह चुका है। यह सब एक दिन में नहीं हुआ बल्कि इसकी पृष्ठभूमि सालों में तैयार हुई। शशांक शेखर से लेकर सतीश चन्द्र मिश्रा को अपेक्षाकृत ज्यादा तव्वजो देने की घटना ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई है और सबसे बड़ी जिम्मेवारी खुद पार्टी प्रमुख की है!’

लालू प्रसाद यादव ने 2015 में सामाजिक न्याय के दाँव से  मोदी को ज़ोरदार शिकस्त देने की मिसाल कायम की 

2014 की कल्पनातीत पराजय के बाद सामाजिक न्याय के समर्थकों को लगा कि बहुजन नेता/ नेत्री अपना वजूद बचाने के लिए निश्चित रूप से सामाजिक न्याय की राजनीति की ओर लौटेंगे। किन्तु यह भ्रम साबित हुआ। अपवाद रूप से एकमात्र सबक लिए लालू प्रसाद यादव जिन्होंने बिहार विधानसभा चुनाव-2015 को मंडल बनाम कमंडल का रूप देकर अप्रतिरोध्य से दिख रहे मोदी को गहरी शिकस्त दे दिया। लालू प्रसाद यादव ने लोकसभा चुनाव -2014 की हार से सबक लेते हुए अपने चिर प्रतिद्वंदी नीतीश कुमार से हाथ मिलाने के बाद एलान कर दिया- ‘मंडल ही बनेगा कमंडल की काट!’ कमंडल की काट के लिए उन्होंने मंडल का जो नारा दिया, उसके लिए आरक्षण के दायरे को बढ़ाने का प्लान किया। इसी योजना के तहत अगस्त 2014 में 10 सीटों पर होने वाले उपचुनाव में अपने कार्यकर्ताओं को तैयार हेतु, जुलाई 2014 में वैशाली में आयोजित राजद कार्यकर्त्ता शिविर में एक खास सन्देश दिया था। उस कार्यकर्त्ता शिविर में उन्होंने खुली घोषणा किया कि सरकार निजी क्षेत्र और सरकारी ठेकों सहित विकास की तमाम योजनाओं में एससी, एसटी, ओबीसी और अकलियतों को 60 प्रतिशत आरक्षण दे। नौकरियों से आगे बढ़कर सरकारी ठेकों तथा आरक्षण का दायरा बढ़ाने का सन्देश दूर तक गया और जब 25 अगस्त को उपचुनाव का परिणाम आया, देखा गया कि लालू का गठबंधन 10 में से 6 सीटें जीतने में कामयाब रहा। यह एक अविश्वसनीय परिणाम था, जिसकी मोदी की ताज़ी-ताजी लोकप्रियता के दौर में कल्पना करना मुश्किल था।

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इस परिणाम से उत्साहित होकर उन्होंने बिहार विधानसभा चुनाव को मंडल बनाम कमंडल पर केन्द्रित करने का मन बना लिया और जुलाई 2015 के दूसरे सप्ताह में जाति जनगणना पर आयोजित एक विशाल धरना-प्रदर्शन के जरिये बिहारमय एक सन्देश प्रसारित कर दिया। उक्त अवसर उन्होंने भाजपा के खिलाफ जंग का एलान करते हुए कहा था,’ मंडल के लोगों उठो और अपने वोट से कमंडल फोड़ दो। इस बार का चुनाव मंडल बनाम कमंडल होगा। 90 प्रतिशत पिछड़ों पर 10 प्रतिशत अगड़ों का राज नहीं चलेगा। हम अपने पुरुखों का बदला लेके रहेंगे।’ उसके बाद जब चुनाव प्रचार धीरे-धीरे गति पकड़ने लगा, संघ प्रमुख पहले चरण का वोट पड़ने के पहले आरक्षण के समीक्षा की बात उठा दिए। उसके बाद तो लालू फुल फॉर्म में आ गए और साल भर पहले कही बात को सत्य साबित करते हुए चुनाव को मंडल बनाम कमंडल बना दिए। वह रैली दर रैली यह दोहराते गए,’ तुम आरक्षण ख़त्म करने की बात करते हो, हम सत्ता में आयेंगे इसे आबादी के अनुपात में बढ़ाएंगे।’ संख्यानुपात में आरक्षण बढ़ाने की काट मोदी नहीं कर पाए और मंडलवादी लालू दो तिहाई सीटें जीतने में कामयाब रहे।

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यूपी विधानसभा चुनाव 2017 : बिहार मॉडल को अपनाने से दूर रहे माया-अखिलेश

लालू प्रसाद यादव ने सामाजिक न्याय के जोर से भाजपा को शिकस्त देने की जो राह दिखाया उससे तमाम बहुजन बुद्धिजीवियों ने यूपी चुनाव को ‘बिहार मॉडल‘ पर लड़ें जाने में सर्वशक्ति लगा दिया। किन्तु मायावती और अखिलेश न तो लालू- नीतीश की भांति सवर्णवादी भाजपा को रोकने के लिए गठबंधन की दिशा में आगे बढ़ें और न ही चुनाव को सामाजिक न्याय पर केन्द्रित करने में कोई रूचि लिये। हालांकि संघ प्रचारक मनमोहन वैद्य और सपा की अपर्णा यादव के आरक्षण विरोधी बयानों ने यूपी चुनाव को सामाजिक न्याय पर केन्द्रित करने के लिए लालू के मुकाबले मायावती के समक्ष बेहतर अवसर सुलभ करा दिया था। पर, शायद सर्वजनवाद को अक्षत रखने के लिए वह उस दिशा में अग्रसर नहीं हुईं। बहरहाल, मायावती जहां आधे अधूरे मन से आरक्षण और मुस्लिम कार्ड खेलती रहीं, वहीं अखिलेश यादव अपने कार्यकाल में हुए एक्सप्रेस-वे, मेट्रो जैसे विकास कार्यों के प्रति पूर्ण आशावादी बने रहे। फलतः एक ऐसा चुनाव परिणाम इतिहास के पन्नो में दर्ज हुआ, जिसे बहुजन नजरिये से एक शब्द में ‘दु:स्वप्न’ ही कहा जा सकता है। बहरहाल, जो लोग यूपी विधानसभा चुनाव-2022 में सामाजिक न्यायवादी बसपा और सपा की हार से विस्मित हैं, वे यदि 2017 के चुनाव परिणामों पर बहुजन बुद्धिजीवियों की राय का सिंहावलोकन करें तो उनका सारा विस्मय काफूर हो जायेगा।

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विधानसभा चुनाव- 2017 के परिणाम पर राय देते हुए प्रख्यात बहुजन बुद्धिजीवी भगवान स्वरुप कटियार ने लिखा था, ’मंडल वालों का वोट 2014 के लोकसभा और हाल के विधानसभा चुनाव में कमंडलवादी ताकतें छीनने में सफल हो गई। मायावती दलितों में एक जाति विशेष का भला करती नजर आती हैं। और दलितों के हित का एक बड़ा हिस्सा मौकापरस्त सवर्ण हड़प लेते हैं। मायावती ने अकूत धन- संग्रह किया है और अपने वर्ग के लोगों से न तो कभी सीधे मिलीं और न ही उनका दुःख-दर्द सुना। उनके इस भ्रम को कि दलित वोट उनका बंधुआ है,  दलित मतदाताओं ने  मौजूदा विधानसभा चुनाव में तोड़ा और उपेक्षित दलित जातियां मोदी लहर में भाजपा की ओर झुक गईं। आंबेडकर की तरह निःस्वार्थ और सर्वस्वीकृत दलित नेता के अभाव का भरपूर लाभ भारतीय जनता पार्टी ने उठाया है। (भगवान स्वरुप कटियार, जनसंदेश टाइम्स, 30 मार्च, 2017)। 2017 में बसपा की हार के कारणों की तफ्तीश करते हुए एस आर दारापुरी ने कहा था,’ मायावती का दलित वोट बैंक खिसकने का मुख्य कारण भ्रष्टाचार, दलित उत्पीड़न की उपेक्षा और तानाशाही रवैया रहा है। मायावती ने दलित राजनीति को उन्हीं गुंडों, माफिया, अपराधियों एवं धनाबलियों को टिकट देकर दलितों को उन्हें वोट देने के लिए आदेशित करती रही हीं। दरअसल, दलित राजनीति को उन्हीं गुंडों माफियाओं, दलित उत्पीड़कों एवं पूंजीपतियों के हाथों बेच दिया है जिसे उनकी लड़ाई है। इस चुनाव में मायावती ने आधा दर्जन ऐसे सवर्णों को टिकट दिया था जो दलित हत्या, दलित बलात्कार और दलित उत्पीड़न के आरोपी हैं इसीलिए इस बार दलितों ने मायावती के इस आदेश को नकार दिया है और बसपा को वोट नहीं दिया। (एसआर दारापुरी, हस्तक्षेप.कॉम, 13 मार्च, 2017)। मशहूर दलित विचारक कँवल भारती का कहना रहा,’ मायावती की यह आखिरी पारी थी, जिसमें उनकी शर्मनाक हार हुई। 19 सीटों पर सिमट कर उन्होंने अपनी पार्टी के तो अस्तित्व को बचा लिया, परन्तु अब उनका खेल ख़त्म ही समझों। मायावती ने यह स्थिति खुद ही पैदा की हैं। (फेसबुक,11 मार्च, 2017)। 2012 में सत्ता पर काबिज हुई सपा बसपा से थोड़ा बेहतर करने में जरुर सफल रही, किन्तु उसकी भी तगड़ी हार हुई थी। इसके कारणों की खोज करते हुए सपा मामले के विशेषज्ञ चन्द्र भूषण सिंह यादव ने लिखा था, ’यूपी में असेम्बली इलेक्शन 2017 का परिणाम भले ही अनापेक्षित लग रहा है, पर, ऐसा होना ही था। मैं तो 2012 के असेम्बली इलेक्शन के बाद हुए नगर निगम चुनाव, नगर पंचायत तथा 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही लगातार कोशिश में था कि समाजवादी पार्टी अपनी मूल लाइन पर आ जाए, पर यहाँ तो हम सब पर विकास का भूत छाया हुआ था। मुझे यह कहने में थोड़ी भी झिझक नहीं है कि हिंदुत्व का मुकाबला काम, विकास, तरक्की, कन्या विद्याधन, समाजवादी पेंशन, लैपटॉप, स्मार्टफोन, दवाई- पढाई—सिंचाई- कर्ज माफ़ी, 102/ 108 मुफ्त एम्बुलेंस, 1090 विमेन पॉवर लाइन, लायन सफारी, एक्सप्रेस-वे, मेट्रो, सायकल हाईवे, रिवर फ्रंट, लोहिया आवास इत्यादि से नहीं हो सकता। हिंदुत्व का जवाब आरक्षण/ प्रतिनिधित्व/ भागीदारी/ वंचित हित- पोषण/ मंडल है, जिसे समाजवादी पार्टी ने अपने पांच साल की सरकार में बड़ी बेदर्दी से रौंद डाला और खुद को मंडल/ पिछड़ा निरपेक्ष दिखने और आभिजात्य समाज का दुलरुवा बनाने का कोई प्रयास नहीं छोड़ा।’ (फेसबुक, 12 मार्च,2017)

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2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में मैंने बसपा के पक्ष में इतना लेख लिखा कि एक किताब ही बन गयी। लेकिन चुनाव ख़त्म होने के बाद जब एग्जिट पोल टीवी पर दिखाया जा रहा था मैंने ये पोस्ट डाले। बहुजनों का खेल ख़त्म! शीर्षक पोस्ट में लिखा- ‘सवा-डेढ़ घंटे से चल रहे एग्जिट पोल के नतीजे 11 तारीख को आने वाले चुनाव परिणाम के प्रायः 80-90% करीब है। अगर आप चमत्कार में विश्वास करते हैं तो ही अपने अनुकूल परिणाम के प्रति आशावादी हो सकते हैं। अगर नहीं करते और आप यथार्थवादी हैं तो यह मानसिकता बना लीजिये कि 5 राज्यों के इस चुनाव के बाद सवर्णवादी सत्ता नए सिरे से मजबूत होने जा रही है। यूपी में अनुमान के मुताबिक़ त्रिकोणीय मुकाबला भाजपा के पक्ष में चला गया, यह एक कठोर सचाई है, जिसका सामना करने के लिए मन बनाइये। (फेसबुक, 9 मार्च, 2017)। पराजित मूलनिवासी समाज के एक लेखक की ओर से हेडगेवारवादियों को अग्रिम बधाई!से डाले पोस्ट में लिखा- ‘7 अगस्त, 1990 को मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद संघ परिवार की ओर से आडवाणी ने, यह कहकर कि मंडल से समाज बंट रहा है, जिस लक्ष्य को लेकर राम जन्मभूमि मुक्ति के नाम पर आजाद भारत का जो सबसे बड़ा आन्दोलन (अटल बिहारी वाजपेयी के अनुसार) चलाया, आज उसे पूर्णता मिल जाएगी। क्या लक्ष्य था संघ परिवार का? लक्ष्य था भारत की धरती पर मुकम्मल हिंदूवादी अर्थात सवर्णवादी सत्ता की स्थापना, ताकि शक्ति के समस्त स्रोतों (आर्थिक-राजनीतक-धार्मिक-शैक्षिक इत्यादि) पर सदियों से कायम सवर्ण सवर्ण वर्चस्व को नए सिरे से स्थापित और मंडल से हुई क्षति की भरपाई किया जा सके.कहना न होगा संघ परिवार अपने लक्ष्य से एक दिन के लिए भी विच्यूत नहीं हुआ और उसने हिन्दू धर्म-संस्कृति के उज्जवल पक्ष और मुस्लिम विद्वेष के निरंतर प्रसार के जरिये उसे हासिल कर लिया, इसका खुलासा मैक्सिमम 10 बजे तक हो जायेगा। पराजित मूलनिवासी समाज के एक लेखक की ओर से हेडगेवारवादियों को अग्रिम बधाई! (फेसबुक, 10 मार्च, 2017)। सहस्राधिक वर्षो के बाद आज होगा :मुकम्मल हिन्दू-राज!वैसे तो अंग्रेजों के जाने के बाद जिन काले अंग्रेजों के हाथ में देश की आई, दरअसल वह सदियों बाद भारत की धरती पर हिन्दू अर्थात सवर्ण-राज की शुरुआत थी। स्मरण रहे 712 मेंमोहम्मद बिन कासिम से भारत भूमि धीरे-धीरे इस्लाम भारत में तब्दील हुई। इस इस्लाम भारत को 23 जून 1757 से अंग्रेज-भारत में बदलने का क्रम प्लासी युद्ध से हुआ। अग्रेजों ने उस सत्ता को 15 अगस्त, 1947 को फिर से उनको स्थान्तरित कर दिया जिनके हाथ में इस्लाम भारत की शुरुआत के पहले सत्ता थी। आज मूलनिवासी बहुजनों के भारत पर की छाती पर हिन्दुओं अर्थात सवर्णों की वह सत्ता स्थापित होगी, जिसकी तुलना आप आप 712 पूर्व के हिन्दुराज से कर सकते हैं। (फेसबुक, 11 मार्च, 2017 की सुबह चुनाव परिणामशुरू होने के आधा घंटा पहले, सुबह 8. 20)

तेजस्वी यादव ने लालू प्रसाद यादव की अनुपस्थिति में जिस तरह बिहार विधानसभा चुनाव 2021 में चुनाव लड़ा, वह हैरान करने वाली घटना थी। उस चुनाव में उन्होंने एकल प्रयास से मोदी- नितीश को लगभग मात दे दिया था, किन्तु उनकी नैया बिलकुल किनारे जाकर डूब गयी थी। उस चुनाव में उन्होंने सबकुछ किया था, सिवाय चुनाव को सामाजिक न्याय के मुद्दे पर केन्द्रित करने के. वह ए टू जेड फार्मूला को कामयाब बनाने के लिए भूलकर भी उस चुनाव में सामाजिक न्याय का मुद्दा नहीं उठाया।

बाद में चुनाव परिणाम आने पर मैंने लिखा था- ‘कांशीराम उत्तरकाल में बसपा नेतृत्व यह भूल गया हजारों साल से शक्ति के स्रोतों से वंचित दलित, आदिवासी, पिछड़ों और इनसे धर्मान्तरित लोगों का बसपा से तेजी से जुडाव इसलिए हुआ कि उनमें यह विश्वास जन्मा था कि एक दिन यह पार्टी केंद्र की सत्ता पर काबिज होकर शक्ति के स्रोतों में कांशीराम का भागीदारी दर्शन लागू कर, उन्हें उनका हको-हुकुक दिला देगी। किन्तु बसपा नेतृत्व ने इस व्यापकतम नारे को सिर्फ सत्ता में भागीदारी तक सीमित रखा गया। यदि इस नारे को समस्त आर्थिक गतिविधियों, राज-सत्ता की सभी संस्थाओं इत्यादितक प्रसारित किया गया होता, बसपा अतीत का विषय बनने की ओर अग्रसर नहीं होती। दुःख के साथ कहना पड़ता है 2007 में शिखर पर पहुँचने के बाद जिस तरह बसपा नेतृत्व ने बहुजन से सर्वजन की ओर विचलन करने के साथ ही शक्ति के स्रोतों में साहेब कांशीराम के भागीदारी दर्शन की निरंतर अनदेखी किया, उसका कुफल लोकसभा चुनाव-2009 से ही सामने आना शुरू किया। किन्तु बहुजन बुद्धिजीवियों द्वारा लगातार सावधान किये जाने के बावजूद नेतृत्व लगातार बेरहमी से इसकी अनदेखी करता रहा, जिसका चरम दुष्परिणाम 2014 के लोकसभा चुनाव में शून्य सीट के रूप में आया। 2009 के बाद 2014 के परिणाम से भी कुछ सबक न सीखने का परिणाम 11 मार्च, 2017 को सामने आ गया। किन्तु वजूद पर संकट आने के बावजूद यदि पार्टी सर्वजन से बहुजन की ओर पुनः लौटने के साथ भविष्य में शक्ति के समस्त स्रोतों में कांशीराम का भागीदारी दर्शन लागू करने का आश्वासन देने का प्रयास करें, तो 2009 पूर्व युग में जाना खूब कठिन नहीं होगा। क्या समाज के ऋण से मुक्त होने का संकल्प लेने वाले लोग बसपा नेतृत्व को इसके लिए राजी करेंगे!‘

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धार्मिक जुलूसों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया जाए

बहरहाल, 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव को सामाजिक न्याय पर केन्द्रित कर लालू प्रसाद यादव ने भाजपा को हराने का जो रास्ता दिखाया, उसका अनुसरण करने में मायावती और अखिलेश यादव ही नहीं, खुद उनके बेटे तेजस्वी यादव ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। तेजस्वी यादव ने लालू प्रसाद यादव की अनुपस्थिति में जिस तरह बिहार विधानसभा चुनाव 2021 में चुनाव लड़ा, वह हैरान करने वाली घटना थी। उस चुनाव में उन्होंने एकल प्रयास से मोदी- नितीश को लगभग मात दे दिया था, किन्तु उनकी नैया बिलकुल किनारे जाकर डूब गयी थी। उस चुनाव में उन्होंने सबकुछ किया था, सिवाय चुनाव को सामाजिक न्याय के मुद्दे पर केन्द्रित करने के. वह ए टू जेड फार्मूला को कामयाब बनाने के लिए भूलकर भी उस चुनाव में सामाजिक न्याय का मुद्दा नहीं उठाया। अगर उठाया होता, वह अकेले दम पर नीतीश- मोदी को शिकश्त देने में सफल हो गए होते। जबकि 2020 चुनाव को हर हाल में सामाजिक न्याय पर केन्द्रित करना जरुरी था। कारण लोकसभा चुनाव- 2019 में राजद गठबंधन 40 में से सिर्फ एक सीट जीतने सफल हुआ था और वह सिट भी राजद के खाते में नहीं आई थी और यह दुर्गति सामाजिक न्याय से दूरी बनाने के कारण ही हुई थी।

लोकसभा चुनाव-2019 में सपा- बसपा की भूमिका का आंकलन करते हुए प्राख्यात बहुजन पत्रकार उर्मिलेशजी ने एक दिलचस्प राय दिया था। उन्होंने कहा था, ’सपा-बसपा नेतृत्व ने चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत तब की, जब मोदी-शाह यूपी में लगभग नब्बे फीसदी हिस्सा कवर कर चुके थे। दोनों दलों के चालीस फीसदी से अधिक उम्मीदवारों की घोषणा नामांकन की आखिरी तारीख के कुछ ही दिनों पहले हुई।

2019 में भी नहीं उठा : सामाजिक न्याय का मुद्दा !

लोकसभा चुनाव 2019 में भी बहुतों खुलकर कहा था कि यह जाति की राजनीति अर्थात सामाजिक न्याय की राजनीति का अंत है। लेकिन उस चुनाव में भी यूपी-बिहार में सामाजिक न्याय का मुद्दा नहीं उठा। 2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार में राजद गठबंधन 40  सीटों पर चुनाव लड़कर सिर्फ एक सिट जीतने में कामयाब हुआ था। उस चुनाव में एग्जिट पोल आने के तीन घंटे पहले मैंने फेसबुक पर पोस्ट डालकर बता दिया था कि सामाजिक न्याय की अनदेखी का परिणाम क्या होने जा रहा है, ’सत्रहवीं लोकसभा का चौकाने वाला चुनाव परिणाम आ चुका है। पूरी दुनिया भाजपा के पक्ष में 2014 से भी बेहतर परिणाम देखकर विस्मित है। बहरहाल, इस चुनाव पर अपनी त्वरित टिपण्णी लिखते हुए सबसे पहले पाठकों का ध्यान 19 मई को एग्जिट पोल प्रसारित होने के प्रायः तीन घंटे पूर्व ‘लोकसभा चुनाव -2019: विपक्ष कायम करने जा रहा है विफलता का एवरेस्ट सरीखा दृष्टांत!’ शीर्षक से फेसबुक पर डाले गए इस पोस्ट की ओर आकर्षित करना चाहूँगा। ‘सात चरणों में संपन्न होने वाले लोकसभा चुनाव-2019 के समापन में बमुश्किल तीन घंटे बचे है। 26 नवम्बर, 2017 से 2 अप्रैल, 2019 तक सत्रहवी लोकसभा चुनाव में बतौर लेखक बहुजन-हित में अपना कर्तव्य निर्वहन के लिए मैंने 8 किताबें तैयार किया। इस श्रृखला की पहली किताब रही ‘2019: भारत के इतिहास में बहुजनों की सबसे बड़ी लड़ाई’ जबकि 2 अप्रैल, 2019 को रिलीज हुई आखरी व आठवी किताब 2019: भाजपा-मुक्त भारत। मैंने इन सभी किताबों में कहीं न कही जरुर इस बात का उल्लेख कि दुनिया की विशालतम पार्टी भाजपा की शक्ति के अनंत स्रोत हैं। किन्तु इसे हराने जैसा आसान पॉलिटिकल टास्क कुछ हो ही नहीं सकता। मेरे इस दावे का सबसे बड़ा आधार इसकी सामाजिक न्याय विरोधी नीतियाँ रही हैं। इसलिए विपक्ष यदि 2019 में इसे सामाजिक न्याय की पिच पर खेलने के लिए मजबूर कर दे, मोदी हार वरण करने के लिए विवश रहेंगे, यह बात मैंने अपनी आठों किताबों में दोहराया। इन आठो किताबों में ही मैंने सामाजिक न्याय की पिच पर भाजपा के शर्तिया तौर हारने की गारंटी देते हुए बिहार विधानसभा चुनाव-2015 में लालू प्रसाद यादव की भूमिका को याद दिलाया था। इन आठों किताबों में ही मैंने यह भी बताने का बलिष्ठ प्रयास किया कि मोदी की सवर्णपरस्त नीतियों के चलते जिस तरह भारत के जन्मजात शोषकों का धर्म और ज्ञान-सत्ता के साथ ही अर्थ और राज-सत्ता पर औसतन 80-90 प्रतिशत जो कब्ज़ा हुआ हैं, उससे देश में सापेक्षिक-वंचना (Relative-deprivation) की वह स्थिति पैदा हो गयी है, जिस स्थिति में दुनिया में क्रांतियों के नए-नए अध्याय रचे गए। विपक्ष यदि सापेक्षिक वंचना के अहसास से दलित, आदिवासी, पिछड़ों और इनसे कन्वर्टेड तबकों को भर दे, भारत आज का वह दक्षिण अफ्रीका बन जायेगा, जहाँ भारत के सवर्णों की भांति कभी शक्ति के स्रोतों पर एकाधिकार जमाये गोरे अब दक्षिण अफ्रीका छोड़कर भाग रहे हैं। भारी अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि मोदी की सवर्णपरस्त नीतियों से भारत में लोकतान्त्रिक क्रांति अर्थात आमूल सत्ता परिवर्तन की जो स्थिति बनी, उसका सदव्यवहार करने में भारत का विपक्ष विफल रहा। यह चुनाव खासतौर से विपक्ष की विफलता के लिए याद किया जायेगा। और यह विफलता इसलिए हुई क्योंकि सामाजिक न्याय की जो पिच भाजपा के लिए बराबर कब्रगाह साबित होती रही है, उस पीच पर टीम मोदी को खिलाने में विपक्ष ने कोई खास रूचि ही नहीं ली। (एचएल दुसाध, विपक्ष ने कायम किया विफलता का एवरेस्ट सरीखा दृष्टांत, द नॅशनल प्रेस, 24 मई, 2019)।

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2022 में महज चुनाव में उतरने की औपचारिकता पूरा किया : सपा- बसपा !

लोकसभा चुनाव-2019 में सपा- बसपा की भूमिका का आंकलन करते हुए प्राख्यात बहुजन पत्रकार उर्मिलेशजी ने एक दिलचस्प राय दिया था। उन्होंने कहा था, ’सपा-बसपा नेतृत्व ने चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत तब की, जब मोदी-शाह यूपी में लगभग नब्बे फीसदी हिस्सा कवर कर चुके थे। दोनों दलों के चालीस फीसदी से अधिक उम्मीदवारों की घोषणा नामांकन की आखिरी तारीख के कुछ ही दिनों पहले हुई। क्या लोकसभा चुनाव में भी सपा-बसपा को चलाने वाले दोनों परिवार कहीं न कहीं केंद्र के निजाम और सत्ताधारी दल के शीर्ष नेतृत्व से डरे- सहमे थे? राजनीति शास्त्र के किसी मर्मज्ञ को छोड़िये, राजनीति का एक अदना जमीनी कार्यकर्त्ता भी बता देगा की यूपी में सपा-बसपा लोकसभा चुनाव में मानों हारने के लिए ही लड़ रही थीं।’ उसी उर्मिलेशजी ने विधानसभा 2022 पर टिप्पणी किया, ’बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के कुछ ‘बौद्धिक समर्थकों’ को अब भी लग रहा है कि उन दोनों की पार्टियों को ईवीएम के जरिये हराया गया है। ऐसे भ्रांतसोच से इन दोनों पार्टियों के कथित बौद्धिक-समर्थक या मित्र सपा और बसपा की चुनावी हार के असल राजनीतिक कारणों को कभी ठीक समझ नहीं पायेंगे!

सबसे पहले, बसपा के बौद्धिक समर्थकों से एक सवाल: उन्होंने कभी यह जानने की ईमानदार कोशिश की है कि बीते सात-आठ साल से बसपा का नेतृत्व क्या चुनाव जीतने के लिए लड़ता है या किसी को हराने-जिताने और अपने को बचाने के लिए लड़ता है? सपा के बौद्धिक समर्थकों से एक सवाल: चुनाव से पहले पूरे पौने पांच साल आप की पसंदीदा पार्टी जनता के बीच कुछ करती क्यों नहीं? हाल के दो विधानसभा चुनावों के दौरान उसकी क्या रणनीति रही है: चुनाव जीतना या नंबर दो बने रहना? उन्होंने आगे कहा है,’ यूपी के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी, ये दोनों पार्टियां अब भारतीय जनता पार्टी-आरएसएस की चुनौती का सामना करने में अक्षम हो चुकी हैं। उसकी सबसे बड़ी वजह है कि इन दोनों पार्टियों के पास भाजपा-आरएसएस का राजनीतिक मुकाबला करने के लिए जरूरी न ठोस विचारदृष्टि है और न तो समर्थ संगठन है। अपने-अपने समर्थकों की कम या अधिक भीड़ से ये दोनों पार्टियां सांगठनिक और वित्तीय रूप से एक मजबूत शक्ति- भाजपा (जो राज्य और केंद्र की सत्ता में भी है) का कैसे मुक़ाबला कर सकती हैं? आज के दौर में सिर्फ विचार और संगठन आधारित कोई राजनीतिक दल ही भाजपा-आरएसएस की चुनौती का कारगर ढंग से मुकाबला कर सकता है! इसलिए बसपा और सपा अगर अपने को नये विचार और मजबूत कार्यकर्ता-आधारित संगठन से लैस नहीं करते हैं तो वे यूपी की राजनीति में क्रमशः अप्रासंगिक होते जाने के लिए अभिशप्त होंगे! मशहूर पत्रकार दिलीप मंडल की राय रही, ‘अभी संपन्न हुए यूपी विधानसभा चुनाव में सामाजिक न्याय मुद्दा ही नहीं था। लोगों के पास सामाजिक न्याय के आधार पर वोट डालने का विकल्प नहीं था। किसी भी राजनीतिक पार्टी ने सामाजिक न्याय को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया। सपा और बसपा मुख्य रूप से दो आधार पर चुनाव लड़ रही थी। दोनों पार्टियां दावा कर रही थीं कि वे बीजेपी को रोकने में ज्यादा सक्षम हैं, इसलिए मुसलमान उन्हें वोट दें. सपा विकास के आधार पर जबकि बसपा कानून व्यवस्था के नाम पर वोट मांग रही थी।’

जहाँ तक मेरी खुद की राय का सवाल है सातवें चरण का चुनाव संपन्न होने के एक दिन पहले अर्थात 6 मई को चुनाव परिणाम का संकेत कर दिया था।’ पिछले विधानसभा चुनाव में विजेता भाजपा और उसके प्रतिद्वंदी दलों बसपा, सपा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मत प्रतिशत में जमीन असमान का अंतर  रहा. 2017 में भाजपा, बसपा, सपा और कांग्रेस को क्रमशः 39.67, 22.23, 21.82 और 6.25 प्रतिशत मत मिले। इनमे भाजपा 384 सीटों पर चुनाव लड़कर 312 पर विजय प्राप्त की जबकि बसपा, सपा, और कांग्रेस क्रमशः 403, 311, 114 पर चुनाव लड़कर क्रमशः 19, 47 और 7 सीटें जितने में कामयाब रहे। ऐसी ताकतवर भाजपा से पार पाने के लिए बसपा, सपा और कांग्रेस को अपने मत प्रतिशत में बहुत ही ज्यादे इजाफा करने की जरूरत थी। इसके लिए इन पार्टियों को भाजपा से कई गुणा बेहतर एजेंडा और तैयारियों के साथ चुनाव में उतरना था। लेकिन जिन मुद्दों के साथ ये पार्टियाँ  भाजपा जैसी विश्व की सबसे शक्तिशाली पार्टी के खिलाफ उतरी हैं, ऐसा लगता है इन पार्टियों ने महज चुनाव में उतरने की औपचारिकता पूरा किया है। (एचएल दुसाध, खांटी भाजपा विरोधी के रूप में उतीर्ण होने में व्यर्थ: यूपी के गैर-भाजपाई दल! अचूक संघर्ष, 6 मई, 2022)।

बहरहाल, उपरोक्त तथ्यों का ठीक से अध्ययन करने पर साफ़ दिखाई देगा कि मोदीराज में 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के बाद 2017, 2019, 2020 और 2022 में लोकसभा और विधानसभा के जो चार चुनाव हुए, उसमे अज्ञात कारणों से सामाजिक न्याय का मुद्दा उठा ही नहीं। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी और सवर्णवादी मीडिया का यह कथन पूरी तरह भ्रांत है कि सामाजिक न्याय के राजनीति अंत हो चुका है। 2015 लालू प्रसाद यादव ने सामाजिक न्याय का हल्का सा मुद्दा उठाकर मोदी को गहरी शिकस्त दे दिया। अब आगामी दिनों सामाजिक न्याय की राजनीति को विस्तार देने के लिए निम्न क्षेत्रों में सभी सामाजिक समूहों के संख्यानुपात में बंटवारे पर राजनीति केन्द्रित होने जा रही है: ऐसा जब होगा फिर मोदी का क्या होगा, मीडिया अभी से इसका अनुमान लगाना शुरू करे !

  1. सेना व न्यायालयों सहित सरकारी और निजीक्षेत्र की सभी स्तर की,सभी प्रकार की नौकरियों व धार्मिक प्रतिष्ठानों अर्थात पौरोहित्य
  2. सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा दी जानेवाली सभी वस्तुओं की डीलरशिप
  3. सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा की जानेवाली सभी वस्तुओं की खरीदारी
  4. सड़क-भवन निर्माण इत्यादि के ठेकों, पार्किंग, परिवहन
  5. सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा चलाये जानेवाले छोटे-बड़े स्कूलों, विश्वविद्यालयों, तकनीकि-व्यावसायिक शिक्षण संस्थाओं के संचालन, प्रवेश व अध्यापन
  6. सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा अपनी नीतियों, उत्पादित वस्तुओं इत्यादि के विज्ञापन के मद में खर्च की जानेवाली धनराशि
  7. देश-विदेश की संस्थाओं द्वारा गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीओ को दी जानेवाली धनराशि
  8. प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया एवं फिल्म-टीवी के सभी प्रभागों
  9. रेल-राष्ट्रीय मार्गों की खाली पड़ी भूमि सहित तमाम सरकारी और मठों की खाली पड़ी जमीन व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए अस्पृश्य-आदिवासियों में वितरित हो एवं
  10. ग्राम-पंचायत, शहरी निकाय,संसद-विधासभा की सीटों; राज्य एवं केन्द्र की कैबिनेट; विभिन्न मंत्रालयों के कार्यालयों; विधान परिषद-राज्यसभा; राष्ट्रपति, राज्यपाल एवं प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री के कार्यालयों इत्यादि में..

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

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