Friday, February 23, 2024
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आर्थिक सशक्तीकरण और आत्मनिर्भरता के लिए चल रही योजनाएँ कितनी कारगर?

वाराणसी। महिला सशक्तीकरण और लैंगिक समानता के मामले में भारत पिछड़ रहा है। साथ ही उसकी लिस्टिंग भी विश्व के पिछड़े देशों में दर्ज की गई है। यह रिपोर्ट (द पाथ्स टू इक्वल) महिलाओं के सशक्तीकरण व लैंगिक समानता के लिए काम कर रहे संगठन यूएन वीमेन और यूएनडीपी यानी यूनाइटेड नेशन डेवलपमेंट प्रोग्राम ने […]

वाराणसी। महिला सशक्तीकरण और लैंगिक समानता के मामले में भारत पिछड़ रहा है। साथ ही उसकी लिस्टिंग भी विश्व के पिछड़े देशों में दर्ज की गई है। यह रिपोर्ट (द पाथ्स टू इक्वल) महिलाओं के सशक्तीकरण व लैंगिक समानता के लिए काम कर रहे संगठन यूएन वीमेन और यूएनडीपी यानी यूनाइटेड नेशन डेवलपमेंट प्रोग्राम ने पिछले वर्ष जारी की है।

देश में महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण और आत्मनिर्भरता के लिए अनेक सरकारी योजनाएँ चल रही हैं। बावजूद इसके, यह ‘रिपोर्ट’ काफी निराशाजनक है, साथ ही सरकार के चुनावी वायदों और भाषणों की पोल खोल रही हैं।

हालांकि, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में राष्ट्रपति के रूप एक महिला का चुनाव महिला सशक्तीकरण की गाथा का एक अंश भर है। जो दर्शाता है कि समाज जागरूक तो हो रहा है, लेकिन अभी भी इस क्षेत्र में काफी कुछ किया जाना बाकी है।

केंद्र सरकार के योजनाओं की बात करें तो महिलाओं को सशक्त और उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए प्रमुख रूप से उज्जवला योजना, फ्री सिलाई मशीन योजना, फ्री आटा चक्की योजना, मातृत्व वंदना योजना, सखी : वन स्टॉप सेंटर योजना, प्रधान मंत्री समर्थ योजना चला रही है। योजनाओं का कोई सार्थक परिणाम नहीं दिखा है। बल्कि समय के साथ उसका ‘ढिंढोरा’ भी खत्म होता दिख रहा है।

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रसोई गैस की पहुँच शहर के साथ ही सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों तक हो, इसके लिए केंद्र सरकार ने ‘उज्ज्वला योजना’ शुरू की थी। इस बहुचर्चित योजना के प्रमुख लक्ष्यों में एक था कि महिलाओं को मिट्टी के चूल्हे से छुटकारा दिला कर उनकी सेहत की रक्षा करना। इसके लिए गाँव-गाँव तक सिलेंडर भी पहुँचाया गया।

आज सवाल उठने लगे हैं कि क्या इस योजना के लाभान्वितों को मिट्टी के चूल्हे से मुक्ति मिली?

सिलेंडर के नाम पर सब्सिडी भी नहीं आती है। दरअसल, ‘स्वच्छ ईंधन बेहतर जीवन’ के नारे के साथ केंद्र सरकार ने एक मई, 2016 को ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ की शुरुआत की थी। इस योजना से महिला सशक्तीकरण, महिला स्वास्थ्य और महिला कल्याण को भी बढ़ावा देना है। लेकिन ऐसा लगता है कि जमीनी स्तर पर यह योजना अपने लक्ष्य से भटक गई है।

ग्रामीण महिलाओं की मानें तो, ‘पहले 400 से 500 में गैस सिलेंडर भरा जाता था और 200 रुपये सब्सिडी भी आ जाती थी, लेकिन अब तो एक गैस सिलेंडर भरवाने में लगभग 1000 रुपये लग जाते हैं और सब्सिडी का पता ही नहीं चलता। इस वजह से हम महिलाएँ गैस सिलेंडर नहीं भरवा पातीं हैं। केवल एक ग्रामसभा की बात की जाए तो दर्जनों महिलाएँ महंगाई के कारण घरेलू गैस सिलेंडर नहीं भरवाती हैं और फिर से मिट्टी के चूल्हे पर ही खाना बना रही हैं।

वहीं, मौजूदा समय में सरकार भले ही ‘बेटी बचाओ और महिलाओं की सुरक्षा के दावे करती हो, लेकिन जमीनी वास्तविकता रिपोर्ट देश में जेंडर गैप की गम्भीरता को दिखाती है।

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देश में आए दिन आ रहे दुष्कर्म और महिला उत्पीड़न के मामले सरकार की महत्वाकांक्षी योजना पर बड़ा सवाल उठाती है कि क्या सरकार इस मुद्दे पर गम्भीरता दिखाएगी या इसे भी नजरअंदाज कर सच्चाई से मुँह मोड़ती रहेगी?

डब्ल्यूईएफ यानी विश्व आर्थिक मंच की वार्षिक लैंगिक अंतराल रिपोर्ट, 2023 में भी भारत को 146 देशों में 127वाँ स्थान मिला था। इस रिपोर्ट में बीते साल के मुकाबले हम 8 स्थान ऊपर जरूर आ गए, लेकिन कई छोटे देशों से अभी भी पीछे रहे।

यहाँ दक्षिण एशिया में बांग्लादेश 72.2 प्रतिशत लैंगिक बराबरी के साथ 59वें स्थान पर था, जबकि श्रीलंका और नेपाल सहित 5 देश भारत से ऊपर थे।

महिला सशक्तीकरण से जुड़े सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और कानूनी मुद्दों पर संवेदनशीलता और सरोकार व्यक्त किया जाता है। सशक्तीकरण की प्रक्रिया में समाज को पारम्परिक पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण के प्रति जागरूक किया जाता है, जिसने महिलाओं की स्थिति को सदैव कमतर माना है।

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रिपोर्ट में डब्ल्यूईआई यानी महिला सशक्तीकरण सूचकांक और जीजीपीआई यानी वैश्विक लिंग समानता सूचकांक से जुड़े आँकड़ें भी साझा किए गए हैं। इन दोनों ही सूचकांकों में भारत को पिछड़े देशों की लिस्ट में रखा गया है।

आँकड़ों के अनुसार, भारत को डब्ल्यूईआई इंडेक्स में 0.52 अंक दिए गए हैं, वहीं जीजीपीआई इंडेक्स में कुल 0.56 अंक मिले हैं। इस लिस्ट में भारत के साथ उसके पड़ोसी देश पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका भी शामिल हैं।

इस रिपोर्ट में महिलाओं के विकास, स्वास्थ्य, स्वतंत्रता, सामर्थ्य की दिशा में हुई प्रगति का आंकलन करने के लिए दोनों सूचकांकों का उपयोग किया गया है। यह दोनों महिला सशक्तीकरण सूचकांक और वैश्विक लिंग समानता सूचकांक अलग-अलग होते हुए भी एक दूसरे के पूरक हैं।

पूरक का मतलब है कि डब्ल्यूईआई इंडेक्स पांच आयामों में विकल्प चुनने और जीवन के अवसरों का लाभ उठाने में महिलाओं के सामर्थ्य और स्वतंत्रता को मापता है, जिनमें स्वास्थ्य, शिक्षा, समावेश, निर्णय लेने और महिलाओं के खिलाफ हिंसा से जुड़े मुद्दे शामिल होते हैं।

इसी तरह, जीजीपीआई इंडेक्स स्वास्थ्य, शिक्षा, समावेशन और निर्णय लेने सहित मानव विकास के मुख्य आयामों में पुरुषों के सापेक्ष महिलाओं की स्थिति का मूल्यांकन करता है।

2023 में जारी इस रिपोर्ट के अनुसार, डब्ल्यूईआई और जीजीपीआई से जुड़े आँकड़ों में भारत को पिछड़े देशों की सूची में रखा गया है। जीजीपीआई यानी वैश्विक लिंग समानता सूचकांक में संसद में महिलाओं की भागीदारी का भी आंकलन किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 के दौरान संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 14.72 फीसदी थी। वहीं, स्थानीय सरकार में उनकी हिस्सेदारी 44.4 फीसदी दर्ज की गई।

इसी तरह यदि शिक्षा की बात करें तो न्यूजक्लिक के अनुसार, 2022 में जहाँ केवल 24.9 फीसदी महिलाओं ने माध्यमिक या उच्चतर शिक्षा हासिल की थी वहीं पुरुषों में यह आँकड़ा 38.6 फीसदी दर्ज किया गया।

इसी तरह यदि 2012 से 2022 के आँकड़ों को देखें तो केवल 15.9 फीसदी महिलाएँ ही मैनेजर पदों पर थीं। यानी शिक्षा और रोजगार के उच्च पदों पर भी महिलाओं के लिए काफी असमानता दिखाई देती है।

रिपोर्ट में मजदूरों का भी जिक्र किया गया है, जिसके अनुसार हमारे देश में विवाहित महिलाएँ या जिनका छह वर्ष से कम उम्र का बच्चा है उनकी श्रम बल में भागीदारी 27.1 फीसदी दर्ज की गई।

इसी तरह 2018 में करीब 18 फीसदी महिलाएँ और लड़कियाँ अपने साथी द्वारा शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार बनी थी। वहीं, 2012 से 2022 के बीच 43.53 फीसदी किशोरियाँ शिक्षा, रोजगार या प्रशिक्षण से वंचित रह गई थी।

यह सही है कि देश में महिलाओं और बच्चियों को प्रत्यक्ष रूप से सशक्त बनाने के लिए ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ जैसी कई सरकारी योजनाएँ शुरू की गई हैं। लेकिन समाज को महिलाओं को लेकर अपनी मानसिकता में भी बदलाव करने की जरूरत है।

हमें यह समझना होगा की समाज महिला और पुरुष दोनों से मिलकर बना है, ऐसे में समुचित विकास के लिए दोनों की ही बराबर की भागीदारी जरूरी है।

अमन विश्वकर्मा
अमन विश्वकर्मा गाँव के लोग के सहायक संपादक हैं।

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