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 मैंने आजतक किसी सवर्ण महिला को डायन प्रथा का शिकार होते नहीं देखा डायरी (2 अगस्त, 2021)

दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है और ना ही किसी को स्थायी होना चाहिए। यह बहुत बुनियादी बात है मानव सभ्यता के मामले में और आज तक यही हुआ भी है। जो संस्कृतियां समय के साथ नहीं बदलती हैं, वे खत्म होती जाती हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह अच्छी बात है। […]

दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है और ना ही किसी को स्थायी होना चाहिए। यह बहुत बुनियादी बात है मानव सभ्यता के मामले में और आज तक यही हुआ भी है। जो संस्कृतियां समय के साथ नहीं बदलती हैं, वे खत्म होती जाती हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह अच्छी बात है। संस्कृतियों को समय के सापेक्ष बदलना ही चाहिए। ऐसे भी सभ्यता कोई अदिश राशि नहीं है। इसकी एक दिशा होती है। यदि यह अपने दिशा की तरफ अग्रसर न हो तो उसके रहने का कोई मतलब नहीं रह जाता।

[bs-quote quote=”मुझे कई बार लगता है कि हिंदी साहित्य में शब्दों की कमियां हैं। खासकर वैसे शब्द जो कमजोर व वंचित लोगों के लिए जरूरी हैं। और महिलाओं के मामले में तो यह कमी और भी खलती है।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

दरअसल, कल मन पूरे दिन खिन्न रहा। इसकी वजह भी रही। कटिहार जिले से एक खबर आयी। खबर ही मेरी बेचैनी की मूल वजह रही। खबर यह कि एक आदिवासी महिला को डायन कहकर पहले तो उसे प्रताड़ित किया गया और बाद में पंचायत ने उसके उपर ही एक लाख रुपए का आर्थिक दंड का फैसला भी सुना दिया। हालांकि जिसे मैं प्रताड़ित कह रहा हूं, वह शब्द उस वेदना की अभिव्यक्ति नहीं करता। मतलब यह कि मारने-पीटने, सिर के बाल काटने, नंगा करके गांव में घुमाने और अंत में उसे पखाना खिलाने को केवल प्रताड़ना नहीं कहा जाना चाहिए। इसके लिए कोई एक शब्द काफी नहीं।

मुझे कई बार लगता है कि हिंदी साहित्य में शब्दों की कमियां हैं। खासकर वैसे शब्द जो कमजोर व वंचित लोगों के लिए जरूरी हैं। और महिलाओं के मामले में तो यह कमी और भी खलती है। हालांकि यह मुमकिन है कि शब्द हों और मुझे इसकी जानकारी न हो। लेकिन यदि मुझे जानकारी नहीं है तो कम से कम इतना तो कह ही सकता हूं कि ऐसे शब्द चलन में नहीं हैं।

खैर, मैं पहले घटना को दर्ज कर लूं। उपरोक्त घटना मेरे गृह राज्य बिहार के सीमांचल जिले कटिहार के फलका इलाके के हथवारा पंचायत के बलवाही संथाली टोले में घटित हुई। इस घटना में पीड़ित और आक्रमणकारी दोनों आदिवासी रहे। जब स्थानीय थानाध्यक्ष उमेश पासवान से दूरभाष पर मेरी बात हुई तो उन्होंने इस घटना की पुष्टि की और मुझे बताया कि इस मामले में गांव के प्रधान सुंदर मरांडी और पूर्व मुखिया महादेव हांसदा सहित कुल 13 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया गया है। हालांकि इस मामले में प्राथमिकी दर्ज करने के बाद क्या कार्रवाई हुई है, इस बारे में उमेश पासवान ने कोई जानकारी नहीं दी। उन्होंने कहा कि वे अभी इस मामले की तहकीकात कर रहे हैं।

[bs-quote quote=”रूढ़िवादिता को लेकर कई मित्रों के साथ बहस होती है। इनमें कुछ आदिवासी मित्र भी हैं और दलित व पिछड़े वर्ग के भी। उनके मुताबिक उनकी संस्कृति अक्षुण्ण रहनी चाहिए। इसका मतलब यह कि वे चाहते हैं कि संस्कृति और परंपरा के नाम पर अंधविश्वास को जारी रखा जाना चाहिए। लेकिन मैं उनका विरोध करता हूं। मैं तो उन्हें उदाहरण देकर समझाता भी हूं कि डायनें अब केवल दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के परिवारों में होती हैं। मैंने आज तक किसी सवर्ण महिला को डायन प्रथा का शिकार होते नहीं देखा।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

उपरोक्त घटना कोई पहली घटना नहीं है। इसके पहले भी कई बार मेरे संज्ञान में आयीं और एक बार तो पटना से प्रकाशित दैनिक आज में काम करते हुए मैंने परिशिष्ट ‘दृष्टि’ के तहत डायन कुप्रथा को लेकर एक विशेष पृष्ठ तैयार किया था। उसमें मैंने बिहार के सुदूर जिलों के अलावा राजधानी पटना में एक साल के अंदर डायन के नाम पर होने वाली घटनाओं की चर्चा की थी। एक घटना तो बोरिंग रोड इलाके की थी जो कि पटना का पॉश इलाका माना जाता है। वह हाई प्रोफाइल मामला था। एक पूर्व आईएएस अधिकारी के परिवार ने अपनी बहू पर डायन होने का आरोप लगाया था और उसके साथ अमानवीय व्यवहार किया था। चूंकि मामला हाई प्रोफाइल था तो पटना की तथाकथित सुशासनी पुलिस ने भी हाथ नहीं डाला। महत्वपूर्ण जानकारी यह कि उक्त पूर्व आईएएस अधिकारी पिछड़ा वर्ग का था।

दरअसल, डायन संबंधी मामलों के लिए देश में कानून है। यह सभी जानते हैं कि इसके लिए डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम, 1999 में कड़े प्रावधान किए गए हैं। इसके मुताबिक यदि कोई भी व्यक्ति किसी औरत को डायन के रूप में पहचान कर उसे शारीरिक या मानसिक यातना, जान-बूझकर देता है या अन्यथा किसी पकार प्रताड़ित करता है, तो उसे छः माह तक की अवधि के लिए कारावास की सजा अथवा दो हजार रुपया तक के जुर्माने अथवा दोनों सजाओं से दंडित किया जा सकता है।

अब दो समस्याएं हैं। पहली समस्या तो यही कि बिहार की पुलिस इस कानून को कानून मानती ही नहीं। यदि मानती तो उपरोक्त घटना में पुलिस ने पीड़िता के आवेदन पर जिन 13 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करायी, उन्हें अविलंब गिरफ्तार कर लिया जाना चाहिए था। उनसे पूछताछ की जानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। आज सुबह डायरी का यह पन्ना लिखने से पहले भी मैंने स्थानीय लोगों से जानकारी ली तो पता चला कि किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है। सभी आरोपी गांव में हैं। कल वहां पुलिस भी गयी थी। लेकिन किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई।

[bs-quote quote=”इसे केवल कानून के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता है। इसके लिए सामाजिक पहल किए जाने की आवश्यकता है। लेकिन मैं यह कह किससे रहा हूं? उस समाज से जो बड़ी तेजी से ब्राह्मणों का गुलाम बनता जा रहा है। एक तो उसकी अपनी संकीर्णताएं और उपर से ब्राह्मणवादी संकीर्णताएं, दोनों मिलकर स्थितियों को भयावह बना रही हैं।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

मेरे लिहाज से पुलिस को इस पूरे मामले में संवेदनशील बनाए जाने की जरूरत है और उन्हें बताया जाना चाहिए कि यदि किसी महिला को डायन कहकर उसके साथ अमानवीय घटना को अंजाम दिया जाता है तो उसे जघन्य अपराध माना जाना चाहिए। केवल संज्ञेय मामला कहने मात्र से बात नहीं बनेगी। कानून में भी संशोधन की आवश्यकता भी है। सजा का स्वरूप वही हो जो बलात्कार के मामले में होता है। मेरा वश चले तो मैं इसके लिए आजीवन कारावास का प्रावधान कर दूं। लेकिन मैं अपनी सीमा जानता हूं। कानून बनाना या फिर उसमें संशोधन करना विधायिका का काम है।

परंतु, समस्या यही है कि हमारे नीति निर्माताओं की नजर में यह कोई अपराध है ही नहीं। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि एक महिला के साथ जानवरों से भी बदतर सुलूक किया जाता है।

कई बार रूढ़िवादिता को लेकर कई मित्रों के साथ बहस होती है। इनमें कुछ आदिवासी मित्र भी हैं और दलित व पिछड़े वर्ग के भी। उनके मुताबिक उनकी संस्कृति अक्षुण्ण रहनी चाहिए। इसका मतलब यह कि वे चाहते हैं कि संस्कृति और परंपरा के नाम पर अंधविश्वास को जारी रखा जाना चाहिए। लेकिन मैं उनका विरोध करता हूं। मैं तो उन्हें उदाहरण देकर समझाता भी हूं कि डायनें अब केवल दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के परिवारों में होती हैं। मैंने आज तक किसी सवर्ण महिला को डायन प्रथा का शिकार होते नहीं देखा।

दरअसल, यही बात समझने की है। गांवों में अब भी सड़ी-गली परंपराएं हैं। अभी हाल ही में एक दलित लेखिका व रंगमंच कलाकार सुजाता पारमिता का निधन हुआ। उनकी आत्मकथा का एक अंश पढ़ने का मौका मिला। अपनी आत्मकथा में वह लिखती हैं कि उनकी मां उन्हें अपशकुनी मानती थी क्योंकि वह तेतर (तीन बेटों के बाद जन्म लेने वाली बेटी) थी और उनके जन्म लेने के बाद ही उनके बड़े भाई का देहांत हो गया था। पारमिता की मां कौशल्या बैसंत्री स्वयं भी नामी दलित लेखिका रहीं। उनके पति भारत सरकार के बड़े अधिकारी रहे। पारमिता अपनी आत्मकथा में बताती हैं कि उन्हें केवल इस कारण से अपनों के द्वारा जानवरों जैसे सुलूक का शिकार होना पड़ा।

बहरहाल, डायनों का पूरा मामला एक बहस की डिमांड करता है। इसे केवल कानून के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता है। इसके लिए सामाजिक पहल किए जाने की आवश्यकता है। लेकिन मैं यह कह किससे रहा हूं? उस समाज से जो बड़ी तेजी से ब्राह्मणों का गुलाम बनता जा रहा है। एक तो उसकी अपनी संकीर्णताएं और उपर से ब्राह्मणवादी संकीर्णताएं, दोनों मिलकर स्थितियों को भयावह बना रही हैं।

स्त्रियों के जीवन का बखान करती मिथिला पेंटिंग (संजू दास)

खैर, कल देर रात एक कविता जेहन में आयी।

 

 

झाड़ू लगाती औरतें

कपड़े धोती औरतें

पोंछा लगाती औरतें

चावल बीनती औरतें

सब्जियां काटती औरतें

अदहन चढ़ाती औरतें

छौंक लगाती औरतें

बिस्तर ठीक करती औरतें

बिछावन पर बिछती औरतें

बच्चा जनती औरतें

दर्द से कराहती औरतें

पत्थर तोड़ती औरतें

हंसती औरतें,

रोती औरतें,

पत्थरों के युग से आजतक,

मेसोपोटामिया से सिंधु तक

हारती औरतें,  जीतती औरतें।

 

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

 

गाँव के लोग
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2 COMMENTS

  1. सच का ब्यान करता आर्टिकल।आज सच्चाई यही है।दलित और पिछड़े वर्ग के गाँव में डायन के नाम पर हर जगह आपसी विवाद है।कहीं कहीं विस्फोटक रूप ले लेता है।
    पंचायत इसी तरह का फैसला सुनाता है।बाल मुड़ाकर चुना का टीका लगाकर पूरे गाँव में घुमाना ।
    समाज में जागरूकता लाने के लिए किसी प्रकार का कोई पहल नहीं किया जाता।
    शम्भू शरण सत्यार्थी

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