सत्यनारायण पटेल भारतीय गांव के समकालीन हालात के चितेरे हैं

रणधीर कुमार सिंह

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‘लाल छींट वाली लुगड़ी का सपना’ सत्यनारायण पटेल की दूसरी कहानी संग्रह है। इस संग्रह में चार कहानियां संकलित है- सपने के ठूँठ पर कोंपल, नकरो, गम्मत और लाल छींट वाली लुगड़ी का सपना। सत्यनारायण पटेल एक बेहतर समाज बनाने का सपना लिए हिन्दी कथा-साहित्य के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। सत्यनारायण पटेल को भेम का भेरु मांगता कुल्हाड़ी ईमान कहानी-संग्रह के लिए ‘वागेश्वरी सम्मान’ और लाल छींट वाली लुगड़ी का सपना कहानी-संग्रह के लिए ‘प्रेमचन्द स्मृति कथा सम्मान’ से सम्मानित किया जा चुका है।
समकालीन हिन्दी कहानी का संसार बहुत व्यापक है। हिंदी में बहुआयामी कहानियां लिखी जा रही हैं। बाजारवाद, सामंतवाद, पूंजीवाद, सम्राज्यवाद, वर्ग-संघर्ष, स्त्री, दलित, आदिवासी, ग्रामीण समाज पर कहानी लिखी जा रही है। यह हिन्दी कहानी के लिए सुखद है। सत्यनारायण पटेल की एक कहानी नकारो ग्रामीण महिलाओं के आपसी झगड़े में दी जाने वाली गालियों पर लिखी गयी है। इससे हिन्दी कहानी के साथ-साथ लेखक के विषय विविधता और व्यापकता का पता चलता है। सत्यनारायण पटेल की रचनात्मकता में ग्रामीण समाज, किसान-मजदूर का संघर्ष बेबाकी से दर्ज होता है। बाजार का प्रभाव और उससे तेजी से बदलते समाज की अभिव्यक्ति उनके लेखन के केंद्र में है।
लाल छींट वाले लुगड़ी का सपना कहानी की शुरुआत मंदिर में होने वाली आरती की सूचना देती शंख की आवाज से होती है। दिलचस्प है कि आज की क्रांतिकारी युवा पीढ़ी जो अपने को प्रगतिशील, आधुनिक भाव-बोध वाली बताती है, वह मंदिर-मस्जिद का नाम सुनते ही ऐसे भड़कते हैं जैसे लाल कपड़ा देखकर सांड़। इनको ग्रामीण किसानी-संस्कृति के रिचुअल की तनिक भी जानकारी नहीं है। ऐसे में इन्हें ग्रामीण किसानी-संस्कृति की रिचुअल्‌ में भी मनुवाद और ब्राह्मणवाद दिखायी देता है। ऐसे क्रांतिकारी साथी किसानी-संस्कृति को एक झटके में खारिज कर देते हैं। मंदिर-मस्जिद, पूजा-आरती में जाने वाला प्रत्येक व्यक्ति ब्राह्मणवाद का पोषक हो, यह कतई जरूरी नहीं है। लेखक इस बात की ओर इशारा करता है – डूँगा मंदिर में होने वाली आरती में जाता तो था, पर उसे न भगवान पर कोई भरोसा था न आरती गाने का शौक। फिर भी वह आरती में जाता, क्योंकि वहां ढपली, करताल, खँजड़ी और झाँझ होती, और डूँगा झाँझ, करताल, ढपली और खँजड़ी बजाने का शौकीन था।

डूँगा कोई बड़ी गाड़ी, बंगला वगैरह-वगैरह जैसी चीज पाने का सपना नहीं देखता है। वह तो अपनी जी (माता जी) के लिए एक नयी लुगड़ी जैसी छोटी वस्तु का सपना देखता है और वह भी पूरा नहीं कर पाता। होरी जिसे डूँगा का साहित्यिक पुरखा कह सकते हैं उनका भी एक छोटा सा सपना था जो पूरा नहीं होता।

 

सपना देखना सत्यनारायण पटेल के जीवन का अनिवार्य हिस्सा है। अनायास नहीं है कि इस संग्रह की दो कहानियां- सपने के ठूँठ पर कोंपल और लाल छींट वाली लुगड़ी का सपना में न केवल सपना शब्द का प्रयोग हुआ है बल्कि सतीश और डूंगा के सपने की कहानी है। सतीश सामाजिक-आर्थिक गैर-बराबरी को मिटाकर एक बेहतर समाज निर्माण का सपना देखता है। वहीं डूंगा का सपना एक नयी लाल छींट वाली लुगड़ी का है। दोनों अपने सपने को साकार करने के लिए भरपूर कोशिश भी करते हैं। दिन-रात मेहनत करते हैं। हालांकि दोनों के संघर्ष भिन्न हैं। लेकिन दोनों अपने सपने को पूरा नहीं कर पाते हैं। पंजाबी का एक क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह ‘पाश’ कहता है- ‘सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर।’ सपना का पूरा न होना इतना खतरनाक नहीं है जितना कि सपना न देखना। सपना मनुष्य को संघर्ष करने के लिए प्रेरित करता रहता है।

डूँगा कोई बड़ी गाड़ी, बंगला वगैरह-वगैरह जैसी चीज पाने का सपना नहीं देखता है। वह तो अपनी जी (माता जी) के लिए एक नयी लुगड़ी जैसी छोटी वस्तु का सपना देखता है और वह भी पूरा नहीं कर पाता। होरी जिसे डूँगा का साहित्यिक पुरखा कह सकते हैं उनका भी एक छोटा सा सपना था जो पूरा नहीं होता। किसान-मजदूर, कामगारों का कोई भी सपना तब तक पूरा नहीं हो पाएगा जब तक सरकार की नीति और नीयत में खोट है। डूँगा ऐसे समय और महान देश का किसान था, जिसमें डूँगा तो क्या, उसके जैसे गांव के किसी भी सामान्य किसान का पेट भरने के अलावा कोई सपना देखना और मेहनत की फसल बेच कर जीते-जी सपना पूरा करने का सोचना गुनाह से कम न था। ऐसा करने का मतलब सरकार और उसकी नीतियों की खुल्लम खुल्ला तौहीन करना था।
सरकार ने बहुत ही विकसित और ताकतवर देशों की सरकारों की मंशानुसार जो नीतियां बनाई थीं, उन्हें समझना डूँगा जैसे धोती छाप नासमझ के बस का तो था ही नहीं। प्रेमचंद लिखते हैं- ‘हर एक गृहस्थ की भाँति होरी के मन में भी गऊ की लालसा चिरकाल से संचित चली आती थी। यही उसके जीवन का सबसे बड़ा स्वप्न, सबसे बड़ी साध थी।’ डूँगा का सपना केवल उसका सपना नहीं है बल्कि उसके दायजी (पिता) का भी सपना था। डूँगा के दायजी भी अपनी जवानी के दिनों में उसके जी के लिए एक नयी लुगड़ी लाना चाहते थे, पर नहीं ला सके। डूँगा अपनी जी (माता) से कहता है- ‘जद हूँ  बड़ो हुई जाउवाँ थारा सरू एक बहोत अच्छी लुगड़ी लउवाँ।’ डूँगा और उसके दायजी दोनों के जीवन में ऐसा असर नहीं आता है कि वह एक अच्छी लुगड़ी ला सकें। यह किसान-मजदूर, कामगारों के जीवन की त्रासदी है। इस कहानी को पढ़ते हुए अब्दुल बिस्मिल्लाह का उपन्यास झीनी-झीनी बीनी चदरिया के इकबाल और उसकी अम्मा की याद आती है। ‘साड़ी उसे नहीं बेचनी थी, अपनी माँ को दे देनी थी। जब वह छोटा था, तभी से माँ की लालसा को वह देखता आ रहा था। छिः! दुनिया-भर के लिए साड़ी बनाकर देने वाले घर की औरतों को एक सस्ते दामवाली बनारसी साड़ी भी नसीब नहीं! पूरी उम्र कट गयी सूती धोतियों और छींट की सलवार-कमीज पर! अरे जैसे इतना कर्ज है, वैसे ही कुछ कर्ज और चढ़ जाता और क्या! आज साड़ी पर इस तरह उसकी अंगुलियां फिर रही थीं- जैसे कोई भूखा बच्चा रोटी पर अपना हाथ फेरे!’

कथा- भाषा, चरित्र एवं वातावरण आदि दृष्टि से सत्यनारायण पटेल प्रेमचन्द और फणीश्वरनाथ रेणु के परम्परा को आगे बढ़ाने वाले कथाकार हैं। चित्रित विषय, चरित्र एवं वातावरण के अनुरूप भाषा का वैविध्य कहानी की भाषा का प्रमुख गुण होता है। भाषा की अपनी सृजनात्मकता से कहानीपन के साथ-साथ यथार्थ के सटीक और प्रभावपूर्ण अंकन में भी सहायता मिलती है।

 

लाल छींट वाली लुगड़ी का सपना मूल रूप से भारतीय गांव के बदलते स्वरूप की कहानी है। ग्रामीण लोगों के जीवन में भी बाजारवाद के दखल को यहां देखा जा सकता है। ‘डूँगा का गांव ए बी रोड के किनारे बसे अनेक गांवों में से एक था। गांव की एक बाजू में प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी के नाम से विख्यात शहर और दूसरी बाजू में एक औद्योगिक शहर। दोनों शहर गांव के विकास और उद्धार का डंका बजाते, अपनी मस्ती में मस्त सांड की तरह डुकराते, गांव की ओर बढ़ते, शहर के हस्तक्षेप से गांवों के हुलिए जिस गति से बदल रहे थे, उस तेजी से डूँगा सरीखे देख-समझ भी नहीं पा रहे थे।’ डूँगा सरीखे लोग भले ही इस बदलाव को नहीं देख पा रहे हों, पर युवा पीढ़ी इससे अछूती नहीं है। वह पूरी तरह से बाजारवाद के गिरफ्त में है। डूँगा की बेटी बारहवीं तक पढ़ी है। दिनभर टीवी देखती है। डूँगा की पत्नी को अंदेशा है कि कहीं पवित्रा भी टीवी की डाकनों जैसी करने लगी तो? पवित्रा की कुछ आदतें थीं भी ऐसी, जो पारबती को लगता कि वह डाकनों से सीखी होगी। डूँगा की पत्नी इस बदलाव को महसूस कर रही है।

बाजारवाद से प्रभावित युवा पीढ़ी अब खेती नहीं करना चाहती है, परन्तु डूँगा सरीखे किसानों को अपनी खेती-किसानी पर नाज है। अपनी जमीन से प्यार है। वे किसी कीमत पर जमीन नहीं बेचना चाहते हैं। जमीन बेच देंगे तो करेंगे क्या? डूँगा को भी यह प्रश्न परेशान करता है कि यदि वह खेत बेच देगा, तो काम क्या करेगा? रोटी कहाँ से कमाएगा? क्या वह धरती का बेटा, धरती को बेचे पैसों से रोटी खरीद कर खाएगा? खेत में मेहनत करे बगैर उसे रोटी हजम हो जाएगी? नींद आ जाएगी? कोई बेटा अपनी माँ का सौदा करके चैन से सो सकता है? सरकार और पूँजीपति मिलकर किसानों को बर्बाद करना चाहते हैं ताकि उनके खेतों को पूँजीपतियों को दिया जा सके। किसानों को बर्बाद करने के लिए अभी हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा तीन नये कृषि-कानून बनाये गये हैं। किसानों के खिलाफ इस प्रकार का षड्यंत्र कोई नयी बात नहीं है, यह अंग्रेजों के जमाने से ही होता आ रहा है। प्रेमचंद का उपन्यास रंगभूमि के सूरदास का जमीन कैसे हड़पा जाता है? सुधीजन जानते हैं। मिस्टर जॉन सेवक सूरदास से जमीन लेकर वहाँ सिगरेट की कंपनी खोलना चाहता है। वह सूरदास के जमीन का मुँह-मांगा दाम देने के लिए तैयार है। सूरदास जॉन सेवक से कहता है कि ‘सरकार, पुरुखों की यही निशानी है, बेचकर उन्हें कौन मुंह दिखाऊंगा?’ सूरदास जमीन बचाने के लिए भरपूर संघर्ष करता है। लेकिन अंततः असफल होता है। जॉन सेवक कल-छल-बल से जमीन लेने में कामयाब हो जाता है और सिगरेट की कंपनी स्थापित करता है। डूँगा भी अपनी जमीन को पूंजीपतियों को नहीं देना चाहता है। उसका साला मदन भी चाहता है कि डूँगा जमीन बेच दे। मदन अपनी बहन और भाँजी को समझाने में सफल भी हो जाता है। लेकिन डूँगा कहता है कि ‘मदन, जिनको मन जी का दूध से नी भरियो, जी का खून पीना से, गोश्त खाना से कैसे भरेगा?’ पूँजीपतियों के दलाल डूँगा को बहुत परेशान करते हैं, तरह-तरह के भय दिखाते हैं। यहां तक कि उसकी बेटी को उठा लेने का भय दिखाते हैं। फिर भी डूंँगा अपनी जमीन बेचने के लिए तैयार नहीं होता है। वह जमीन को माता के समान मानता है और वह अपनी मां का सौदा नहीं कर सकता। डूँगा के सामने संकट ये है कि उसे अब बेटी की आबरू और माता (जमीन) दोनों में से एक को चुनना है। लेखक उसे इस संकट से बचा लेता है। किशोर डूँगा को बताता है कि ‘काका जा, थारो खेत अभी नी बिकेगो। थारो खेत लेने वाली बम्बई की पार्टी तो डूबी गई।’ देखना यह है कि आखिर कब तक किसानों के खेत बच पा रहे हैं? जब सरकार खुद पूँजीपतियों के साथ खड़ी होकर किसानों को बर्बाद करना चाहती है तो हमें और अधिक सजग और मुस्तैद रहने की जरूरत है। तभी किसान बच सकते हैं। प्रकृति बच सकती है। मनुष्यता बच सकती है।
कथा- भाषा, चरित्र एवं वातावरण आदि दृष्टि से सत्यनारायण पटेल प्रेमचन्द और फणीश्वरनाथ रेणु के परम्परा को आगे बढ़ाने वाले कथाकार हैं। चित्रित विषय, चरित्र एवं वातावरण के अनुरूप भाषा का वैविध्य कहानी की भाषा का प्रमुख गुण होता है। भाषा की अपनी सृजनात्मकता से कहानीपन के साथ-साथ यथार्थ के सटीक और प्रभावपूर्ण अंकन में भी सहायता मिलती है। ‘लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना’ कहानी-संग्रह में कई तरह के चरित्र हैं, घटनाएं हैं, मानसिकता है, सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य हैं और इनकी अभिव्यक्ति के अनुरूप भाषा की सृष्टि हुई है। सत्यनारायण पटेल अपनी कहानियों में आँचलिक शब्दों का खूब इस्तेमाल करते हैं। परंतु इससे कहीं कहानीपन या पठनीयता में बाधा नहीं उत्पन्न होती है।
संदर्भ सूची:-
1.पटेल, सत्यनारायण: ‘लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना’ (2011), अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद, पृष्ठ सं• 98
2. पाश : ‘संपूर्ण कविताएँ’ (संपा•एवं अनु•- चमनलाल)(2011), आधार प्रकाशन, पंचकूला, पृष्ठ सं• 200
3.पटेल, सत्यनारायण: ‘लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना’ (2011), अंतिका प्रकाशन,गाजियाबाद, पृष्ठ सं• 126
4.प्रेमचन्द : ‘गोदान’ (2004), वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ सं• 7
5 .पटेल, सत्यनारायण: ‘लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना’ (2011), अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद, पृष्ठ सं• 104
6. बिस्मिल्लाह, अब्दुल: ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ (1986), राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ सं•190
7.पटेल, सत्यनारायण: ‘लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना’ (2011), अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद, पृष्ठ सं• 115
8.वही , पृष्ठ सं• 117
9.वही, पृष्ठ सं• 118
10.प्रेमचन्द : ‘रंगभूमि'(2011), भारती ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, पृष्ठ सं• 11
11.पटेल, सत्यनारायण: ‘लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना’ (2011), अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद, पृष्ठ सं• 124
12.वही, पृष्ठ सं•  135

रणधीर कुमार सिंह अध्यापक हैं और हजारीबाग में रहते हैं। 

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