क्या मध्य प्रदेश में शिक्षा पर चुनिंदा लोगों का ही अधिकार है ?

रीना शाक्य

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मध्य प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा के परिदृश्य में वह सब कुछ है जो किसी बड़ी रिपोर्ट में उसके दयनीय हालात की कहानी बयान करने के जरूरी तत्व होते हैं । मसलन छत और अध्यापक विहीन स्कूल , प्रयोगशाला , पेयजल और शौचालय का अभाव, जाति-वंचना और उत्पीड़न , अध्यापकों को दीगर कामों में लगाने, मिड डे मील और दूसरी वस्तुओं के बजट में भ्रष्टाचार आदि। मध्य प्रदेश प्राथमिक शिक्षा के मामले में कितना पिछड़ चुका है बता रही हैं ग्वालियर की सामाजिक कार्यकर्ता रीना शाक्य

शिक्षा मनुष्य के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास में खाद-पानी का काम करता है। जिस तरह पौधे को पोषण व विकास के लिए खाद-पानी बेहद जरूरी है वैसे ही व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में शिक्षा सबसे जरूरी मानसिक पोषक तत्व है। अशिक्षा समाज के विकास को अवरूद्ध करता है। बिना शिक्षित समाज के विकास की कल्पना बेमानी है। बच्चे कुम्हार की मिट्टी की तरह होते हैं, मिट्टी से क्या आकार बनाना है यह कुम्हार पर निर्भर करता है। उसी प्रकार बच्चे देश का भविष्य होते हैं, बच्चों का भविष्य कितना उज्जवल होगा यह सरकार की शिक्षा प्रणाली पर निर्भर करता है।

पिछली सदी के अंतिम दशक से केन्द्र व राज्य सरकारों की शिक्षा नीति पर नजर डालें तो साफ पता चलता है कि सरकार ने शिक्षा को बाजारी वस्तु में तब्दील कर दिया है। सरकारी स्कूलों के मुकाबले निजी स्कूलों की बाढ़ आ गई है। जहां व्यक्ति अपनी हैसियत के हिसाब से अपने बच्चों का एडमिशन करवाता है। जिसके पास पैसा होगा वही अच्छी शिक्षा ग्रहण कर सकता है और अपने का भविष्य उज्जवल बना सकता है।

हमें इस बात पर विचार करना होगा कि क्या कारण है कि आमजन का सरकारी स्कूलों से लगातार मोह भंग होता चला जा रहा है। इसके लिए हमें सरकार की शिक्षा के प्रति नजरिये को समझना होगा। एक ओर सरकार निजी स्कूलों को बिना किसी मूलभूत सुविधा की जांच किये ही स्कूल खोलने की अनुमति प्रदान कर रही है, जैसे स्कूल में बच्चों के अनुपात में शिक्षकों कितनी संख्या है, शिक्षकों की शैक्षणिक योग्यता बच्चों को शिक्षा देने के लिए उपयुक्त है या नहीं, बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए खेल का मैदान है या नहीं इत्यादि तमाम बाते हैं जो स्कूल खोलने की अनुमति से पहले देखने की आवश्यकता होती है परन्तु भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी की वजह से लगातार इन बातों की अनदेखी होती है । इसके चलते निजी स्कूलों की बाढ़-सी आ गई है।

छतविहीन स्कूल

सरकार शिक्षा के प्रति कितनी गंभीर है इसका आंकलन इस आंकड़े से पता चलता है जिसके तहत मध्यप्रदेश में 2197 प्राथमिक शालाओं के पास स्वयं का भवन तक नहीं है। 12760 माध्यमिक शालाओं के पास स्वयं के भवन नहीं हैं। इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे शिक्षा किस प्रकार ग्रहण करते होंगे इसका आंकलन आप ख़ुद कर  सकते हैं। ये स्कूल किसी पंचायत भवन में या किसी पेड़ के नीचे अथवा आंगनवाड़ी में या गौशा लाओं में लगते हैं। एक तरफ सरकार ‘स्कूल चले हम’ का नारा देती है । हम पूछना चाहते हैं कि अगर बच्चा स्कूल जायेगा तो पढ़ेगा कहाँ?

सरकार एक और नारा देती है कि ‘सभी पढ़े, सभी बढ़ें’। वहीं दूसरी तरह सरकारी स्कूलों पर नजर डालते हैं तो पाते हैं कि आज भी मध्यप्रदेश में 4662 स्कूल ऐसे हैं जहां एक भी शिक्षक नहीं है। 17972 स्कूल ऐसे हैं जो मात्र एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। (ये आंकड़े यू-डाईस की रिपोर्ट से लिए गये हैं)। इन आंकड़ों से अनुमान लगाया जा सकता है कि सरकार शिक्षा के प्रति कितनी गंभीर है।

उपरोक्त आंकड़ों के बावजूद मध्यप्रदेश सरकार 01 लाख 08 हजार सरकारी स्कूलों को बंद कर रही है। सरकार का तर्क यह है कि इन स्कूलों में बच्चों की संख्या कम होने के कारण इन स्कूलों को बंद किया जा रहा है। आज सरकार मुनाफे की हवस में इतनी अंधी हो गई है कि उसे घाटे में चल रही सभी सरकारी संस्थाओं का इलाज बंद करने में ही नजर आता है। सरकार ने यह जानने का प्रयास कभी नहीं किया कि आखिर बच्चे स्कूल क्यों नहीं आ रहे ? इनके कारणों को खोजने पर पता चलता कि बच्चों के माता-पिता तो अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं परन्तु सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था इतनी लचर हो चुकी है कि कोई भी अपने बच्चों का भविष्य खराब नहीं करना चाहता। किसी भी इमारत की मजबूती का आधार उसकी बुनियाद पर निर्भर करता है। अगर बुनियाद मजबूत नहीं होगी तो मकान ऊपर से देखने में कितना भी आलीशान लगे परन्तु भूकम्प के हल्के झटके में ही भरभराकर नीचे गिर जायेगा। यही स्थिति आज हमारी शिक्षा व्यवस्था के साथ है।

बच्चों को स्कूल से बाहर रखने का खामोश षड्यंत्र

आज सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के माता-पिता की आर्थिक स्थिति इतनी नहीं होती कि वे अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ा सकें इसलिए वे सरकारी स्कूलों में भेजने को मजबूर होते हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार का शिक्षा पर होने वाले खर्च से लगातार बजट को कम करना यह दर्शाता है कि सरकार ने शिक्षा को आम जनता की पहुंच से दूर कर मुट्ठी भर लोगों तक सीमित कर दिया है ।

सवाल यह है कि छात्र पढ़ना नहीं चाहते या सरकार की मंशा में खोट है। जहां मध्यप्रदेश व अन्य राज्यों में बच्चे सरकारी स्कूलों की जगह प्राइवेट स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं वहीं केरल सरकार ने उदाहरण प्रस्तुत करते हुए 10 हजार करोड़ की व्यवस्था कर सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में खर्च किया है। उसका नतीजा यह है कि 01 लाख से ऊपर छात्र निजी स्कूलों को त्यागकर सरकारी स्कूलों में प्रवेष लिया है। वहां मंत्री, विधायक, सांसदों के बच्चों का भी दाखिला सरकारी स्कूलों में किया जाता है। केरल सरकार ने कक्षा-01 से लेकर 08वीं तक के सभी विद्यालयों को डिजिटल कर दिया है।

आज से तकरीबन चार साल पहले 22 दिसम्बर 2017 को इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार मध्यप्रदेश में ‘स्कूल चले हम’ अभियान के तहत अरबों रुपये विज्ञापन में बहाने के बाद भी 2.9 प्रतिशत बच्चों का पंजीयन स्कूल में नहीं हो पाया। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार ही 6-14 वर्ष की उम्र के 8.5 प्रतिषत बच्चे स्कूल में दाखिल होने के बाद प्राइमरी शिक्षा पूरी होने के पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं।

मध्यप्रदेश सरकार एक तरफ ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा देती है और भारत माता की जय न कहने पर देशभक्त व देशद्रोही जैसे माहौल को पैदा करती है और वहीं दूसरी ओर जीती-जागती सांस लेती बेटियों की शिक्षा में स्थिति यह है कि 7-10 साल की 2.9 प्रतिषत बच्चियाँ स्कूल से बाहर हैं।

स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता खराब होने के कारण काफी चिंताजनक आंकड़े हैं। इंडियन एक्सप्रेस  के अनुसार 3 प्रतिशत 8वीं में पढ़ने वाले बच्चे किताब पढ़ पाने की स्थिति में नहीं है। और 13.5 प्रतिषत 8वीं के बच्चे केवल कक्षा-01 की किताब पढ़ पाते हैं। 64.3 प्रतिशत 8वीं के बच्चे कक्षा-2 की किताब पढ़ पाते हैं।

जिस देश में शून्य का अविष्कार होने का गौरव प्राप्त है वहां के बच्चों के गणित की स्थिति और भी दयनीय है। रिपोर्ट के अनुसार कक्षा 5वीं में पढ़ने वाले 6.7 प्रतिशत बच्चे 1 से 9 अंकों की पहचान नहीं कर पाते हैं। 8वीं में पढ़ने वाले बच्चे 1.6 प्रतिशत इन अंको का अंकों को पहचान पाना मुश्किल है। 8.1 प्रतिषत बच्चे अल्फाबेट के शब्द ठ ब क को भी नहीं पढ़ पाते हैं। ऐसे बच्चों के भविष्य का हम स्वयं ही आकलन कर सकते हैं।

 असलियत ऐसी है

केन्द्र सरकार जोर-शोर मचाकर स्वच्छ भारत अभियान का ढोल पीट रही है जबकि मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चैहान (मामा जी) की सरकार ने शिक्षकों और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को खुले में शौच से रोकने का काम सौंप दिया है। बहुत बढ़िया! एक तो स्कूलों में शिक्षकों का पहले से ही अभाव है ऊपर से मामा जी का फरमान ! अगर शिक्षक ये देखने जायेगा कि खेत में लोटा लेकर कौन बैठा है तो वह कब पढ़ाएगा ?  सरकार ने शौचालय के लिए  कितने भी गड्डे खुदवाये हों लेकिन स्कूलों के शौचालयों की स्थिति इस कदर खराब है कि 20 प्रतिशत स्कूलों में शौचालय ही नहीं है और जहां है भी वहां पानी की व्यवस्था न होने कारण 35.9 प्रतिशत इस्तेमाल ही नहीं हो पाते हैं। 28.4 प्रतिशत स्कूल में छात्राओं के लिए अलग से शौचालय नहीं है। एक तरह तो मोदी जी पूरे देश को डिजिटल इंडिया में बदल रहे हैं वहीं सरकारी स्कूलों में 97.5 प्रतिशत में कम्प्यूटर की व्यवस्था नहीं है।

सरकार के स्वयं की रिपोर्ट के अनुसार वर्ग-02 और वर्ग-03 में लगभ 30 हजार पद रिक्त हैं। सरकार ने पूर्व में शिक्षक भर्ती वर्ष 2011 में निकाली थी। उसके बाद आज तक कोई शिक्षकों की भर्ती नहीं हुई है। सरकारी स्कूलों में असुविधा और अव्यवस्था की स्थिति इतनी बदतर है कि कैग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार 53 हजार 345 स्कूल बच्चों के लिए असुरक्षित हैं। इन स्कूलों में बाउंड्री न होने के कारण असामाजिक तत्व स्कूल में घुस आते हैं और आवारा पशुओं के तो क्या ही कहने। 64 हजार स्कूलों में हेडमास्टर के लिए अलग से कोई दफ्तर नहीं है। कक्षा वाला कमरा ही कार्यालयीन कार्य के लिए होता है।

शिक्षा केवल किताबी ज्ञान का नाम नहीं है । वह प्रायोगिक व तर्कपूर्ण होनी चाहिए। मगर म.प्र. के सरकारी स्कूलों में 10 हजार 763 स्कूलों में प्रयोगशाला नहीं है।

 पेयजल की समस्या और जाति

राज्य के 5176 स्कूलों में पेयजल व्यवस्था नहीं है। 44 हजार 754 स्कूलों में खेल का मैदान नहीं है। 9.3 प्रतिषत दलित बच्चे कक्षा में आगे बैठने का साहस नहीं कर पाते है। 57 प्रतिषत दलित बच्चे तब पानी पी पाते हैं जब गैर दलित पानी पिलाये। 79 प्रतिषत दलित मध्याह्न भोजन की रसोई में प्रवेश नहीं कर पाते।

अब सवाल यह है कि छात्र पढ़ना नहीं चाहते या सरकार की मंशा में खोट है। जहां मध्यप्रदेश व अन्य राज्यों में बच्चे सरकारी स्कूलों की जगह प्राइवेट स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं वहीं केरल सरकार ने उदाहरण प्रस्तुत करते हुए 10 हजार करोड़ की व्यवस्था कर सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में खर्च किया है। उसका नतीजा यह है कि 01 लाख से ऊपर छात्र निजी स्कूलों को त्यागकर सरकारी स्कूलों में प्रवेष लिया है। वहां मंत्री, विधायक, सांसदों के बच्चों का भी दाखिला सरकारी स्कूलों में किया जाता है। केरल सरकार ने कक्षा-01 से लेकर 08वीं तक के सभी विद्यालयों को डिजिटल कर दिया है।

डॉ अम्बेडकर के शब्दों में कहें तो ‘‘शिक्षा शेरनी का वह दूध है जिसे पीकर बच्चा गुर्राने लगता है।’’ यह बात हम और पास समझें न समझें सरकार अच्छी तरह समझती है कि अगर शिक्षा आम आदमी के लिए सहज और सरल तरीके से मिलने लगेगा तो वह कल पूरे देश में यह भी नारा लगायेगा कि ‘‘राष्ट्रपति हो या चपरासी की संतान, सबको शिक्षा एक समान’’ और जब एक समान शिक्षा की बात आयेगी तो छात्र बजट में शिक्षा पर खर्च होने वाली राशि जो इस बजट में केन्द्र सरकार ने 0.75 से घटाकर 0.45 कर दी है इस बजट को बढ़ाकर 10 प्रतिशत करने की मांग करेगा।

आज वक्त की मांग है कि हम सफदर हाशमी की मशहूर कविता पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो, , , , ई को हथियार बनाकर लड़ना सीखो। को चरितार्थ करें और शिक्षा को आम मेहनतकश और वंचित समुदाय की पहुंच में लाने के वैज्ञानिक और तर्कसंगत शिक्षा के लिए संघर्ष करें।

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