Friday, June 14, 2024
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क्या रायसीना हिल्स पर कब्जा जमाने में सफल होगा इंडिया गठबंधन?

चौथे चरण का वोट खत्म होते-होते राहुल गांधी एक आंधी में तब्दील हो गए। भीषण गर्मी की उपेक्षा कर इंडिया की सभाओं में जो भीड़ उमड़ी, वह अभूतपूर्व है। कई लोगों को संदेह है कि यह भीड़ शायद वोट में तब्दील न हो। लेकिन भीड़ के अन्दर जो जुनून देखा जा रहा है वह इंडिया गठबंधन की कामयाबी की पटकथा को व्यक्त कर रहा है।

आज 19 अप्रैल से शुरू हुए लोकसभा का चुनाव के सातवें और अंतिम चरण का मतदान हो रहा है। 44 दिनों तक चला  लोकसभा चुनाव 2024 एकाधिक कारणों से लंबे समय तक याद किया जाएगा। सबसे पहले जिस देश ने 1980 में चुनाव दो चरणों और चार दिन में सम्पन्न होते देखा है, उसके लिए ईवीएम के युग में सात चरणों और 44  दिनों तक चली चुनावी प्रक्रिया किसी सजा से कम नहीं रही। इस दौरान देश थम सा गया। ऐसे में अपने उबाऊपन के कारण यह चुनाव लंबे समय तक लोगों के जेहन में रहेगा। इससे लंबा चुनाव सिर्फ 1951-52 का पहला लोकसभा चुनाव रहा, जो चार महीने से ज्यादे समय तक चला था। स्वाधीन भारत का यह पहला  चुनाव रहा, जिसमें चुनाव की आचार संहिता लागू होने के  बाद भी ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग सर्वशक्ति से क्रियाशील रहा और इसका उपयोग विपक्ष के खिलाफ किया गया। इस चुनाव में जिस तरह प्रधानमंत्री द्वारा 25वें चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्त राजीव कुमार शर्मनाक अंदाज मे अपना काम किए लोगों को बार–बार शेषन,लिंगदोह, कुरैशी जैसे चुनाव आयुक्तों की याद आई। चुनाव कार्यक्रम की घोषणा करते समय जिस तरह उन्होंने घटिया सा यह शेर कहा था- अधूरी हसरतों का इल्जाम हर बार हम पर लगाना ठीक नहीं, वफ़ा खुद से नहीं होती, खता ईवीएम की कहते हो और बाद में जब परिणाम आता है तो उसमें कायम भी नहीं रहते- उससे ही उनके खतरनाक इरादों की झलक मिल गई थी। पर, उनके खतरनाक इरादों की झलक मिलने के बावजूद लोगों को यह विश्वास नहीं था कि हर चरण में चुनाव के वोटों का आंकड़ा पेश करने में कई दिन लगा देंगे। यही नहीं उन्होंने जिस तरह मनमाने तरीके वोटों की बढ़ी संख्या करोड़ से ऊपर बताया है, उससे यह चुनाव विपक्ष के लिए दुःस्वप्न बन चुका है। 25 मई को सम्पन्न हुए जिस छठे चरण के चुनाव का प्रतिशत 61.78 प्रतिशत बताया गया था, वह राजीव कुमार की करामात से 28 मई को 63.37 प्रतिशत हो गया। कुल मिलाकर यह पहला चुनाव है, जिसमें चुनाव आयोग को आंकड़ों की हेरफेर के जरिए निर्लज्जता के साथ सत्ता पक्ष के लिए काम करते देखा गया।

राहुल गाँधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा और महात्मा गांधी की दांडी यात्रा का मूल मकसद

2014 के बाद 2019 में मोदी की सुनामी में फिर एक बार  बुरी तरह विध्वस्त होने के बाद कांग्रेस पार्टी का पुनरुद्धार राहुल गांधी के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आई। और उन्होंने इसके लिए अपनी दादी महान इंदिरा गांधी का अनुसरण करने हुए सड़कों पर उतर कर जनता से संवाद करने का मन बनाया। इस क्रम में रचित हुआ ‘भारत जोड़ों यात्रा’ का स्वर्णिम  अध्याय। 7 सितंबर, 2022 को कन्याकुमारी से शुरू होकर 30 जनवरी, 2023 को कश्मीर के क्लॉक टॉवर पर समाप्त हुई ‘भारत जोड़ों यात्रा’ के जरिए  3750 किमी की पैदल यात्रा कर राहुल गांधी ने एक ऐसा इतिहास रच डाला, जिसकी तुलना भारत का इतिहास बदलने वाली महात्मा गांधी की दांडी यात्रा से ही की जा सकती है। उनकी भारत जोड़ो यात्रा एक जनांदोलन साबित हुई, जिसके जरिए उनको भाजपा की विभाजनकारी नीतियों के खिलाफ देश को एकजुट करने में भारी सफलता मिली। इस यात्रा से वह मूल्यवृद्धि, बेरोजगारी, भय कट्टरता की राजनीति और नफरत के खिलाफ लड़ने का माहौल बनाने में सफल हुए। राजनीति के जानकारों के मुताबिक भारत जोड़ो यात्रा ने उन्हें एक ऐसे राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित होने में मदद की जो राजनीति के गुणा- भाग से ऊपर है। भाजपा द्वारा हजारों करोड़ खर्च करके उनकी जो छवि अगंभीर, बेपरवाह, कमअक्ल और पार्ट टाइम पॉलिटिशियन के रूप में बनाई गई थी, भारत जोड़ों यात्रा ने उसे अतीत का विषय बना दिया और ढेरों लोगों को उनमें नए जमाने के गांधी नजर आने लगे।

मिर्ज़ापुर : किंवदंतियों में लोगों की गर्दन काटनेवाले रामविलास बिन्द और उनकी वास्तविक कहानी

भारत जोड़ो यात्रा के समापन के कुछ अंतराल बाद लोकसभा चुनाव 2024 की पृष्ठभूमि में 24-26 फरवरी, 2023  तक रायपुर में कांग्रेस का 85वां अधिवेशन आयोजित हुआ, जहां पार्टी ने पहली बार सामाजिक न्याय का पिटारा खोलकर सामाजिक न्यायवादी दलों तक को चौका दिया। इसी रायपुर अधिवेशन में कांग्रेस नें खुद में आमूल परिवर्तन करते हुए स्थायी तौर पर सामाजिक न्यायवादी दल के रूप में तब्दील कर लिया, जिसे समझने में आज भी अधिकांश बुद्धिजीवी व्यर्थ हैं। यहीं से उसने सामाजिक न्याय से जुड़े जो प्रस्ताव पारित किए, उसी को आधार बनाकर उसने आगे का चुनावी एजेंडा स्थिर किया। रायपुर में पार्टी ने सामाजिक न्याय से जुड़े जो प्रस्ताव पास किए उसमें एक उच्च न्यायपालिका में एससी,एसटी,ओबीसी के लिए आरक्षण का प्रस्ताव था। इस संबंध में कहा गया था, ‘यह सुनिश्चित करने के लिए  कि न्यायपालिका भारत की सामाजिक विविधता का प्रतिबिंब है, कांग्रेस पार्टी उच्च न्यायपालिका में एससी-एसटी-ओबीसी के लिए आरक्षण पर विचार करेगी। इसी भावना से भारतीय न्यायायिक सेवा आयोग बनाने के लिए सुधार किए जाएंगे।’ इन वर्गों के लिए आम बजट का हिस्सा निर्धारित करने और उनमें गरीब तबकों को ईडब्ल्यूएस कोटे में शामिल करने का वादा किया गया था। रायपुर में ही महिला आरक्षण पर यू टर्न लेते हुए कोटे में कोटे का समर्थन किया गया था। वहीं दशकीय जनगणना के साथ-साथ एक सामाजिक-आर्थिक जनगणना कराने की प्रतिबद्धता जाहिर की गई थी। जातिगत जनगणना में गैर-अधिसूचित और खानाबदोश जनजातियों की भी जनगणना कराने का प्रस्ताव भी पारित हुआ था। वहीं एससी,एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदायों के छात्रों के साथ शैक्षणिक संस्थानों में होने वाले भेदभाव को दूर करने तथा उनके शिक्षा सम्मान के अधिकार की रक्षा और सुरक्षा के लिए रोहित वेमुला अधिनियम बनाने का प्रस्ताव पास किया गया था। इस किस्म के अन्य कई प्रस्ताव भी पास हुए थे। कुल मिलाकर रायसीना हिल्स  पर कब्जा जमाने की दूरगामी रणनीति के तहत रायपुर में सामाजिक न्याय से जुड़े ऐसे बुनियादी प्रस्ताव पास हुए, जिन्हें लेकर ही पार्टी ने आगे बढ़ने का मन बनाया।

रायपुर से निकले विचार का परिणाम है भारत जोड़ो न्याय यात्रा

रायपुर से निकले विचार को आधार बनाकर कांग्रेस ने मई, 2023 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव को सामाजिक न्याय पर केंद्रित किया। चूंकि चुनाव सामाजिक न्याय पर केंद्रित होने से भाजपा हार वरण करने के लिए विवश रहती है, इसलिए भाजपा हेट पॉलिटिक्स को हिमालय सरीखी ऊंचाई देकर भी हार गई। उसी कर्नाटक चुनाव में राहुल गांधी ने कोलार में ‘जितनी जिसकी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी उछालकर दुनिया को न सिर्फ हैरान दिया, बल्कि दीर्घ काल के लिए ‘जितनी आबादी- उतना हक’ को अपनी राजनीति का मूलमंत्र भी बना लिया। कर्नाटक में जिस शिद्दत के साथ चुनाव को सामाजिक न्याय पर केंद्रित करते हुए राहुल गांधी ने ऐतिहासिक सफलता अर्जित की, उसे देखते हुए दलित बुद्धिजीवियों ने उन्हें सामाजिक न्याय के नए आइकॉन के रूप में वरण किया। कर्नाटक में रायपुर से निकले सामाजिक न्याय का एजेंडा कारगर होने के बाद उसे नवंबर, 2023 में आयोजित 5 राज्यों- राजस्थान, मध्य प्रदेश, छतीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम– के चुनाव में भी आजमाया। 3 दिसंबर को जब चुनाव परिणाम आया देखा गया कि कांग्रेस तेलंगाना को छोड़कार बाकी राज्यों में भारी संभावना जागकर भी विफल रही। राजस्थान, मध्य प्रदेश, छतीसगढ़ में तमाम विश्लेषकों ने पार्टी के जीत की भविष्यवाणी कर दी थी, पर भीतरघात के चलते पार्टी की नैया किनारे जाकर डूब गई। किन्तु राहुल गांधी इससे हताश होने के बजाय रायपुर से निकले विचार को आगे बढ़ाने के लिए दूने उत्साह के साथ 14 जनवरी, 2024 से नए जोश के साथ फिर भारत जोड़ो यात्रा पर निकल पड़े । पर, इस बार भारत जोड़ो के साथ ‘न्याय यात्रा’ जोड़ लिए। 14 जनवरी को मणिपुर से शुरू होकर 16 मार्च को मुंबई समाप्त हुई 63 दिवसीय ‘भारत जोड़ों न्याय यात्रा’ में रायपुर से निकले सामाजिक न्याय के बुनियादी विचार को विस्तार देते हुए पाँच न्याय तक प्रसारित कर दिया गया । भारत जोड़ों न्याय यात्रा में विकसित पांच  न्याय  पाँच अप्रैल को न्याय पत्र के रूप में जारी उसके घोषणापत्र के रूप में सामने आया और देखते ही देखते छा गया।

जो लोग यह मानकर चल रहे थे कि यह चुनाव महज एक औपचारिकता है और मोदी के नेतृत्व में एनडीए 400 पार नहीं जाएगा तो भी जबरदस्त सफलता हासिल करेगा, ऐसे लोगों की धारणा में कांग्रेस के घोषणापत्र ने रातोंरात बदलाव ला दिया। सबसे बड़ा असर तो प्रधानमंत्री मोदी पर पड़ा! वह इसकी काट न ढूंढ पा कर उद्भ्रांत ही नहीं हुए, ऐसा लगता है उनका मानसिक संतुलन ही बिगड़ गया। इसी मानसिक स्थिति ने उन्हे मुसलमान, मंगलसूत्र, मटन, मछली, मुजरा की ओर बढ़ने के लिए विवश कर दिया। इस चुनाव में वह बुरी तरह एक्सपोज होकर जाहिलों की जमात मे शामिल हो गए तो  उसके लिए जिम्मेवार कांग्रेस का घोषणापत्र ही रहा। उसके घोषणापत्र ने जहां एनडीए को बुरी तरह बौखला  कर रख दिया तो इंडिया गठबंधन मे नई जान फूँक दी।

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क्या रायसीना हिल्स पर कब्जा जमाने में सफल होगा इंडिया गठबंधन?

अब जबकि आज चुनाव खत्म हो रहा है, लाख टके का सवाल है, क्या इंडिया ब्लॉक रायसीना हिल्स पर कब्जा जमाने में सफल होगा। जब यह पंक्तियां लिख रहा हूँ, सोशल मीडिया पर एक चर्चित टिप्पणीकार का यह दावा मुझे खासा प्रभावित किया है। उसने प्रमाणित किया है कि जिस तरह 1983 के वर्ल्ड कप में कपिल देव के नेतृत्व में कमजोर मानी जा रही टीम इंडिया ने क्लाइव लॉयड की शक्तिशाली टीम को शिकस्त देकर दुनिया को विस्मित कर दिया, इस लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी के नेतृत्व में वैसा काम इंडिया ब्लॉक करने जा रहा है। बहरहाल, मैं चार कारणों से इंडिया को मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए पर विजयी होते पा रहा हूँ। पहला, जब भी चुनाव सामाजिक न्याय पर केंद्रित होता है, भाजपा हारने के लिए अभिशप्त रही और इस चुनाव में कांग्रेस के घोषणापत्र ने सामाजिक न्याय के मुद्दे को एक्सट्रीम पर पहुंचा दिया है। दूसरा, इस चुनाव में सोशल मीडिया पर सक्रिय डीबी लाइव के राजीव रंजन, 4 पीएम के संजय शर्मा, सत्य हिन्दी के आशुतोष, आंबेडकरनामा के प्रो रतनलाल, आर्टिकल 19 के नवीन कुमार, पुण्य प्रसून वाजपेयी, अजीत अंजुम इत्यादि सहित श्रवण गर्ग, अभय कुमार दुबे, अशोक वानखेडे, शीतल पी सिंह, आनंद प्रधान सिंह, शरत प्रधान, अशोक कुमार पांडे, नीलू व्यास, कुमकुम बैनीवाल सहित अन्य ढेरों पत्रकारों ने मोदी के खिलाफ हवा बनाने में जो योगदान किया है, वह स्वर्णाक्षरों लिखे जाने योग्य है। किन्तु मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया इन पत्रकारों द्वारा उठाए गए मुद्दों पर आई दर्शकों को राय। पूरे चुनाव में मैं बहुत ही ध्यान से कमेन्ट बॉक्स में आई लोगों की राय पढ़ा। कॉमेंट बॉक्स में आई श्रोताओं की राय ही मेरे लिए वोटरों का मिजाज परखने का सबसे बड़ा जरिया रहा। कमेन्ट बॉक्स जिस तरह प्रायः 90 प्रतिशत दर्शकों ने राहुल गांधी और इंडिया के पक्ष में अपनी भावनाएं जाहिर किया, उसके आधार पर आश्वस्त हूँ कि इंडिया जीत रही है। जिस तीसरे कारण से मैं इंडिया के जीत के प्रति आश्वस्त हूँ, वह है इंडिया के प्रति लोगों का जुनून। इस चुनाव में चौथे चरण का वोट खत्म होते-होते राहुल गांधी एक आंधी में तब्दील हो गए, उसके बाद भीषण गर्मी की उपेक्षा कर इंडिया की सभाओं में जो भीड़ उमड़ी, वह अभूतपूर्व घटना है। कई लोगों को संदेह है कि यह भीड़ शायद वोट में तब्दील नहीं होगी।  लेकिन भीड़ की आँखों में बदलाव का जो जुनून देखा हूँ, उसके बाद आश्वस्त हूँ कि यह वोट में कन्वर्ट होकर इंडिया को कामयाब बनाएगी। जो चौथा कारण मुझे इंडिया के पक्ष में दावा करने के लिए प्रेरित कर रहा है, वह चुनाव विशेषज्ञों की राय का औसत। तमाम चुनाव एक्सपर्ट सीटों की जो संख्या बता रहे हैं, उसका औसत निकालने पर दिख रहा है कि भाजपा 200 से 225 सीटें पा रही है। और 4 जून को यदि भाजपा को इसी मात्रा में सीटें आती हैं, तब तो रायसीना हिल्स पर इंडिया का कब्जा हो जाएगा, इसके प्रति आशावादी हुआ जा सकता है। लेकिन चुनाव आयुक्त की भूमिका और डोनाल्ड ट्रम्प के गुरु मोदी की हर हाल में सत्ता में बने रहने की जिद्द, इंडिया की जीत के प्रति शंकित करती है।

एच एल दुसाध
एच एल दुसाध
लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.

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