इश्क ना बाड़ी उपजै, प्रेम न हाट बिकाए… (डायरी 19 जून, 2022) 

नवल किशोर कुमार

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जो इश्क करना नहीं जानते, उनके लिए यह वाकई में कोई अनोखी बात होगी। लेकिन जो करते हैं, उनके लिए तो यह बिल्कुल अलहदा है। वैसे इश्क होता भी अलग तरह का ही है। इसका कोई एक रूप नहीं है और ना ही करने का कोई एक निश्चित तरीका है। वजह यह कि इश्क उन अहसासों का समुच्चय है, जो किसी के हृदय में किसी के प्रति अकृत्रिम तरीके से उत्पन्न होते हैं। अहसासों को कृत्रिम तरीके से उत्पन्न किया भी नहीं जा सकता।

दरअसल, मैं आज इश्क की बात इसलिए कर रहा हूं क्योंकि कल रात मैं एक खास तरह के इश्क को समझने की कोशिश कर रहा था। और मुझे यह मौका प्रदान किया पटना के मेरे मित्र अनंत की नवीनतम कृति दो गुलफामों की तीसरी कसम ने। अनंत लेखक भी हैं और प्रकाशक भी। ये कीकट प्रकाशन, पटना के मालिक भी हैं। अभी दो दिन पहले अनंत मिलने मेरे अस्थायी आवास पर आए थे।

कल रात नींद को मुझसे दुश्मनी थी, सो पढ़ने की नौबत आन पड़ी। हालांकि इन दिनों मेरी नींद बहुत अच्छी हो गई है। करीब 7-8 घंटे तो सो ही लेता हूं। लेकिन नींद भी मानो इश्क की क्रिया का एक हिस्सा है और एक बार उचट जाय तो बहुत मुश्किल होती है। ऐसे में अनंत की उपरोक्त किताब को पलटने लगा।
वे रेणु साहित्य के अनुभवी अध्येता हैं, इसलिए यह किताब भी रेणु पर ही केंद्रित है। हालांकि इसमें उन्होंने रेणु और शैलेंद्र को नये अंदाज में पेश किया है और यह अंदाज है दोनों के इश्क का।

रेणु इश्कबाज आदमी थे। लेकिन वे अपनी कहानी मारे गए गुलफाम के नायक हिरामन की तरह इश्कबज नहीं थे। मैं यह तो नहीं कह सकता कि हीराबाई से हिरामन का इश्क एक तरह का पाखंड था। मैं पाखंड इसलिए कह रहा हूं क्योंकि यदि आप अपने इश्क को अभिव्यक्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब साफ है कि आप जिम्मेदारी से भाग रहे हैं। इश्क मनुष्य को जिम्मेदारियां देता है। हिरामन अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहा था। मैं हीराबाई को कटघरे में इसलिए नहीं खड़ा करता क्योंकि वह तो हिरामन के साथ जीना चाहती थी। लेकिन कैसे जीती जब हिरामन के मुंह में शब्द ही नहीं थे।

वैसे फणीश्वरनाथ रेणु, जिनकी कहानी मारे गए गुलफाम को आधार बनाकर शैलेंद्र ने तीसरी कसम बनायी, की प्रेम कहानी वास्तविक जीवन में बहुत विवादास्पद रही है। मसलन, लतिका जी से उनका प्रेम हालांकि कई तरह के सवाल भी उत्पन्न करता है। एक सवाल तो यही कि रेणु जी ने लतिका जी से शादी की और बच्चे अपनी पहली पत्नी से पैदा करते रहे। इसे लेकर लतिका जी ने अपनी पीड़ा भी एक साक्षात्कार में व्यक्त की है। लेकिन रेणु और लतिका का प्रेम भी बहुत खास रहा था। अब तक इन दोनों के बारे में जितना पढ़ा है, उसके आधार पर तो केवल इतना ही कह सकता हूं कि इश्क जब रोज-रोज के जीवन में शामिल हो जाता है तो उसके स्वरूप में बदलाव भी आते हैं। वैसे भी प्रेमी रोज-रोज चांद-सितारे नहीं तोड़ सकता और ना ही प्रेमिका रोज-रोज स्वर्ग की अप्सरा बन सकती है। जीवन है तो शरीर की समस्याएं भी हाेंगी ही।
खैर, रेणु इश्कबाज आदमी थे। लेकिन वे अपनी कहानी मारे गए गुलफाम के नायक हिरामन की तरह इश्कबज नहीं थे। मैं यह तो नहीं कह सकता कि हीराबाई से हिरामन का इश्क एक तरह का पाखंड था। मैं पाखंड इसलिए कह रहा हूं क्योंकि यदि आप अपने इश्क को अभिव्यक्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब साफ है कि आप जिम्मेदारी से भाग रहे हैं। इश्क मनुष्य को जिम्मेदारियां देता है। हिरामन अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहा था। मैं हीराबाई को कटघरे में इसलिए नहीं खड़ा करता क्योंकि वह तो हिरामन के साथ जीना चाहती थी। लेकिन कैसे जीती जब हिरामन के मुंह में शब्द ही नहीं थे। इसके बावजूद हिरामन और हीराबाई की प्रेम कहानी अलहदा है, जो रेणु ने लिखी।
फिल्म तीसरी कसम में हिरामन और हीरबाई की भूमिका में राजकपूर और वहीदा रहमान

तो अनंत ने अपनी किताब में रेणु की एक और प्रेम कहानी का जिक्र किया है। उनके मुताबिक यह कहानी तब शुरू हुई जब तीसरी कसम की शूटिंग चल रही थी। वहीदा रहमान जो कि फिल्म में हीराबाई का किरदार निभा रही थीं, की बहन साईदा रहमान उनकी जुल्फों का ख्याल रखती थीं। ख्याल रखने का मतलब केश विन्यास और उन्हें सुंदर बनाना। अब रेणु भी लंबी जुल्फों के स्वामी थे। चेहरा तो आकर्षक था ही। साईदा जी को लगा कि रेणु भी फिल्म में अभिनय करेंगे और इसलिए जुल्फें बढ़ा रखी हैं। लेकिन रेणु तो शूटिंग स्थल पर निर्माता शैलेंद्र और निर्देशक बासु भट्टाचार्य आदि के साथ दिन-दिन भर बैठे रहते। एक दिन साईदा जी ने उनसे पूछ ही लिया। अनंत ने रेणु-साईदा की बातचीत को रेणु की आत्मकथात्मक शैली में प्रस्तुत किया है। अब कुछ पलों की बातचीत का असर तो होना ही था। रेणु और साईदा करीब आए और इतने करीब आए कि लोगों की नजर में ‘नाइस पेयर’ बन गए।

हालांकि अनंत ने इस प्रेम कहानी का अंजाम नहीं लिखा है। मुझे लगता है कि नहीं लिखकर उन्होंने अच्छा ही किया। मुमकिन है कि रेणु और साईदा की प्रेम कहानी बस इतनी सी ही हो। वैसे भी हिरामन का रचनाकार करता भी तो किस तरह का इश्क करता।

रेणु भी लंबी जुल्फों के स्वामी थे। चेहरा तो आकर्षक था ही। साईदा जी को लगा कि रेणु भी फिल्म में अभिनय करेंगे और इसलिए जुल्फें बढ़ा रखी हैं। लेकिन रेणु तो शूटिंग स्थल पर निर्माता शैलेंद्र और निर्देशक बासु भट्टाचार्य आदि के साथ दिन-दिन भर बैठे रहते। एक दिन साईदा जी ने उनसे पूछ ही लिया। अनंत ने रेणु-साईदा की बातचीत को रेणु की आत्मकथात्मक शैली में प्रस्तुत किया है। अब कुछ पलों की बातचीत का असर तो होना ही था। रेणु और साईदा करीब आए और इतने करीब आए कि लोगों की नजर में 'नाइस पेयर' बन गए।

बहरहाल, अनंत की नई किताब में कुछेक खामियां हैं। एक तो किताब आवरण पृष्ठ और बेहतर हो सकता था। दूसरी खामी वर्तनी आदि की त्रुटियां हैं। तीसरी बात हालांकि कोई खामी नहीं है, लेकिन यदि इस किताब के प्रारंभ में कहीं जिक्र होता कि यह किताब रेणु की जयंती के सौवें वर्ष में लिखी गई है तो इसका एक खास महत्व भी होता। फिर भी उनकी किताब खोजपरक है। शैलेंद्र के इश्क के बारे में फिर लिखूंगा। फिलहाल मेरा अपना इश्क, जिसे कुछ ऐसे दर्ज किया।

तुम होती तो सचमुच 
कितना अच्छा होता
जब आंगन के ठीक उपर
होते काले-काले मेघ
और असगनी पर रखे 
कपड़ों के बारे में सोचती
या फिर चूल्हे की फिक्र करती
और मैं माथे पर लकड़ियां लादे
जल्दी-जल्दी डेग बढ़ाता ताकि
तुम्हें बारिश की पहली बूंद को
हथेलियों में जमा करते देख सकूं।
सचमुच कितना अच्छा होता
अगर बरसात होती
और तुम भी होती।
अब जबकि तुम नहीं हो
फिर भी मैं सोच रहा हूं
मेघों को सहेज लूं
जैसे सहेजा है तुम्हें अबतक।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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