नौजवानों को इन कारणों से अग्निवीर बनाना चाहती है सरकार? (डायरी 20 जून, 2022) 

नवल किशोर कुमार

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 बचपन अलहदा था। रोज कहानियां सुनने को मिलती थीं। मां कहानियों को ‘खिस्सा’ कहती थी। यह ‘किस्सा’ का अपभ्रंश जैसा भले लगता हो, लेकिन वाकई में यह था नहीं। वजह यह कि किस्सा का मतलब कोई एक वाकया होता है। जैसे वह बंदर वाली कहानी, जिसमें टोपियां बेचनेवाला बंदरों को बेवकूफ बनाकर उनसे टोपियां वापस ले लेता है। लेकिन खिस्सा अलग होता था। वह तो कई-कई रातों तक एपिसोडवार चलता रहता। वैसे यह सवाल हमेशा मेरी जेहन में रहता कि ऐसे खिस्से मां लाती कहां से है। पापा खिस्सा नहीं सुनाते थे। बहुत जिद करने पर छोटी-छोटी कहानियां किस्से की शक्ल में। लेकिन पापा के किस्सों का भी खास महत्व होता था और वे इतनी लंबी तो होती ही थीं कि दो किस्सों के बाद नींद आ जाती थी।
उन दिनों ही पापा ने एक किस्सा सुनाते हुए कहा था कि एक चोर के पास सौ राजाओं का दिमाग होता है। मतलब यह कि राजा चाहे सौ तरीके आजमा ले, चोर अगर ठान ले तो वह चुराकर ही दम लेगा।
मैं आज सोच रहा हूं कि यदि कोई चोर किसी देश का शासक बन जाय तो क्या हो? वैसे मैं यह मानता हूं कि शासक हमेशा चोर ही होते रहे हैं। भारतीय संदर्भ में तो यह बात एकदम शत-प्रतिशत सच है। वजह यह कि भारतीय शासकों ने वर्चस्ववादी सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए तमाम तरह के तिकड़म किये और एक तरह से बहुसंख्यक आबादी को उसके वाजिब हक से वंचित रखा। तो मेरे हिसाब से ऐसे सारे शासक जिन्होंने बहुसंख्यक आबादी को उसका वाजिब हक नहीं दिया, वे चोर ही थे और हैं भी।
अब भारत के वर्तमान शासक को ही देखें। वह जोर-जुल्म के आधार पर नौजवानों को अग्निवीर बनाना चाहता है। अब तो उसने सेना का भी उपयोग कर लिया है। कल सरकार ने सेना के तीनों अंगों के उच्चाधिकारियों को प्रेस कांफ्रेंस तक करने के लिए बाध्य कर दिया, जिसमें उच्चाधिकारियों ने अग्निपथ योजना के तहत नौजवानों को डराते हुए कहा कि जो भी प्रदर्शन में भाग लेंगे और हिंसक गतिविधियों में शामिल होंगे, उनकी भर्ती नहीं की जाएगी। इसे विस्तार से समझाते हुए थल सेना के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट कर्नल ए. पुरी ने कहा कि सभी आवेदकों को आवेदन के साथ यह शपथ पत्र देना होगा कि वे किसी भी तरह के हिंसक प्रदर्शन में शामिल नहीं थे। उनके शपथ पत्र की जांच पुलिस करेगी और तदुपरांत उनके आवेदन पर विचार किया जाएगा।

कोई चोर किसी देश का शासक बन जाय तो क्या हो? वैसे मैं यह मानता हूं कि शासक हमेशा चोर ही होते रहे हैं। भारतीय संदर्भ में तो यह बात एकदम शत-प्रतिशत सच है। वजह यह कि भारतीय शासकों ने वर्चस्ववादी सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए तमाम तरह के तिकड़म किये और एक तरह से बहुसंख्यक आबादी को उसके वाजिब हक से वंचित रखा। तो मेरे हिसाब से ऐसे सारे शासक जिन्होंने बहुसंख्यक आबादी को उसका वाजिब हक नहीं दिया, वे चोर ही थे और हैं भी।

कल ही भारत सरकार के मंत्री और पीएमओ की जिम्मेदारी संभालने वाले जितेंद्र सिंह ने कह दिया कि जो अग्निवीर नहीं बनना चाहते हैं, नहीं बनें। सरकार ने नौजवानों का ठेका नहीं ले रखा है। और कल ही भाजपा के एक बड़े नेता कैलाश विजयवर्गीय ने कह दिया कि भाजपा के कार्यालयों की सुरक्षा की जिम्मेदारी वह अग्निवीरों को देना चाहेंगे।
कहने का मतलब यह कि भारत सरकार नौजवानों को आक्रोशित कर रही है और मेरे हिसाब से वह सेना को कमजोर बना रही है। अब इसको ऐसे समझें कि चार साल की नौकरी के दौरान अग्निवीरों में प्रतिबद्धता की कमी होगी। उनके पास पर्याप्त अनुभव नहीं होगा और भारतीय सेना इस लिहाज से कमजोर होती चली जाएगी। अब इसका कारण क्या हो सकता है? मैं बस यह अनुमान लगा रहा हूं कि क्या भारत की मौजूदा सरकार देश को फिर से गुलाम बना देना चाहती है?
कल समजावादी नेता और किसान आंदोलन के चर्चित शख्सियत डॉ. सुनीलम का दिल्ली स्थित मेरे किराए के आशियाने में आगमन हुआ। यह एक नायाब अनुभव रहा। एक तो मुझे उनका स्नेह प्रत्यक्ष रूप से मिला और वीपी सिंह, इंद्र कुमार गुजराल, देवगौड़ा, चंद्रशेखर, मुलायम सिंह यादव और रामविलास पासवान आदि से संबंधित खूब सारी जानकारियां भी मिलीं। साथ ही, यह भी कि एक वैज्ञानिक समाजवादी नेता कैसे बना और उसकी राह में कितनी मुश्किलें आयीं। मध्य प्रदेश का मुलताई विधानसभा क्षेत्र, जहां से वह 1998 और 2003 में विधायक बने, वह वहां पहुंचे कैसे, यह जानकारी भी उन्होंने विस्तार से दी। दिग्विजय सिंह से लेकर कमलनाथ सरकार तक के जुल्मों के उदाहरण सामने आए। फिर न्यायपालिका का दो पक्ष भी सामने आया। एक पक्ष वह जिसने डॉ. सुनीलम की जान की रक्षा की और दूसरा पक्ष वह जिसने उन्हें तीन मामलों में कुल मिलाकर 54 साल की सुना दी। फिलहाल वे जमानत पर हैं।

नरेंद्र मोदी को मैं भारत का प्रधानमंत्री नहीं मानता। वह इस देश के अघोषित राजा हैं। अब वह चाहें सो करें। यह उनकी मर्जी पर निर्भर करता है। संसद काे उन्होंने महत्वहीन बना दिया है। और न्यायपालिका को इतना मजबूर कि वह केवल रेंग सकती है। मीडिया के बारे में किसी तरह की टिप्पणी की आवश्यकता नहीं है।

तो कल अग्निपथ योजना के संदर्भ में डॉ. सुनीलम का विचार भी सुना। उनका दृष्टिकोण व्यापक अर्थों वाला है। उनका कहना है कि आरएसएस ने इस देश को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए अपना सबसे मारक प्रहार कर दिया है। संघ के लोग इसका अर्थ और परिणाम बखूबी जानते हैं कि अब इस देश में क्या होगा। बहुसंख्यक समाज और अल्पसंख्यक समाज के लोग भी बड़ी संख्या में आक्रोशित होंगे और आंदोलन करेंगे। निकट भविष्य के इन आंदोलनों के दमन के लिए अब सरकार को बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मियों की आवश्यकता होगी। ऐसे सुरक्षाकर्मियों की, जो केवल लाठी चार्ज ही ना करें, बल्कि हरवे-हथियार का उपयोग करना भी जानते हों।
बहरहाल, कल ट्वीटर पर एक वीडियो देखा। इस वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रगति मैदान के पास सुरंग का उद्घाटन कर रहे थे और इस दौरान सुरंग में पड़े प्लास्टिक का कचरा इकट्ठा कर रहे थे। उनकी चाल ऐसी थी, मानो वह लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि राजतंत्र को माननेवाले देश के कोई राजा हों। विनम्रता उनके चेहरे से गायब थी और प्लास्टिक की बोतलों का चुनना महज दिखावा। मैं तो यह सोच रहा था कि आखिर वहां बोतलें आयी कहां से? क्या यह प्रधानमंत्री की सुरक्षा में चूक नहीं है?
खैर, नरेंद्र मोदी को मैं भारत का प्रधानमंत्री नहीं मानता। वह इस देश के अघोषित राजा हैं। अब वह चाहें सो करें। यह उनकी मर्जी पर निर्भर करता है। संसद काे उन्होंने महत्वहीन बना दिया है। और न्यायपालिका को इतना मजबूर कि वह केवल रेंग सकती है। मीडिया के बारे में किसी तरह की टिप्पणी की आवश्यकता नहीं है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम कुछ ना कहें। मुझे तो एक पाकिस्तानी शायर का एक शे’र याद आ रहा है–
खंज़र बकफ खड़े हैं, गुलामीन-ए-मुंतज़िर,
आका कभी तो निकलोगे अपने हिसार से।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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4 Comments
  1. Deepak Sharma says

    नरेंद्र मोदी को मैं भारत का प्रधानमंत्री नहीं मानता। वह इस देश के अघोषित राजा हैं। अब वह चाहें सो करें। यह उनकी मर्जी पर निर्भर करता है। संसद काे उन्होंने महत्वहीन बना दिया है। और न्यायपालिका को इतना मजबूर कि वह केवल रेंग सकती है।
    👌

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