भारत में कानून बनाना संसद का काम नहीं (16 जुलाई, 2021 की डायरी)

नवल किशोर कुमार

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अहा! एक और खूबसूरत दिन बीता। सचमुच खूबसूरत दिन था कल। कल के दिन को खूबसूरत कहने की कई वजहें हैं। इनमें से तीन तो व्यक्तिगत हैं और शेष देश-दुनिया के। सबसे खास है मेरे जर्मन पत्रकार दोस्त फ्लोरियान की रिहाई। फ्लोरियान को छह महीने पहले गिरफ्तार किया गया था। ऐसा कल फ्लोरियान ने बताया। जीमेल की वीडियो चैट सर्विस के जरिए कल हम लंबे समय बाद रू-ब-रू थे। उसने बताया कि वहां की प्रांतीय सरकार ने एक मामले की खबर लिखने के  कारण गिरफ्तार किया था। हालांकि जेल में उसे किसी तरह की शारीरिक यातना नहीं दी गयी, लेकिन एक निर्दोष व्यक्ति को जेल में रखा जाना ही उसके साथ भयंकर अत्याचार है।

कल शाम सुप्रीम कोर्ट से मन को प्रफुल्लित करने वाली खबर मिली। खबर यह कि सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान राजद्रोह कानून की वैधता पर सवाल उठाया है। मुख्य न्यायाधीश एन वी रमण, न्यायाधीश एएस बोपन्ना और न्यायाधीश हृषिकेश राय की पीठ ने भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए को लेकर भारत सरकार से कुछ सवाल पूछे हैं जो कि दरअसल में पीठ की टिप्पणी ही है। ये सवाल बेहद खास हैं।

भारत में कानून बनाना संसद का काम है और संसद को कोई सपना नहीं आता है कि वह नींद से जगे और कोई कानून बनाए या फिर पहले के कानून में कोई बदलाव करे या उसे रद्द करे। यह केवल कहने की बात है कि संसद का काम कानून बनाना है। दरअसल, कानून तो उस पार्टी या गठबंधन दल का नेता बनाता है जिसके पास बहुमत होता है और वह प्रधानमंत्री कहलाता है। यदि इस कुर्सी पर बैठने वाला शख्स चाहता है तभी कोई कानून बनता है। कानून बनने से यहां मेरा मतलब है संसद का हरकत करना। व्यवहार के स्तर पर संसद जब हिलना-डुलना और नींद से जागना कानून बनने या संशोधित होने की प्रक्रिया का हिस्सा है।

पहली टिप्पणी है – राजद्रोह का कानून अंग्रेजों ने बनाया था और तब उनका मकसद भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की धार को कुंद करना था। अब जबकि देश को आजाद हुए 75 साल हो चुके हैं, इस कानून की आवश्यकता क्या है? दूसरी टिप्पणी – हमारी चिंता कानून के दुरुपयोग और कार्यपालिका की कोई जवाबदेही नहीं होने को लेकर है। अगर आप इतिहास में जाएं और इस सवाल का पता लगाएं तो पाएंगे कि 124 ए के तहत न्यून्तम लोगों को दोषी पाया गया है और उन्हें सजा दी गयी है। तीसरी टिप्पणी – हम किसी राज्य या सरकार पर दोषारोपण नहीं कर रहे हैं। पर देखिए कि कैसे आईटी कानून की धारा 66ए को किस तरह अभीतक इस्तेमाल में लाया जा रहा है। कितने बदनसीब लोग इसका खामियाजा भुगत चुके हैं। किसी की कोई जवाबदेही नहीं है? चौथी टिप्पणी – लोग भयभीत हैं। राज्य जिसे चाहे उसे इस मामले में गिरफ्तार कर सकता है और उसे परेशान कर सकता है। यहां तक कि थाना का एक अधिकारी भी जिसे चाहे उसे 124ए के तहत गिरफ्तार कर उसका उत्पीड़न कर सकता है ।

निस्संदहेह सुप्रीम कोर्ट की उपरोक्त पीठ की टिप्पणियां बेहद शानदार हैं और समय के सापेक्ष न्यायोचित भी। लेकिन मेरी जेहन में तीसरी टिप्पणी में पीठ द्वारा इस्तेमाल किया गया शब्द कितने बदनसीब लोग है। मुझे लगता है कि इसे शीर्ष अदालत द्वारा स्वीकारोक्ति के रूप में देखना चाहिए कि अभी तक ऐसे सभी मामलों में जो परेशान किए गए हैं और लंबे समय तक जेल में रखे गए हैं, वह गलत था और है। लेकिन जवाबदेही किसकी हो और कौन तय करेगा जवाबदेही?

हम सभी जानते हैं कि भारत में कानून बनाना संसद का काम है और संसद को कोई सपना नहीं आता है कि वह नींद से जगे और कोई कानून बनाए या फिर पहले के कानून में कोई बदलाव करे या उसे रद्द करे। यह केवल कहने की बात है कि संसद का काम कानून बनाना है। दरअसल, कानून तो उस पार्टी या गठबंधन दल का नेता बनाता है जिसके पास बहुमत होता है और वह प्रधानमंत्री कहलाता है। यदि इस कुर्सी पर बैठने वाला शख्स चाहता है तभी कोई कानून बनता है। कानून बनने से यहां मेरा मतलब है संसद का हरकत करना। व्यवहार के स्तर पर संसद जब हिलना-डुलना और नींद से जागना कानून बनने या संशोधित होने की प्रक्रिया का हिस्सा है। फिर तो होता वही है जो प्रधानमंत्री पद पर बैठा हुक्मरान चाहता है। बहुमत के बल पर संसद में वह कोई भी बात पारित करवा सकता है। फिर चाहे वह देश व समाज के विरोध में क्यों न हो।

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संसद भवन की पत्रकारिता का मेरा कोई खास अनुभव नहीं है। लेकिन बिहार विधान मंडल में बनने वाले अनेक कानूनों को बनते-संशोधित होते कई बार देखा है। वह 2009 का साल था और बिहार विधान मंडल का बजट सत्र था। नीतीश सरकार एक प्रस्ताव लेकर आयी थी। प्रस्ताव यह था कि कृषि योग्य भूमि का उपयोग औद्योगिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हो तथा इसके लिए एक शुल्क का निर्धारण करना था। मतलब यह कि कोई भी व्यक्ति सरकार द्वारा निर्धारित कीमत के आधार पर टैक्स का भुगतान कर अपनी जमीन को कृषि योग्य जमीन से उद्योगों के लायक जमीन बना सकता है। सरकार की ओर स्वयं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसके बारे में सदन को बताया था कि इससे बिहार में औद्योगिकीकरण की गति बढ़ेगी। निवेशकर्ताओं को सस्ती जमीनें मिलेंगी।

मुझे स्मरण है कि जब नीतीश कुमार बोल रहे थे तब विधानसभा में उनके पक्ष के लोग उनकी हर तीसरे वाक्य के बाद मेजें थपथपा रहे थे। मुख्यमंत्री की तकरीर खत्म होने के बाद विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष उदयनारायण चौधरी ने सदन में अंतिम वाक्य कहा – जो इसके पक्ष में हैं, वह हां कहें और जो विरोध में हैं ना कहें। फिर कुछ ध्वनियां हुईं। चौधरी ने तीन बार दोहराते हुए कहा – पक्ष में बहुमत है। पक्ष में बहुमत है। …संशोधन कानून का अंग बना।

पत्रकार दीर्घा में मौजूद मैं हक्का-बक्का था। संयोग ही था कि उस दिन सदन से बाहर निकलते समय मेरी मुलाकात शैबाल गुप्ता से हो गई थी। शैबाल गुप्ता नीतीश कुमार की थिंक टैंक के अहम सदस्य थे। लेकिन इससे अधिक वे एक अच्छे अर्थशास्त्री थे। मैंने उनसे पूछा कि यह कानून तो सब बर्बाद कर देगा। शैबाल गुप्ता ने तब कहा था – विवेकहीन सरकार का फैसला है। लेकिन घबराइए मत, इससे बहुत अधिक फर्क पड़ेगा नहीं।

लेकिन फर्क तो पड़ा है। केवल उस संशोधन के कारण बिहार में जमीन की कीमतों में उछाल आया है और लोगों का जीवन प्रभावित हुआ है। आज बिहार में कृषि का योगदान बिहार की कुल योजना बजट में 10 फीसदी से भी कम रह गयी है। सचमुच किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। किसी की जिम्मेदारी नहीं।

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खैर, मैं दिल्ली से प्रकाशित जनसत्ता का पहला पन्ना देख रहा हूं। इसी पन्ने पर सुप्रीम कोर्ट के पीठ द्वारा राजद्रोह कानून के संबंध में टिप्पणी संबंधी खबर है और इसी पन्ने के एक कोने में खबर है -खुफियागिरी के आरोप में जवान सहित दो गिरफ्तार। खबर के मुताबिक राजस्थान के पोखरण स्थित सेना के बेस कैंप के एक जवान को आइएसआइ को गुप्त सूचनाएं देने के मामले में गिरफ्तार किया गया है। उसके साथ हबीब-उर-रहमान नामक व्यक्ति को भी गिरफ्तार किया गया है जो बेस कैंप में सब्जियों की आपूर्ति करता था। मैं पूरी खबर को पढ़ने के बाद सोच रहा हूं कि खबर में उस जवान का नाम क्यों नहीं दिया गया जिसे जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया गया है? क्या इसकी वजह यह है कि वह कोई हिंदू हो?

मेरा सवाल गैरवाजिब नहीं है।

 

खैर कल रात ग़ालिब को पढ़ रहा था –

तुम अपने शिकवे की बातें न खोद खोद के पूछो

हज़र करो मिरे दिल से कि उसमें आग दबी है

 

दिला ये दर्द ओ अलम भी तो मुग़्तनिम है कि आख़िर

न गिर्या-ए-सहरी है न आह-ए-नीम-शबी है

 

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं

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