मेयार भाई हरहुआ में रहते थे !

केशव शरण

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सजाकर दामने-अल्फ़ाज़ में ख़याल के फूल/ मैं दे रहा हूँ ज़माने को बोल-चाल के फूल जैसे बेहतरीन शे’र और ग़ज़लों से दुनिया को नवाज़ने वाले हर दिल अज़ीज और अज़ीम शायर मेयार सनेही आज दुनिया में नहीं हैं। सूर्य उत्तरायण होते ही जब सर्दियों की मारकता समाप्त होने की ओर चली और सूर्य-रश्मियों के प्रखर होने के साथ नव वसंत की आशा बँधी और ये हुआ कि बुजुर्ग लोगों को एक साल और मिला जीने को, अफ़सोस की बात तब यह हुई कि बनारस की काव्य गोष्ठियों और मंचों पर अपनी शायरी का जल्वा बिखेरने वाले मेयार भाई इससे महरूम होकर मरहूम हो गये। उन्होंने अपने जीवन में पचासी से भी अधिक वसंत देखे और जिये जिसमें पचास से भी अधिक वसंतों को अपनी शायरी के रंग बख़्शे। लेकिन ऐन वसंत के पहले उनके जीवन की सरसों पक गयी और उसकी स्वर्णाभा दुनिया को सौंपकर उन्होंने दुनिया से विदाई ले ली। सरसों पक गयी  रदीफ़ के साथ उनकी एक ग़ज़ल थी जिसका मक़्ता है – ख़ूब हो तुम सनेहीगुलमुहर के शहर में / लिख रहे थे गीत देहातों में सरसों पक गयी। 

बहुत याराना लगता था

इस वक़्त जब वसंत अपने चरम पर है, उनकी याद आ रही है। कल ही होली बीती है। पिछले दस साल से वे होली की बधाई फोन पर देते थे। होली बीतने के बाद मगर बुढ़वा मंगल से पहले हम उनसे मिलने उनके घर जाते थे। तपाक से उनका मिलना, प्रेम से बातें करना, लहककर शेरो-शायरी की चर्चा करना और नया लिखा-कहा सुनना-सुनाना मुलाक़ात को ख़ूबसूरत और यादगार बना देता था। उसके पहले तक वे मित्रों के घर जाते थे क्योंकि तब वे आराम-से चल-फिर लेते थे। तब वे बनारस शहर के बाहर हरहुआ में अपनी बेटी के यहाँ नहीं, गोलघर कचहरी स्थित अपने ससुराल से प्राप्त अपने मकान में रहते थे। उनका घर मेरे घर से एक किलोमीटर दूर था। एक-दो किलोमीटर के दायरे में रहने वाले सभी मित्रों की बैठकी उनके यहाँ शाम को हुआ करती थी। डीजल रेल कारख़ाना वाराणसी से रिटायर होकर उन्होंने अपने घर में जनरल स्टोर की दुकान खोल ली थी जिस पर उनका छोटा बेटा और वे बैठते थे। उनके चार बेटे और दो बेटियाँ हैं जिनके शादी-विवाह करके वे अपनी ज़िम्मेदारियां पूरी कर चुके थे। वहीं दुकान के सामने रखी कुर्सियों पर हम लोग भी जम जाते थे। इस जमघट की विशेषता यह थी कि यहाँ राजनैतिक, सामाजिक और धार्मिक बातों से ज़्यादा साहित्य की चर्चा होती थी। सुनायी गयी चीज़ों की अच्छी समालोचना भी हो जाती थी। मेयार सनेही जिन्हें मैं मेयार भाई कहता था, मुझसे उम्र में काफ़ी बड़े थे लेकिन उनमें वरिष्ठता की कोई ग्रंथि नहीं थी। वे एक बे-तकल्लुफ़ दोस्त थे। और अंत तक वे इसी रूप में रहे।

ग़ज़लकार मेयार सनेही

मेरा उनसे प्रथम परिचय सन् अठहत्तर में बनारस की साहित्यिक संस्था साहिती  में हुआ था। मैं इंटर में पढ़ रहा था। सीनियर सहपाठी आनंद परमानन्द और कमल नयन मधुकर, जो गोष्ठियों और मंचों पर कविता पाठ करते थे, मुझे उस गोष्ठी में ले गये थे। ” घर-घर लंका घर-घर रावण/ इतने राम कहाँ से लाऊँ ” जैसी जनप्रिय कविता के कवि गणेश प्रसाद सिंह मानव ‘ के आवास पर प्रत्येक रविवार को यह साप्ताहिक गोष्ठी हुआ करती थी। उन्हीं के मकान में किरायेदार कवि अशोक पाठक गोष्ठी की कार्रवाई को रजिस्टर में शब्दबद्ध करते थे। मानव जी जहाँ पारम्परिक और पद्य के कवि थे वहीं पाठक जी समकालीन कविता के। गोष्ठी में दोनों तरह के कवि शामिल रहते थे और हिंदी के कवि ही नहीं उर्दू के शायर भी। साहित्य और मंचीय कविता के पुरोधा कवि प्रवासी , सुरेंद्र कुमार श्रीवास्तव जी, तो मध्य पीढ़ी के

ब्रह्माशंकर पाण्डेय , वशिष्ठ मुनि ओझा , राजशेखर, उर्दू शायरी के राय जौनपुरी जी, उस्ताद शायर क़लीमी , तस्कीन वारसी, मेयार सनेही जी तो नई पीढ़ी के मित्रवर अनिरुद्ध प्रसाद त्रिपाठी, अजीत श्रीवास्तव, दानिश जमाल, , उमेश चन्द्र वर्मा, सुरेंद्र कुमार वाजपेयी नसीम अख़्तर, बशर बनारसी और एकदम युवतर पीढ़ी के शिवकुमार पराग, राजेन्द्र राजन और मैं इस गोष्ठी में प्राय: हर रविवार उपस्थित रहते थे। बल्कि इस गोष्ठी का साहित्य-सुख लेने और अपना नया लिखा सुनाने के लिए हम अगले रविवार का इंतज़ार करते रहते थे। इस गोष्ठी में सराहना पाकर लिखने का आत्मविश्वास बढ़ता था, साथ ही मार्गदर्शन भी प्राप्त होता था। रविवार से रविवार के बीच रोज़ की शाम का क्या करें तो इसका विकल्प अपना व्यक्तिगत मिलना-जुलना बना। मेयार सनेही, राजशेखर, तस्कीन वाहदी, शमीम गाज़ीपुर, आनंद परमानन्द और मैं तथा एक और शायर ख़स्ता बनारसी वरुणापार के थे और एक-दूसरे से वाकिंग डिस्टैंस पर थे। वरुणापार मतलब बनारस का वह इलाक़ा जो शहर को दो हिस्सों में बाँटती वरुणा नदी के उत्तर में पड़ता है। इस समूह में दानिश जमाल भी आ जुड़े। इस समूह में भी एक तिकड़ी बनी। मेयार सनेही, दानिश और मेरी। किसी शाम समूह के अन्य सदस्य हों न हों तिगड़ी ज़रूर रहती थी। कचहरी गोलघर के चायख़ानों में चाय पीती और शांत, साफ़-सुथरी सड़कों पर टहलती हुई। क्या लिखा, क्या पढ़ा इसकी चर्चा करती हुई। हर कोई खुलकर अपनी राय रखने के लिए स्वतंत्र था। कविता में शब्द का सटीक प्रयोग और भाव- संयोजन की त्रुटिहीनता पर दानिश और मेयार सनेही की अनौपचारिक चर्चाओं और आलोचनाओं ने मेरा मार्गदर्शन किया और प्रशंसाओं ने निरन्तर उत्साहित रखा। मेरी छोटी-छोटी कविताओं ने छोटी उमर में ही मुझे स्थापित कर दिया। दानिश भी मुक्तछंद कविताएं लिखते थे और ग़ज़लें कहते थे। इसके अलावा वे बनारस के रंगमंच पर भी सक्रिय थे। दानिश की ग़ज़लों में एक ताज़गी और नयापन था। बिम्बों और प्रतीकों के इस्तेमाल से वे अपनी ग़ज़लों को एक आकर्षक रूप दे रहे थे। मेयार सनेही जिन्हें मैं भी मेयार भाई कहता था कभी-कभी मज़ाक़ में मेरे यार भाई भी कह देता था बहुत अच्छी और पुख़्ता ग़ज़लें कहते थे लेकिन उनका अंदाज़ उर्दू का रवायती अंदाज़ था और शब्दावली भी उर्दू की थी । धीरे-धीरे उनमें भी एक बदलाव आने लगा।

.वे ग़ज़लों में उर्दू के कठिन शब्दों और लम्बी सामासिक शब्दावली से परहेज़ करने लगे। कई ग़ज़लें उन्होंने ऐसी भी कहीं जिन्हें हम हिन्दी ग़ज़ल कह सकते हैं। इन ग़ज़लों ने उन्हें हिंदी में ऐसा प्रतिष्ठित किया कि मिश्रित शब्दावली के प्रयोग के बावजूद वे हिंदी कविता के मंच और गोष्ठियों तथा पत्रिकाओं के हो गये। यह उनकी ग़ज़लों की ताक़त रही कि उर्दू मंचों पर बुलाये जाने पर वहाँ भी अपना ग़ज़ब प्रभाव छोड़ते थे।

आसान अल्फ़ाज़ की ग़ज़ल के मेयारी शायर

वे ग़ज़लों में उर्दू के कठिन शब्दों और लम्बी सामासिक शब्दावली से परहेज़ करने लगे। कई ग़ज़लें उन्होंने ऐसी भी कहीं जिन्हें हम हिन्दी ग़ज़ल कह सकते हैं। इन ग़ज़लों ने उन्हें हिंदी में ऐसा प्रतिष्ठित किया कि मिश्रित शब्दावली के प्रयोग के बावजूद वे हिंदी कविता के मंच और गोष्ठियों तथा पत्रिकाओं के हो गये। यह उनकी ग़ज़लों की ताक़त रही कि उर्दू मंचों पर बुलाये जाने पर वहाँ भी अपना ग़ज़ब प्रभाव छोड़ते थे। गंगा-जमुनी शायरी अपनाते हुए उन्होंने कई हिंदी ग़ज़लें दीं एक से एक ख़ूबसूरत।

एक गीत लिखने बैठा था मैं कल पलाश का

ये बात सुनकर हँस पड़ा जंगल पलाश का

 

वादों को भूल जाना ही जिसका स्वभाव है

ऐसे ही एक शख़्स से अपना लगाव है

 

मदिरा की सुराही में गरल देख रहे हैं

अतृप्त ही रहने में कुशल देख रहे हैं

 

हम तो उस वक़्त भी आपके मीत थे

जब कि थी आपसे जान-पहचान कम

 

साथ रहते हुए इक ज़माना हुआ

फिर भी है इस तरफ़ आपका ध्यान कम

 

हाथ पीले क्या हुए हाथों में सरसों पक गयी

चार ही दिन की मुलाक़ातों में सरसों पक गयी

 

मुहब्बत भी कैसे अकस्मात होती

न तुम होते सुन्दर न ये बात होती

 

अगर सावन मे भी चाहो कि हासिल तुमको गौरव हो

तो अपनी प्यास को रोको जहाँ तक तुमसे संभव हो

 

माहौल में अनबन का चलन देख रहे हैं

बिखरे हुए सद्भाव-सुमन देख रहे हैं

 

हम जो प्यार से अपनी ग़ज़ल देख रहे हैं

सपनों का सुघड़ ताज महल देख रहे हैं

 

बनारस ने उन्हें बहुत प्यार दिया

मेयार भाई की ग़ज़लों पर लहालोट बनारस के साहित्यकारों और साहित्य प्रेमियों को देखकर मेरी भी इच्छा रहती थी कि मैं भी ग़ज़लें कहूँ। ग़ज़लों की गेयता और लोकप्रियता नई कविता से बिल्कुल अलग थी। मैंने उनसे कहा कि वे मुझे ग़ज़ल का आंतरिक शिल्प बताएं। लेकिन उन्होंने वह बताने के बजाय यह बताया कि तुम नई कविताएं बहुत अच्छी लिख रहे हो और चुपचाप वही लिखते रहो, ग़ज़ल आदि के चक्कर में मत पड़ो। फिर भी मैंने इस दिशा में एक कोशिश की। दो-चार ग़ज़लें कहीं। इनमें से एक थी— पहला-पहला प्यार है एक साँवली लड़की/ यारो आख़िरकार है एक साँवली लड़की।…. यह सन् उन्यासी की बात है जब मैं उन्नीस साल का था। यह ग़ज़ल अच्छी थी लेकिन इसमें कुछ बहर दोष भी था जिसकी जानकारी तब मुझे नहीं थी। लेकिन विषय और वर्णन मेयार भाई को पसंद आया। दानिश ने इसकी बहुत तारीफ़ की और आज भी बातचीत में इसकी चर्चा कर बैठते हैं। उत्साहित होकर फिर मैंने एक और कोशिश की। इस बार लिखा—- हौले-हौले हाथ हिलाता है युकिलिप्टस का इक पेड़ / दूर से नज़दीक बुलाता है युकिलिप्टस का इक पेड़।…. एक शाम गोलघर पर एक चाय की दुकान में मैं, दानिश, मेयार भाई और तस्कीन वाहिदी बैठे थे। मेयार भाई ने कहा कुछ लिखा है तो सुनाओ। मैंने झटपट यह ग़ज़ल सुना दी। सुनने के बाद तस्कीन वाहिदी साहब ने मुझसे सवाल किया कि आपने युकिलिप्टस का पेड़ क्यों लिया, कोई भारतीय पेड़ क्यों नहीं ? मेरे मुंह से बेसाख़्ता निकल गया, मैं करूँ क्या, मैंने जिसके लिए ग़ज़ल कही है उसके दर पर युकिलिप्टस का ही पेड़ है। इस पर लोग ख़ूब हँसे। बाद में भी इसकी चर्चा करके तस्कीन वाहिदी और मेयार भाई रस लेते रहे। याद है कि इसी के बाद फिर मैंने कोई ग़ज़लनुमा रचना की थी और उसे मेयार भाई को सुना भी दिया। उसे सुनने के बाद मेयार भाई ने कह दिया कि यह क्या लिखे हो ! तुम ग़ज़ल का चक्कर छोड़ो और छंदमुक्त कविता ही लिखते रहो उसी में तुम्हारी योग्यता है उसमें तुम अच्छा लिख रहे हो। इसके बाद मैंने ग़ज़ल कहने का नेक ख़याल छोड़ दिया।

उसी दौरान कुछ समय बाद मेयार भाई ने एक मुक्तछंद कविता लिखी। उनका यह प्रथम प्रयास था जो वक्तव्यवत अभिव्यक्ति मात्र थी। मैंने कहा- मेयार भाई, यह क्या लिखे हैं ! आप ग़ज़ल कितनी बढ़िया कहते हैं। ग़ज़ल ही कहिए ! मेयार भाई ने फिर कभी नई कविता कहने की कोशिश नहीं की।

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जब मैंने ग़ज़ल कहना शुरू किया

लेकिन इस घटना के चौदह वर्ष बाद फिर मैंने ग़ज़ल कहने का दुस्साहस किया। कारण वही कि इसकी गेयता, लोकप्रियता और इसमें मेयार भाई का जलवा। मगर फिर वही दिक़्क़त ! बहर की कोई जानकारी और समझ नहीं और बतलाने के लिए तैयार मेयार भाई भी नहीं ! ऐसा कुछ लिखता तो दोस्तों को सुना देता लेकिन छपवाता नहीं था। क्योंकि अपनी कमज़ोरी जानता था, बस यह नहीं मालूम था कि इसे कैसे दूर करूँ। एक शाम लहुराबीर की अड़ी पर दोस्तों के बीच मैंने ग़ज़ल के नाम पर एक ग़ज़लनुमा रचना पेश कर दी। वहाँ एक मित्र का मित्र जो मुस्लिम नौजवान था जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था और उस दिन के बाद फिर कभी नहीं देखा, उसने कहा कि आपकी ग़ज़ल में भाव-विचार अच्छे ढंग से व्यक्त हुए हैं लेकिन ग़ज़ल बहर से मात खा रही है। बहर जान लीजिए तो मुक़्क़मल तौर से ग़ज़ल कहने लगेंगे। उसने इसका एक सूत्र दिया और कुछ सामान्य नियम बताये। घर आकर मैंने ग़ज़लों की किताब ली और बहर समझने की कोशिश में लग गया। इस तरह मुझे एक-दो दिन में बहर की मालूमात हो गयी। फिर क्या, लगे हाथों मैंने एक ग़ज़ल कह दी—

कहाँ ठहरी हुई है तू नदी

यहाँ हम जल रहे धू-धू नदी

 

लबों को पत्थरों पर रख दिया

कहीं से भी कभी तो चू नदी

 

बहेगी कब उसी अंदाज़ में

उसी रूमानियत को छू नदी

 

तुम्हारे पाट नीरव हो गये

न कल-कल है न है कू-कू नदी

 

जहां के पास हैं काँटे बचे

बचा तेरे यहाँ बालू नदी

 

टपकते आज तेरे नाम पर

झराझर आँख से आँसू नदी

 

किसे मालूम है किस घाट पर

रहा केशव शरणसाधू नदी

यह ग़ज़ल कहने के बाद मैं उनके घर गया। मैंने कहा- मेयार भाई ! अब मुझे ग़ज़ल कहने का शऊर आ गया। उन्होंने कहा- सुनाओ ! मैंने कहा- चलिए ज़िला जेल रोड की ओर, वहीं टहलते भी हैं और आपको ग़ज़ल भी सुनाता हूँ। मेयार भाई का यह बड़प्पन और प्यार था कि मैं कहीं भी कह देता था चलने को और वे चल पड़ते थे। मैं कुछ भी लिखता था उन्हें सुनाता रहता था। वे उसके एक-एक शब्द और एक-एक पंक्ति पर बात करते थे जिसमें प्रशंसा, आलोचना और सुझाव सब रहता था।

ख़ैर, उन्होने सुनी और कहा- काश ! यह ग़ज़ल मैंने कही होती। मेयार भाई जैसे ऊंचे शायर द्वारा मेरी ग़ज़ल की यह बहुत बड़ी प्रशंसा थी। इससे मेरा आत्मविश्वास और मनोबल स्थिर हो गया।

मेयार भाई ने बेहतरीन ग़ज़लें दी हैं। बस थोड़ी-सी नज़्में कही हैं लेकिन वे भी बेहतरीन। इंदिरा गांधी की शहादत पर उन्होंने पांच नज़्में लिखी थीं। जो सन् चौरासी में पुस्तिकाकार वतन के नाम पांच फूल के नाम से छपीं और वितरित हुईं। इन नज़्मों के साथ वे बनारस में एक दूसरे नज़ीर बनारसी के रूप में उभरे।

मेयार भाई जिस ऊंचे मरतबे के शायर थे उसके अनुपात में उनका दायरा उतना विस्तृत नहीं था।

विस्तार देने की उन्होंने कोई कोशिश भी नहीं की। वगरना, इस बनारस में गंगा-जमुनी तहजीब के शायर नज़ीर बनारसी के बाद वही थे। वे गोष्ठियों और स्थानीय मंचों पर जिस तत्परता और चाव से शिरकत करते थे दूर के कवि सम्मेलनों और मुशायरों में भाग लेने के प्रति उतने ही उदासीन थे। सिर्फ़ अपने विभाग रेलवे के कवि सम्मेलनों में भाग लेने के लिए बनारस से बाहर जाते थे। वे कहीं भी अपना कलाम पढ़ते श्रोताओं के दिल-दिमाग़ पर छा जाते थे। ऐसे ही किसी कवि सम्मेलन में उनके साथ कवि और नवभारत टाइम्स के संपादक कन्हैयालाल नंदन थे जो उनकी ग़ज़लों से बहुत प्रभावित हुए। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद उन्होंने उनसे दो ग़ज़लें लीं जिन्हें अगले ही हफ़्ते शाया भी कर दीं। नंदन जी ने मेयार भाई से अनुरोध किया कि वे उन्हें महीने दो महीने में अपनी ग़ज़लें भेजते रहें। लेकिन मेयार भाई भी न ! वे छपने के लिए अपनी ग़ज़लें कहीं नहीं भेजते थे। कोई संपादक पीछे पड़कर उनसे ग़ज़लें लेकर छाप दे तो अलग बात। दीवान छपवाना तो बहुत दूर। वो तो भला हो उनके घोषित शिष्य कवि और ग़ज़लकार विनय मिश्र का कि उनके पीछे पड़कर सन् दो हज़ार दस में उनका ग़ज़ल संग्रह ख़याल के फूल छपवाकर ही दम लिया जब वे पचहत्तर वर्ष के हो गये थे और उनके पास कई संग्रहों की ग़ज़ल-सामग्री इकट्ठा हो चुकी थी। सही तरह से इस संग्रह के माध्यम से वे समकालीन हिंदी ग़ज़ल के परिदृश्य में आये। उनके श्रोताओं, पाठकों और ख्याति का दायरा ख़ूब बढ़ा। मुझे लगता है कि उनकी जो ग़ज़लें हिंदी ग़ज़ल में समाहित हो सकती थीं उन्हीं ग़ज़लों को इस संग्रह में लिया गया है। लेकिन ऐसी सब की सब ग़ज़लें इसमें ले ली गई हों, ऐसा भी नहीं है। कुछ अवश्य छूटी हैं। यूं भी इस संग्रह में उनकी मात्र अस्सी ग़ज़लें हैं। इसके प्रकाशन के बाद उन्होंने कम से कम पचास ग़ज़लें कही होंगी जिनमें आप हिंदी ग़ज़ल के कथ्य और रूपगत तत्व पायेंगे। मोटे तौर पर नये विषय, जनवादिता, प्रगतिशीलता और प्रयोगधर्मिता हिंदी ग़ज़ल की विशेषता कही जा सकती है। हालांकि रचना की ये सार्वभौम विशेषताएं हैं जो उर्दू में भी पायी जाती हैं जिसके कारण उर्दू के तमाम शायर हिंदी ग़ज़लकारों के लिए प्रकाश स्तंभ बने हैं क्योंकि उनके यहां ग़ज़ल का रचाव परम्परा से ही ज़्यादा परिपक्व और प्रभावपूर्ण है। प्रभाव की दृष्टि से मेयार भाई की ग़ज़लें दुष्यंत कुमार और अदम गोंडवी से कम नहीं हैं। इसी का नतीजा है कि इस ग़ज़ल संग्रह के प्रकाशन पश्चात उनकी ग़ज़लों का जो जल्वा बनारस में दिखता था वही बाहर दिखाई पड़ा। दरवेश भारती, जहीर कुरैशी, कमलेश भट्ट कमल, रामकुमार कृषक, देवेन्द्र आर्य जैसे हिंदी ग़ज़ल के बड़े व्यक्तित्व उनके मुरीद हुए। देश-भर के हिंदी ग़ज़लकारों में उनकी लोकप्रियता बनी। यूं इस संग्रह के पहले सन् दो हज़ार छह में ग़ज़लकार दीक्षित दनकौरी द्वारा संपादित पुस्तक  ग़ज़ल — दुष्यंत के बाद (भाग-दो )  में वे संकलित हैं।

इसका भी श्रेय विनय मिश्र को ही है। उनके शागिर्दों में विनय मिश्र की गुरुदक्षिणा अनुपम है। विनय मिश्र के कारण ही वे उस्ताद बने। नहीं तो उस्ताद शायर होते हुए भी वे उस्तादी से दूर रहते थे। अट्ठावन वर्ष पर रिटायर होने के बाद मिले समय के कारण वे उस्तादी स्वीकार कर सके। विनय मिश्र के अलावा कुंअर सिंह कुंअर, नसीम अख़्तर और अज़फ़र अली उनके जाने-माने शिष्य हैं। अज़फ़र अली ने उनकी बहुत सेवाएं कीं तन-मन से अंतिम दम तक। यूं गाहे-ब-गाहे जिनको चाहिए होता उनको वे इस्लाह करते रहते थे। उनमें मैं भी शामिल हूं।

वे एक सधे शायर थे, शब्दों और भावों तथा कहन के गहरे जानकार लेकिन जब कोई नई ग़ज़ल कहते तो मुझसे पूछते यह शे’र कैसा रहा, वह शे’र कैसा रहा, यहां यह ठीक रहेगा या वह। वरिष्ठता और श्रेष्ठता के बावजूद ऐसा मैत्री-भाव था उनमें। लेकिन कभी मैं उनसे नाराज़ हो जाता था तो महीनों उनसे नहीं मिलता था। तब वे अचानक एक दिन मेरे पास आते थे और मेरे गिले-शिकवे दूर हो जाते थे। हम पहले की तरह क़रीब।

मेयार भाई ने बेहतरीन ग़ज़लें दी हैं। बस थोड़ी-सी नज़्में कही हैं लेकिन वे भी बेहतरीन। इंदिरा गांधी की शहादत पर उन्होंने पांच नज़्में लिखी थीं। जो सन् चौरासी में पुस्तिकाकार वतन के नाम पांच फूल के नाम से छपीं और वितरित हुईं। इन नज़्मों के साथ वे बनारस में एक दूसरे नज़ीर बनारसी के रूप में उभरे। उनके जीवन की एक ख़ास बात यह रही कि देश के विभाजन के समय वे बाल्यावस्था में पाकिस्तान में थे अपनी रिश्तेदारी में। वहां उनके दादा का कारोबार था जबकि उनका खानदान और परिवार उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले में रहकर खेती-किसानी करता था। उस उथल-पुथल में जब मुसलमान भारत छोड़कर पाकिस्तान जा रहे थे, संकटों का सामना करते हुए वे दादा-दादी के साथ बाराबंकी लौटे। बड़े होकर रेलवे की नौकरी पायी और बनारस में आ गये और यहीं के होकर रह गये। यहीं उन्होंने महकवि सूरदास पर एम फिल किया प्राइवेट पढ़ाई करके।

मेयार सनेही की किताब ख्याल के फूल

उनकी शायरी में जो गंगा-जमुनी संस्कृति का प्रवाह है उनकी शख़्सियत में भी उसकी तहजीब मौजूद थी। यदि ऐसा नहीं होता तो उनकी शायरी में सच्चाई की वह ताक़त नहीं होती जो दिलों पर सीधे असर करती है। हिंदी साहित्य के शिखर आलोचकों में से एक और जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव प्रोफ़ेसर चन्द्रबली सिंह के वे चहेते शायर थे। चन्द्रबली जी के आवास पर होने वाली सामान्य गोष्ठियों में प्राय: और विशेष आयोजनों में वे अवश्य रहते थे। जब ब्रहमाशंकर पाण्डेय और अशोक पाठक उन्हें जनवादी लेखक संघ में सदस्य के रूप में लाये तो चन्द्रबली जी बहुत ख़ुश हुए थे।

ख़ुश होकर उन्होंने उनको जनवादी संघ का पदाधिकारी बनाया। जनवादी लेखक संघ वाराणसी से निकलने वाली पत्रिका ” जनपक्ष ” के संपादक डा रामसुधार सिंह के सहायक संपादक थे मेयार भाई और अशोक पाठक। ग़ज़लों और उर्दू साहित्य से संबंधित सामग्री की त्रुटिहीन प्रस्तुति की ज़िम्मेदारी मेयार भाई की थी। अशोक पाठक से मेरा संबंध अच्छा था लेकिन बहुत अच्छा नहीं था। उन्होंने सोच लिया था कि जनपक्ष में केशव शरण को नहीं छापना है। इसकी काट के लिए मैंने अपनी ताज़ा और अप्रकाशित पांच कविताएं मेयार भाई को सौंपीं। सोचा, उनके समर्थन और दबाव से मैं जनपक्ष में छप जाऊँगा। एक सप्ताह बाद मेयार भाई से मुलाक़ात होती है। मेरी कविताओं का वही लिफ़ाफ़ा लौटाते हुए मेयार भाई मुझे बताते हैं कि अशोक पाठक ने इन्हें लौटा दिया है क्योंकि ये जनपक्ष में छपने लायक़ नहीं हैं। मैंने देखा कि इस अस्वीकृति को लेकर उनके चेहरे पर कोई अफ़सोस नहीं है। फिर इस विषय में उनसे आगे कुछ पूछना व्यर्थ लगा। लेकिन कुछ महीनों के लिए उनसे मेरा अबोला हो गया जो अशोक पाठक और मेरे बीच पहले से चल रहा था। पत्रिका छपकर आ गई थी। एक दिन मैं और सलाम बनारसी चन्द्रबली जी के पास बैठे थे तभी अशोक पाठक आ गये। चन्द्रबली जी ने अशोक पाठक जी से सवाल किया कि पाठक जी मैंने आपसे कहा था कि केशव की दो कविताएं छाप दीजिएगा, क्यों नहीं छापा ? इस पर अशोक पाठक जी ने जवाब दाख़िल किया कि उनके पास पचासों कवियों की सैकड़ों कविताएं हैं वे किसको-किसको छापें। इस जवाब से चन्द्रबली सिंह जी चुपचाप हो गये। लेकिन इसके बाद मेयार भाई से मेरा अबोलापन दूर हो गया। हम फिर मिलने लगे। किसी शाम उनकी दुकान पर, किसी सुबह राजकीय उद्यान में। हमें अक्सर वहाँ समीक्षक और साहित्यकार डा विश्वनाथ प्रसाद, राजशेखर जी और शायर गोपाल तन्हा मिल जाते थे। आज उनमें से कोई नहीं है और मेयार भाई भी। जनपक्ष अब भी निकलती है क्योंकि अनियतकालीन पत्रिका है। 

धीरे धीरे रवां हुये

मेयार सनेही एक खुशमिज़ाज, नरम स्वभाव और कड़क आवाज़ के व्यक्ति थे। इस आवाज़ में वे बड़े मन और प्यार से ग़ज़लें पढ़ते थे। अच्छे तरन्नुम में ग़ज़ल पढ़ने वालों को वे तरह में ग़ज़ल पढ़कर श्रीहीन कर देते थे। इसके पीछे थी उनकी उम्दा फ़िक्र, फ़न और अन्दाज़े-बयां। ग़ज़ल कहने में उनकी जो महारत थी वह कम ही शायरों में देखने को मिलती है। यूँ, एक विकासक्रम मेयार भाई का भी है। शुरुआत उनकी रवायती शायरी से होती है पारम्परिक भाषा-शैली में रूमानी ख़यालों को दोहराकर। उदाहरण के लिए, धीरे-धीरे वो मेरी हस्ती के सामां हो गये की तर्ज और रफीफ़-क़ाफिया में ग़ज़ल कहना। उनकी ऐसी ग़ज़लें भी अपना तासीर रखती थीं और कव्वाल एक समय गाते भी थे। वे अपने गाने के लिए अक्सर उनसे ग़ज़लें लिखवाते थे। बदलते समय और हिंदी कवियों , ग़ज़लकारों और साहित्यकारों से निरन्तर बढ़ते सम्पर्क के कारण उनमें जदीदियत बढ़ती गयी और वे ग॔गा-जमुनी संस्कृति के क़ौमी शायर के रूप में उभरकर आये। हिंदी के अतिप्रतिष्ठित ग़ज़लकार जहीर कुरैशी ने बिल्कुल सही लिखा है कि मेयार सनेही की अधिकतर ग़ज़लें हिन्दी-उर्दू की साझा संस्कृति का एक अनुकरणीय उदाहरण हैं।

कहते हैं कि सिर्फ़ कवि ही कविता नहीं रचते कविता भी कवि को रचती है। सजाकर दामने-अल्फ़ाज़ में ख़याल के फूल/ मैं दे रहा हूँ ज़माने को बोल-चाल के फूल  लिखने के बाद मेयार भाई बोलचाल की भाषा में ही ख़यालों के फूलों से ज़माने को नवाज़ने लगे।

उनकी शायरी के कुछ फूल मैं यहां रखना चाहता हूँ जिन पर महफ़िलें और मंच लहालोट हो जाते थे। वाह-वाह की झड़ियां लग जाती थीं। कुछेक उद्धरण रख रहा हूँ।

तारीकियों में किसलिए गुम हैं बतायें क्या

नंगे बदन हैं लोग उजाले में आयें क्या

 

बस एक शाम गुज़ारी थी उनकी महफ़िल में

महक रहे हैं अभी तक उसी ख़याल के फूल

 

हम मुहब्बत के पुजारी हैं मुहब्बत की क़सम

जिसको भी सजदा करेंगे वो ख़ुदा हो जायेगा

 

तेरे लिए ऐ ज़िन्दगी इक रास रचूँगा

पहले मैं ख़यालात को घनश्याम तो कर लूँ

 

ख़फ़ा न हो तो इसे चूम लूँ ख़ुदा की क़सम

तुम्हारा चेहरा मुक़द्दस किताब लगता है

 

भीलनी के बेर जूठे थे ये कैसे देखते

राम तो हैरत में थे जंगल में इतना प्यार है

 

जो गुलसितां को मुहब्बत का रंग दे न सके

वो गुलसितां के लिए अपनी जान क्या देंगे

 

ये कहता ही मैं रह गया बाग़बां से

मेरा आशियां है ! मेरा आशियां है

 

बनारस की तहज़ीब क्या पूछते हो

इसी शहर का नाम हिन्दोस्तां है

 

इत्तिफ़ाक़न मुलाक़ात भी ख़ूब है

तुम मसीहा हो मुझको दवा चाहिए

 

मयकदा डूब जाये बला से मेरी

मयकशों को तो काली घटा चाहिए

 

तुम अपने वास्ते जो चाहे रंगो-बू रखना

मगर तुम्हीं को है गुलशन की आबरू रखना

 

ये उजाले हैं सियहज़ात लिखूँ या न लिखूँ

सोचता हूँ कि मैं ये बात लिखूँ या न लिखूँ

 

मुझको नहीं है मेरी ख़बर तुमको इससे क्या

ये देन है तुम्हारी मगर तुमको इससे क्या

 

तुमने मजहब को सियासी पैंतरों में रख दिया

सर पे रखनेवाली शै को ठोकरों में रख दिया

 

विभीषण कहके तौहीने-बिरादर कर नहीं सकते

भरत मुझको बनाना था तो तुमको राम होना था

मेयार सनेही जी की ग़ज़लों का एक मेयार है। उनकी हर ग़ज़ल एक कामयाब ग़ज़ल है। जनता के दुःख-दर्द को स्वर देने वाली और सामाजिक-राजनीतिक विडम्बनाओं पर प्रहार करने वाली और ग़ज़ल के उच्च साहित्यिक मापदण्डों का भी सम्वर्धन करने वाली। सूक्ष्म भाव वाले उनके कुछ शे’रों को भी आइए देखते चलें।

 

जिस बात को तस्लीम मेरे दिल ने किया है

उस बात को तस्लीम सरे-आम तो कर लूं

 

ख़ूबसूरत ग़ज़ल कही मैंने

आपको सोचते हुए अक्सर

 

कश्ती का हौसला किसी तूफ़ां से कम न था

तूफ़ां समझ रहा था ये काग़ज़ की नाव है

 

मौत आई है जो कहते हैं ग़लत कहते हैं

ज़िंदगी लौट के आई है जहाँ थी पहले

 

ज़हर को जिसने दवा कहके पुकारा होगा

मेरे जैसा ही कोई दर्द का मारा होगा

 

मैं अपने आपसे बचकर भला कहाँ जाता

मेरे वजूद के अंदर मेरी तबाही थी

 

समन्दर से कोई रिश्ता तो होगा

वगर्ना अश्क़ क्यों खारा हुआ है

 

वो देखो ज़िन्दगी ठहरी हुई है

मगर जीने को ख़्वाहिश चल रही है

 

विपदाओं के हुजूम से घबरा के सर न पीट

विपदाएं साथ लाती हैं अपना इलाज भी

 

इन उबलते आँसुओं में बोलती है इक नदी

ये बला का दर्द किसने पत्थरों में रख दिया

 

ठंडी-ठंडी छाँव तो लोगों ने मिलकर बाँट ली

और मैं अपना मुक़द्दर धूप में पढ़ता रहा 

मेयार भाई ने उर्दू मिश्रित बोल-चाल की भाषा में शायरी की है। वे आसानी से उर्दू के शायर कहे जा सकते हैं। लेकिन उनको अपनाया है हिन्दी वालों ने। हिन्दी ग़ज़ल कहने वाले बनारस के तमाम साथी उनसे किसी न किसी रूप में जुड़े रहे एक हार्दिक रिश्ता बनाकर। वे चाहे रवीन्द्र उपाध्याय कौशिक हों, रामदास अकेला हों, जयप्रकाश बाग़ी हों, आनंद परमानन्द या राजशेखर जी हों जो मेयार भाई की तरह ही आज इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उन्हें याद करने के लिए विद्यानंद मुद्गल, चन्द्रभाल सुकुमार हैं और हैं सर्वश्री नरोत्तम शिल्पी, सलीम राजा, अलकबीर, विनय कपूर गाफिल, दानिश, संतोष सरस, मंजरी पांडेय, शिव कुमार पराग, केशव शरण, धर्मेंद्र साहिल, अभिनव अरुण और विनय मिश्र

जो ग़ज़ल नहीं कहते हैं और अन्यान्य विधाओं में लिखते हैं वे लोग भी मेयार भाई के प्रशंसक और मित्रों में रहे हैं।डॉ महेन्द्र प्रताप सिंह और विपिन कुमार मेयार भाई के पास बराबर जाते रहे दूर हरहुआ उनसे मिलने।

मेयार भाई को बनारस हमेशा याद करता रहेगा। अपने उद्गारों में उनके अशआर उद्धृत करता रहेगा। वे बनारस की साहित्यिक विभूति थे। उन्हें हम कभी भूल नहीं सकते। उनकी स्मृति को बार-बार प्रणाम !

केशव शरण जाने-माने कवि-ग़ज़लकार और गद्यकार हैं।

 

1 Comment
  1. Yogesh Nath Yadav says

    मेयार सनेही जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर विस्तार पूर्वक चर्चा की है केशव शरण जी ने।बहुत सुंदर।

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