Wednesday, April 17, 2024
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मुमकिन है सड़क हादसों का न्यूनीकरण (डायरी, 6 अगस्त, 2022)

भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारें तमाम दावे कर लें, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारतीय सड़कें दुनिया के स्तर पर सबसे खतरनाक सड़कों की श्रेणी में आती हैं? क्या आप यह जानते हैं कि भारत में वाहनों की संख्या दुनिया के स्तर पर केवल एक फीसदी है और दुर्घटनाओं के मामले में भारत […]

भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारें तमाम दावे कर लें, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारतीय सड़कें दुनिया के स्तर पर सबसे खतरनाक सड़कों की श्रेणी में आती हैं? क्या आप यह जानते हैं कि भारत में वाहनों की संख्या दुनिया के स्तर पर केवल एक फीसदी है और दुर्घटनाओं के मामले में भारत अव्वल है। अकेले केवल भारत में पूरी दुनिया की 11 फीसदी सड़क दुर्घटनाएं होती हैं। यह भी जानना कम दिलचस्प नहीं है कि भारत में होनेवाली मौतों की वजह में सड़क दुर्घटनाएं तीसरे नंबर पर हैं। पहले दो स्थानों पर सामान्य मौतें और स्वास्थ्य संबंधी कारण हैं। केंद्रीय सड़क और राजमार्ग मंत्रालय की अपनी रपट यह मानती है कि देश में वाहन दुर्घटनाओं की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है। मंत्रालय द्वारा जारी रपट के मुताबिक, वर्ष 2020 में 1 लाख 31 हजार 714 लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में हुईं। इनमें 66 फीसदी मौतों की वजह बेकाबू रफ्तार है। वहीं 30.1 फीसदी मौतों की वजह हेलमेट नहीं पहनने के कारण हुईं। करीब 11 फीसदी मौतें कार में सीट बेल्ट नहीं लगाने की वजह से हुईं।

खैर, उपरोक्त आंकड़े सरकारी हैं और जाहिर तौर पर इनमें मैनिपुलेशन किया ही गया होगा। लेकिन इसके बावजूद इन्हें एक आधार माना जा सकता है और इस पर विचार किया जा सकता है कि इस समस्या का समाधान क्या है?

राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण में इस बात का ध्यान रखा जाय कि अलग-अलग लेनों के बीच डिवाइडर हों। हर लेन अलग-अलग श्रेणियों के वाहनों के लिए ही उपयोग किये जायें। ओवरटेकिंग को अपराध माना जाय। सामुदायिक वाहनों के उपयोग को बढ़ावा दिया जाना हमेशा सकारात्मक परिणाम देगा।

आज यह सवाल इसलिए कि कल मेरे सामने एक हादसा होते-होते रह गया। हुआ यह कि दफ्तर जाने के लिए बस स्टैंड पर खड़ा था। दिल्ली में मुझे एक बात अच्छी लगती है कि यहां की हुकूमतें अधिक संवेदनशील नजर आती हैं। क्षेत्रीय विषमता की कहानी फिर कभी, लेकिन जो बात मुझे यहां अच्छी लगती है, वह यही कि सरकारें कुछ बातों को समझती है। नागरिक सुविधाओं के मामले में दिल्ली पूरे देश में अव्वल है। एक सुविधा तो यही कि यहां हर जगह शौचालयों की व्यवस्था है। किसी पुरुष को सड़क किनारे हल्का होने की मजबूरी नहीं होती और ना ही किसी महिला को बर्दाश्त करना पड़ता है। पिछले कुछ दिनों से मैं दिल्ली परिवहन निगम की बसों पर एक विज्ञापन देख रहा हूं। चूंकि यह दिल्ली सरकार के अधिकार क्षेत्र में शामिल है, इसलिए विज्ञापन में अरविंद केजरीवाल की फोटो है। लेकिन मेरे लिए विज्ञापन का संदेश महत्वपूर्ण है- “हम अपनी लेन में चल रहे हैं और आप?”।

खैर, पहले कल की घटना। हुआ यह कि बस स्टैंड पर खड़ा था। तभी एक मोटरसाइकिल सवार को एक बस ने टक्कर मार दी। मोटरसाइकिल सवार गिर पड़ा और उसकी खुशकिस्मती रही कि वह दायीं ओर गिरा और उसने हेलमेट पहन रखा था। अगर हेलमेट ना होता तो निश्चित तौर पर सड़क पर बने डिवाइडर के कारण उसे अधिक हानि होती। मैं दौड़कर उस व्यक्ति के पास पहुंचा और उसकी सहायता की।

मैं तभी से यह सोच रहा था कि सड़कों पर मौत होती कैसे है। हालांकि एक बार मैं खुद भी सड़क दुर्घटना का शिकार हुआ हूं। लेकिन हेलमेट पहनना मुझे हमेशा महत्वपूर्ण लगता रहा है तो जब मेरे साथ हादसा हुआ था तब मेरी मोटरसाइकिल (यामहा कंपनी की ग्लैडिएटर जिसे मैं धन्नो की उपमा देता था) को नुकसान हुआ और मेरे कॉलर बोन में हेयरलाइन फ्रैक्चर हुआ था।

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दरअसल, दो चीजें एक साथ हो रही हैं। एक तो यह कि औद्योगिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए सरकारें सड़कों के निर्माण पर खूब जोर दे रही हैं और दूसरा, उनका पूरा ध्यान इस बात पर है कि सड़कें ऐसी हों ताकि वाहनों का परिचालन तीव्र गति से हो। बिहार के मुख्यमंत्री तो अक्सर यह बात दूसरे शब्दों में कहते नजर आते हैं कि किसी भी जिले से पटना अधिकतम छह घंटे में पहुंचा जा सकता है। तो सरकारों के लिए यह भी एक उपलब्धि है।

सड़कों के मामले में बिहार अलहदा है। यहां पैदल चलनेवालों को सड़क पर चलने का अधिकारी माना ही नहीं जाता। दिल्ली में हालांकि शहर की मुख्य सड़कों पर फुटपाथ का निर्माण किया गया है। असल में करीब 16 फीसदी मौतें सड़क पर पैदल चलनेवालों की होती है। एक बड़ा कारण यह भी है कि सड़क पार करने के लिए स्थल चिन्हित करने के मामले में सरकारें संवेदनशील नहीं होतीं और ना ही आम जन जेब्रा क्रासिंग की परवाह करते हैं।

मुझे लगता है कि सड़क हादसों में कमी लायी जा सकती है। इसके लिए कुछ कठोर कानून बनाने होंगे। पहला तो यह कि राष्ट्रीय राजमार्गों पर मोटरसाइकिलों का उपयोग बिल्कुल बंद कर दिया जाय। दूसरा यह कि शहर की सड़कों पर बड़े वाहनों का परिचालन हर समय प्रतिबंधित रहे। हालांकि नो इंट्री का कांसेप्ट पहले से है, लेकिन यह केवल खास स्थानों के लिए ही है। मसलन, मेरे गांव की सड़क, जिसकी चौड़ाई महज 12-16 फीट है, पर बड़े वाहनों के कारण जाम की समस्या बनी रहती है और हर साल कम से कम चार-पांच लोगों की मौत हो ही जाती है। इसलिए मुझे लगता है कि जहां सघन आबादी है, वहां बड़े वाहनों पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध हो। रात में भी उनकी गति पर नियंत्रण के लिए प्रावधान किये जाएं।

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दूसरी बात यह कि राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण में इस बात का ध्यान रखा जाय कि अलग-अलग लेनों के बीच डिवाइडर हों। हर लेन अलग-अलग श्रेणियों के वाहनों के लिए ही उपयोग किये जायें। ओवरटेकिंग को अपराध माना जाय। सामुदायिक वाहनों के उपयोग को बढ़ावा दिया जाना हमेशा सकारात्मक परिणाम देगा।

बहरहाल, मैं यह मानता हूं कि बात केवल कानूनों को कठोर बना देने से नहीं बनेगी। देश में परिवहन कानूनों में संशोधन तो 2019 में किया ही गया था। सरकार का दावा था कि नये संशोधनों के कारण सड़क हादसों में कमी आएगी। लेकिन हुआ क्या, यह तो सरकार की अपनी रपट बता रही है। सरकार को अपनी नीयत में और लोगों को अपनी सोच में बदलाव लाने ही होंगे।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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