आखिर क्यों नहीं बनतीं गिरमिटिया पूर्वजों पर फ़िल्में

राकेश कबीर

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प्रवासी भारतीयों के सिनेमा पर एमफिल करते वक्त सन 2007-08 में ह्यूग टिंकर (HughTinker) की किताब में  गिरमिटिया मजदूरों के बारे में पढ़ने-जानने का अवसर मिला। उन्होंने अपनी किताब ए न्यू सिस्टम ऑफ स्लेवरी: द एक्सपर्ट ऑफ इंडियन लेबर ओवरसीज 1830-1920 में इन्डेन्चरशिप को गुलामी प्रथा का ही नया स्वरूप बताया। यह दुनिया के इतिहास में मजदूरों का सबसे बड़ा पलायन था। 19वीं सदी में अंग्रेजों के गन्ना, चाय और रबर के बागानों में काम करने के लिए भारत के दो राज्यों बिहार और उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में मजदूरों का प्रवास ठेका श्रमिकों  के रूप में हुआ। वे पहले दलाल या अरकाटी के द्वारा फुसला-बहलाकर कलकत्ता ले जाए जाते और फिर उन्हें  बागानों में काम करने के लिए ठेका मजदूर बनाकर भेज दिया जाता। ब्रिटिश पार्लियामेंट द्वारा सन 1838 में गुलामी प्रथा को समाप्त कर दिया गया लेकिन मजदूरों की समस्याओं को दूर करने के लिए ठेका मजदूरी की शुरुआत हुई, जिसमें नाममात्र का बदलाव हुआ था इससे मजदूरों के शोषण में किसी तरह की कमी नहीं आई। पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं बिहार के विभिन्न जनपदों से लाखों की संख्या में ठेका मजदूर एक बेहतर भविष्य की तलाश में फ़िजी, मारीशस, फ्रेंच गुयाना और अन्य केरेबियन देशों में इंडेंटचर्ड लेबरर बनकर गए और वहीं बस गए। भोजपुरी भाषा में पलायन से उपजे दर्द को गीतों और नाटकों के माध्यम से रचनाकारों ने प्रस्तुत किया जो आज भी मौजूद हैं। जब हम इतने बड़े पैमाने पर हुए प्रवास (गिरमिटिया मजदूर) के सिनेमा के बारे में खोज शुरू करते हैं तो कुछ गिनी-चुनी डाक्यूमेंट्री फिल्में और एक दो फिल्में मिलती हैं। बॉलीवुड दुनिया का सबसे ज्यादा फिल्में बनाने वाला उद्योग है लेकिन वह आज तक इस विषय पर एक भी ढंग की फिल्म नहीं बना सका जो बॉलीवुड के पूंजीवादी, संभ्रांत और लाभ समर्थक चरित्र का प्रमाण है।

आजादी के बाद आधुनिक शिक्षा और डिग्री प्राप्त संभ्रांत लोग जब इंग्लैंड, अमेरिका, जर्मनी आस्ट्रेलिया जैसे देशों में गए तो उनको ही इंडियन डायस्पोरा मानते हुए पूरब और पश्चिम, देस-परदेस, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, परदेस, सलाम नमस्ते, नमस्ते लंदन जैसी कई फिल्में बनीं लेकिन हजारों की संख्या में गरीब दलित और पिछड़े पृष्ठभूमि के लोग 200 साल पहले पानी के जहाजों से हजारों मील दूर महीनों मुश्किल भरी यात्राएं करते हुए अनजान जगहों पर जा बसे उनका कोई सिनेमा बॉलीवुड में नहीं मिलता। गिरमिटिया मजदूरों के वंशजों की होस्ट देशों में अपनी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक उपलब्धियां हैं। विदेशी जमीन पर वे अपने धर्म, भाषा, और संस्कृति को बचाकर रखे हुए हैं। प्रवासी भारतीय मजदूरों को कुली, कंट्राकी, ठेका और गिरमिटिया नामों से भी जाना जाता है।

प्रवीण कुमार झा (2019) अपनी किताब कुली लाइंस के फ्लैप पर लिखते हैं कि गिरमिटिया मजदूरों का पलायन इतिहास में विश्व के सबसे बड़े पलायन और प्रवास का इतिहास है जो लगभग भुला दिया गया कि लाखों लोग समंदर से पानी के जहाजों पर भेजे गए, ऐसे कागजों पर हस्ताक्षर करवाकर जिन्हें ना वह समझ सकते थे, ना पढ़ सकते थे। यह कहानी एक विशाल साम्राज्य के लालच और हिंदुस्तानियों के संघर्ष की है। हिंदुस्तान से दूर कई हिंदुस्तानियों की यह कहानी कई गैर अदालती सवाल पूछती है। उन ब्रिटिश सरकारों से जिन्होंने इसे होने दिया। जिन लोगों को कभी इंसाफ नहीं मिल सका जो लोग कभी लौट कर घर ना आ सके और एक अनचाही दुनिया बसा ली। बिना किसी सरकारी मुआवजे के, किसी सरकारी माफी के। यह कर्ज ब्रिटेपर ही गया ह्युग टिंकर ने अपनी किताब ए न्यू सिस्टम ऑफ स्लेवरी में जिक्र किया है कि ब्रिटिश पार्लियामेंट से स्लेव कानून पर रोक लगने के बाद इंडेंचर्ड ठेका मजदूरों की भर्ती और ब्रिटिश कॉलोनियों पर गन्ना, चाय की खेती करने के लिए भारत, चीन और आसपास के पड़ोसी देशों से बड़ी संख्या में मजदूर समृद्धि का सपना दिखाकर कैरेबियन देशों में ले जाए गए।

गिरमिटिया मजदूरों से मुंह चुराता भोजपुरी सिनेमा

भोजपुरी सिनेमा के इतिहास को देखें तो यह भी बॉलीवुड के सिनेमा की तरह है। उसके साथ-साथ ही चल रहा है। शुरुआत में तो बॉलीवुड के नामचीन निर्देशकों, अभिनेता और अभिनेत्रियों ने भोजपुरी भाषा में बेहतरीन फिल्में बनाने का काम किया लेकिन 80 के दशक के बाद से सन 2004 तक भोजपुरी सिनेमा की हालत बहुत खस्ता रही। सन 2004 में जब मनोज तिवारी मृदुल की फिल्म ससुरा बड़ा पैसा वाला रिलीज हुई तो बहुत ही लोकप्रिय हुई और उसने अच्छा बिजनेस भी किया। उसके बाद से भोजपुरी सिनेमा का एक दूसरा दौर आरंभ हुआ। रवि किशन, दिनेश लाल यादव निरहुआ, मनोज तिवारी मृदुल, पवन सिंह, अक्षरा सिंह, रानी चटर्जी, काजल राघवानी जैसी तमाम अभिनेता और अभिनेत्रियों ने भोजपुरी सिनेमा को एक नई गति प्रदान की। भोजपुरी सिनेमा की विषय वस्तु की तरफ ध्यान दें तो पुराने भोजपुरी सिनेमा और 21वीं सदी में दूसरी बार के भोजपुरी सिनेमा के विषय वस्तु में बहुत अंतर था। पहले की फिल्मों में विषय वस्तु के साथ-साथ उसके प्रस्तुतीकरण पर भी विशेष ध्यान दिया गया था जबकि इसी सदी के सिनेमा में फूहड़ और अश्लील गीतों, द्विअर्थी संवादों को विशेष तरजीह दी गई। फिल्म निर्माताओं निर्देशकों और कलाकारों का ध्यान ज्यादा से ज्यादा अश्लीलता परोसकर घटिया फिल्मों का निर्माण कर धन कमाने तक सीमित रहा। इसी प्रवृति के कारण भोजपुरी भाषा में कोई उल्लेखनीय फिल्म नहीं बन पा रही है।

लेकिन गिरमिटिया मजदूर जो हिंदी क्षेत्रों से बड़ी संख्या में अंग्रेजी शासन में प्लांटेशन वर्कर की तरह काम करने के लिए फ्रेंच गुयाना, मलेशिया और कई और देशों मे लंबी समुद्री यात्राएं की। वे बीमारियों और अकाल मृत्यु के शिकार हुए, अंग्रेज बागान मालिकों के द्वारा शोषण के शिकार हुए, उनकी महिलाओं के साथ शोषण और अत्याचार की तमाम घटनाएं इतिहास में दर्ज हैं, जिनको प्रवीण कुमार झा ने अपनी किताब कुली लाइंस में विस्तार से दर्ज किया। भोजपुरी सिनेमा में आज तक इस विषय पर कोई भी फिल्म नहीं बनी है।

एक समय था जब हिंदी में भोजपुरी भाषा-भंगिमा की उल्लेखनीय फ़िल्में बनीं और चलीं। इनमें दिलीप कुमार की गंगा जमुना, सुजीत कुमार की फिल्म दंगल, राजश्री प्रोडक्शन की नदिया के पार, शत्रुघ्न सिन्हा की कालका, नसीरुद्दीन शाह की पार जैसी तमाम फिल्में बनी थीं, जिनको लोग आज भी याद करते हैं। उनका गीत और संगीत स्तरीय था जिसे बड़े प्रेम से सुना जाता है। भोजपुरी साहित्य और संगीत की बात करें तो यह बहुत ही समृद्ध है। भोजपुरी भाषा में एक से एक बड़े कलाकार हुए हैं, जिन्होंने साहित्य, गीत, नृत्य और नाटकों के माध्यम से समाज के समकालीन मुद्दों को प्रस्तुत करने का काम किया इनमें भिखारी ठाकुर का नाम सबसे ऊपर आता है। इसके अलावा महेंद्र मिश्र, रघुवीर नारायण सिंह, रसूल मियां, मोती बी ए जैसे तमाम गीतकार हैं जिन्होंने देशभक्ति गीतों से लेकर अंग्रेजों से मुठभेड़, आजादी के गीत के साथ-साथ विदेसिया और बटोही गीत जैसी परंपराओं से भोजपुरी साहित्य को समृद्ध करने का कार्य किया। आज भी डॉक्टर गोरख प्रसाद मस्ताना, डॉ सागर और उनकी तरह तमाम भोजपुरी के साहित्यकार भोजपुरी साहित्य को अपनी रचनाओं से समृद्ध करने में लगे हुए हैं। उनके साहित्य में पूर्वी उत्तर प्रदेश और भोजपुरी भाषी बिहारी समाज का वर्णन प्रस्तुत है जो अत्यंत समृद्ध है। साहित्य और संगीत की परंपरा से अलग आज का भोजपुरी सिनेमा अश्लील और फूहड़ किस्म के गाने और विषयों पर फिल्में बनाकर केवल निंदा का पात्र बना हुआ है। भोजपुरी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लगातार प्रयास आंदोलन जारी हैं लेकिन उन्हें अभी सफलता नहीं मिल पाई है। भोजपुरी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के उपरांत भोजपुरी भाषी फिल्मों को भी विशेष तवज्जो मिल सकती है और उनका प्रचार-प्रसार देश दुनिया में आसानी से हो सकता है। अगर हम भोजपुरी में पलायन के सिनेमा, प्रवास के सिनेमा पर बात करें तो हम पाएंगे की आंतरिक प्रवास पर फिल्में उपलब्ध है, जिसमें भोजपुरी भाषी क्षेत्र का नौजवान बड़े शहरों से दिल्ली, मुंबई, लुधियाना, कर्नाटक में जाकर फैक्ट्री मजदूर के रूप में काम करता है और इन विषयों को केंद्र में राल्ह्लर भोजपुरी सिनेमा में कुछ फिल्में बनी भी हैं।

लेकिन गिरमिटिया मजदूर जो हिंदी क्षेत्रों से बड़ी संख्या में अंग्रेजी शासन में प्लांटेशन वर्कर की तरह काम करने के लिए फ्रेंच गुयाना, मलेशिया और कई और देशों मे लंबी समुद्री यात्राएं की। वे बीमारियों और अकाल मृत्यु के शिकार हुए, अंग्रेज बागान मालिकों के द्वारा शोषण के शिकार हुए, उनकी महिलाओं के साथ शोषण और अत्याचार की तमाम घटनाएं इतिहास में दर्ज हैं, जिनको प्रवीण कुमार झा ने अपनी किताब कुली लाइंस में विस्तार से दर्ज किया। भोजपुरी सिनेमा में आज तक इस विषय पर कोई भी फिल्म नहीं बनी है। इतनी त्रासदी झेलने के बाद भी पिछले सौ वर्षों में भोजपुरी भाषी लोग विदेशी जमीन पर सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति करते हुए अपने आपको स्थापित किया। विदेशी भूमि पर अपनी साहित्य संस्कृति, परंपरा और धर्म को बचाकर रखा। इस विषय पर फिल्म निर्माण करने-करवाने का प्रयास न तो प्रवासियों ने किया और न ही बॉलीवुड जैसे विशाल सिनेमा उद्योग ला ध्यान इस विषय पर फिल्म बनाने की तरफ गया। गिरमिटिया मजदूरों के प्रवास की मुश्किलों और उपलब्धियों पर रिसर्च और लेखन का काम तो लगातार हुआ है लेकिन सिनेमा बनाने का काम नहीं हुआ है।

बॉलीवुड के मुनाफाखोरों से बहिष्कृत गिरमिटिया

साहित्य अकादमी अवार्ड से सम्मानित मारिशस के साहित्यकार अभिमन्यु अनंत के उपन्यास लाल पसीना पर फिल्म बनाने की बात चल रही है। भारत और मारीशस दोनों ब्रिटिश उपनिवेश थे और हिन्द महासागर से जुड़े हुए थे। भारत से सस्ता श्रम पाने के लिए श्रमिकों को पानी के जहाजों से फ़िजी,  मारीशस, त्रिनिनाद और गुयाना ले जाया गया। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल के छोटे किसान और मजदूर प्रमुख रूप से कान्ट्रैक्ट लेबरर या कंत्राकी के नाम से इन देशों में ले जाए गए। मारीशस में आज दो तिहाई आबादी भारत और पाकिस्तान के लोगों की है। जिनमें कुल प्रवासियों का दसवां हिस्सा भोजपुरी भाषा का प्रयोग करता है। मारीशस मे आयोजित 11वें हिन्दी सम्मेलन में अभिमन्यु अनंत के उपन्यास लाल पसीना पर फिल्म बनाने की बात आरंभ हुई।

इस उपन्यास पर जहाजी शीर्षक से फिल्म बनाने की बात बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान कर रहे हैं। जहाजी की कहानी दुनिया के सबसे बड़े पलायन पर आधारित होगी। जिसमें बताया जाएगा कि उन्नीसवी सदी के अंतिम वर्षों में अंग्रेज किस तरह अविभाजित भारत से हजारों की तादाद में मेहनतकश मजदूरों को एशिया, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया लेकर गए थे। बाद में उन्हीं मजदूरों को गिरमिटिया मजदूर कहा जाने लगा। ये गिरमिटिया मजदूर पानी के जहाजों में भरकर भारत से बाहर ब्रिटिश उपनिवेश देशों में ले जाए जाते थे, जिनका सफर तीन से चार महीनों का हुआ करता था। आज की तारीख में गिरमिटिया मजदूरों के वंशजों ने वेस्टइंडीज, मॉरिशस, ऑस्ट्रेलिया और अन्य कई मुल्कों में अपनी अलग साख और पहचान कायम की है।

भोजपुरी हिन्दी सिनेमा की कुछ नामचीन फिल्में तीसरी कसम, गंगा जमना, नदिया के पार, कालका, गंगा किनारे मोरा गाँव हो, गंगा मैया तोहें पियरी चढ़िएबे, दंगल, गिरमिटिया एक करूण  कथा (डाक्यूमेंट्री),  आवाज : द गिरमिट कोंस्पिरेसी, वैरियर्स ऑफ टॉइल: द फोरगोटन गिरमिटियाज स्टोरी भारतीयों के फ़िजी जाने की कहानी। नीतू चंद्रा द्वारा निर्देशित मैथिली भाषा की फिल्म मिथिलामखान( एनिमेशन) फिल्म को 63वां  राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। गिडेओन हनुमान सिंह निर्देशित फिल्म कलकत्ता टू कैरेबियन: एन इंडियन जर्नी (Calcutta To The Caribbean- An Indian Journey) एक डाक्यूमेंट्री फिल्म है जो कलकत्ता के बंदरगाह से  ठेका मजदूरों के कैरेबियन देशों ( त्रिनिनाद) में जाने के इतिहास का चित्रण करती है।

नीतू चंद्रा द्वारा निर्देशित मैथिली भाषा की फिल्म मिथिलामखान( एनिमेशन) फिल्म,जिसे 63वां  राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला

ठेका मजदूरों पर दुनिया भर सिनेमा की समृद्ध परंपरा है 

ठेका और गिरमिटिया मजदूरों पर दुनिया भर में अनेक फ़िल्में बनी हैं। इनमें से कुछ फिल्में और डाक्यूमेंटरी निम्नलिखित हैं:

ब्लैकबर्ड (Blackbird 2016), ब्राउनशुगर (Brown Sugar 2013), ब्राउन सुगर टू बिटर फॉर मी-द ऑइल ड्रीम (2020), चटनी इन यूह सोका: ए मल्टीकल्चरल मिक्स 1996 (Chutney in Yuh Soca: A Multicultural Mix 1996), सिटी ऑन द हिल (City on the Hill (2015), कोकोनट/कैन एण्ड कट्लस (Coconut/Cane and Cutlass 1998), कुली पिंक एण्ड ग्रीन (Coolie Pink and Green 2009), डबल्स विद स्लाइट पेप्पर (Doubles with Slight Pepper 2011), एन्सलेवेड (Enslaved 1999), फेस्टिवल ऑफ लाइटस (Festival of Lights 2010), गुयाना (Guiana 1838-2004), आई कुली (I, Coolie 2019),  जहाजी भाई (Jahaji Bhai-2012), कवि (Kavi 2009) , माइटर डान डे सन (Mighter dan de Sun 2020), वन्स मोर रिमुवड (Once More Removed 2006), प्रिज़्नरस ऑफ पाराडाइज़ (Prisoners of Paradise (Forthcoming ), पुकीकि द पुरतगीज अमेरिकनस ऑफ हवाई (Pukiki: The Portuguese Americans of Hawai’i, 2003), संगरी (Sangaree 1953) सर्वेन्ट आर स्लेव (Servant or Slave 2016), सेवन्टीन कलर्स एण्ड अ सितार (Seventeen Colours and a Sitar 2010), शुगर स्लेव्स (Sugar Slaves 1995),  टाइन्टी फेमिनिज़म: आर्कइवस ऑफ कैरेबियन (पोस्ट) इन्डेन्चर एण्ड कुलीवीन (Tanty Feminisms: Archives of Caribbean (Post-) Indenture and Coolieween, 2021), कोस्ट ऑफ शुगर (The Cost of Sugar 2019), द मैन फ्राम अल डोराडो (The Man from El Dorado 2018), वायरन (Wiren 2018), व्हाइट गोल्ड (2010), परदेसी (paradesi 2013)

फिल्म ब्राउन सुगर टू बिटर फॉर मी-द ऑइल ड्रीम

अट्ठारह सौ चौरासी के आसपास दक्षिणी अमेरिका के गुयाना द्वीप पर भारत के गिरमिटिया मजदूर संघ का पहुंचना शुरू हुआ। जिसमें लक्ष्मण जानकी देवी और महारानी जैसे लोग सिलहट और अन्य जहाजों से गुयाना पहुंचे लेकिन महिलाओं के साथ जहाज के अंग्रेज कर्मचारियों ने बदतमीजी और बलात्कार जैसी हरकतें की। महारानी नामक महिला दो बार बलात्कार की शिकार होकर संक्रमण के कारण मर गई। गुयाना जाने वाले जहाजों में महिलाओं द्वारा उनके शोषण के विरुद्ध आंदोलन भी किया गया।

गुयाना द्वीप पर कई दर्दनाक घटनाएं भी हुईं। जिसमें बेबी नामक एक महिला की दास्तान मिलती है जो एक स्वतंत्र नारी रही और कई प्रेमियों के साथ अपना जीवन बिताया। बेबी के जीवन में कुल 5 पुरुष आए और वह उन्हें अपनी शर्तों चाहती रही। एक निरक्षर गिरमिटिया महिला निडर होकर व्यवस्था के खिलाफ लड़ी और उसकी बात सुनी भी गई। गुयाना द्वीप पर मजदूरों को समय पर  मजदूरी न मिलने और अन्य तरह के शोषण की घटना की जानकारी विभिन्न रिकॉर्ड में दर्ज मिलती है। भारतीय नागरिक गिरमिटिया मजदूर के तौर पर जिन विधायकों में गए वहां पर उन्होंने अपनी भी भाषा संस्कृत और साहित्य का भी प्रचार प्रसार किया। गुयाना टापू पर गिरमिटिया मजदूर काम से लौटने के बाद रामचरितमानस का पाठ करते थे। वह मानते थे कि राम की तरह खुद भी वनवास पर हैं और जंगलों में भटक रहे हैं।

गुयाना में भारतीय लोगों की जनसंख्या 45% है। छेदी भरत जगन गुयाना के चौथे राष्ट्रपति रहे हैं और उन्हें फादर ऑफ नेशन भी कहा जाता है। छेदी जगन के अलावा भरत जगदेव और डोनाल्ड राम अवतार गुयाना के राष्ट्रपति रह चुके हैं गुयाना और वेस्टइंडीज के अन्य द्वीपों में एक समस्या रही कि भारतीय लोग वहां के स्थानीय लोगों से खुद को अलग मानते रहे। दोनों समुदायों में संघर्ष की स्थिति बनती रही। त्रिनीनाद एवं टोबैगो जैसे कैरेबियन देशों में भी 1845 के आसपास प्रवासी भारतीय गिरमिटिया मजदूरों के तौर पर बागानों में काम करने के लिए गए। बिहार के राम लखन मिस्त्री थे। कमला प्रसाद बिसेसर वहां की प्रधानमंत्री बनी। अंग्रेजों ने जाति भेद मिटाने के लिए कुली लाइंस में ब्राह्मणों के साथ चमार जाति के लोगों को भी रखा। अंग्रेजों ने यह भी प्रयास किया कि भारत से जाने वाले गिरमिटिया महिला और पुरुष जहाज पर ही अपने जीवन साथी चुनें। इससे उन्हें नए स्थान पर साथ में काम करने और जीवन बिताने में आसानी होगी।

प्रवीण कुमार झा की किताब कुली लाइंस

कुली एक तमिल शब्द है जिसका अर्थ होता है काम के बदले पैसा। सन 1860 में और उसके आसपास गिरमिटिया मजदूर मारीशस द्वीप में गए और वहां पर अपनी बस्तियां बसाई। प्रवीण कुमार झा अपनी किताब कुली लाइंस में पेज नंबर 168 पर लिखते हैं – पटना जिला में एक छोटा सा गांव है सुंदरपुर। यहां की कुर्मियों की बस्ती का युवा नौकरी ढूंढने शहर गया और फिर मारीशस चला गया। उनका नाम था शिवधारी भगत। शिवधारी जब गिरमिटिया कॉन्ट्रैक्ट से मुक्त हो गए तो उन्होंने अपने दो भारतीय मित्रों के साथ दुकान खोल ली और धीरे-धीरे मारीशस में जमीन खरीदने लगे। कुछ वर्षों के बाद यहां के बड़े जमीदार बन गए इस तरह छोटे छोटे प्लाट लगातार खरीद कर कुछ वर्षों में जमीन के बड़े हिस्से का मालिक बनना ही ग्रैंड मार्शलमेंट था। उन्होंने प्लाटों को बांट कर उस पर भारतीय गांव बताएं और एक-एक एकड़ जमीन लोगों को 50 डालर में बेचने की योजना बनाई। यह इस नए द्वीप पर नए तरह का काम था। शिबू धारी का मारीशस का प्लेंस बिल हेमसिला का गाँव आज संपन्न है और पटना का सुंदरपुर गांव आज भी उसी तरह का एक पुराना गांव है, जहां से उनके पुरखों ने पलायन किया था। मारीशस में राजनीति की बात करें तो वहां पर भारतीय मूल के लोग छाए हुए हैं और इस देश के ज्यादातर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बिहारी मूल के हुए। इसकी वजह यह भी है कि मारीशस के भारतीयों में बिहारियों का बाहुल्य है।  मारीशस के पहले राष्ट्रपति सीवूसागर रामगुलाम भोजपुर जिले के हरीगाँव के थे। अन्य राष्ट्रपति  राजकिशोर पुरयाग आज भी अपने गाँव और जड़ों की तलाश मे हैं। उनके परदादा कभी बिहार से मजदूर बनकर मारीशस गए थे और उनके भाई का परिवार यहीं रह गया था। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मसौढ़ी के महतो टोली से उनके कुलवृक्ष को जोड़ा है पर पता नहीं कहाँ तक सच है (झा 2019:78)।

गिरमिटिया मजदूरों को फ़िजी पहुंचने के उपरांत उन्हें किसी अलग दीप पर कोरेंटिन करके रखा जाता था ताकि किसी बीमारी को लेकर अगर वह भारत से आए हैं तो उससे अन्य लोग बीमार न हों। मेडिकल जांच के बाद फिट पाए जाने पर इन मजदूरों को अलग-अलग द्वीपों पर बागानों मे काम करने भेज दिया जाता था। कभी-कभी तो भाई-भाई और और पति-पत्नी को भी अलग-अलग रखा जाता था। इस अमानवीय व्यवस्था में यह संभावना भी नहीं रहती थी कि वे आगे फिर कब मिल पाएंगे। फिजी द्वीप पर गिरमिटिया मजदूरों की एक और दर्दनाक घटना का जिक्र आता है जिससे पता चलता है कि गिरमिटिया मजदूरों के साथ अंग्रेज बागान मालिक बहुत दुर्व्यवहार करते थे।

प्रशांत महासागर का द्वीप फ़िजी के गिरमिटिया मजदूरों का एक गीत है:

छुरी कुदारी के संग अब बिताए दिन और रतिया

गन्ने की हरी हरी पत्तियां जाने हमारे दिल की बतियां

गिरमिटिया मजदूरों की लाखों कहानियाँ कई देशों मे बिखरी पड़ी हैं। सतीश राय सिडनी के डाक्यूमेन्ट्री निर्देशक हैं जिनके दादा दादी गिरमिटिया थे और उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से फ़िजी गये थे। वे अपने पूर्वजों की खोज में कई बार बस्ती गए सन 2014 में उनका परिवार और उसका इतिहास मिला जो अब मुस्लिम बन चुके थे। तोताराम सनाढ्य सन 1893 मे नौकरी की तलाश में एटा से प्रयाग पहुंचे जहां एक अहीर ने उन्हें शरण दिया और नौकरी के बारे बताया और वे गिरमिटिया जहाज से फिजी पहुंचे। तोताराम सनाढ्य को गिरमिटिया लोगों ने फ़िजी का महात्मा गांधी कहा क्योंकि वे उनके अधिकारो के लिए लड़ते रहे। तोतराम जी ने महात्मा गांधी से पत्राचार करके फिजी द्वीप पर गिरमिटिया मजदूरों के दुर्दशा की तरफ ध्यान आकर्षित किया और किसी वकील को उनका पक्ष रखने के लिए फ़िजी भेजने का आग्रह किया। गांधीजी ने वकील मणिलाल डॉक्टर को फिजी भेजा। तोताराम जी ने हिंदू धर्म और संस्कृति को प्रवासी भारतीयों के बीच बचाए रखने के लिए भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। तोताराम और उनकी पत्नी 21 वर्ष तक फ़िजी में बिताकर भारत लौटे और गांधीजी के साथ साबरमती आश्रम में रहने लगे। इस बीच 1914 ईस्वी में मद्रास कांग्रेस की सभा में फ़िजी मे रहने वाले भारतीयों के नुमाइंदा बनकर तोताराम जी ने भाषण दिया। वह गांव-गांव घूमकर गिरमिटिया प्रथा के विरुद्ध मुहिम चलाते रहे और उन प्रयासों से ही आखिर यह प्रथा बंद हुई।

सन 1884 ईस्वी में सीरिया नामक जहाज कोलकाता से कुल 479 मजदूरों को लेकर चला और सबसे कम दिनों मात्र 58 दिन के सफर के बाद फ़िजी पहुंचने वाला था लेकिन द्वीप के करीब आते ही यह जहाज एक चट्टान से टकरा गया जिससे उसमें छेद हो गया और जहाज डूबने लगा। फ़िजी के गवर्नर खुद बचाव दल लेकर मौके पर पहुंचे। लोग असहाय पानी में डूबकर मरते रहे। आखिर में  सीरिया नामक जहाज पानी में डूब गया जिसमें 59 गिरमिटिया मजदूर मर गए। इस जहाज के डूबने और गरीब निर्दोष लोगों के जान गंवाने के बाद इस घटना पर एक मार्मिक कविता लिखी गई जो दर्द को बयां करती है:

रात अंधेरी हवा सनसनी पाल फड़फड़ाते थे ऊपर।

सीरिया आगे बढ़ा चला था कि जी सागर की छाती पर।

तूफान का एक हुआ धड़ाका सीरिया टकराया चट्टानों से।

एक तरफ वह सीधे डूबा मची कोलाहल सब लोगों में।

डूब मरे मल्लाह यात्री समा गए सागर के अंदर।

गिरमिटिया मजदूरों को फ़िजी पहुंचने के उपरांत उन्हें किसी अलग दीप पर कोरेंटिन करके रखा जाता था ताकि किसी बीमारी को लेकर अगर वह भारत से आए हैं तो उससे अन्य लोग बीमार न हों। मेडिकल जांच के बाद फिट पाए जाने पर इन मजदूरों को अलग-अलग द्वीपों पर बागानों मे काम करने भेज दिया जाता था। कभी-कभी तो भाई-भाई और और पति-पत्नी को भी अलग-अलग रखा जाता था। इस अमानवीय व्यवस्था में यह संभावना भी नहीं रहती थी कि वे आगे फिर कब मिल पाएंगे। फिजी द्वीप पर गिरमिटिया मजदूरों की एक और दर्दनाक घटना का जिक्र आता है जिससे पता चलता है कि गिरमिटिया मजदूरों के साथ अंग्रेज बागान मालिक बहुत दुर्व्यवहार करते थे। ललिया नाम की एक मुस्लिम महिला को उसके पति से अलग करके दूसरे बागान और द्वीप पर रखा गया। वह पागलों की तरह अपने पति को पाँच वर्षों तक ढूंढती रही। जब उन्हें एक दूसरे का पता मिल गया तब भी  बागान मालिक ने उन्हें मिलने की छुट्टी नहीं दी।  और तो और इस्माइल को जबरदस्ती हिंदुस्तान भेज दिया। इस दुख से इस्माइल कोलकाता पहुंचते ही मर गए और ललिया को जब इस मृत्यु की खबर हुई तो पूरी तरह टूट गई। कई दिनों तक बीमार हालत में भी उसके मालिक उससे काम करवाते रहे। इस प्रेम कहानी को तोताराम जी ने अपनी किताब में दर्ज किया है।

गिरमिटिया या कुली

गिरमिटिया मजदूरों की भर्ती करने वाली सबसे बड़ी कंपनी ऑस्ट्रेलिया की ‘कॉलोनियल शुगर रिफायनिंग’ थी जिसकी मिलें कई स्थानों पर स्थापित थीं। फिजी में काम करने वाले गिरमिटिया मजदूरों को एक बैरक में 10 फीट लंबे और 7 फीट चौड़े कमरों के बैरक में रखा जाता था ऊपर लोहे की छत होती थी। हर कमरे औसतन तीन लोग रहते थे। इस बैरक को कुली लाइंस कहा जाता था। किसी बैरक में पानी-शौचालय वगैरह की अच्छी व्यवस्था होती थी लेकिन ज्यादातर जगहों पर गंदी बस्तियों की तरह से खराब हालात में मजदूरों को रहना पड़ता था जहां पर दुर्गंध और बीमारी का वास होता है।

सभ्य कहे जाने वाले अंग्रेज बागान मालिक इतने क्रूर और निर्मम थे कि महिला मजदूरों के साथ भी बहुत ज्यादती करते थे। उन्हें पेड़ों से बांधकर उनके बच्चों के सामने नंगा किया जाता। छेड़खानी की जाती। गोरे लोग सुंदर औरतों का खूब फायदा उठाते और मना करने पर उनको और उनके पतियों की खूब पिटाई करते। एक बार एक महिला के बच्चे को बुखार था और उसे लेकर खेत में आ गई। खेत में बच्चों को लाना मना था। वह गोद में बच्चा चिपकाकर काम करती रही और अंग्रेज उसकी पीठ पर चाबुक मारते रहे। यह दृश्य देखकर दूसरे अंग्रेज को दया आ गई और उसने जाकर छुड़ाया । चाबुक से मार खाना एक प्रथा बन गई थी शायद ही कोई गिरमिटिया अंग्रेजों के चाबुक से बचा हो।

गिरिमिटीया मजदूर (साभार-गूगल)

10 अक्टूबर 1970 को फिजी आजाद हो गया लेकिन उसके बाद वहां पर राष्ट्रवाद हावी होने लगा। सन1969 में अचानक भारतीयों के सबसे बड़े नेता  ए. डी. पटेल का निधन हो गया।  भारतीय फिर से बेघर होने की कगार पर आ गए। सन1972 ईस्वी में जब ईदी अमीन ने युगांडा के 80000 भारतीयों को अपने देश से बाहर निकाल फेंका तो फ़िजी में भी भारतीय डर गए। सन1975 में फिजी नेशनलिस्ट पार्टी के एक नेता ने सदन में प्रस्ताव रखा कि अब समय आ गया है कि भारतीय और भारत मूल के लोग वापस अपने देश लौट जाएं और उन्हें भेजने का खर्च ब्रिटिश सरकार वाहन करें जो उन्हें यहाँ लेकर आई। यह प्रस्ताव सदन में पास नहीं हो पाया लेकिन हिंदुस्तानियों पर अत्याचार होने शुरू हो गए। भारतीय नेताओं में विनोद पटेल और विजेंद्र सिंह के बाल खींच कर घसीटते हुए ले जाया गया और जेल में बंद कर दिया गया। 14 मई 1987 को सेना के कर्नल राबुका अपनी फौज लेकर संसद में घुसे और सभी नेताओं को बंदी बना लिया। सन 2000 में जर्नल फाइट के नेतृत्व में फ़िजी के चरमपंथियों का दल संसद पहुंचा और महेंद्र चौधरी सहित नेताओं को बंदी बना लिया और उन्हें 56 तीनों तक संसद में ही बंदी बनाकर रखा गया और भारतीयों के ऊपर अत्याचार चलते रहे। गिरमिटिया मजदूर भारत के पिछड़ी और दलित जातियों के लोग थे उन्हें हमेशा दबाकर रखा गया था अपने देश में भी और फ़िजी में अंग्रेजी राज्य में भी जिसके कारण वे विद्रोह और दमन के विरुद्ध आवाज नहीं उठा सके। तमाम यातनाओं के सहने के बाद भी फ़िजी मे भारतीय लोग आबाद हैं और अपनी भाषा संस्कृति और सभ्यता को बचा कर रखे हुए हैं और राजनीतिक रूप से भी प्रभावी हैं।

गुयाना में भी गिरमिटिया मजदूर विभिन्न जहाजों पर लाद कर लाए गए और तमाम यातनाएं झेले और विद्रोह भी हुए। द मेन नाम के जहाज पर, एजल नामक जहाज पर सन 1875 में महिलाओं ने विद्रोह कर दिया क्योंकि जहाज के शौचालय के बाहर अंग्रेज और अन्य पुरुष महिला गिरमिटिया मजदूरों के साथ छेड़खानी करते थे और खाने-पीने की चीजों के लालच में उनसे बदतमीजी की जाती थी जिसके प्रमाण तमाम समकालीन डाक्यूमेंट्स मे मौजूद हैं।

गिरमिटिया मजदूरों का दो सौ साल का अपना इतिहास है। वे पानी के जहाज पर सवार होकर अनजान देशों को गए। उन्हें बहला-फुसला कर ले जाया गया और यातनाएं देकर खूब काम कराया गया।जब ये द्वीप और देश अंग्रेजों और फ़्रांसीसियों की गुलामी से मुक्त हुए तो गिरमिटिया भारतीयों को कुछ बेहतर अवसर और अधिकार मिले और उन्होंने अपने जीवन में प्रगति की। यह सब सिनेमा में भी दर्ज किया जाना चाहिए। भारतीय सिनेमा, खासकर भोजपुरी और हिन्दी सिनेमा में गिरमिटिया मजदूरों के ऊपर न के बराबर फिल्में बनी हैं। अब कुछ प्रयास होने शुरू हुए हैं जिनसे उम्मीद है कि गिरमिटिया मजदूरों का जीवन रुपहले परदे के माध्यम से लोगों के बीच पहुंचेगा।

संदर्भ

Films about indentureship (2021)Ameenagafoorinstitute.org, December 2021.

Dutt, Kunal (2017)Bihar labourers’ story told through animation, PTI, June 13, 2017.

kaps://ameenagafoorinstitute.org/bibliography-south-and-east-africa-1kaushika, Pragya (2018)Bihar eyeing Shah Rukh, Aamir Khan for movie on Indian labourers in Mauritius, The Print on 24 September 2018.

Tinker, Hug (1993) A New System of Slavery: The Export of Indian Labour Overseas 1830-1920,the university of Michigan press, USA.

अनत, अभिमन्यु (2010) लाल पसीना, राजकमल प्रकाशन , नई दिल्ली।

किशोर, गिरिराज (1991) पहला गिरमिटिया, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली।

झा, प्रवीण कुमार (2019) कुली लाइंस: गाथा गिरमिटियों की, वे जहाजी जो कभी हिंदुस्तान नहीं लौट सके, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।

#:a~:text=Blackbird%20(2016)%2C%2013%20mins,120mins%2C%20Director%3A20Mahadeo%20Shivraj. registered in England and Wales number 1136616

राकेश कबीर जाने-माने कवि-कथाकार और सिनेमा के गंभीर अध्येता हैं।

3 Comments
  1. मनोज कुमार यादव says

    सर आप का ये लेख गिरमिटिया मजदूरों के अनछुए पहलुओं व उनकी वेदनाओं को दर्शाता है, जिसको बॉलीवुड सिनेमा के साथ भोजपुरी सिनेमा ने कभी दिखाने का साहस नहीं किया। आप के लेख से उनके वेदनाओं को महसूस करने का अवसर मिला। आप के लेख सदैव मानवीय संवेदनाओं के अनछुए पहलुओं से साक्षात्कार करते हैं। धन्यवाद ??

  2. राजेश प्रसाद says

    भोजपुरी सिनेमा बनाने वालों में दृष्टि का अभाव है। तुरंत लोकप्रिय होने और रुपए कमाने के चक्कर में विषय वस्तु से संबंधित रिस्क नहीं लेना चाहते हैं। यह व्यावसायिक दृष्टिकोण श्रेष्ठ फिल्म के निर्माण में बाधक है।

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