सिनेमा में पत्रकार न्याय के लिए लड़ने की एक उम्मीद हैं

राकेश कबीर

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 पत्रकार ड्यूश वेले (2020) ने मीडिया एडवोकेसी ग्रुप नामक निजी संस्था की वार्षिक रिपोर्ट रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स का हवाला देते हुए 29 दिसम्बर 2020 को इंडियन एक्सप्रेस अखबार में लिखा है कि विश्व भर में अपनी ड्यूटी करते हुए कम से कम 50 पत्रकारों ने अपनी जान गंवाई है। आगे पत्रकारों पर टार्गेटेड किलिंग्स का खतरा और बढ़ने की आशंका भी जताई गयी है। इसी लेख में आगे मेक्सिको, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान के साथ भारत को भी 2010 के बाद पत्रकारों को टारगेट करके हत्याएं करने की खतरनाक श्रेणी के देशों में रखा गया है। पत्रकार अपने पेशे के एथिक्स के अनुसार दुनिया के सामने सच लाने और जानकारी बढ़ाने के लिए साहसी और जोखिम भरे कदम भी उठाते हैं। दुनिया भर के लोकतांत्रिक प्रणाली वाले देशों में मीडिया की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वास्तव में लोकतंत्र की समृद्धि के लिए निष्पक्ष और स्वतंत्र मीडिया प्रकार्यात्मक पूर्व आवश्यकता है। गौरी लंकेश को बेंगलुरु के राज राजेश्वरी नगर स्थित उनके घर के सामने 5 सितम्बर, 2017 को गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी। डाफने माल्टा (1964-2017) की रहने वाली खोजी पत्रकार, लेखक और ब्लॉगर थीं। सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, अपराध और मनी लौन्डरिंग जैसे विषयों पर लिखती थीं। उनसे नाराज रहने वाले लोगों ने डाफने की कार में बम बिस्फोट कर उनकी हत्या कर दी।

भारतीय मीडिया और सिनेमा

मीडिया को भारतीय लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। जनता के हित में ज़िम्मेदार  पदों पर बैठे लोगों से प्रश्न पूछना, अहम मुद्दों पर विमर्श आरंभ करना और आम जनता को दुनिया भर में घटित हो रही घटनाओं की हकीकत से रूबरू कराना पत्रकारिता के मूलभूत कार्य और उद्देश्य है। संयुक्त राष्ट्र संघ की सामान्य महासभा द्वारा 3 मई को वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे घोषित किया गया है. अपने देश में 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। पत्रकारों और पत्रकारिता के पेशे की जिम्मेदारियों, मुश्किलों और द्विधाओं को चित्रित करती हुई कई फ़िल्में बनी जिनमें न्यू डेल्ही टाइम्स, जाने भी दो यारों, मैं आजाद हूं, नायक, पेज थ्री, नो वन किल्ड जेसिका उल्लेखनीय हैं। साहित्य की तरह ही सिनेमा को भी समाज का दर्पण कहा जाता है। उससे आगे बढ़कर मीडिया ऐसा दर्पण है जो समाज और देश को उसकी सच्चाइयों से रूबरू कराता है। उदाहरण के तौर पर फिल्म न्यू डेल्ही टाइम्स में शशि कपूर का किरदार ईमानदार संपादक का होता है फिल्म के क्लाइमेक्स को देखकर पता चलता है कि किस प्रकार दो राजनीतिक पार्टियां अपने हित साधने के लिए सम्पादक को मोहरे की तरह इस्तेमाल करती हैं। अमिताभ बच्चन और शबाना आजमी अभिनीत फिल्म मैं आजाद हूं में निहित स्वार्थों के लिए मीडिया किस प्रकार से छवि को बनाने या बिगाड़ने का काम करता है, उस पहलू को दर्शाया गया। वास्तविक जीवन में भी हम किसी घटना के मीडिया ट्रायल या खबरों को किसी एक पक्ष में ट्रेंड करने को देखते रहते है। बॉलीवुड की कुछ अन्य फिल्मों जैसे मद्रास कैफे, मुंबई मेरी जान में पत्रकारिता का गंभीर पहलू दर्शाया गया। सिनेमा और मीडिया का बहुत करीबी रिश्ता रहा है। मेरे विचार में सिनेमा सबसे मजबूत और प्रभावी संचार माध्यम या मीडियम है।  सिनेमा लोगों का मनोरंजन करने के साथ-साथ विविध विषयों पर जनशिक्षण का काम करता है उसी तरह मीडिया का काम सही सूचनाये जनता को देकर लोगों को जागरूक करना है। मीडिया प्रहरी की भूमिका में है। मीडिया के प्रभाव का इस्तेमाल सिनेमा भी करता है। आज तो फिल्मों के प्रमोशन और प्रचार-प्रसार में तमाम ऑनलाइन प्लेटफार्म, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सहभागी का काम करते हैं।

पीपली लाइव में जब टीवी पत्रकार कहते हैं कि नत्था जरुर मरेगा तो उनकी सम्वेदनशीलता के स्तर का पता चलता है। यह फिल्म पत्रकारिता का वह चेहरा दिखाने का काम करती है जहां टीआरपी का खेल, किसी गरीब-मजदूर की जिंदगी से ज्यादा मायने रखता है। यह मीडिया पर सटायर था। एक किसान की आत्महत्या की खबर को किस तरह एक सनसनीखेज टीआरपी के खेल में बदल दिया जाता है और एक गाँव में मीडिया के ओवी वैन धूल उड़ाते हुए भागते रहते हैं।

मधुर भंडारकर निर्देशित पेज 3 अखबारों में चमकती हस्तियों की बातों, बड़े लोगों की पार्टियों के मकसद और उनके दोहरे चरित्र को सामने लाने का काम करती है। साथ ही संपादक की मजबूरियां और अखबार के मालिक के हितों के सवाल भी उठाने की कोशिश करती है। उस फिल्म को बनाने को लेकर मधुर कहते हैं कि वर्ष 2001 में फिल्म चांदनी बार और सत्ता को मिली सफलता के बाद मेरे पास अचानक से पार्टियों के न्योते आने लगे। मैं पार्टी में जाता था, वहां पर विभिन्न क्षेत्रों से ताल्लुक रखने वाले लोग आते थे, पर उनका चेहरा मुखौटा लगता था। मैंने रिसर्च करना शुरू किया। यह सोचना शुरू किया कि इसे किस प्वाइंट आफ व्यू से दिखाया जाना चाहिए। मुंबई की इलीट पार्टियों में शरीक होकर प्राप्त किये हुए अपने निजी अनुभव को शामिल करते हुए पेज 3 जैसी बेहतरीन फिल्म बनाई।

द ताशकंद फाइल्स और पत्रकारिता

भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमयी मौत की पड़ताल करती फिल्म द ताशकंद फाइल्स मुद्दा आधारित महत्वपूर्ण फिल्म थी। इस फिल्म की कहानी एक खोजी पत्रकार के कार्य के इर्दगिर्द बुनी गई थी। इसके लेखक और निर्देशक विवेक रंजन अग्निहोत्री कहते हैं कि मैंने अपनी फिल्म द ताशकंद फाइल्स को ईमानदार पत्रकारों को समर्पित किया है। उनका उद्देश्य था कि ऐसे पत्रकारों के कामों को सराहा जाए जो भ्रष्ट लोगों की वजह से बिगड़ रहे समाज को बचाकर, उसमें छिपी सच्चाई को सामने लाने का काम ईमानदारी से कर रहे हैं। इस फिल्म में इलेक्ट्रानिक मीडिया के बजाय अखबार के पत्रकार के एक खबर के पीछे की सच्चाई को सामने लाने के लिए की जाने वाली मेहनत और समर्पण को सामने लाना था। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत के बाद उस वक्त प्रकाशित अखबारों के लेखों पर शोध करके इस फिल्म की सामग्री तैयार की गयी थी।

मशाल (1984) दिलीप कुमार (विनोद कुमार) अभिनीत फिल्म है जिसमें उन्होंने एक समर्पित और ईमानदार पत्रकार की भूमिका निभायी है। विचारों की मशाल तो कलम से ही जल सकती है। शिक्षा की रोशनी जो मनुष्य के अंदर रोशनी भरने का काम करती है। साहित्य के उद्देश्यों पर बात की जाती है कि साहित्य ऐसा होना चाहिए जो मनुष्य का उन्नयन करे और उसे लोककल्याणकारी कार्यों की तरफ उन्मुख करे।

फ़िल्में और पत्रकारिता 

फिल्म मुंबई मेरी जान में टीवी न्यूज चैनलों के उस पहलू को दिखाया गया है कि वे किस तरह  समाचारों को सनसनीखेज रूप में इस्तेमाल करते हैं। वह भी तब जब यह 11 जुलाई, 2006 के मुंबई ट्रेन बम विस्फोट जैसी बड़ी त्रासदी की बात करता है। आमिर खान निर्मित फिल्म पीपली लाइव में जब टीवी पत्रकार कहते हैं कि नत्था जरूर मरेगा तो उनकी सम्वेदनशीलता के स्तर का पता चलता है। यह फिल्म पत्रकारिता का वह चेहरा दिखाने का काम करती है जहां टीआरपी का खेल, किसी गरीब-मजदूर की जिंदगी से ज्यादा मायने रखता है। यह मीडिया पर सटायर था। एक किसान की आत्महत्या की खबर को किस तरह एक सनसनीखेज टीआरपी के खेल में बदल दिया जाता है और एक गाँव में मीडिया के ओवी वैन धूल उड़ाते हुए भागते रहते हैं। फिल्म में किसान बने अभिनेता रघुबीर यादव कहते हैं, ‘कि फिल्मों में आने से पहले मैं जबलपुर के एक अखबार में काम कर चुका हूं। हायरसेकेंड्री की परीक्षा दे रहा था, फीस के पैसे नहीं थे तो प्रेस ज्वाइन कर लिया था। नर्मदा ज्योति नामक शाम का एक अखबार था। दिन में वहां छपाई का काम करता था, शाम को पेपर बांटने निकल जाता था। उस वक्त अखबारों में समाज को सुधारने वाली बातें होती थीं। आजकल तो हेडिंग कैसे बनाई जाए, इस पर विचार होता है। यह पेशा भी बिजनेस बन गया है।’ टीआरपी की रेस में किसान के बारे में वे सोचना भूल जाते हैं। किसान नत्था को घर छोड़कर पास के शहर में भागना पड़ता है।

फिल्म द ताशकंद फाइल्स में समाचारपत्र की पत्रकार का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री श्वेता बासु प्रसाद कहती हैं कि मैं खुद पत्रकारिता में ग्रेजुएट हूं। मेरी इस पढ़ाई ने किरदार को निभाने में मेरी थोड़ी मदद कर दी। मैं मीडिया और पत्रकारों की बहुत इज्जत करती हूं। हिम्मत चाहिए, सच बोलने, रिसर्च करने और डेडलाइंस पर काम करने के लिए। मैंने अपने कॉलम्स के लिए काम किया है। मुश्किल जॉब है, आपको हमेशा तैयार रहना पड़ता है सच्चाई को लोगों के सामने लाने के लिए। फिल्म और मीडिया दोनों एक-दूसरे के साथ चलते हैं।

साथ साथ (1982), मशाल (1984), कानून अपना अपना (1989), गंगाजल, दिल से (1998), फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी (2000), क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलता (2001), नायक (2001), गंगाजल (2003), लक्ष्य(2004), पेज-3 (2005), काबुल एक्सप्रेस (2006) पीपली लाइव (2010), रण (2010),  नों वन किल्ड जेसिका (2011),  सिंघम (2011), सत्याग्रह (2013), मद्रास कैफे (2013), नूर (2017), मुंबई डायरीज (2021)।

पत्रकारों को लेकर हॉलीवुड की कुछ फ़िल्में  हैं जिनमें नेटवर्क 1976,  शैटर्ड ग्लास 2003, गुड नाईट गुड लक 2005, सेप्टेम्बर इशू -2009, स्पॉटलाइट 2015।

समाज में परिवर्तन होते रहते हैं और अच्छे बुरे का संघर्ष नित्य चलता रहता है। पुरानी पीढ़ी ने नई पीढ़ी की उंगली थामी थी तो नई पीढ़ी भी पुरानी पीढ़ी को जरूरत पड़ने पर हाथ थाम उसे सहारा देगी। दो पीढ़ियों में गैप और संघर्ष ही सत्य नही है बल्कि उनमें सहयोग होना ज्यादा बड़ा सच है। मशाल और अन्य पत्रकारिता आधारित फ़िल्में इन्हीं अनुकूलताओं प्रतिकूलताओं, अच्छाइयों बुराइयों के बीच अपना वजूद तलाशती और अपने अस्तित्व को बचाने का भी काम करती हैं।

मशाल (1984) दिलीप कुमार (विनोद कुमार) अभिनीत फिल्म है जिसमें उन्होंने एक समर्पित और ईमानदार पत्रकार की भूमिका निभायी है। विचारों की मशाल तो कलम से ही जल सकती है। शिक्षा की रोशनी जो मनुष्य के अंदर रोशनी भरने का काम करती है। साहित्य के उद्देश्यों पर बात की जाती है कि साहित्य ऐसा होना चाहिए जो मनुष्य का उन्नयन करे और उसे लोककल्याणकारी कार्यों की तरफ उन्मुख करे। फिल्में भी साहित्य की ही एक विधा हैं ऐसा मेरा मानना है। साहित्य की ही तरह फिल्में जनमानस को शिक्षित करने का काम करती हैं। मशाल फ़िल्म एक उम्मीद देती है कि हम कलम के माध्यम से सत्यपरक और तथ्यपरक पत्रकारिता करके समाज को सजग और जागरूक कर सकते हैं। समाजविरोधी और गलत काम करने वाले सफेदपोश लोगों का असली चेहरा सामने लाकर उनको दण्डित कराने का काम भी कर सकते हैं। एक सम्पादक की भूमिका में विनोद कुमार (दिलीप कुमार) कम संसाधनो में एक अखबार दैनिक ऐलान निकालते हैं। उनकी अपनी कोई संतान नहीं है फिर भी वे एक मोहल्ले के शराबी गुंडे को जो सिनेमा का टिकट ब्लैक करता है को अपना स्नेह देकर न केवल सुधारते हैं बल्कि पत्रकारिता की पढ़ाई करने विश्वविद्यालय (बेंगलोर) भेजते हैं। माफिया द्वारा अपना आफिस जला दिए जाने और मकान मालिक द्वारा घर से बेदखल करने से सड़क पर पनाह लेने को मजबूर कर दिए जाने वाले साहसी पत्रकार की पत्नी दर्द से तड़पकर उसकी आँखों के सामने मर जाती है। कोई उसकी मदद करने नहीं आता। वह प्रतिक्रियावादी होकर पत्रकारिता के पेशे को छोड़ देता है और शहर के सबसे बड़े शराब माफ़िया एस. के. वरधान को बर्बाद करने के लिए खुद ही शराब माफिया बन जाता है। फिल्मकार का यह समाधान हमे पसंद नहीं आता क्योंकि जिन बुराइयों के खिलाफ सम्पादक विनोद की कलम की कलम चलती थी वह खुद पैसे कमाने और माफ़िया से बदला लेने के लिए वही शराब, जुआ का काम करने-कराने लगता है। इसके कारण एक समर्पित और ईमानदार सम्पादक-पत्रकार के चरित्र का विकास नही हो पाता। परन्तु उम्मीद यहीं खत्म नही होती। उसी मुंबई शहर में एक नया मार्क्सवादी कामरेड लोगों का अखबार है जो अब माफ़िया बन चुके विनोद के खिलाफ ख़बरें छापता है। विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई पढ़ाई पूरी करके लौटे राजा (अनिल कपूर) को अपने गुरु और अभिभावक विनोद के बारे में जानकर ठेस लगती और अगली पीढ़ी का यह पत्रकार अपने विनोद साहब के खिलाफ मोर्चा खोल देता है। यह उचित भी है क्योंकि जनहित के मूल्य किसी व्यक्ति से ज्यादा बड़े और महत्वपूर्ण होते हैं।

फिल्म गंगाजल का एक दृश्य

फिल्म गंगाजल के निष्पक्ष और संवैधानिक पत्रकार की भूमिका बहुत ही सराहनीय है। वे एक तरफ गुंडा-माफियाओं की मनमानी बढ़ने पर पुलिस-प्रशासन की आलोचना करते हैं तो जनता और पुलिस द्वारा अपराधियों की आँख फोड़कर उसमें तेज़ाब डालने की घटना की भी निंदा करते हैं। उनका रास्ता संविधान का रास्ता है जो क़ानूनी तरीके से दोषियों और अपराधियों को दण्डित करने की वकालत करते हुए जनता या पुलिस का कानून अपने हाथ में लेने से रोकना चाहता है। सच और कानून के पक्ष में खड़े होने के कारण उस साहसी पत्रकार को स्वयं का बलिदान करना पड़ता है। क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलता फिल्म का पत्रकार अपने कर्तव्य के प्रति इतना समर्पित और साहसी है कि खूनी गुंडों से अपने जान का खतरा देखते हुए भी उनको अपने कैमरे से बेनकाब करने और सच को सामने लाने की धमकी देता है। उसके बनाये हुए वीडिओ कैसेट से ही हत्यारों को सजा मिलती है। अपनी जान देकर भी वह पत्रकार (मोहनीश बहल) अपने दायित्व को निभाता है। नायक फिल्म के पत्रकार (अनिल कपूर) को तो एक दिन का मुख्यमंत्री बनने की चुनौती मिलती है।  दिन भर में वे जो काम करते हैं उसके बदले में जान की बाज़ी लगानी पड़ती है। नायक एक हायपरबोलिक और अति आदर्शवादी फिल्म है। एक पत्रकार मौका पाकर एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बनकर एक दिन में कितनी चीजें बदल सकता है। सरकार और अधिकारी तंत्र मिलकर जनहित के ऐसे कई काम लगातार करते रहते हैं. फ़िल्मी परदे पर अतिआदर्शवाद प्रदर्शित करके जनता को भ्रम में डालने का काम भी नायक जैसी फ़िल्में करती हैं। आम जनता कभी-कभी सर्व समस्या समाधान करने वाले युगपुरुष की तलाश में गलत लोगों को भी चुन लेती है।

इलेक्ट्रॉनिक युग में पत्रकारों की जिम्मेदारी बढ़ी

सजग और ज़िम्मेदार पत्रकार एक बेहतर समाज के निर्माण का महत्वपूर्ण काम करते हैं। समाज और सामाजिक मूल्यों में परिवर्तन के साथ पत्रकारों और पत्रकारिता के पेशे में भी परिवर्तन घटित हुए हैं। परन्तु यह भी सच है कि एक संस्था, एक व्यक्ति निजी हित में पेशे के दायित्व से विमुख होगा तो दूसरे लोग नए तरीके और उम्मीद लेकर आएंगे। ऐसे ही समाज में परिवर्तन होते रहते हैं और अच्छे बुरे का संघर्ष नित्य चलता रहता है। पुरानी पीढ़ी ने नई पीढ़ी की उंगली थामी थी तो नई पीढ़ी भी पुरानी पीढ़ी को जरूरत पड़ने पर हाथ थाम उसे सहारा देगी। दो पीढ़ियों में गैप और संघर्ष ही सत्य नही है बल्कि उनमें सहयोग होना ज्यादा बड़ा सच है। मशाल और अन्य पत्रकारिता आधारित फ़िल्में इन्हीं अनुकूलताओं प्रतिकूलताओं, अच्छाइयों बुराइयों के बीच अपना वजूद तलाशती और अपने अस्तित्व को बचाने का भी काम करती हैं।

संचार तकनीकी में अभूतपूर्व प्रगति के कारण आज अनेक समाचार माध्यमों जैसे वेबसाइट, यूट्यूबर की भरमार हो गयी। खबरें मिलने और प्रसारित होने की गति तीव्र हो गई है।  बहुत सारा फेक मटेरियल भी मीडिया में उपलब्ध है।  इसीलिए पत्रकार और पत्रकारिता की ज़िम्मेदारी कई गुना बढ़ गयी है। पत्रकारों की मुश्किलों, चुनौतियों और उनकी उपलब्धियों को प्रस्तुत करती हुई फ़िल्में बनाये जाने की जरूरत भी बढ़ गयी है।

संदर्भ
मंडल दिलीप (2013) मीडिया का अंडरवर्ल्ड: पेड न्यूज, कार्पोरेट और लोकतंत्र, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली.
वेले, ड्यूश (2020) डाज़ेंस ऑफ़ जर्नलिस्ट्स किल्ल्ड इन टार्गेटेड अटैक्स, इन इंडियन एक्सप्रेस 29 दिसम्बर 2020.

राकेश कबीर जाने-माने कवि, कथाकार और सिनेमा के गंभीर अध्येता हैं।

3 Comments
  1. Gulabchand Yadav says

    राकेश कबीर का यह शोधपरक आलेख रोचक और पठनीय लगा।

    मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। किसी भी देश में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाएं कितनी सक्रिय, प्रभावी और सफल इसका पता इस बात से लगता है कि वहां की मीडिया और पत्रकारिता कितनी मुखर, निष्पक्ष, निर्भीक और स्वतंत्र है। जहां यह कमतर या गैरमौजूद होगी वहां अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता का दौरा कम या न्यूनतम रहता है। मीडिया किसी भी समाज के लिए आंख, कान और विवेक की अहमियत रखता है। इसलिए आपका यह कहना सही है कि पत्रकारिता समाज को सजग, सतर्क और जागरूक बनाने हुए शिक्षित करने का काम करती है।

    सिनेमा समाज के हर क्षेत्र से अविभाज्य रूप से जुड़ा है और उनसे ही अपने विषयों के लिए खाद पानी भी जुटाता है। वह अपने तैयार माल (फिल्मों) को समाज के सामने परोसता है इस आशा में कि समाज उसके उत्पाद (फिल्मों) को हाथोहाथ लेगा और उसे अच्छा मुनाफा मिलेगा।

    आपने हिंदी की ऐसी तमाम फिल्मों और उनके मनोविज्ञान का सटीक मूल्यांकन करने का प्रयास अपने आलेख में किया है जो मीडिया, पत्रकारिता या पत्रकारिता को केंद्र में रखकर अथवा आंशिक रूप से कथा में समाहित कर बनाई गईं हैं।

    आपने कुछ विदेशी फिल्मों का भी सम्यक उल्लेख किया है।
    आज निष्पक्ष पत्रकारिता बेहद जोखिमवाला पेशा हो गया है। पत्रकार किसी भी देश – समाज का बौद्धिक/वैचारिक प्रहरी होता है और सचाई की मशाल को लेकर आगे आगे चलता है ताकि देश समाज की तमाम बुराइयों, भ्रष्टाचार, कुरीतियों, अनाचारों, षड्यंत्रों, कालाबाजारियों, दुराभिसंधियों, राजनेताओं, उद्योगपतियों, धन्नासेठों, नौकरशाही, पुलिस – प्रशासन के काले कारनामों का पर्दाफाश हो सके और जनता जागरूक और सतर्क हो सके। किंतु आज जब हम अपने आसपास गौर करते हैं तो पाते हैं कि देश के लगभग सभी बड़े अखबार/मीडिया समूह कॉरपोरेट हाउसों में बदल गए हैं और उनका सबसे बड़ा लक्ष्य/ध्येय/मिशन ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना हो गया है। सरकारी विज्ञापनों तथा उससे प्राप्त होने वाले अन्य फायदों के चलते लगभग सभी मीडिया समूह/अखबार तथा उनसे जुड़े पत्रकार आदि सत्ता के पालतू श्वान और उनके चारण भांट बन गए हैं और सत्ता की गलत नीतियों, कुशासन, भ्रष्टाचार के कारनामों आदि से न केवल आंख मूंदे हुए हैं बल्कि बेशर्म होकर सत्ताधारी पार्टी की विरुदावलियां गा रहे हैं। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश के लिए यह स्थिति अत्यंत घातक है।

    आज ईमानदार पत्रकार के सामने जान का जोखिम है। सच बोलने वाले जिद्दी पत्रकारों को दलाल मीडिया समूह नौकरी से निकाल बाहर करता है। लेकिन अपनी धुन के पक्के ऐसे ईमानदार पत्रकार भी हार मानकर चुप नहीं बैठे हैं। वे सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों के जरिए अपना मिशन जारी रखे हुए हैं और जनता के सामने निडरता से खबरों की सचाई/विश्लेषण सामने रख रहे हैं। वाकई में उनका साहस, उनकी प्रतिबद्धता और उनकी जुझारू प्रवृत्ति प्रणम्य और अनुकरणीय है।

    आपने अपने आलेख में हिंदी सिनेमा के बरक्स उपर्युक्त मुद्दों को भी छुआ है। आपका आलेख कई नए बिंदुओं को कवर करता है और पठनीय है। आपका प्रयास सराहनीय है।

  2. Tarkeshwar Patel says

    हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के तीन स्तंभ कार्यपालिका, न्यायपालिका,विधायिका के साथ ही मीडिया को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में माना जाता है, मीडिया समाज में सूचना के स्रोत के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है,और ये एक प्रहरी या जाचकर्ता के रूप में भी कार्य करता है ।मीडिया हमारे समाज को नया आकार प्रदान करने तथा इसको मजबूत बनाने में अपनी एक शसक्त एवम महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। वर्तमान में पत्रकारिता सरकारी गजट या नोटिफिकेशन बनकर रह गई हैं।लगभग सभी मीडिया संस्थान और चेनल दिन रात सरकार का गुदगान करते हैं। इक्कीसवीं सदी में दुनिया विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर बात कर रही है।परंतु भारतीय मीडिया धर्म,जातिवाद, मंदिर,मस्जिद की तथाकथित राजनीति से आगे नहीं बढ़ पाई है। हर बार की तरह इस बार भी ये आलेख भी सराहनीय और पठनीय है।
    🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

  3. DHARMENDRA VEERODAY says

    राकेश कबीर जी का यह शोधपरक आलेख रोचक और पठनीय है । सिनेमा और समाज का रिश्ता अविभाज्य है, और समाज के द्वारा ही सिनेमा को पोषण मिलता है । सिनेमा अपने उत्पादन को समाज के सामने इसी आशा में लाता है कि वहां से उसको अच्छा मुनाफा भी मिलेगा । लेखक ने हिंदी की ऐसी तमाम फिल्मों और उनके मनोविज्ञान का सटीक मूल्यांकन करने का प्रयास अपने आलेख में किया है जो मीडिया, पत्रकारिता या पत्रकारिता को केंद्र में रखकर अथवा आंशिक रूप से पत्रकारिता पर आधारित हैं ।
    मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। किसी भी देश में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाएं कितनी सक्रिय, प्रभावी और सफल इसका पता इस बात से लगता है कि वहां की मीडिया और पत्रकारिता कितनी मुखर, निष्पक्ष, निर्भीक और स्वतंत्र है।
    जिस समाज में मीडिया की भूमिका निष्पक्ष नहीं होगा वह समाज निश्चित ही भटका हुआ होगा । पत्रकारिता समाज को सजग, सतर्क और जागरूक बनाने हुए शिक्षित करने का काम करती है ।
    हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के तीन स्तंभ कार्यपालिका, न्यायपालिका,विधायिका के साथ ही मीडिया को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में माना जाता है, मीडिया समाज में सूचना के स्रोत के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है,और ये एक प्रहरी या जाचकर्ता के रूप में भी कार्य करता है ।मीडिया हमारे समाज को नया आकार प्रदान करने तथा इसको मजबूत बनाने में अपनी एक शसक्त एवम महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। परंतु भारतीय मीडिया धर्म,जातिवाद, मंदिर,मस्जिद की तथाकथित राजनीति से आगे नहीं बढ़ पाई है। हर बार की तरह इस बार भी ये आलेख प्रशंसनीय और पठनीय है। 👏👏👏👏💐

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