मोदी सरकार सावरकर को ‘भारत-रत्न’ क्यों देना चाहती है?

उर्मिलेश

0 1,095

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी और केंद्र की मोदी सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद अब भी देश में विनायक दामोदर सावरकर को एक सम्मानित स्वाधीनता सेनानी और सुंसगत राष्ट्रवादी के रूप में राष्ट्रीय स्वीकृति नहीं मिल पा रही है। इसका मुख्य कारण ये नहीं कि देश की आम जनता का बड़ा हिस्सा सावरकर को पसंद या नापसंद करता है। दरअसल, समाज के बड़े हिस्से में सावरकर को लेकर ज्यादा जानकारी भी नहीं है। सावरकर को देश के सिर्फ दो प्रदेशों-महाऱाष्ट्र और गोवा में आम लोगों के बीच ज्यादा जाना जाता है। लेकिन वहां के आम लोगों में भी वह महात्मा गांधी, शहीद भगत सिंह या डॉ बी आर अम्बेडकर की तरह किंवदतीय व्यक्तित्व या महानायक की तरह नहीं देखे जाते। पर संघ-भाजपा के नेता और सरकार की छांव व समर्थन में उभरे कुछ नये ‘राष्ट्रवादी बौद्धिक’ आज सावरकर को किसी राष्ट्रीय़ महानायक के रूप में स्थापित करने की मुहिम छेड़े हुए हैं।

सच तो ये है कि महाराष्ट्र और गोवा में भी वी डी सावरकर को वहां के ब्राह्मण समुदाय और उग्र दक्षिणपंथी समूहों के बीच ही ज्यादा महत्व के साथ याद किया जाता है। लेकिन महाराष्ट्र के मराठी या अंग्रेजी मीडिया में उन्हें लेकर अक्सर कुछ न कुछ लिखा जाता रहता है। कभी उन्हें भारत रत्न देने के बारे में कुछ खास तरह के नेताओं या हिन्दुत्ववादी संगठनों के बयान छापे जाते हैं तो कभी उन्हें वीर स्वाधीनता सेनानी बताते हुए उनकी तुलना किसी बड़े क्रांतिकारी से की जाती है। क्या वाकई सावरकर ‘भारत-रत्न’ के पात्र हैं? क्या उन्हें मरणोपरांत यह सम्मान मिलना चाहिए? इस सवाल का जवाब देने से पहले सावरकर की छवि को लेकर दो बेहद जरूरी पहलुओं की चर्चा यहां जरूरी है। पहली बात ये कि हमारे समाज के कुछ ताकतवर लोग, समुदाय या सरकार वी डी सावरकर को चाहे जो भी सम्मान दे डाले, वह देश में कभी भी महात्मा गांधी, शहीद भगत सिंह या डा अम्बेडकर जैसे किंवदतीय चरित्र या राष्ट्रीय महानायक के रूप मे नहीं देखे जायेंगे। इसके दो कारण हैः आजादी की लड़ाई के दौरान उनका ब्रिटिश हुकूमत से माफी मांगकर अंडमान स्थित जेल से छूटकर आना और दूसरा कि वह महात्मा गांधी के नृशंस हत्याकांड में एक ऐसे अभियुक्त के रूप में दर्ज रहे, जिसे साक्ष्यों की कमी के चलते राहत मिल गयी और उन्हें कोई बड़ी सजा नहीं मिली। उन्हें जेल से मुक्ति मिल गयी। ये दोनों कारण पूरे देश के बौद्धिक और आम पढ़े-लिखे लोगों में सर्वज्ञात हैं। फिर भी हमारे रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने पिछले दिनों उनका काफी महिमामंडन किया। क्या राजनाथ जी की यह बात सच है कि सावरकर ने गांधी जी की ‘सलाह’ पर ब्रिटिश हुकूमत से माफी मांग ली थी? ऐसा एक भी साक्ष्य नहीं है, जिसके आधार पर कोई ऐसा दावा करे। संभवतः मौजूदा सरकार सावरकर को ‘भारत रत्न’ जैसा सम्मान (मरणोपरांत) देने से पहले लोगों की प्रतिक्रिया का अंदाज लेना चाहती है। राजनाथ सिंह का बयान उस अंदाज के लिए ही सामने आया। एनडीए-1 कार्यकाल के दौरान भी सावरकर को भारत-रत्न देने की कोशिश की गयी थी। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसकी पहली कोशिश की पर तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन ने उन्हें समझा-बुझा लिया कि सावरकर को भारत रत्न देना किस तरह उऩकी सरकार और समूचे राष्ट्र के लिए उचित नहीं होगा। इस तरह तत्कालीन सरकार का प्रस्ताव निरस्त हो गया। प्रधानमंत्री वाजपेयी ने फिर अपने उस प्रस्ताव पर कभी जोर नहीं दिया। वैसे भी उनकी सरकार आज की नरेंद्र मोदी सरकार की तरह प्रचंड बहुमत और संपूर्ण संघ-वर्चस्व वाली सरकार नहीं थी। उस सरकार के कई घटक भी सावरकर को भारत रत्न देने के पक्षधर नहीं थे।

इसके दो कारण हैः आजादी की लड़ाई के दौरान उनका ब्रिटिश हुकूमत से माफी मांगकर अंडमान स्थित जेल से छूटकर आना और दूसरा कि वह महात्मा गांधी के नृशंस हत्याकांड में एक ऐसे अभियुक्त के रूप में दर्ज रहे, जिसे साक्ष्यों की कमी के चलते राहत मिल गयी और उन्हें कोई बड़ी सजा नहीं मिली। उन्हें जेल से मुक्ति मिल गयी। ये दोनों कारण पूरे देश के बौद्धिक और आम पढ़े-लिखे लोगों में सर्वज्ञात हैं।

 

सावरकर महिमामंडन के इस नये प्रयास में एक नयी बात सामने आई है। पहली बार संघ-भाजपा खेमे से राजनाथ सिंह जैसे एक बड़े नेता ने सावरकर की माफी का जिक्र किया है। अब तक संघ-भाजपा और हिन्दू महासभा के लोग अपनी जुबान से सावरकर के माफीनामे पर कुछ नहीं कहते थे। बस, उन्हें ‘वीर सावरकर’ कहकर संबोधित करते थे। उसके जवाब में सोशल मीडिया पर बहुतेरे लोग माफी-वीर का विशेषण दे डालते थे। इस बार सरकार के मंत्री ने ये तो माना कि सावरकर ने माफी मांगी थी पर गांधी जी की सलाह पर उन्होंने य़ह फैसला किया था! अपने बयान के पक्ष में मंत्री ने कोई ठोस तथ्य या साक्ष्य नहीं पेश किया। इससे उनका बयान बेमतलब साबित हो गया।

कई लोग सवाल करते हैं कि सावरकर कभी भी संघ से सम्बद्ध नहीं रहे। फिर भी संघ और भाजपा के नेता इस विवादास्पद हिन्दू महासभाई नेता को क्यों ‘भारत रत्न’ बनाना चाहते हैं? इसलिए कि सावरकर भले ही संघ के सदस्य नहीं थे। पर संघ के सभी संस्थापक-सदस्य सावरकर से बेहद  प्रभावित थे। संघ के अनेक लोग विचार के स्तर पर उनसे हमेशा संवाद करते थे। इसलिए यह संयोग नहीं कि भारत में ‘हिन्दुत्व’ की राजनीतिक विचारधारा के प्रणेता समझे जाने वाले विनायक दामोदर सावरकर के प्रति आज के सत्ताधारियों का विशेष आकर्षण है। उनके पास विचारकों का सख्त अभाव है। स्वाधीनता आंदोलन से गहरी सम्बद्धता का संघ-भाजपा का न तो अपना कोई इतिहास है और न ही कोई चमकदार विरासत। ऐसे में जहां किसी को वे अपने थोड़ा भी नजदीक देखते हैं, उसे अपनाने के लिए आतुर हो जाते हैं और सावरकर तो निश्चय ही संघ-भाजपा की वैचारिकी के नजदीक ही नहीं, उनके प्रेरक भी हैं। यह सही है कि शुरूआती दौर में उन्होंने और उऩके कई साथियों ने अपने विचारों के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में अपने तईं भाग लिया था। पर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर विवादों की गहरी छाया हमेशा मौजूद रही। महात्मा गांधी की नृशंस हत्या करने वाले नाथू राम गोड्से के प्रेरणा-पुरुष भी सावरकर ही थे। यह बात नाथू राम के भाई और गांधी जी की हत्या में आजीवन कारावास काट चुके गोपाल गोड्से ने भी मानी थी।

तमाम राजनीतिक दलों और बुद्धिजीवियों की आपत्तियों के बावजूद संघ-भाजपा और सरकार के संचालक हर हालत में सावरकर को गौरवान्वित करते देखे जाते हैं। वे अपनी आलोचना से घबराकर सावरकर को छोड़ते नहीं। क्योंकि उन्हें सावरकर के रूप में अपने हिन्दू-राष्ट्रवाद की मूल संकल्पना का प्रणेता नजर आता है। संघ के इतिहास में उन्हें ऐसा कोई विचारक नहीं दिखता। सच है कि विनायक दामोदर सावरकर की पूरी वैचारिकी हिन्दुत्व और राष्ट्र सम्बन्धी धारणा पर केंद्रित है। सावरकर और अम्बेडकर, दोनों का कार्यक्षेत्र बुनियादी तौर पर महाराष्ट्र था। सावरकर सन् 1966 में दिवंगत हुए जबकि बाबा साहेब सन् 1956 में। पर दोनों ने एक-दूसरे को ठीक से देखा-समझा। डॉ अम्बेडकर ने सावरकर पर कई जगह बहुत महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं। भारत सरकार द्वारा प्रकाशित बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर के संपूर्ण वांग्मय, खंड-15 के कई पृष्ठों में सावरकर चर्चा के अंश मिलते हैं। एक संदर्भ में वह जिस तरह सावरकर की तस्वीर पेश करते हैं, उससे साफ लगता है कि हिन्दुत्व का ये पैराकोर निहायत आत्ममुग्ध और असहिष्णु किस्म का चरित्र था। आधी-अधूरी चीजें पढ़कर बड़ी-बड़ी बातें करना और सिद्धांतकार बनने की उसमें जिद दिखती थी। वह निहायत कट्टरपंथी था। सामाजिक न्याय और सकारात्मक कार्रवाई के उसूलों के प्रति तमाम ब्राह्णणवादियों की तरह उसका भी विरोध था। राष्ट्र की उसकी धारणा भी बेहद संकीर्ण और संकुचित थी। डॉ अम्बेडकर राष्ट्रवाद की सावरकर थीसिस को सिरे से खारिज करते हैं। वह उसे भारतीय राष्ट्र के लिए बेहद खतरनाक मानते हैं। इसके लिए वह सावरकर के भाषणों और पुस्तिकाओं को उद्धृत करते हैं। दिसम्बर, 1939 में कलकत्ता में आयोजित हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय अधिवेशन में दिये भाषण में सावरकर ने बार-बार हिन्दुओं को ‘राष्ट्र’ कहकर संबोधित किया था। उनकी नजर में हिन्दू और मुस्लिम, दो अलग-अलग राष्ट्र हैं। इसे ही-सावरकर की द्वि-राष्ट्र की थीसिस कहा जाता है! बाबा साहेब कहते हैः ‘इस मामले में उनके विचारों में निरंतरता और स्थायित्व है। उन्होंने सन् 1937 के हिन्दू महासभा के अहमदाबाद अधिवेशन में भी इस बारे में महत्वपूर्ण वक्तव्य दिया थाः ‘आज हिन्दुस्थान को एकात्मक और समजातीय राष्ट्र नहीं कहा जा सकता, बल्कि इसके विपरीत यहां हिन्दू और मुस्लिम, दो प्रमुख राष्ट्र हैं।’ सावरकर के भाषण के इस अंश को उद्धृत करते हुए डॉ अम्बेडकर लिखते हैं : ‘यह बात सुनने में भले ही विचित्र लगे पर एक राष्ट्र बनाम दो राष्ट्र के प्रश्न पर श्री सावरकर और श्री जिन्ना के विचार परस्पर विरोधी होने के बजाये एक-दूसरे से पूरी तरह मेल खाते हैं। दोनों ही इस बात को स्वीकार करते हैं और न केवल स्वीकार करते हैं बल्कि इस बात पर जोर देते हैं कि भारत में दो राष्ट्र है-एक मुस्लिम राष्ट्र और एक हिन्दू राष्ट्र। उनमें मतभेद केवल इस बात पर है कि इन दोनों राष्ट्रों को किन शर्तों पर एक-दूसरे के साथ रहना चाहिए। श्री सावरकर यह मानते हैं कि मुस्लिम एक अलग राष्ट्र हैं। वे यह भी स्वीकार कर लेते हैं कि उन्हें सांस्कृतिक स्वायत्तता का अधिकार है। वह उन्हें अपना पृथक राष्ट्रीय ध्वज रखने की भी अनुमति देते हैं। पर इसके बावजूद वे मुस्लिम राष्ट्र के लिए अवग कौमी वतन की अनुमति नहीं देते। यदि वे हिन्दू राष्ट्र के लिए एक अलग कौमी वतन का दावा करते हैं तो मुस्लिमराष्ट्र के कौमी वतन के दावे का विरोध कैसे कर सकते हैं? ’(वांग्मय-खंड-15, पृष्ठ-131, 132)।

कई लोग सवाल करते हैं कि सावरकर कभी भी संघ से सम्बद्ध नहीं रहे। फिर भी संघ और भाजपा के नेता इस विवादास्पद हिन्दू महासभाई नेता को क्यों ‘भारत रत्न’ बनाना चाहते हैं? इसलिए कि सावरकर भले ही संघ के सदस्य नहीं थे। पर संघ के सभी संस्थापक-सदस्य सावरकर से बेहद प्रभावित थे। संघ के अनेक लोग विचार के स्तर पर उनसे हमेशा संवाद करते थे। इसलिए यह संयोग नहीं कि भारत में ‘हिन्दुत्व’ की राजनीतिक विचारधारा के प्रणेता समझे जाने वाले विनायक दामोदर सावरकर के प्रति आज के सत्ताधारियों का विशेष आकर्षण है।

 

डॉ अम्बेडकर ने वीडी सावरकर के हिन्दुत्व, कथित राष्ट्रवाद और उनकी राजनीतिक वैचारिकी को भारतीय राष्ट्रराज्य की अवधारणा और समाज का विरोधी बताया। यही नहीं, उनका कहना था कि सावरकर का यह चिंतन भारत की सुरक्षा के लिए खतरनाक है। स्वयं बाबा साहेब के शब्दों में ही पढ़ियेः ‘यदि श्री सावरकर की एकमात्र त्रुटि उनकी असंगति होती तो यह कोई बहुत चिंता का विषय नहीं होता। परन्तु अपनी विचार-योजना का समर्थन करके वह भारत की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा पैदा कर रहे हैं।—वे चाहते हैं कि हिन्दू राष्ट्र और मुस्लिम राष्ट्र के बीच शत्रुता के बीज बो देने के बाद वे एक साथ, एक ही विधान के अंतर्गत, एक ही देश में रहें। सावरकर यह क्यों चाहते हैं; इसकी व्याख्या करना कठिन नहीं है (पृष्ठ 133-134)।

बाबा साहेब बहुत विद्वान, बहुपठित और तर्कशील होने के साथ बौद्धिक रूप से बहुत विनम्र भी थे। सावरकर से गहरी असहमति के बावजूद वह अपने अध्याय में हिन्दुत्वा के इस पैरोकार को जगह-जगह उद्धृत करते हैं। उनकी बातों को सामने लाकर वह उनकी आलोचना करते हैं। उन्हें वह ये सलाह देना नहीं भूलते कि जनाब थोड़ा इतिहास तो पढ़ लो। इससे आपको लाभ होगा। डा अम्बेडकर की नजर में सावरकर की वैचारिकी भारतीय-राष्ट्र के हितों के सर्वथा विरूद्ध है और उन्होंने यह बात साफ शब्दों में कही है। यह बात सही है कि सावरकर ने शुरुआती दौर में एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में जो काम किया, उसके कुछ चमकदार पहलू भी रहे। पर विचारों से वह हमेशा हिन्दूवादी कट्टरपंथी रहे। जेल-प्रवास में वह टूटते नजर आये। भगत सिंह या असंख्य स्वाधीनता सेनानियों जैसा उनमें आत्मबल नहीं दिखा। अंततः उऩके संघर्ष का समापन माफीनामे से हुआ। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के कई पक्ष हैं। पर जो सबसे प्रमुख पक्ष है-वह द्वि-राष्ट्र के सिद्धांतकार का है, जो हिन्दुत्व की राजनैतिक धारा का प्रणेता भी है, जिसका राष्ट्रवाद बेहद संकुचित और एक्सक्लूसिव है। उसमें समावेशी, समतामूलक और न्यायपूर्ण बनने की कोई गुंजायश ही नहीं है। निस्संदेह, ऐसी सावरकरी-सोच को सिरे से खारिज करने की जरूरत है।

लेखक जाने माने स्वतंत्र पत्रकार हैं। 

Leave A Reply

Your email address will not be published.