सभ्यता के पीछे ज्ञान या ज्ञान के पीछे सभ्यता? (डायरी 5 जुलाई, 2022) 

नवल किशोर कुमार

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मेरी बेटी साक्षी के सवाल ऐसे ही होते हैं। उसकी तरह ही चुलबुली और थोड़ी-सी नुकीली। कल उसने यह खास सवाल किया कि पापा, सभ्यता की वजह ज्ञान है या फिर ज्ञान की वजह सभ्यता है?
इस सवाल की पृष्ठभूमि यह है कि कल मैं दिल्ली नहीं जा सका। मेरी लाख कोशिशों के बावजूद रेलवे ने मेरा टिकट कनफर्म नहीं किया और करीब साढ़े तीन बजे मुझे इत्तिला भेज दी। खैर, आज की मेरी वापसी तय थी तो दूसरे विकल्प का उपयोग किया। हालांकि यह बहुत महंगा है और मुझे जैसे अति सामान्य व्यक्ति के लिए अतिरिक्त खर्च।
बहरहाल, इस घटना के अनेक लाभ मिले। पहला तो यह कि मेरे फूफा इंद्रदेव राय कल घर आए। हमारे परिवार में ऐसी परंपरा है कि किसी की पत्नी का निधन हो जाय तो ब्रह्माभोज के बाद उसे ससुराल ले जाया जाता है। ऐसे ही कोई विधवा हो जाय तो उसे मायके ले जाया जाता है। परंपरा के हिसाब से इसे जगह बदलना कहते हैं शायद। तो कल शाम में फूफा का आगमन हुआ तो उनके और फुआ की प्रेम कहानी सुनने को मिली। यह भी कि अंतिम समय में मेरी फुआ ने उनका हाथ नहीं छोड़ा था। वह दो सालाें से बीमार थीं और लगभग बिस्तर पर थीं। लेकिन तीन बहुओं में से किसी ने भी उनकी सेवा नहीं की। तीन बेटियां भी हैं उनकी, लेकिन उन्हें अपने ससुराल से फुरसत नहीं थी। लिहाजा नित्य कर्म से लेकर सारे काम फूफा इंद्रदेव राय ने खुद किया। कल उन्होंने संतोष जाहिर किया कि मेरी फुआ का निधन हो गया। अब वह भी सुकून से दुनिया को अलविदा कह सकेंगे।

हम आगे बढ़े तो विज्ञान भवन के पास से गुजरते हुए गांधी मैदान की सड़क पर पहुंचे। वहां रोशनी से नहाता बिस्कोमान टॉवर देखा और गांधी मैदान तो खैर गुलजार था ही। वहां गांधी की गगनचुंबी इमारत भी है। प्रतिमा पर की गयी बेइंतहां रोशनी ने साक्षी को सवाल करने का एक और मौका दे दिया। उसका दूसरा सवाल था– यह रोशनी सत्य और अहिंसा की रोशनी से अधिक तेज है या मद्धिम?

 

इस दो-तीन घंटे की लंबी प्रेम कहानी से पहले एक और बात हुई। मेरी बड़ी साक्षी, जो इस बार मेरे अचानक बीमार पड़ जाने की वजह से निराश थी, को एक दिन मिल गया। उसे दृश्य देखकर सवाल पूछने की अच्छी आदत है। तो कल उसने इच्छा व्यक्त की कि उसे गंगा नदी पर बनी नई सड़क को देखना है। इसके बारे में उसने पटना से प्रकाशित अखबरों में पढ़ा और यू-ट्यूब चैनल पर देखा था। कल की शाम अपनी थी। हम निकल पड़े। साथ में मेरे दो और बच्चे– लड्डू और गुल्लू।
दरअसल, पटना की मौजूदा संरचना बहुत चौड़ी नहीं है। अलबत्ता लंबी अवश्य है। पूरब से लेकर पश्चिम तब मुझे यह दोआबा जैसा दिखता है। दोआबा मतलब दो नदियों के बीच का हिस्सा। पूरब से लौटते समय बाएं तरफ गंगा और दाएं तरफ पुनपुन और सोन नहर। मेरा घर ऐसी जगह पर है जहां से इन दोनों नदियों की दूरी लगभग एक जितनी है। हालांकि पुनपुन अधिक नजदीक है और मैं उसे अपने गांव की नदी मानता हूं।
खैर, हमें गंगा नदी पर बनाए गए नये सड़क पर जाना था। लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए मैंने गोलघर के बगल वाला रास्ता चुना। हालांकि मेरे पास आर. ब्लॉक चौराहे के पास से सीधे निकलने का रास्ता था। लेकिन मैं तो अपने बच्चों को बिहार सरकार के विकास की उलटी कहानी को भी दिखाना और समझाना चाहता था। इस बार पटना के पुराने संग्रहालय के रास्ते गया। संग्रहालय में पहले रंग-बिरंगी रोशनियां होती थीं। अब रातों में रोशनियां नहीं होतीं। साक्षी को संग्रहालय की दीवारों पर स्वचालित तरीके से बदलनेवाली रंगीन रोशनियां याद थीं। सो उसने पहला सवाल यही पूछा कि अब क्यों नहीं।
मैंने कहा कि राज्य सरकार के लिए अब यह शानदार इमारत किसी काम की नहीं। इसे किसी भी दिन नीतीश कुमार तुड़वा देंगे और इसकी जगह जो इमारत बनेगी, उसके नीचे शिलालेख में अपना नाम लिखवा देंगे। साक्षी के साथ गुल्लू ने भी जोर के ठहाके लगाए।
हम आगे बढ़े तो विज्ञान भवन के पास से गुजरते हुए गांधी मैदान की सड़क पर पहुंचे। वहां रोशनी से नहाता बिस्कोमान टॉवर देखा और गांधी मैदान तो खैर गुलजार था ही। वहां गांधी की गगनचुंबी इमारत भी है। प्रतिमा पर की गयी बेइंतहां रोशनी ने साक्षी को सवाल करने का एक और मौका दे दिया। उसका दूसरा सवाल था– यह रोशनी सत्य और अहिंसा की रोशनी से अधिक तेज है या मद्धिम?
रात में बिस्कोमान टॉवर,पटना
बेटियां जब बड़ी होती हैं तो उनके सवाल ऐसे ही होते हैं। लेकिन अच्छा लगता है जब वह ऐसे सवाल पूछें। मैंने कहा कि सत्य और अहिंसा की रोशनी को किसी कृत्रिम रोशनी की जरूरत नहीं होती। गांधी होते तो नीतीश कुमार को डांट जरूर लगाते और कहते कि जितनी रोशनी मेरी प्रतिमा पर अपव्यय की जा रही है, उतने से कम से कम एक गांव को बिजली मुफ्त तो जरूर दी जा सकती है।
हम आगे बढ़े तो गोलघर नजर आया। उसे देख साक्षी ने गुल्लू को अपना संस्मरण सुनाया कि जब वह सात साल की थी तब ऊपर तक चढ़ी थी। अब गुल्लू को हिसका हुआ तो उसने जिद किया कि उसे अभी गोलघर पर चढ़ना है। लेकिन यहां तो एकदम अंधेरा है। पापा, क्या यह अब एक खंडहर है? इस बार सवाल गुल्लू का था। मैंने जवाब में कहा कि हां, यह बिहार के आधुनिक इतिहास का खंडहर ही है, जिसका श्रेय नीतीश कुमार को जाता है।

मूल बात यह है कि ज्ञान के पहले समझ आयी। समझ से बुद्धि और सभ्यता के विकास की प्रक्रिया शुरू हुई। सभ्यता जब समृद्ध हुई तो ज्ञान सामने आया। इस लिहाज से ज्ञान के पीछे सभ्यता है।

 

गोलघर से पहले पटना कमिश्नरी के ठीक सामने से एक सड़क है जो गंगा नदी पर बनाई गई नयी सड़क पर ले जाती है। हम उस सड़क की ओर बढ़े। रात के अंधेरे में सड़क साफ-साफ दिख रही थी लेकिन गंगा गायब थी। लगा कि इस बरसात में भी गंगा पटना से रूठी हुई है। वर्ना कुछ रोशनियां जरूर झिलमिलातीं। हम आगे बढ़े तो मिला सभ्यता द्वार और आज का सवाल भी कि सभ्यता के पीछे ज्ञान या फिर ज्ञान के पीछे सभ्यता?
दरअसल, सभ्यता द्वार गंगा के किनारे बनाया गया है। अब यदि आप गंगा के रास्ते जाएंगे तो सभ्यता द्वार आगे मिलेगा और यदि पटना शहर के रास्ते आएंगे तो यह ज्ञान भवन के पीछे। साक्षी का सवाल इसी कारण से था। लेकिन यह दिलचस्प सवाल था। वहीं उसे यह समझाना पड़ा कि नीतीश कुमार किस तरह खुद को अमर देनेवाले शासक हैं और उनके माथे पर किस तरह का भूत सवार रहता है। पहले गांधी मैदान में 14 फीट की गांधी की प्रतिमा थी, उसे तुड़वाकर ऐसी जगह फेंक दिया, जहां कोई उसे देखता भी है तो सम्मान नहीं देता। वजह यह कि वह प्रतिमा 1994 में लालू प्रसाद ने लगवायी थी। अब उसकी जगह गगनचुंबी इमारत है तब भी लोग केवल मुंह चिहाड़कर देखते हैं।
मूल बात यह है कि ज्ञान के पहले समझ आयी। समझ से बुद्धि और सभ्यता के विकास की प्रक्रिया शुरू हुई। सभ्यता जब समृद्ध हुई तो ज्ञान सामने आया। इस लिहाज से ज्ञान के पीछे सभ्यता है।
मेरी बेटी मेरी जैसी है। एक छोटी-सी नोटबुक अपने पास रखती है। अंतिम बात को उसने नोट किया। और नीतीश कुमार नौटंकीपूर्ण अधिसंरचना के सामने मेरी फोटो भी उतारी। गुल्लू तो खैर नीतीश कुमार से भी अधिक नौटंकीबाज है। तो जो जैसा है, वैसा ही इस तस्वीर में नजर आया।
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