माया-मोह और मेेरी भाभी (डायरी, 27 जून, 2022) 

नवल किशोर कुमार

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जीवन में मोह का महत्व होता ही है। मोह न हो तो जीवन का कोई उद्देश्य भी नहीं होता। बिन माया-मोह जीवन की बातें महज चोंचलेबाजी हैं। मेरे जीवन में मोह की बड़ी भूमिका रही है।
मोह किसी के लिए भी हो सकता है। फिर चाहे वह निर्जीव हो या सजीव। कल कई बातें एक साथ हुईं और सबके केंद्र में मोह ही था। सबसे खास एक व्यक्तित्व जिनसे मोह तब हुआ जब जीवन का मतलब केवल स्कूल जाना, भैंस चराना और गांव के मैदान में खेलना भर होता था। उन दिनों इनका आगमन मेरे घर में हुआ।  मुझे वह दिन अब भी याद है जब महेश जी मेरे घर आए। पापा से कुछ बात कर रहे थे। बात थोड़ी अलग सी थी। मालूम चला कि भैया की शादी की बात हो रही है। पटना में मेरे गांव के मेरे घर में उस दिन उत्सव का माहौल था जब भैया को देखने लोग आए।
मुझे कई जिम्मेदारियां दी गयी थीं। मसलन अतिथियों का स्वागत करने से लेकर उनके लिए जलपान आदि की व्यवस्था करना। सारे चेहरे नए थे केवल एक महेश भैया को छोड़कर। वे ही अगुआ थे। आज जब सोचता हूं कि समाजवाद का उदाहरण क्या-क्या हो सकता है तब मुझे उनकी याद आती है। वे ठेला चलाते थे। रहने वाले तो दानापुर के थे लेकिन आजीविका अनिसाबाद के इलाके में कमाते थे। यहीं उनका मन लग गया था। पापा को वह चाचा कहते।

भैया की शादी में बारात जाने के लिए मैंने अपनी साइकिल का उपयोग किया था। उस अनुभव को याद करता हूं तो शरीर में अजीब सी हरकत होती है। क्या अनुभव था वह साइकिल चलाने का। पापा बार-बार कहते रहे कि टेम्पू पर चलो। लेकिन बारात में शामिल होने कई लोग साइकिल से जा रहे थे तब मैं भला टेम्पू से कैसे जाता। यह तो समाजवाद के विपरीत ही होता।

एक बार मैं बीमार पड़ा तो मां ने मनौती मान ली। मनौती यह कि मेरे ठीक होने पर मां गंगा जी को दो सेर मिठाई भेंट करेंगीं और कबूतर छोड़ेंगीं। उस दिन हमसब तैयार हुए। नया-नया कपड़ा पहनकर  मैं मां का राजदुलारा लग रहा था। सारा आयोजन था भी तो मेरे लिए ही। फिर पटना में मेरे गांव से लेकर कलेक्ट्रियट घाट तक की दूरी मैंने मां के साथ महेश भैया के ठेले पर तय की। उनके चेहरे पर चेचक के दाग थे। लेकिन थे आदमी जबरदस्त।
खैर, भैया की शादी का प्रस्ताव महेश भैया लेकर आए थे तो यह तो पक्का था कि शादी होगी और जरूर होगी। सब तय-तमन्ना हो गया। वह 1994 का वर्ष था। भैया की शादी में बारात जाने के लिए मैंने अपनी साइकिल का उपयोग किया था। उस अनुभव को याद करता हूं तो शरीर में अजीब सी हरकत होती है। क्या अनुभव था वह साइकिल चलाने का। पापा बार-बार कहते रहे कि टेम्पू पर चलो। लेकिन बारात में शामिल होने कई लोग साइकिल से जा रहे थे तब मैं भला टेम्पू से कैसे जाता।  यह तो समाजवाद के विपरीत ही होता।
पटना के बेली रोड पर पहुंचने के लिए फुलवारी स्टेशन की गुमटी को पार करना ही था। तब पहली बार एयरपोर्ट को देखा। तब आज के जैसी ऊंची दीवारें नहीं थीं। ट्रैक पर हवाई जहाज आसानी से दिख जाते थे। हवाई जहाज को जमीन पर देखने का रोमांच तब अलहदा ही था। फिर बेली रोड पर तेज गति में दौड़ती गाड़ियों के सापेक्ष साइकिल चलाने में रोमांच तो था ही।

मन में ख्वाहिशें तो होती ही थीं कि कोई मुझे भी देखे। यह कोई असामान्य बात नहीं थी। लेकिन मन पढ़ाई में भी रम गया था। भाभी अब हमारे जीवन का हिस्सा थीं। भैया ने उनका एक नामकरण किया था। शायद गंगा-दामोदर एक्सप्रेस या फिर वह हावड़ा एक्सप्रेस। वजह यह कि भाभी को दिन भर के काम से छुटकारा नौ बजे के बाद ही मिलता। भैया उनका इंतजार करता रहता और इसी इंतजार में वह उन्हें इस तरह के संबोधन से संबोधित करता। दोनों थे भी एकदम शानदार कपल।

भैया की शादी हो गयी और भाभी का आगमन हुआ। एक अजीब सा रिश्ता रहा हमारे दरमियान पहले दिन से। मुझे लाज आती थी। भैया मुझे चिढ़ाता था। वह बार-बार कहता कि एक दिन मेरी तरह तुम्हारी भी शादी हो जाएगी। इस बात पर भाभी कहतीं कि मुझसे भी खूब सुंदर होगी नवल की कनिया। और मैं फूलकर गुब्बारा हो जाता। फिर ख्याल आता कि अभी तो मुझे पढ़ाई करनी है। फिर शादी कैसे कर सकता हूं।
यह बात तब की है जब मैं किशोरावस्था को लगभग जी चुका था। मन में ख्वाहिशें तो होती ही थीं कि कोई मुझे भी देखे। यह कोई असामान्य बात नहीं थी। लेकिन मन पढ़ाई में भी रम गया था। भाभी अब हमारे जीवन का हिस्सा थीं। भैया ने उनका एक नामकरण किया था। शायद गंगा-दामोदर एक्सप्रेस या फिर वह हावड़ा एक्सप्रेस। वजह यह कि भाभी को दिन भर के काम से छुटकारा नौ बजे के बाद ही मिलता। भैया उनका इंतजार करता रहता और इसी इंतजार में वह उन्हें इस तरह के संबोधन से संबोधित करता। दोनों थे भी एकदम शानदार कपल।
फिर घर में कई बार झगड़े भी हुए। कई बार तो मैंने भी विरोध किया। मां का स्वभाव ऐसा रहा कि वह भाभी को बहू ही मानती थीं। बेटी मानने का तो सवाल ही नहीं था। दोनों के बीच कहासुनी महीने में कभी एक बार तो कभी-कभी दो-चार बार भी हो जाती। जब भी कहासुनी होती मेरी जिम्मेदारी बढ़ जाती। मां के पास मेरे अलावा कोई था भी नहीं जो उनका पक्ष ले। पापा तो हमेशा परिवार के इस तरह के झंझटों से दूर ही रहे। भैया की शादी के बाद पापा ने बथानी में अपना बसेरा बना लिया था। मैंने भी अपनी पढ़ाई को ध्यान में रखते हुए बथानी में ही एक खपड़ैल वाले घर को अपना स्टडी रूम बना लिया था। जनानी किता में जाने का मकसद तब केवल खाना खाना होता था या फिर टीवी देखना।
समय बीतता जाता है और अपने पीछे कितनी बातें छोड़ जाता है, यदि आदमी संवेदनशील न हो तो फिर इन बातों का कोई मतलब नहीं होता। मेरे मन में एक बात बैठ गयी कि भाभी मुझे नहीं मानती हैं। वजह शायद यह कि मैं मां के साइड में रहता जब दोनों के बीच झगड़ा होता। लेकिन यह वहम ही था। जब भतीजा रौशन का जन्म हुआ तब भी मैं साइकिल चलाकर उसे देखने भाभी के मायके गया था। वहां ताराचक मुहल्ले में देव लोक नार्सिंग होम शायद आज भी है। उसी अस्पताल के एक वार्ड के बाहर बड़ी बहन  बिन्दा दीदी खड़ी थीं। उनके हाथ में एक बच्चा था। एकदम अजीब-सा बच्चा। इतना छोटा कि जब दीदी ने मुझे उसे मेरी गोद में दिया तब मैं तो डर ही गया था कि कहीं उसे चोट न लग जाय। नवजात को गोद में लेने का वह पहला अनुभव था। यह बात 1997 की है।
अब तो रौशन बहुत बड़ा हो गया है। इतना बड़ा कि अब उसकी शादी हो गई है, भाभी सास बन चुकी हैं। लेकिन मेरे लिए तो हमेशा भाभी ही रहेंगी। मुझसे बेपनाह मोहब्बत करने वाली रोनी भाभी। रोनी इनका निक नेम है जो इनके घरवालों ने रखा था।
ख्वाहिश बस इतनी कि यह केवल नाम की रोनी रहें, आजीवन मुस्कराती रहें।
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