यूपी के राज ठाकरे बन रहे मोदी-योगी (डायरी 11 फरवरी, 2022)

नवल किशोर कुमार

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देश को गृह युद्ध की तरफ धकेला जा रहा है। इसे रोकने की जिम्मेदारी भारत की जनता को है और इसके लिए मीडिया को अपनी भूमिका का निर्वहन करते हुए ऐसे सभी बयानों को खारिज करना चाहिए जो भारतीय संविधान पर आघात करते हैं। फिर चाहे वह बयान देश के प्रधानमंत्री ने ही क्यों न दिया हो। मीडिया से उम्मीद इस वजह से भी कि भारत में लगभग संवैधानिक संस्थाओं को नरेंद्र मोदी ने अपने शिकंजे में कर रखा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ द्वारा कल दिया गया बयान तो ऐसा है कि दोनों को संयुक्त रूप से यूपी का राज ठाकरे की संज्ञा दी जाय तो अतिश्योक्ति नहीं।
राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद ने हाल ही में एक बयान दिया है। उनका बयान इस संदर्भ में आया है कि कर्नाटक में मुस्लिम छात्राओं को हिजाब पहनकर कालेज परिसरों में जाने से रोका जा रहा है। लालू प्रसाद से इस संबंध में पूछनेवाले पत्रकार ने संभवत: यह उम्मीद की होगी कि वे नरेंद्र मोदी और आरएसएस के खिलाफ कोई ऐसा बयान देंगे, जिसका उपयोग भाजपा देश के पांच राज्यों में चल रहे चुनावों में कर सके या फिर भाजपा को हिंदू-मुस्लिम की राजनीति करने का मौका मिल सके।
सामान्य तौर पर ऐसे ही होता है पत्रकारिता में। हर पत्रकार अपनी राजनीतिक समझ और राजनीतिक झुकाव के हिसाब से सवाल करता है। जाहिर तौर पर उसकी अपनी जाति भी उसे ऐसा करने को बाध्य करती है।

योगी आदित्यनाथ के बयान में कश्मीर का जिक्र है, जिसे एक तरह से नरेंद्र मोदी की हुकूमत ने बर्बाद कर दिया है। वहां 370 और 35ए को निष्प्रभावी बनाने के वक्त पूरे प्रांत को नजरबंद कर दिया गया था और आज भी इसकी हालत वैसी ही है। रही बात बंगाल और केरल की तो इन दोनाें राज्यों ने अबतक उत्कृष्टता के अनेक मानदंड स्थापित किये हैं। मसलन, दोनों राज्यों में भूमि सुधार देश में एक नजीर है। वहीं शिक्षा के मामले में भी ये दोनों राज्य यूपी से लाख गुणा बेहतर हैं।

 

खैर, लालू प्रसाद ने प्रश्नकर्ता पत्रकार की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। उन्होंने कुछ ऐसा कहा कि पत्रकार के चैनल तक ने उनके बयान को सुनकर हाथ खड़े कर लिये। दरअसल, हुआ यह कि लालू प्रसाद ने कहा कि मामला हिंदू-मुस्लिम की सियासत का नहीं है। इस देश को सिविल वार की तरफ धकेला जा रहा है।
सिविल वार का हिंदी में मतलब गृहयुद्ध होता है। लालू प्रसाद के इस बयान का कितना महत्व है, इस बात का अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि आज सियासत के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक ऐसे बयान दे रहे हैं कि जिस राज्य में डबल इंजन की सरकार होगी, वहां विकास कार्य तेज गति से होते हैं। यह बयान कल ही मोदी ने उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए दिया। अब उनका यह बयान भारतीय संविधान में वर्णित संघीय व्यवस्था के ठीक विपरीत है। देश में बहुदलीय व्यवस्था है और वर्तमान में भी अनेक राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारें हैं। हालांकि भाजपा शासित प्रदेशों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है। लेकिन अनेक राज्यों में गैर भाजपाई दलों की सरकारें हैं।
संविधान के हिसाब देश का प्रधानमंत्री पूरे देश का प्रधानमंत्री होता है। वह किसी खास दल का नहीं होता है। लेकिन मौजूदा प्रधानमंत्री वास्तव में केवल भाजपा के प्रधानमंत्री हैं। यहां तक कि वह जदयू के भी प्रधानमंत्री नहीं हैं जबकि जदयू बिहार में उनकी पार्टी भाजपा के साझेदार हैं।
तो यह सोचकर देखिए कि कैसे एक प्रधानमंत्री भारतीय संविधान की धज्जियां उड़ा रहे हैं। यदि इस देश के चुनाव आयोग के पास रीढ़ सलामत होती या फिर सुप्रीम कोर्ट के जजगण गुलाम नहीं होते तो निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री के खिलाफ कार्रवाई होती। लेकिन मूल बात यही है कि नरेंद्र मोदी ने सभी संवैधानिक संस्थाओं को पंगू बना दिया है।

लालू प्रसाद ने प्रश्नकर्ता पत्रकार की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। उन्होंने कुछ ऐसा कहा कि पत्रकार के चैनल तक ने उनके बयान को सुनकर हाथ खड़े कर लिये। दरअसल, हुआ यह कि लालू प्रसाद ने कहा कि मामला हिंदू-मुस्लिम की सियासत का नहीं है। इस देश को सिविल वार की तरफ धकेला जा रहा है।

 

मैं तो यह देख रहा हूं कि अखबारों ने कैसे अपने हथियार डाल दिये हैं। जनसत्ता जैसे अखबार तक की हालत यह है कि वह भी भाजपा से जुड़ी खबरों को तवज्जो देने के लिए बाध्य हो रहा है। मसलन, दिल्ली से प्रकाशित आज के अपने संस्करण में जनसत्ता ने पहले पन्ने पर नरेंद्र मोदी के देश विभाजक बयान को प्रकाशित किया है। शीर्षक है– केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर काम करती हैं तो बड़ा परिवर्तन होता है : मोदी। 
इस खबर में अत्यंत ही शातिर तरीके से मोदी ने भारतीय संघीय व्यवस्था पर हमला किया है। इसी खबर में एक और खबर है– ‘इस बार चूके तो यूपी को कश्मीर, बंगाल और केरल बनते देर नहीं लगेगी।’ यह खबर योगी आदित्यनाथ द्वारा ट्वीटर पर जारी एक वीडियो बयान पर आधारित है। यह वीडियो तब जारी किया गया जब यूपी में प्रथम चरण का मतदान चल रहा था। यह आचार संहिता का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन का मामला बन सकता था, यदि यही बयान किसी गैर भाजपाई नेता ने दिया होता।

बंगाल और केरल की तुलना में यूपी की बदहाली को समझ सकते हैं। यह आंकड़ा प्रति व्यक्ति आय का है। भारत सरकार के वित्त मंत्रालय ने पिछले वर्ष यह आंकड़ा जारी किया है कि केरल में प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 2 लाख 45 हजार 323 रुपए, बंगाल में यह आंकड़ा 1 लाख 48 हजार 103 रुपए रहा तो यूपी में केवल 73 हजार 792 रुपए।

 

नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ के बयान के आलोक में लालू प्रसाद के बयान को देखा जा सकता है कि देश को सिविल वार की तरफ धकेला जा रहा है। योगी आदित्यनाथ के बयान में कश्मीर का जिक्र है, जिसे एक तरह से नरेंद्र मोदी की हुकूमत ने बर्बाद कर दिया है। वहां 370 और 35ए को निष्प्रभावी बनाने के वक्त पूरे प्रांत को नजरबंद कर दिया गया था और आज भी इसकी हालत वैसी ही है। रही बात बंगाल और केरल की तो इन दोनाें राज्यों ने अबतक उत्कृष्टता के अनेक मानदंड स्थापित किये हैं। मसलन, दोनों राज्यों में भूमि सुधार देश में एक नजीर है। वहीं शिक्षा के मामले में भी ये दोनों राज्य यूपी से लाख गुणा बेहतर हैं।
भारत सरकार के आंकड़े ही यूपी की बदहाली की दास्तान बता रहे हैं। फिर चाहे वह शिक्षा का मामला हो, जन-स्वास्थ्य के लिए आधारभूत संरचनाओं का विकास का सवाल हो या फिर कानून-व्यवस्था का, यूपी सबसे पिछड़े राज्यों में एक है। एक आंकड़े से हम चाहें तो बंगाल और केरल की तुलना में यूपी की बदहाली को समझ सकते हैं। यह आंकड़ा प्रति व्यक्ति आय का है। भारत सरकार के वित्त मंत्रालय ने पिछले वर्ष यह आंकड़ा जारी किया है कि केरल में प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 2 लाख 45 हजार 323 रुपए, बंगाल में यह आंकड़ा 1 लाख 48 हजार 103 रुपए रहा तो यूपी में केवल 73 हजार 792 रुपए।
खैर, बात केवल आंकड़ों का नहीं है। मूल बात यह है कि नरेंद्र मोदी और आदित्यनाथ जैसे सत्ता के भूखे लोमड़ियों के खिलाफ सभी लाचार हैं। लेकिन क्या जनता भी लाचार है?

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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