नए दौर का नया सिनेमा

 अपर्णा

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पहले के मुकाबले सिनेमा बहुत बदल गया है। कथ्य, शिल्प और कैमरे की कारीगरी के साथ ही गीत-संगीत को भी नए ढब में ढाल दिया गया है और सिनेमा अपने दर्शकों के भीतर के अवसाद को अपने ज्वार से उखाड़ देना चाहता है। लेकिन हम अक्सर देख रहे हैं कि मनोरंजन का यह शक्तिशाली माध्यम अपने ज्वार के समय जितना उत्साह और फुरफुरी पैदा कर रहा है अपने भाटे के समय उससे भी अधिक अज्ञान का कूड़ा बिखेर कर चला जा रहा है।  प्यारे-दुलारे दर्शक अपनी जेब को जिस उत्साह से खाली कर रहे हैं उतने ही विगलित भाव से यह भी कहते पाए जा रहे हैं कि फिल्म अपनी पटरी से उतर गई है। ऐसा क्यों है इसकी पड़ताल इस दौर की कुछ फिल्मों के माध्यम से की जा सकती है। दरअसल आज सिनेमा कई चीजों में बंट गया है। उसका एक सिरा स्टारकास्ट से बंधा है तो दूसरा मेकिंग से। तीसरा सिरा रिलीज से बंधा है तो चौथा प्रचार से और ऐसे में विषयवस्तु क्या है और वह कहाँ जा रहा है इस बात पर ध्यान देना लगातार कम होता गया है। सिनेमा शॉट दर शॉट बनता है और सीन दर सीन विकसित होता है। पचहत्तर-अस्सी सीन का सिनेमा अगर दस अच्छे सीन भी पेश कर दे तो निर्देशक की नैया पार हो जाती है और निर्माता का बैंक बैलेंस पर्याप्त रूप से बढ़ जाता है। तीस चालीस साल पहले सिनेमा को कुटीर उद्योग कहा जाता था लेकिन अब यह एक तंत्र है जिसमें वही व्यक्ति सफल हो सकता है जो इसमें शामिल होकर इसके मूल्यों को आगे बढ़ाये यानी फिल्म कंपनियों, निर्माताओं, कॉरपोरेट्स और इससे जुड़े लोगों का मुनाफा बढ़ाये। भले ही इसके लिए नंगा नाच करना पड़े। गौर करने की बात है कि फिल्मों में आइटम सॉंग की जरूरत इसी नंगे नाच का रूपक है।

एक सर्वे के मुताबिक भारत के आठ महानगरों दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, बेंगलोर, हैदराबाद, नोएडा-गुड़गाँव और अहमदाबाद ही अब सिनेमा के बड़े खिलाड़ियों के लिए अर्थवान रह गए हैं। सारा माल इन्हीं जगहों से बटोरा जा सकता है। अब सदाबहार फिल्म का जमाना लद चुका है। नब्बे दिन से अधिक पुरानी फिल्म को टी वी चैनल भी खरीदने और दिखाने में कोई दिलचस्पी नहीं रखते।

आज फिल्मों की सफलता के लिए अच्छे विषय की जरूरत नहीं है बल्कि स्टार सेटअप की अनिवार्यता हो गई है। स्टार है तो पैसा है। तभी बिकने और रिलीज होने की सम्भावना है। रिलीज का अर्थ भी पहले के मुकाबले बहुत बदल गया है। पहले, बम्बई, सी पी बरार, पंजाब और बंगाल जैसे प्रोविंस या टेरिटरी (क्षेत्र) हुआ करते थे लेकिन अब यह सब अखिल भारतीय हो गया है। सारे क्षेत्रीय वितरक या तो धंधा चौपट होने से बेरोजगार हो गए या फिर वे कमीशन पर बड़े कॉरपोरेट्स के लिए काम करने लगे हैं। रिलीज का आलम यह है कि बड़े स्टार सेटअप वाली फ़िल्में ही रिलीज हो पा रही हैं और उनको ही मल्टीप्लेक्स हासिल हो रहे हैं। सिंगल थियेटर और छोटे शहरों के दर्शकों की जरूरत अब सिनेमा को नहीं रह गई है। उसका क्रीमी लेयर आज का युवा है। यह युवा या तो संपन्न बाप का बेटा है या मल्टीनेशनल का कर्मचारी है। शुक्रवार को रिलीज हुई फिल्म रविवार तक लागत और मुनाफा निकाल लेती है और सोमवार से गुरुवार तक के चार दिन उसके लिए कोई खास मतलब के नहीं रह गए हैं। एक सर्वे के मुताबिक भारत के आठ महानगरों दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, बेंगलोर, हैदराबाद, नोएडा-गुड़गाँव और अहमदाबाद ही अब सिनेमा के बड़े खिलाड़ियों के लिए अर्थवान रह गए हैं। सारा माल इन्हीं जगहों से बटोरा जा सकता है। अब सदाबहार फिल्म का जमाना लद चुका है। नब्बे दिन से अधिक पुरानी फिल्म को टी वी चैनल भी खरीदने और दिखाने में कोई दिलचस्पी नहीं रखते। डीवीड, सी डी का दौर भी बीत चुका है। अब ऑनलाइन फ़िल्मों का दौर है। इसके अतिरिक्त ओवरसीज देशों में हिंदी सिनेमा का बाज़ार बढ़ा है।

हिंदी सिनेमा का दुर्भाग्य है कि वह ऐसे लोगों के हाथों की कठपुतली हो गया है जो नहीं जानते कि इस देश का मन मिजाज़ क्या है और उन्हें किस तरह के सांस्कृतिक उत्पादों की ज़रुरत है। वे हर चीज को मुनाफे में बदल देने को प्रतिबद्ध हैं। यहाँ तक कि मूर्खता , जड़ता, अकर्मण्यता, भ्रष्टाचार से लेकर नैतिकता और संवेदना तक सब कुछ और इसके लिए कितना भी विकृत और भ्रष्ट तरीका अख्तियार करना पड़े वे अपनाने के लिए तैयार बैठे हैं। क्योंकि उनके हाथ में पैसा है और पैसे से स्टार है और स्टार से रिलीज और थियेटर है।

इन तमाम बदलावों के बीच ताकतवर प्रोडक्शन हाउस या कॉर्पोरेट को अगर अपनी फ़िल्म के लिए छः हज़ार थियेटर मिल जाएँ तो! यह एक तरह से एकाधिपत्य की बात है लेकिन जो तंत्र अक्षय कुमार, सलमान खान, अजय देवगन, शाहरुख़ खान, आमिर खान या रणबीर कपूर जैसे स्टार को लेकर फिल्म बनाएगा उसके लिए ही यह सुलभ है। इसलिए इस तंत्र की फ़िल्में लोगों के लिए मजबूरी हैं। कहा जाता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने सेवक युवाओं को मनोरंजन के नाम पर हर हफ्ते पर्याप्त पैसा देती हैं ताकि वे सोमवार को तरोताजा होकर उनकी सेवा में जुटें। ज़ाहिर है इन युवाओं को पैसा खर्च करना ही है। जिस देश में रंगमंच और प्रदर्शनकारी कलाएं दम तोड़ रही हों वह उनके सामने मनोरंजन का एकमात्र माध्यम और विकल्प सिर्फ सिनेमा है। और अगर केवल वही है तो फिर दर्शक कहाँ जायेंगे?

गौरतलब है पहले हर शहर में राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र या उनके दौर के दूसरे बड़े अभिनेताओं की फ़िल्में साथ साथ चला करती थीं और दर्शकों के सामने चुनाव का विकल्प होता था। किसी अभिनेता या निर्माता को एकाधिपत्य से अधिक अपनी फिल्म की अपीलिंग कैपेसिटी पर भरोसा था लेकिन अब मामला एकदम बदल गया है। अब कभी भी एक साथ अजय देवगन या सलमान खान या अक्षय कुमार या शाहरूख खान की फ़िल्में नहीं रिलीज होती है। सबके बीच चाहे जितनी प्रतियोगिता दिखाई पड़े लेकिन व्यवसाय के मामले में एक अलिखित समझौता है। अभी तुम लूटो बाद में मैं लूटूंगा। सारा कारोबार ऐसे लोगों के हाथ में सिमट गया है जो सिनेमा का मतलब सिर्फ और सिर्फ मुनाफा समझते हैं। विषय, ट्रीटमेंट और सबकुछ इसी मुनाफे के तहत है। इन सबका सबसे बुरा असर अच्छी और छोटे बजट की उन अच्छी फिल्मों पर पड़ा है जो बनने के बाद भी रिलीज तक पहुँचने में अपनी उम्र का बड़ा हिस्सा डिब्बे में ही बिताने पर मजबूर होती हैं।

फिल्म पीके

अब इस तंत्र के द्वारा निर्मित सिनेमा की भी पड़ताल की जानी चाहिए। इधर बीच क्या बन रहा है इसे समझे बिना यह नहीं समझा जा सकता कि आज के दौर का संकट क्या है? हाल ही में सबसे ज्यादा रेवेन्यु बटोरने वाली फिल्म राजकुमार हिरानी द्वारा निर्देशित और आमिर खान अभिनीत फिल्म पीके ने जो धमाल मचाया वह अभूतपूर्व था। पीके अपने नाम से ही एक रहस्य पैदा करती है कि आखिर यह किस व्यक्ति के नाम का संक्षिप्त रूप है? इसके बाद आया उसका वह पोस्टर जिसने बिना हर्रे-फिटकरी के ही पी के को भारी लोकप्रियता प्रदान कर दी। असल में पीके मतलब पिए हुए एक फिल्म से ज्यादा एक लतीफा लगती है जो दर्शक के दिमाग को झकझोरती नहीं बल्कि गुदगुदाती है। यह  फिल्म लोकप्रियता का एक मानक बन जाती है। अगर यह झकझोरती तो शायद लोग दोबारा न देखते लेकिन चूँकि यह गुदगुदाती है इसलिए दर्शक इसे एंज्वाय करने बार-बार जाता है। इस फिल्म की एक और खासियत यह है कि यह बहुदेववाद का मज़ाक उड़ाती है। बहुदेववाद का सबसे बड़ा हथियार लोगों की मासूमियत है। भोली-भाली जनता को बरगला कर, उनकी लौकिक परेशानियों के अलौकिक हल दिखलाकर उनकी कमाई को ऐंठना ही बहुदेववाद का चरम लक्ष्य है। यह फिल्म भोलेपन को ही इसका मज़ाक उड़ाने का हथियार बना देती है। एक एलियन जो किसी और गोले से इस गोले पर छूट गया है और जिसे यहाँ कि भाषा नहीं आती। वह यहाँ के धार्मिक स्वरूप से परिचित नहीं है। वह अपनी चीज अर्थात रिमोट को ढूंढ रहा है जिसे एक स्वामी ने शिवजी के डमरू के टूटे हुए मनके के रूप में अपने प्रभाव और कमाई का जरिया बना लिया है।  असल में यह फिल्म उस दौर में सामने आई जब आसाराम, निर्मल बाबा जैसे न जाने कितने हज़ार बाबाओं और चमत्कारी साधुओ के उभार से सारा देश बजबजा चुका है। लोगों के सामने इनके कृत्य-कुकृत्य की अनेक कहानियां फैली हुई हैं।  उनको बड़े-बड़े लोगों की श्रद्धा और समर्थन मिला हुआ है। यह फिल्म ऐसे लोगों के झूठ को आईना दिखाती है।

हिंदी जितना मुनाफा अंग्रेजी में सम्भव ही नहीं है। विज्ञापनों का जो संजाल भारत में अपने सम्पूर्ण प्रभाव के साथ मौजूद है वैसा दुनिया के किसी और देश में दुर्लभ है। और मजे की बात है कि इसका सबसे बड़ा माध्यम और उपभोक्ता हिंदी है। भले ही इनमें काम करने वाले कान्वेंट शिक्षित लोग रोमन में लिखी हिंदी समझते हों लेकिन जो कुछ वे प्रोड्यूस करते हैं उसमें उनकी अंग्रेजी बाहर की चीज है। इस हिंदी में बोलियों की छौंक लगाई जाती है

आमिर खान का स्टारडम और एलियन के रूप में बोली जा रही उसकी भोजपुरिया हिंदी इस फिल्म को अधिक देशज बना देती है। इस हिंदी के कई अर्थ हैं। एक तो यह बहुत जीवंत है और बनावटी हिंदी के मुकाबले इसका सम्प्रेषण बहुत बढ़ जाता है।  इसी कारण वह औपचारिक और संस्कृतनिष्ठ हिंदी के सामने कई असुविधाएं खड़ी कर देती है जिनका निस्तारण करना उस हिंदी के सामने अपना मुलम्मा उतरने के खतरे को बढ़ा देता है। उदाहरण के लिए पीके स्वामी की सभा में शिव का स्वांग करने वाले अभिनेता का पीछा करते हुए पहुँचता है। प्रवचन चल रहा है। श्रोता एकाग्रचित्त सुन रहे हैं।  शिवजी के डमरू का टूटा हुआ मनका जैसे ही दिखाया जाता है वैसे ही पीके बम बम भोले बम बम भोले कहता हुआ स्वामी के पास चला जाता है और कहता है हमरा समान की डिलीवरी ऊ इहाँ कर दिए गलती से। हमार समान हमके वापस कर दो।  स्वामी के सामने विकट स्थिति पैदा हो जाती है। अब भेद खुलने वाला है। तुरंत ही उसके चेले प्रवचन की जगह भजन चालू कर देते हैं और कहते हैं कि स्वामीजी की मौन साधना का समय हो गया है। पीके में इस्तेमाल की गई भाषा फिल्म के बहाने कई बातों की तरफ ध्यान खींचती है। यह फिल्म बताती है कि अभी भी उत्तर प्रदेश और बिहार की भाषा अपना प्रभामंडल बना सकती है। दिलीप कुमार ने गंगा जमुना में यह भाषा बोली थी और फिल्म की सफलता आज भी एक मिथक है। अपने पूरे फ़िल्मी कैरियर में दिलीप कुमार कभी कौन का इस्तेमाल नहीं करते, वे हमेशा कउन का ही प्रयोग करते रहे। कउन है,  कउन बोलता है आदि। यह शब्द पंजाब का तो नहीं है जहाँ से वे आते हैं लेकिन इसकी ताकत को उन्होंने पहचान लिया था। अमिताभ बच्चन ने जिन फिल्मों में भोजपुरी मिश्रित भाषा का इस्तेमाल किया उनकी सफलता को भी लोग भूले नहीं है। एक तरह से यह भाषा तत्सम समाज-व्यवस्था और औपचारिकता के बीच एक सेंध बना देती है।  यह बोलने वाला साहबी लोगों के बीच बैठा एक भदेस मालूम होता है। वह तुरंत कुतूहल और हंसी का पात्र बन जाता है और सामान्य दर्शक की सहानुभूति उसे मिलने लगती है। वह भाषायी घटाटोप का किला ढहा कर सबको समतल बना देता है।

एक और अर्थ में यह कि बीमारू प्रदेश के रूप में चिन्हित किये जाने वाले हिंदी के इन भाषा-क्षेत्रों के लोगों में इतना अधिक हीनताबोध है कि जैसे ही सिनेमा जैसा सशक्त माध्यम उनकी भाषा-भंगिमा में कोई बात कहता है तो यहाँ के लोग गर्व से भरकर उसे हाथोंहाथ उठा लेते हैं। यह भी गौर करने की बात है कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यहाँ के लोगों का सबसे अधिक पलायन और आवागमन हुआ है। माटी के प्रति हुड़क होना स्वाभाविक है। लेकिन सबसे बड़ी बात है उत्तर भारत में बहुदेववाद की जकड़बंदी। अगर सर्वे किया जाय तो सबसे अधिक देवता उत्तर प्रदेश और बिहार में ही मिलेंगे।  उनके मिथक और किस्से मिलेंगे। यह सब बताता है कि भोजपुरी मानस किन संघर्षों से दो-चार है। सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर होनेवाली बेचैनी और फिर शरण्य खोजते हुए एक नए देवता या धर्मगुरु के चरणों तक पहुँचने की इनकी मजबूरी एक विशिष्ट अध्ययन की मांग करती है। धर्म गुरुओं द्वारा बोली जानेवाली भाषा का जादू सर पर चढ़कर बोलता है नतीजतन कोई भी धर्मगुरु करोड़ों  और अरबों के नीचे तो सोच भी नहीं सकता।

फिल्म गंगा जमुना का एक दृश्य

आज अंग्रेजी के मुकाबले हिंदी को रोजगारहीन भाषा माना जाता है लेकिन देखा जाय तो हिंदी ने हवा में रोजगार पैदा कर दिया है।  पूरी की पूरी धर्म और बाबा इंडस्ट्री हिंदी के हवाई रोजगार का दुनिया में सबसे विलक्षण उदाहरण है।  यह इंडस्ट्री इस भाषा की ताकत का अंदाजा कराती है। हजारों करोड़ सालाना के टर्नओवर वाले इस कारोबार का केवल यह एक हिस्सा भर है।  दूसरा हिस्सा फिल्म और टेलीविजन इंडस्ट्री है जहाँ दुर्भाग्य से अब देवनागरी में हिंदी लिखने वाले लगातार कम होते जा रहे हैं। इसके बावजूद हिंदी मुनाफाखोरों की भाषा बनती गई है। हिंदी जितना मुनाफा अंग्रेजी में सम्भव ही नहीं है।  विज्ञापनों का जो संजाल भारत में अपने सम्पूर्ण प्रभाव के साथ मौजूद है वैसा दुनिया के किसी और देश में दुर्लभ है। और मजे की बात है कि इसका सबसे बड़ा माध्यम और उपभोक्ता हिंदी है। भले ही इनमें काम करने वाले कान्वेंट शिक्षित लोग रोमन में लिखी हिंदी समझते हों लेकिन जो कुछ वे प्रोड्यूस करते हैं उसमें उनकी अंग्रेजी बाहर की चीज है। इस हिंदी में बोलियों की छौंक लगाई जाती है और यह एकल परिवार की निजी ज़रूरतों से लेकर संयुक्त परिवार की सामूहिक जरूरत तक सबकुछ बड़े प्रेम से आपको परोस दिया जाता है।

अगर कभी गौर कीजिये तो आप पाएंगे कि विज्ञापन सुबह आपके उठने से लेकर रात में सोने तक प्रयोग होनेवाली सारी सामग्री को आपके ज़ेहन ठूंसता रहता है। अगर आपके पास खर्च करने के लिए पैसा है तो सबकुछ का मज़ा लीजिये और ज़िन्दगी गुजार दीजिये।  पीके ऐसे ही दौर में आई एक फिल्म है जो थोपी गई दिमागदारी और उससे पैदा हुए खालीपन की कालिमा को अपने फुहारों से धोने की कोशिश करती है। वह आम इन्सान के भीतर पैठे हुए अंध श्रद्धा और विश्वास को भोलेपन के तर्क के साथ खरोंचने की कोशिश करती है। वह उपभोक्तावाद को उपभोक्तावादी हथियार से ही पटखनी देने की कोशिश करती है। पीके अपना रिमोट पाने के लिए मंदिर-मंदिर चढ़ावा चढ़ाता है। दंडवत करता है लेकिन जब काम नहीं बनता तब अपना पैसा वापस भी ले लेता है।  भक्तों के क्रोध से बचने के लिए अपने गालों पर स्टीकर चिपका लेता है।  एक तरह से पीके दर्शकों की उपभोक्ता-अदालत में की गई एक अपील है कि मंदिरों में मौजूद निर्माता और दुकानदार ईमानदार और अपने पेशे के प्रति सच्चे और नैतिक नहीं हैं। वे दाम तो लेते हैं लेकिन काम नहीं करते। प्रकारांतर से यह भारत की नस-नस में जड़ जमा चुके भ्रष्टाचार और गैर जिम्मेदारी पर किया गया मज़ाक है।

फिल्म जनता से जुड़े जेनुइन मुद्दों को विकृत करके मनोरंजन करने का एक घटिया नमूना भर है। इसके निहितार्थ भी सही नहीं हैं और टारगेट तो बिलकुल ही सही नहीं हैं। यह बड़े खिलाड़ियों की बजाय ऐसे छोटे गुर्गों को अपना निशाना बनाती है। यह पूँजी और तंत्र के अपवित्र और षड्यंत्रकारी गंठजोड़ पर फोकस नहीं करती बल्कि अपने को विश्वसनीय बनाने के लिए सबकुछ को निष्क्रिय बनाकर पेश करती है। इसलिए यहाँ कोई प्रतिरोध नहीं है।

अगर थोडा गहरे विश्लेषण में जाया जाए तो फिल्म पीके कई मायने में नए दौर के सिनेमा को एक नया व्याकरण देती प्रतीत होती है। यह इस बात का संकेत देती है कि सिनेमा को बड़े और गंभीर मुद्दों को उठाना चाहिए और बड़ी स्टारकास्ट के साथ ही जेनुइनली उन विषयों पर बात की जानी चाहिए जो हमारी सोच पर जाले की तरह जमे हुए हैं। पीके में फिल्म के हिसाब से कई तरह के झोल हैं। मेकिंग में यह एक हास्य-कार्यक्रम की प्रस्तुति का बोध कराती है और यथार्थ के साथ उसका तालमेल ढेरों स्थलों पर बेहद अतार्किक है। यह एक क्रियेटेड कॉमेडी है और सहजता से इसका विकास नहीं होता लेकिन दो चीजें ऐसी हैं जिनपर ध्यान दिया जाना चाहिए। एक तो यह कि यह धर्म और साम्प्रदायिकता जैसे संवेदनशील मुद्दे से पैदा होने वाली नासमझी और भीड़तंत्र के आधारभूत तत्वों की प्रचुरता को रेखांकित करते हुए इस बात को सामने ले आती है कि भले ही साम्प्रदायिकता और धर्म अब मुट्ठी भर लोगों का हथियार हो जिनके सहारे वे अपना उल्लू सीधा करते हों लेकिन इनकी जकडबंदी आम आदमी पर सबसे अधिक है। अभी भी विज्ञान और अंधविश्वास एक साथ रह सकते हैं।  विज्ञान से सभी साधन पाए जा सकते हैं लेकिन अन्धविश्वास का खुद और दूसरे को भी बहुत जायज़ तरीके से शिकार बना और बनाया जा सकता है। जो सबसे बड़ी बात यह फिल्म स्थापित करती है वह है तमाम मंदिरों और ढोंगी बाबाओं, देवस्थानों का निषेध करके ईश्वर की सर्वसत्ता को मज़बूत करना। यानी छोटे-छोटे अंधविश्वासों के चंगुल से निकालकर ईश्वरवाद की बड़ी गुफा में दर्शक को ले जाना। यानी छोटी-छोटी अंध-मान्यताओं और अंध-विश्वासों को खत्म करने के लिए बड़ी अंधमान्यता का हथियार जरूरी है लेकिन इसके बाद अंत में बचती वही अंध-मान्यता ही है। पशुओं को छोटे बाड़े से निकालकर बड़े बाड़े में बांध दिया गया।

एक तरह से यह फिल्म उस विज्ञान का निषेध है जो एलियन लोगों के गोले पर सहज है।  यह भारतीय संविधान और उसकी सार्वजनिक संस्थाओं पर, भारत में विकसित होने वाली आधुनिकता की परंपरा और वैज्ञानिक प्रगति के उलट एक आध्यात्मिक सत्ता का वकालत करती है। यह उस सच को सही साबित करती है कि हर भारतीय के भीतर एक ऐसा डर है जो कभी नहीं ख़त्म होता। हर भारतीय अपने भीतर की नैतिक कायरता और अमूर्त भय से बचाव के लिए एक अमूर्त सत्ता की स्थापना कर लेता है।  पीके इस सत्ता को और मज़बूत कर देती है। और इस तरह विज्ञान और टेक्नोलाजी के सहारे एक विज्ञानविरोधी समझ का विस्तार करती है। बड़ा प्रोडक्शन हाउस और स्टारकास्ट होने के कारण इसे देश भर में छः हज़ार थियेटर मिले और इसने रुपयों की झमाझम बारिश की।

इस दौर में सिनेमा के बड़े खिलाड़ी किस तरह अराजक और डरपोक हो चुके हैं यह कुछ वर्ष पहले आई धर्मा प्रोडक्शन की फिल्म ऊँगली देखकर पता चलता है। यह सिनेमा और पुलिस तंत्र के अपवित्र गंठजोड़ का एक लिजलिजा प्रयास भर है।  अपने एक साथी के कोमा में चले जाने के बाद कुछ लोग एक ऊँगली गैंग बनाते हैं। वह कमजोर और सताए हुए लोगों के पक्ष में भ्रष्ट और रिश्वतखोर अधिकारियों और कर्मचारियों को रात के अँधेरे में सबक सिखाते हैं। किसी के गले में बम बांधकर दौड़ा देते हैं तो किसी ऑटो चालक को मालगाड़ी के डिब्बे में बंद कर दिल्ली भेज देते हैं। मुंबई पुलिस इन लोगों से परेशान है जबकि वह स्वयं इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि जब नोट गिना जाता है तो भ्रष्टाचार की कमाई पर लगा केमिकल हरेक पुलिसकर्मी/अफसर की जीभ काली कर देता है। सिवा एक के, जिसे फिल्म के अंत में कमिश्नर बना दिया जाता है।

फिल्म ऊँगली

यह फिल्म जनता से जुड़े जेनुइन मुद्दों को विकृत करके मनोरंजन करने का एक घटिया नमूना भर है। इसके निहितार्थ भी सही नहीं हैं और टारगेट तो बिलकुल ही सही नहीं हैं। यह बड़े खिलाड़ियों की बजाय ऐसे छोटे गुर्गों को अपना निशाना बनाती है। यह पूँजी और तंत्र के अपवित्र और षड्यंत्रकारी गंठजोड़ पर फोकस नहीं करती बल्कि अपने को विश्वसनीय बनाने के लिए सबकुछ को निष्क्रिय बनाकर पेश करती है। इसलिए यहाँ कोई प्रतिरोध नहीं है। ऊँगली गैंग की कारगुजारियां निहायत बचकानी और फूहड़ हैं और सारी सदाशयता के बावजूद किसी तरह से लोगों में उठ खड़ा होने की प्रेरणा नहीं पैदा करते बल्कि लिजलिजी भावुकता और पंगु मानवीयता को बढ़ावा देते हैं। हर चीज अतार्किक है। फ़िल्मकार का कुल उद्देश्य है मध्यवर्ग के प्रति श्रमजीवी वर्ग की आज्ञाकारिता को बढ़ावा देना। अगर वह इंकार करता है तो उसे इसका हक़ नहीं है। मुझे नहीं लगता कि मुंबई के ऑटो वाले कम दूरी के नाम पर जाने से इंकार करते होंगे क्योंकि वे मीटर से ही चलते हैं और उससे अधिक पैसा लेना उनके लिए नाजायज है और अपवाद स्वरुप ही कोई ऑटोवाला ऐसा करता होगा। लेकिन फ़िल्मकार महोदय को मुंबई में भ्रष्टाचार दिखाना ही था इसलिए उन्हें ऑटोवाले से अधिक आसन शिकार कोई और मिला ही नहीं। बेचारे का मुंह बांधा और मालगाड़ी का दरवाजा बंद कर दिया। जाओ दिल्ली।

सबसे हास्यास्पद है कि मुंबई में मालगाड़ी कहाँ चलती है इसके प्रति निर्देशक का अज्ञान। माना कि फ़िल्में झूठ पर आधारित सच होती हैं लेकिन इतना बड़ा झूठ क्या कि नायक रहता अँधेरी में है और ऑटो वाले को बन्दूक के बल पर वसई रोड या दिवा जैसी जगह पर ले गया होगा जो कमोबेश 30 से 40 किलोमीटर दूर हैं। चैनल में कोई खबर नहीं है। यह रेटारिक बहुत पुराना है। बेचारी रिपोर्टर खबर की कीमत पर प्रेम नहीं करती और जब उसे ऊँगली गैंग की सनसनीखेज खबर मिलती है तब समझ जाती है कि किसने दिया होगा। ऐसा ही दिमागी दिवालियापन रजनीकांत की बहुचर्चित लेकिन फ्लॉप फिल्म लिंगा भी लेकर आती है जिसका काल पचास का दशक है लेकिन वहां किसान आत्महत्या करते हैं क्योंकि नदी पर बाँध नहीं है। यह बहुत बड़ा तथ्य है कि किसान आत्महत्याएं भूमंडलीकरण के बाद की परिघटना है जब बहुराष्ट्रीय खाद-बीज कंपनियों ने कपास आदि नकदी फसलें उगानेवाले किसानों को अपनी शर्तों पर कर्ज देना और फसल नष्ट होने पर उन्हें घेरकर मरने पर मजबूर करना शुरू किया। कुछ वर्ष पहले आई आमिर खान निर्मित पीपली लाइव भी किसान आत्महत्याओं का मज़ाक बनाकर चर्चा पा चुकी है।

फिल्म लिंगा में रजनीकांत

हिंदी सिनेमा का दुर्भाग्य है कि वह ऐसे लोगों के हाथों की कठपुतली हो गया है जो नहीं जानते कि इस देश का मन मिजाज़ क्या है और उन्हें किस तरह के सांस्कृतिक उत्पादों की ज़रुरत है। वे हर चीज को मुनाफे में बदल देने को प्रतिबद्ध हैं। यहाँ तक कि मूर्खता , जड़ता, अकर्मण्यता, भ्रष्टाचार से लेकर नैतिकता और संवेदना तक सब कुछ और इसके लिए कितना भी विकृत और भ्रष्ट तरीका अख्तियार करना पड़े वे अपनाने के लिए तैयार बैठे हैं। क्योंकि उनके हाथ में पैसा है और पैसे से स्टार है और स्टार से रिलीज और थियेटर है। इसी कारण यहाँ किक और दबंग जैसी फ़िल्में बनती और सफल होती हैं लेकिन लॉरेंस ऑफ़ अरबिया या अवतार या टायटेनिक बनाना यहाँ के तन्त्र-चतुर निर्माता-निर्देशकों के लिए असाध्य वीणा साधना है।

फिल्म लॉरेंस ऑफ़ अरबिया का दृश्य

नए दौर में सबसे दुखद बात यह है कि सूचना के साधनों की बहुतायत के बावजूद सूचना के प्रति रवैया बहुत दयनीय है।  शोध की इच्छाशक्ति तो बिलकुल ही नहीं है लिहाज़ा सारा खेल एक झूठी अवधारणा के समानांतर दूसरी झूठी अवधारणा की स्थापना करना भर है। सब कुछ एक पल्प या लुगदी में बदल रहा है। जाहिर है यह संवेदनाओं का लुग्दीकरण हैं जिसमें आज के दौर का सिनेमा बहुत बढ़-चढ़कर भूमिका निभा रहा है। लेकिन चाहे यह कितना भी चमकदार हो यह खुद भी लुगदी की तरह अंततः जायेगा कूड़े के ढेर पर ही!

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