संस्थानों में जातीय भेदभाव लगातार बढ़ रहा है

स्वदेश कुमार सिन्हा

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एक समय था, जब हमारे देश में डॉक्टर को भगवान का स्वरूप माना जाता था और डॉक्टर जाति-धर्म‌ से ऊपर होता है, परन्तु नज़दीक से देखने पर यह अवधारणा गलत-सी प्रतीत होती है। दुनिया में अनोखी जाति प्रथा, ‘उसके आधार पर हम और वे’ एवं ऊँच-नीच‌ की भावना की मौजूदगी को आज भी देखते हुए यह धारणा सही सिद्ध होती है कि अन्य सभी संस्थाओं की तरह चिकित्सा क्षेत्र भी भयानक जाति व्यवस्था से ग्रस्त है।‌ गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में छात्रों के बीच काम करते हुए ये बातें मैंने बहुत नज़दीक से देखी हैं। उन दिनों मेडिकल कॉलेज में हमारे जूनियर डॉक्टरों के संगठन में ज्यादातर पिछड़े और दलित वर्ग के ही डॉक्टर थे। कई बार धरना-प्रदर्शन‌ करते हुए अन्य सामान्य छात्र‌ उन्हें घृणा से आरक्षण वाले चमारों का संगठन कहते थे। उन्हीं दिनों एक दलित छात्र ने आत्महत्या भी कर ली थी, लेकिन इस मामले को मेडिकल प्रशासन ने यह कह कर दबा दिया कि वह छात्र नशा करने का आदी थी और अधिक डोज लेने के कारण उसकी ‌मृत्यु हो गई। इस मामले का सत्य जानने वाले अनेक छात्रों को यह कहकर चुप करा दिया गया कि उन्हें परीक्षा में फेल कर दिया जाएगा। ऐसी घटनाएँ आजकल देश भर के मेडिकल कॉलेज में आम हैं, लेकिन इनमें से कुछ ही सामने आती हैं। इस मामले में अभी हाल में देश के सबसे अग्रणी कहे जाने वाले चिकित्सा संस्थान एम्स दिल्ली (अखिल भारतीय चिकित्सा संस्थान) के बारे में एक संसदीय कमेटी की रिपोर्ट आँख खोलने वाली है। सांसद किरीट प्रेमजी भाई सोलंकी के नेतृत्व में बनी एक संसदीय कमेटी की हाल की रिपोर्ट है, जो विशिष्ट संस्थानों में जातिगत भेदभाव के आरोपों की जाँच करती है, उसकी एक ताज़ा रिपोर्ट में एम्स की कार्यप्रणाली और वहाँ आज भी पिछड़े, अनुसूचित जाति / जनजाति के प्रोफेसरों और छात्रों के साथ अलग-अलग जारी भेदभाव की तीखी आलोचना की गई है। कमेटी का कहना है; उसने पाया है कि इस श्रेणी के विद्यार्थियों को परीक्षाओं में बार-बार फेल किया जाता है। इतना ही नहीं जब अध्यापकों की भर्ती का सवाल आता है तो आरक्षित सीटें इस तर्क के आधार पर छोड़ दी जाती हैं कि उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मिले, जबकि कई बार यह भी पाया जाता है कि इन स्थानों पर पहले ही तदर्थ श्रेणी में इन वंचित तबकों के डॉक्टर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। उसने अपनी रिपोर्ट में पाया कि संस्थान में मौजूद 1,111 पदों में से असिस्टेंट प्रोफेसरों के 275 पद और प्रोफेसर श्रेणी के 92 पद खाली हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगर दिल्ली स्थित एम्स की तरह देश के अलग-अलग हिस्सों में बनी एम्स को देखें, तो हमें यह पता लगता है कि वहाँ अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों के लिए आरक्षित 15 फीसदी तथा 7.5 फीसदी सीटें पूरी तरह कभी भर नहीं पातीं। वास्तविकता यह है कि इनमें प्रवेश लेने वाले छात्रों को किसी न किसी आधार पर छाँट दिया जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक सामाजिक तौर पर उत्पीड़ित तबकों के छात्रों को सुपरस्पेशलिटी पाठ्यक्रमों में प्रवेश नहीं मिल पाता क्योंकि उनमें आरक्षण नहीं रखा गया है, इसका नतीज़ा यह है कि ऐसे पाठ्यक्रमों में ऊँची जातियों का दबदबा बना रहता है।

जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव भारतीय समाज के रग-रग और शिराओं में भरा हुआ है। यह आधुनिकता की तमाम परियोजनाओं को ख़ारिज़ करता है।‌ जब तक भारतीय समाज में उच्च जाति के प्रगतिशील तबके के लोग सभी बहुजन समाज के लोगों के साथ मिलकर इसके खिलाफ़ डटकर खड़े नहीं होंगे,तब तक यह नासूर बनकर समाज को असहनीय पीड़ा देता रहेगा।

इस रिपोर्ट में एम्स की कार्यप्रणाली को लेकर एक महत्वपूर्ण बात यह भी कही गई है कि जहाँ तक थ्योरी तथा प्रैक्टिकल पेपर का सवाल है, वहाँ‌ इन तबकों के छात्रों ने थ्योरी के पेपर में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया, यहाँ उन्हें अपने आप से लिखना होता है।‌ प्रैक्टिकल्स पेपर्स में जहाँ उनका सामना प्रोफेसरों से पड़ता है, वहाँ‌ उन्हें बहुत कम नम्बर मिले। कमेटी के मुताबिक यह अनुसूचित जाति / जनजाति छात्रों के साथ सीधे-सीधे पूर्वाग्रह का मामला है।

आरक्षित तबकों के छात्रों के साथ ज़ारी भेदभाव को रेखांकित करते हुए कमेटी ने यह सिफारिश भी की, कि छात्रों का मूल्यांकन उनके नाम को गुप्त रखकर किया जाए, इतना ही नहीं फैकल्टी के पदों पर अनुसूचित जाति और जनजाति के उम्मीदवारों की नियुक्ति को समय सीमा में तय कर लिया जाए तथा संस्थान की जनरल‌ बॉडी में भी ‌अनुसूचित तबकों के सदस्यों को शामिल किया जाए। सफाई कर्मचारी, ड्राइवर क्षेत्रों के कामों को आउटसोर्स न किया जाए।

संसद के तीस‌‌ सदस्यीय पैनल द्वारा तैयार की गई यह रिपोर्ट जो उच्च शिक्षा संस्थानों में आज भी कायम संस्थागत भेदभाव की एक और निशानी है। यह रिपोर्ट एम्स के संचालकों या वे सभी जो स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय का काम संभाल रहे हैं, उनको‌ इसकी कार्यप्रणाली में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव लाने के लिए प्रेरित करेगी या नहीं? यह अभी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है, यद्यपि इस संबंध में अतीत के अनुभव बहुत निराशाजनक हैं। अगर हम इस पैनल के अवलोकनों और सिफारिशों पर गौर करें तो हमें करीब डेढ़ दशक से पहले संस्थान की कार्यप्रणाली को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर हुए हंगामों को याद करेना होगा, जब संस्थान के अंदर अनुसूचित जाति / जनजाति के छात्रों के साथ हो रही भेदभाव की घटनाओं पर अनुसूचित जाति राष्ट्रीय आयोग को दखल देना पड़ा था और इस मामले की जाँच के लिए प्रोफेसर सुखदेव थोरात के नेतृत्व में एक कमेटी का गठन किया गया था।

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उन दिनों संस्थान के अंदर की स्थितियों पर एक अंग्रेजी अख़बार टेलीग्राफ (5 जुलाई 2006) में छपी रिपोर्ट में हम देख सकते हैं। किस तरह एम्स छात्रावास के कुछ क्षेत्र अनुसूचित जाति/ जनजाति के छात्रों के लिए अभिशाप बन गए थे। आरक्षित तबकों के छात्रों ने बताया कि ऊँची जाति के छात्रों द्वारा उन्हें बाकी बचे कमरों से खदेड़ा जा रहा है और उन्हें दो मंजिलों तक ही सीमित किया जा रहा है। अख़बार के संवाददाता ने एक अनुसूचित जाति के छात्र के कमरे के दरवाज़े पर कुछ लिखा देखा, जिसमें उसे चेतावनी दी गई थी कि छात्रावास के इस विंग से भाग जाओ।‌ अनुसूचित तबकों के इन‌ छात्रों ने संवाददाता को यह भी बताया कि अगर उन्होंने इस भेदभाव के खिलाफ़ शिकायत की, तो उन्हें फेल कर दिया जाएगा। प्रोफेसर थोरात की अगुवाई में बनी इस कमेटी ने छात्रों की बात बिलकुल सत्य पाई तथा सुधार के लिए कुछ महत्वपूर्ण सिफारिशें भी कीं, जिसे एम्स के प्रशासन ने अमल करने योग्य नहीं माना। कमेटी की इस सिफारिश के बावजूद संस्थान के निदेशक पी. वेणु गोपाल के खिलाफ़ अनुसूचित जाति / जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत कार्यवाही होनी चाहिए, परन्तु संस्थान ने इन सिफारिशों को यह कहकर ख़ारिज़ कर दिया कि अब संस्थान के अंदर छात्रों के बीच सौहार्दपूर्ण वातावरण बनगया है।

क्या एम्स की ये घटनाएँ अपवाद मानी जा सकती हैं ?

2006 में जब एम्स की घटनाएँ सुर्ख़ियों में थीं,तब उससे कुछ समय पहले दिल्ली के ही गुरु तेग बहादुर अस्पताल में अनुसूचित जाति तथा गैर अनुसूचित जाति के छात्रों के बीच चले तीखे विवाद का मसला अख़बारों की सुर्ख़ियाँ‌ बना था, तब यह देखा गया था कि इन वंचित तबकों के छात्रों के साथ जातिगत भेदभाव तो होता ही है, साथ ही साझा मेस में इन तबकों के लिए अलग मेज-कुर्सियाँ भी रखी जाती हैं। इस संबंध में शहर के अन्य जनतांत्रिक संगठनों के साथ मिलकर अनुसूचित जाति के छात्र को लम्बा संघर्ष करना पड़ा था।‌ विडम्बना यह है कि प्रशासन के एक हिस्से से भी इन उच्च जाति के छात्रों को संरक्षण मिल रहा था। जिन दिनों प्रोफेसर सुखदेव थोरात कमेटी की रिपोर्ट को एम्स प्रशासन द्वारा स्वीकार न करने की बात आ रही थी, उससे कुछ समय पहले ही केन्द्र सरकार के अधीन संचालित एवं दिल्ली में स्थित वर्धमान मेडिकल कॉलेज में पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित तबकों के छात्रों के साथ जारी भेदभाव पर संयुक्त समिति की रिपोर्ट में इसकी पुष्टि हुई थी (भास्कर 14 फरवरी 2011, बीएमएमसी में पिछड़े वर्ग….) जिसमें बताया गया था कि किस तरह फिजियोलॉजी विभाग में पिछड़े वर्ग के छात्रों को जानबूझकर कम अंक प्रदान किए गए। छात्रों की शिकायत पर एम्सऔर एलएनजेपी के विशेषज्ञों की कमेटी डॉ० एल आर मुरमु की‌ अध्यक्षता में बनाई गई। कमेटी ने पाया कि पिछले पाँच‌ साल में उस विभाग में फेल होने वाले सभी छात्र पिछड़े वर्ग से हैं। कमेटी रिपोर्ट के अनुसार एक छात्रा को एक अंक से एक-दो बार नहीं बल्कि तीन बार फेल किया गया है। इन‌ पिछड़े और अनुसूचित तबके के जिन छात्रों को फेल‌ किया गया, उन्होंने अन्य विभागों की परीक्षा में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया था तथा मेडिकल प्रवेश परीक्षा में भी उन्हें उच्च स्थान मिला था। इस रिपोर्ट के एक साल बाद मुम्बई विश्वविद्यालय के भूतपूर्व कुलपति प्रोफेसर भालचंद मुड़गेकर की जाँच में इन आरोपों को बिलकुल सही पाया और इस संबंध में कुछ महत्वपूर्ण सिफारिशें भी कहीं। अपनी रिपोर्ट में उन्होंने जाति के आधार पर भेदभाव करने के लिए अधिकारियों और प्रबंधन की आलोचनाओं की, साथ में यह भी कहा कि ऐसे लोगों के खिलाफ़ अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमे चलाए जाने चाहिए तथा प्रबंधन की भेदभावपूर्ण नीतियों के कारण जिन छात्रों को नुकसानउठाना पड़ा है, उन छात्रों को दसदस लाख रूपए मुआवजा भी मिले।

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इन्हीं कारणों से कई बार यह देखने में आता है कि कई छात्र इस घुटन और भेदभाव को बर्दाश्त नहीं कर पाते और मौत को गले लगा लेते हैं। वर्ष 2010 में बालमुकुन्द भारती नामक मेडिकल छात्र ने आत्महत्या की, जो एम्स में पढ़ रहा था, अगले साल ही इसी संस्थान में अनिल मीणा ने मौत को गले लगा लिया। वर्ष 2019 में पायल तड़वी की आत्महत्या लम्बे समय तक सोशल मीडिया में छाई रही। उसकी आत्महत्या ने भी ऐसे ही सवालों को हमारे सामने प्रस्तुत किया था,जब उसे स्नातकोत्तर पढ़ाई के दौरान अपनी सहपाठियों के हाथों उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा था।

जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव भारतीय समाज के रग-रग और शिराओं में भरा हुआ है। यह आधुनिकता की तमाम परियोजनाओं को ख़ारिज़ करता है।‌ जब तक भारतीय समाज में उच्च जाति के प्रगतिशील तबके के लोग सभी बहुजन समाज के लोगों के साथ मिलकर इसके खिलाफ़ डटकर खड़े नहीं होंगे,तब तक यह नासूर बनकर समाज को असहनीय पीड़ा देता रहेगा।

 

 

 

 

स्वदेश कुमार सिन्हा स्वतंत्र लेखक हैं।

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