Wednesday, May 22, 2024
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धार्मिक सेक्टर में अवसरों का पुनर्वितरण बने चुनावी मुद्दा

आज हमारे देश के मंदिरों में अकूत संपत्ति पड़ी हुई। इस संपत्ति का भोग एक खास वर्ग ब्राम्हण ही कर रहा है। यदि धार्मिक सेक्टर में जितनी आबादी-उतना हक का सिद्धांत लागू हो जाता है तो मंदिरों के ट्रस्टी बोर्ड से लेकर पुजारियों की नियुक्ति में अब्राह्मणों का वर्चस्व हो जाएगा और वे मठों–मंदिरों की बेहिसाब संपदा के भोग का अवसर भी पा जाएंगे और आर्थिक रूप से मजबूत भी होंगे।

भारतीय लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण पर्व लोकसभा का चुनाव जारी है। जिस तरह मोदी अपना मानसिक संतुलन खोकर नफरती राजनीति का तांडव नृत्य कर रहे हैं, उसे देखते हुए अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक सत्ताधारी पार्टी की विदाई का मंच सज चुका है। अगर केचुआ (केन्द्रीय चुनाव आयोग) की सत्ताधारी पार्टी के प्रति कमजोरियों को दरकिनार कर दिया जाए तो चुनाव मोटामोटी शांतिपूर्ण हो रहा है। किन्तु पक्ष–विपक्ष के हमलों के बीच एक ऐसी घटना हो चुकी है, जिसे लेकर पूरा दलित-बहुजन समाज आहत है। जिस घटना से वंचित बहुजन समाज आहत है, वह कन्नौज की है, जिसके शिकार हुए हैं सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव। मीडिया में आई खबरों के मुताबिक सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव चुनाव प्रचार के दौरान इत्र नगरी कन्नौज के सिद्धपीठ बाबा गौरीशंकर मंदिर में दर्शन-पूजन के लिए गए थे। उन के मंदिर से लौटने के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं नें उस मंदिर को गंगाजल से धोया। इसका वीडियो भी वायरल हो गया, जिसके बाद देश भर में इसकी भर्त्सना शुरू हो गई।

इस घटना पर अखिलेश यादव ने कहा, ‘उन्होंने महाराणा प्रताप की मूर्ति को भी धोया था। ये भाजपा की पुरानी आदत है। इन्हीं लोगों नें मुख्यमंत्री आवास को भी धोया था, मगर हमें बुरा नहीं लगा। भाजपा वाले हमें अहसास कराते रहते हैं कि हम कहां खड़े हैं। मगर इससे पीडीए की लड़ाई मजबूत होगी और पीडीए विजयी होगा। जिस तरह इन्होंने मंदिर धोकर साफ किया है, उसी तरह पीडीए इनको चुनाव में साफ कर देगा।’ बहरहाल, संभव है पीडीए चुनाव में भाजपा को धो डाले, मगर इस घटना ने भारत के धार्मिक सेक्टर में दलित-बहुजनों की स्थिति का नए सिरे से अहसास करा दिया है; साबित कर दिया है कि सनातनियों की नजरों में शुद्रातिशूद्रों की हैसियत में कोई फर्क नहीं आया है। दलित-पिछड़े आज भी मंदिरों में धिक्कृत और बहिष्कृत हैं। आज भी दलित-बहुजनों को मदिरों में प्रवेश करने पर प्रताड़ित किया जाता है। कभी-कभी तो ऐसे दुस्साहस पर उनको गोलियों से उड़ा देने की घटनाएँ भी सामने आ जाती हैं। लेकिन ऐसा नहीं कि सिर्फ आम बहुजन बल्कि, लोकतंत्र में राजाओं सी हैसियत रखने वाले सांसद-विधायक तक भी मंदिरों पर काबिज लोगों का दुर्व्यवहार झेलने लिए अभिशप्त रहते हैं।

अंबेडकर से लेकर मुर्मू तक अपमानित

बहरहाल, 21 वीं सदी में अखिलेश यादव जैसे प्रमुख ओबीसी नेता के साथ कन्नौज के मंदिर में हुआ अपमानजनक आँख में अंगुली डाल कर बताता है कि संविधान द्वारा धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार दिए जाने के बादजूद हिन्दू समुदाय की बहुसंख्य वंचित जातियों के आम तो आम; विशिष्ट शख्सियतों के साथ भेदभाव पूर्ववत जारी है। चर्चों और मस्जिदों की भांति दलित वंचित जातियाँ सभी छोटे-बड़े मंदिरों में प्रवेश कर सर्वशक्तिमान ईश्वर की करुणा जय करने का उपक्रम चला सकें, इसके लिए वर्षों से बड़े-बड़े समाज सुधारक प्रयास करते रहे पर, कोई फर्क नहीं पड़ा। डॉ. आंबेडकर ने तो इसके लिए 1930 में बाकायदे मंदिर प्रवेश का आंदोलन तक चलाया किन्तु, हिन्दू धर्म के ठेकेदारों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा।

खुद आंबेडकर ब्रितानी सरकार में मंत्री रहते हुए जब वायसराय के साथ 1945 में पुरी मंदिर के दर्शन के लिए गए, तो उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया। बाबा साहब आंबेडकर के साथ हुई उस दुखद घटना के 73 सालों बाद जब 2018 में भारत के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द सपत्नी पुरी गए तो उनको भी वहां सेवारत पंडों के दुर्व्यवहार का सामाना करना पड़ा। ऐसा नहीं कि जाहिल पंडे-पुरोहित ही दलित बहुजनों की विशिष्ट शख्सियतों के साथ अपमानजनक सलूक करते हैं, हाल के वर्षों में हिन्दुत्ववादी सरकार के प्रधानमंत्री ने भी इसकी मिसाल कायम करते हुए न सिर्फ राम मंदिर के भूमि पूजन अनुष्ठान से दलित राष्ट्रपति कोविन्द को दूर रखा, बल्कि आदिवासी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को उसके प्राण- प्रतिष्ठा समारोह से दूर रखकर बता दिया कि दलित, आदिवासी, पिछड़ी जातियों की बड़ी से बड़ी शख्सियतों के लिए मंदिरों में प्रवेश के साथ धार्मिक अनुष्ठानों में शिरकत करने का कोई अधिकार नहीं है। सदियों की भांति आज भी धार्मिक सेक्टर से उनका बहिष्कार जारी है और आगे भी रहेगा, यदि कुछ विशेष उपक्रम नहीं चलाया गया तो। बहरहाल, धार्मिक सेक्टर में बहुजनों के बहिष्कार के दूरीकरण का उपक्रम चलाने के पहले सबसे जरूरी है यह जानना कि इस क्षेत्र से क्यों दलित बहुजन बहिष्कृत रहे हैं। इसका जवाब हिन्दू धर्म का प्राणाधार वर्ण-व्यवस्था के उस अर्थशास्त्र में छिपा है, जिसके तहत भारत समाज सदियों से परिचालित होता रहा है।

धार्मिक सेक्टर में बहुजन के तिरस्कार और बहिष्कार के लिए जिम्मेवार वर्ण-व्यवस्था

आर्यों द्वारा प्रवर्तित धर्माधारित वर्ण-व्यवस्था मूलतः शक्ति के स्रोतों-आर्थिक-राजनीतिक–शैक्षिक और धार्मिक- के बंटवारे की व्यवस्था रही। इसमें शक्ति के समस्त स्रोत बहुत ही सुपरिकल्पित रूप से चिरकाल के लिए सिर्फ कथित हिन्दू ईश्वर के उत्तम अंगों (मुख-बाहु-जंघे) से जन्मे  ब्राह्मण-क्षत्रिय और वैश्यों के लिए आरक्षित किए गए, जबकि उसी भगवान के जघन्य अंग पैर से जन्मे शुद्रातिशूद्रों को शक्ति के स्रोतों में एक कतरा भी नहीं दिया गया। इनके लिए वितरित हुई सिर्फ तीन उच्च वर्णों की सेवा, वह भी पारिश्रमिक रहित। वर्ण-व्यवस्था के इस वितरणवादी अर्थशास्त्र के कारण दैविक-सर्वस्वहारा में तब्दील दलित-पिछड़े और महिलाओं के लिए अध्ययन- अध्यापन, सैन्य-वृत्ति, व्यवसाय- वाणिज्यादि, राजनीतिक कर्म अधर्म व दंडनीय अपराध घोषित रहे। किन्तु सर्वाधिक अधर्म व दंडनीय घोषित रहीं धार्मिक गतिविधियां। सबसे बड़ी बात तो यह हुई की जीवन का चरम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति के लिए आध्यात्म का अनुशीलन इनके लिए पूरी तरह अधर्म व दंडनीय अपराध घोषित रहा । वहीं आधी आबादी के लिए मोक्ष संधान का निर्देश सिर्फ पति चरणों में ढूँढने के लिए दिया गया। मानव जाति के समग्र इतिहास में धरती की छाती पर ऐसा कोई समाज वजूद में नहीं आया, जिसमें शुद्रातिशूद्रों और महिलाओं से युक्त प्रायः 93 प्रतिशत आबादी को ही पूजा-पाठ से महरूम कर ईश्वर- कृपा लाभ से वंचित किया गया हो। इनमें सबसे शोचनीय स्थिति अछूतों की रही, जिनके लिए मंदिरों में घुस कर ईश्वर के समक्ष अपने दुख-मोचन के लिए पूजा–प्रार्थना करने का रत्ती भर भी अवसर नहीं रहा।

शक्ति के स्रोत के रूप में  धर्म की अहमियत

डॉ. आंबेडकर के शब्दों में धर्म भी शक्ति का स्रोत है, जिसकी अहमियत आर्थिक शक्ति से जरा भी कम नहीं है। ब्राह्मण ही पंडे- पुरोहित बनकर इसके समस्त सुफल का भोग करते रहे। उच्च वर्ण में शामिल क्षत्रिय और वैश्य मोक्ष के लिए पूजा-पाठ तो कर सकते थे, किन्तु ब्राह्मणों की तरह पंडे-पुरोहित (डिवाइन- ब्रोकर) बनकर गगन-स्पर्शी सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ मठ-मंदिरों की अकूत संपदा का भोग नहीं कर सकते थे। इस्लाम–ईसाई इत्यादि अन्य संगठित धर्मों में कोई भी पौरोहित्य का कोर्स करके मौलवी, फादर बन सकता था, पर हिन्दू धर्म में जन्मसूत्र से यह अधिकार सिर्फ ब्राह्मणों को मिला। अब्राह्मण पूरी तरह अनधिकृत रहे। ध्यान रहे पुरोहितों की स्थिति भक्त और भगवान के बीच मध्यस्थ/ दलाल की होती है। इसी स्थिति के कारण पूरी दुनिया में पंडे–पुरोहित, मौलवी और पादरियों की स्थिति ईश्वर–कृपा लाभ के आकांक्षी लोगों के लिए पूज्य हो गई। पौरोहित्य के एकाधिकार के कारण ही ब्राह्मण खुद को भूदेवता घोषित कर दिए और शुद्रातिशूद्र और महिलाएं ही नहीं, क्षत्रिय- वैश्य समुदायों में जन्मे –बड़े-बड़े राजा-महाराजा, सेठ-साहूकार और उद्योगपति तक उनके चरणों में लोटने के लिए अभिशप्त रहे।

पौरोहित्य के एकाधिकार से ब्राह्मण इतने शक्तिशाली हो गए कि सत्तर वर्ष के क्षत्रियों तक को दस वर्ष के ब्राह्मण बालक के समक्ष सिर झुकाने के लिए बाध्य होना पड़ा। आर्थिक शक्ति के समतुल्य शक्तिसम्पन्न मंदिरों में पुरोहित वर्ग के एकाधिकार के कारण भारत में ब्राह्मणशाही का उभार हुआ, जिसमें मध्य युग के यूरोप की पोपशाही की भांति ब्राह्मण भारतीय समाज के सुपर पावर बन गए। लेकिन मध्ययुग के पोपशाही के प्रभाव से यूरोप कब का मुक्त हो चुका है पर, भारत में ब्राह्मणशाही अतीत की भांति आज भी प्रबल – प्रताप के साथ क्रियाशील है। धार्मिक शक्ति के केंद्र मठों-मंदिरों पर पुरोहित वर्ग के एकाधिकार के कारण आज भी अब्राह्मण जातियों की स्थिति उनके समक्ष दोयम दर्जे के नागरिक जैसी है। दैविक गुलाम में तब्दील अब्राह्मण आज भी इस स्थिति के खिलाफ विद्रोह नहीं करते। सदियों से ब्राह्मणशाही के चरणों में घुटते रहने के बावजूद आज 21वीं सदी में भी क्षत्रिय, वैश्य, शुद्रातिशूद्रों और देश की आधी आबादी की ओर से इसके खात्मे का प्रयास होता दिख नहीं रहा है, जबकि आज से प्रायः नौ दशक पहले ही डॉ. अंबेडकर ने इसके खात्मे का सटीक उपाय बता दिया था।

ब्रह्मणशाही के खात्मे का नुस्खा

डॉ. आंबेडकर ने 1935 में अपनी सर्वोत्तम रचना ‘जाति का उच्छेद’ में ब्राह्मणशाही के खात्मे का उपाय सुझाते हुए कहा था, ‘हिंदुओं में पुरोहिती के पेशे को अच्छा हो कि समाप्त ही कर दिया जाए, लेकिन यह असंभव प्रतीत होता है। अतः आवश्यक है कि इसे कम से कम वंश- परंपरा से न रहने दिया जाए। कानून के द्वारा ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि वही व्यक्ति पुरोहिताई कर सकेगा जो, राज्य द्वारा निर्धारित परीक्षा पास कर ले। गैर-सनदप्राप्त पुरोहितों द्वारा कराए गए कर्मकांड कानून की दृष्टि में अमान्य होने चाहिए और बिना लाइसेंस पुरोहिताई करना अपराध माना जाना चाहिए। पुरोहित राज्य का कर्मचारी होना चाहिए और उस पर राज्य का अनुशासन लागू होना चाहिए। आईसीएस अधिकारियों की तरह पुरोहितों की संख्या भी राज्य द्वारा निर्धारित होनी चाहिए। भारत में सभी व्यवसाय विनियर्मित हैं। डॉक्टरों, इंजीनियरों व वकीलों को अपना पेशा आरंभ करने के पहले अपने विषय में दक्षता प्राप्त करनी पड़ती है। इन लोगों को अपने जीवन में न केवल देश के नागरिक व अन्य कानूनों के प्रति पाबंद रहना पड़ता है, वरन अपने विशिष्ट नियम व नैतिकता का पालन भी करना पड़ता है। हिंदुओं का पुरोहित वर्ग न किसी कानून की बंदिश में है न किसी नैतिकता में बंधा हुआ है। वह केवल अधिकार व सुविधाओं को पहचानता है, कर्तव्य शब्द की उसे कोई कल्पना ही नहीं। वह एक ऐसा परजीवी कीड़ा है, जिसे विधाता ने जनता का मानसिक और चारित्रिक शोषण करने के लिए पैदा किया है। अतः इस पुरोहिती वर्ग को मेरे द्वारा सुझाई गई नीति से कानून बनाकर नियंत्रित किए जाना आवश्यक है। कानून द्वारा इस पेशे का द्वार सबके लिए खोलकर इसे प्रजातान्त्रिक रूप प्रदान कर देगा। ऐसे कानून से निश्चय ही ब्राह्मणशाही समाप्त हो जाएगी। इससे जातिवाद, जो ब्राह्मणवाद की उपज है, समाप्त करने में सहायता मिलेगी।’

भारी अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि देश की अब्राह्मण जातियाँ वर्षों पूर्व ब्रह्मणशाही के खात्मे का सटीक सुझाव पाकर भी, इसके खात्मे की दिशा में आगे नहीं बढ़ीं और धर्म-भीरुता के कारण वे लाखों मठों-मंदिरों तक फैले धार्मिक सेक्टर के भोग का एकाधिकार ब्राह्मणों के लिए मुक्त रखें। लेकिन आज जबकि चुनाव में धन-संपदा का पुनर्वितरण एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है,धार्मिक–सेक्टर में उपलब्ध अवसरों का पुनर्वितरण एक बड़ा मुद्दा बनना चाहिए। मान लिया जाए कि आने वाले दिनों में सरकारी और निजी क्षेत्र की सभी प्रकार की नौकरियों के साथ सप्लाई ,डीलरशिप, पार्किंग- परिवहन, फिल्म-टीवी, शैक्षणिक संस्थानों में जितनी आबादी-उतना हक अर्थात सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू हो जाती है तो विश्व में सर्वाधिक असमानता का शिकार हमारा देश  काफी हद तक समान हो जाएगा। पर, यदि धार्मिक सेक्टर में ब्राह्मणों का एकाधिकार पूर्ववत रहता है तो  मुकम्मल रूप से समानता का लक्ष्य हासिल नहीं हो सकता। इसलिए धार्मिक सेक्टर में अवसरों का पुनर्वितरण बने चुनावी मुद्दा और विभिन्न दल मंदिरों के प्रबंधन, पुजारियों की नियुक्ति का एजेंडा पेश करें। साथ में पार्टियां घोषणा करें कि मंदिर परिसरों में बनी फूल-माला, प्रसाद इत्यादि की दुकानों के वितरण में विविध समुदायों को भागीदारी सुनिश्चित करेंगी। धार्मिक सेक्टर में विविध समुदायों की हिस्सेदारी के लिए प्रतिक्रियावादी एनडीए तो सामने नहीं ही आ सकती पर, इंडिया गठबंधन की जिम्मेवारी बनती है कि वह सामने आए।

धार्मिक सेक्टर में आरक्षण के कुछ दृष्टांत

इंडिया गठबंधन अगर धार्मिक सेक्टर के अवसरों के पुनर्वितरण की दिशा में आगे बढ़ता है, तो हाल के वर्षों के कुछ दृष्टांत उसके लिए सहायक हो सकते हैं। 2019 के सितंबर में आंध्र प्रदेश की जगनमोहन रेड्डी सरकार ने मंदिरों में पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति को 50 प्रतिशत और महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया। इसके तहत अब वहां हर बोर्ड ऑफ ट्रस्टी में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग के उम्मीदवारों के लिए नामित सदस्यों की कुल संख्या(पदेन सदस्यों को छोड़कार)में से 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था कर दी गई है। इसके अतिरिक्त कुल मनोनीत सदस्यों में से 50 फीसदी महिलाएं हो गई हैं, जिनमें एससी, एसटी, ओबीसी 50 प्रतिशत कोटे के तहत नामित महिला सदस्य शामिल है। 2019 में अगर आंध्र प्रदेश के बोर्ड ऑफ ट्रस्टी में वंचित जाति के स्त्री-पुरुषों के लिए आरक्षण लागू हुआ तो 2021 में तमिलनाडु की स्टालिन सरकार ने 36,000 मंदिरों के अर्चक (पुजारियों) की नियुक्ति एससी, एसटी, ओबीसी और महिलाओं को आरक्षण देने का फैसला करके क्रांति ही कर दिया। तमिलनाडु सरकार के उस निर्णय के पीछे केरल सरकार से मिली प्रेरणा बताया गया था, जहां सदियों की पुरानी परम्परा को तोड़ते हुए वहां की सरकार ने 2017 में मंदिरों के पुजारियों की नियुक्ति में गैर-ब्राह्मणों को आरक्षण देने का विरल दृष्टांत स्थापित किया। आंध्र प्रदेश , केरल, तमिलनाडु की भांति राजस्थान की गहलोत सरकार ने भी पुजारियों की नियुक्ति में आरक्षण लागू करने की मिसाल कायम किया। ये चंद दृष्टांत बताते हैं कि सरकारों में यदि इच्छाशक्ति हो तो मंदिरों के प्रबंधन से लेकर पुजारियों की नियुक्ति तक में आरक्षण लागू हो सकता है। इससे कम से कम हिन्दी पट्टी के अखिलेश और तेजस्वी को जरूर प्रेरणा लेते हुए धार्मिक सेक्टर में अवसरों के पुनर्वितरण को मुद्दा बनाने में आगे आना चाहिए। यदि मंदिरों के ट्रस्टी बोर्ड और पुजारियों की नियुक्ति में आरक्षण लागू होने पर ब्राह्मण सिर्फ अपने संख्यानुपात 3-4 प्रतिशत पर सिमटने के लिए बाध्य होंगे। उनकी जगह  अब्राह्मणों का वर्चस्व कायम हो जाएगा। इससे अब्राह्मण जहां दस वर्ष के ब्राह्मण बच्चों के सामने सिर झुकानें से निजात पा जाएंगे, वहीं उनको  आर्थिक शक्ति के समतुल्य मंदिरों की आय के भोग का अवसर सुलभ हो जाएगा। धार्मिक सेक्टर में एकाधिकार के कारण ब्राह्मण किस पैमाने पर अकूत संपदा भोग करते रहे हैं,  इसका अनुमान समय-समय पर मीडिया में आए निम्न तथ्यों से लगाया जा सकता है।

जनता की गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा जमा होता रहा देवालयों में

यह एक तथ्य है कि सदियों से भारत के जनता के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई का भारी हिस्सा देवालयों में जमा होता रहा है। इससे भारत का अधिकांश धन पूंजी में तब्दील होने के लिए तरसता रहा और यह धन जनहित व उत्पादन के काम में न लगकर, पुरोहित वर्ग के आमोद-प्रमोद में खर्च होता रहा है। देवालयों में धन जमा करने की जो विराट कीमत देश को अदा करनी पड़ी, उसकी मिसाल विश्व इतिहास में अन्यत्र मिलनी मुश्किल है। मध्य युग के जिन इस्लामी हमलावरों के कारण देश को कई सौ सालो तक पराधीनता का दंश झेलना पड़ा, उन्हें मुख्यतः हिन्दू मंदिरों ने ही आकर्षित किया था। उन लोगों को पता था कि जो लोग पुरोहितों को भूदेवता मानते हैं, उन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा मंदिरों में जमा कर रखा है, इसलिए उन्होंने हिन्दू मंदिरों को अपना पहला निशाना बनाया। इतिहास गवाह है कि विदेशी आक्रांता हमारे मंदिरों से हीरे-जवाहरात, सोने-चांदी ऊंटों और घोड़ों पर लादकर अपने मुल्क ले जाते रहे। किन्तु हमारे पुरोहित वर्ग नें इतिहास से कोई सबक नहीं लिया। लोगों को लौकिक और पारलौकिक सुख सुलभ कराने का झांसा देकर भूदेवता अतीत की भांति ही आधुनिक भारत में हिन्दू मंदिरों को अपनी निजी जागीर और सोने की खान बना रखा है। हिन्दू मंदिरों में किस पैमाने पर धन पड़ा है, इसका अनुमान 2018 में टॉप के 10 मंदिरों की संपति के विषय में छपी एक रिपोर्ट से लगाया जा सकता  है।

देवालयों का आर्थिक समराज्य

उक्त रिपोर्ट में पहले नंबर पर रहा तिरुवनंतपुरम का पद्मनाभस्वामी मंदिर। यह केवल भारत ही नहीं बल्कि विश्व के सबसे अमीर मंदिरों में से एक है। यह मंदिर द्रविड़ शैली वास्तुकला में बनाया गया है जो दक्षिण भारत में प्रचलित है, मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। कुछ लोग यहां की संपत्ति का अनुमान लगाकर बताते हैं कि यहां 1 खरब डॉलर के मूल्य की संपत्ति है। संपत्ति के मामले दूसरे नंबर रहा तिरुपति का वेंकटेश्वर मंदिर। तिरुपति में स्थित वेंकटेश्वर मंदिर को तिरुमाला मंदिर भी कहते हैं। नवीनतम अनुमान के अनुसार तिरुमला मंदिर में स्वर्ण भंडार और 52 टन सोने के गहने (प्राचीन सोने के गहने और राजाओं द्वारा देय देवता और 1000 वर्ष से भी ब्रिटिश शासकों सहित) के 37,000 करोड़ रुपये के मूल्य हैं। प्रत्येक वर्ष यह तीर्थयात्रियों से हुंडी / दान बॉक्स में प्राप्त 3000 किलो सोने से राष्ट्रीयकृत बैंकों के साथ गोल्ड रिजर्व जमा के रूप में परिवर्तित हो जाता है। भक्तों के बीच बेहद पॉपुलर शिर्डी के साईबाबा का मंदिर तीसरे स्थान पर रहा। साईं बाबा पर हर धर्म के लोग विश्वास करते हैं। यही वजह है के शिर्डी के साईं मंदिर में हजारों भक्त दर्शन के लिए आते हैं और बड़ी मात्रा में सोने-चांदी के आभूषण और नकदी दान करते हैं। माना जाता है कि इनका सिंहासन 94 किलोग्राम सोने का बना है। जम्मू जिले के कटरा के निकट स्थित वैष्णव देवी मंदिर संपत्ति के मामले में चौथे स्थान पर रहा। 5,200 फुट की ऊंचाई पर एक गुफा के अंदर स्थित इस मंदिर का राजस्व पिछले कुछ सालों से बढ़ गया है, क्योंकि तीर्थयात्रियों की संख्या बढ़ गई है। मंदिर में करीब 500 करोड़ की वार्षिक आय है। मुंबई का सिद्धि विनायक मंदिर गणपति बप्पा का सबसे लोकप्रिय मंदिर है जो कि मुबई में स्थित है। वैसे तो इस मंदिर में भी दुनिया भर के भक्त आते हैं, किन्तु इसकी खास पहचान बॉलीवुड वालों के कारण है। 100 करोड़ से अधिक की वार्षिक आय और 125 करोड़ की सावधि जमा के साथ, यह भारत के सबसे अमीर मंदिरों में से एक है। मदुरै का मीनाक्षी मंदिर भी भारत के अमीर मंदिरों में से एक है। आसपास कई मंदिरों से घिरा होने के बाद भी इस मंदिर में हर दिन 20 हजार से ज्यादा लोग आते हैं। मीनाक्षी तिरुकल्यानम त्यौहार के दौरान यहां पर 10 दिन में 1 मिलियन से ज्यादा लोग आते हैं। यह त्योतहार अप्रैल और मई के बीच मनाया जाता है। हर साल यह मंदिर 6 करोड़ की कमाई करता है।

पुरी के भगवान जगन्नाथ को समर्पित जगन्नाथ मंदिर, जिसे दरिद्र नारायण के नाम से भी जाना जाता है, की नेट वर्थ 250 करोड़ रुपये। वार्षिक आय 50 करोड़ रुपये है। 12 वीं शताब्दी के बाद से मंदिर में 18 बार हमला किया गया। उसके बाद से 7 चेंबर में से केवल 2 ही चेंबर पूजा और दर्शन के लिए खुले होते हैं। इस मंदिर में कितने किलो सोना हो सकता है कोई अनुमान नहीं है। वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर, भी देश के अमीर मंदिरों मे गिना जाता है। यहां पर वार्षिक दान 6 करोड़ से ज्यादा का होता है। यहां पर जो गुंबद बने हैं वो 2 सोने के प्लेट से बने हुए हैं। हर साल 2 लाख से अधिक श्रद्धालु आते है।   दक्षिण कश्मीर हिमालय में अमरनाथ गुफा में भगवान  शिव के पवित्र गुफा में दर्शन के लिए श्रद्धालु कष्टसाध्य यात्रा करके आते हैं। इस मंदिर में भी खूब चढ़ावा दिया जाता है। केरला के पेरियार टाइगर रिजर्व में स्थित सबरीमाला मंदिर, साल भर में लाखों तीर्थयात्रियों को अपने पास बुलाता है। लोग अपने पसंदीदा भगवान को करोड़ों का चढ़ावा भी देते हैं। साल 2013 में यहां पर चढ़ावे की राशि 203 करोड़ रुपए थी। यहां पर अकेले अरविना प्रसाद की बिक्री से 74.50 करोड़ की कमाई होती है। मनोरम पहाड़ियों के बीच स्थित इस मंदिर का दर्शन करने हर साल 100 मिलियन से ज्यादा श्रद्धालु आते हैं।

मठ-मंदिरों के  खजाने पर बैठी बाबाओं की फौज

बहरहाल दौलतमंद मंदिरों की संख्या सिर्फ उपरोक्त मंदिरों तक सीमित नहीं है। दर्जनों ऐसे मंदिर हैं, जिनकी कमाई का फिगर देखकर आँखें फटी की फटी रह जाएंगी। लेकिन लोगों को लौकिक और पारलौकिक सुख का झांसा देकर सिर्फ पंडे-पुरोहित ही हिन्दू मंदिरों को सोने की खान बनाने में सफल नहीं हुये; लोगों की आस्था का लाभ उठाकर कई माएं और बाबा अपना आर्थिक साम्राज्य खड़ा करने मेंसफल हो गए। देश में ऐसे ढेरों बाबा हैं जिनकी संपत्ति औसतन हजार करोड़ के आसपास है। गत 17 अप्रैल, 2020 को प्रकाशित एक रिपोर्ट में 8 बाबाओं- माताओं की संपत्ति का जो ब्योरा प्रकाशित हुआ था, वह एक शब्दों में  आश्चर्यजनक है। उस रिपोर्ट में 80 के दशक में भारत से कहीं अधिक, विदेशों में मशहूर दिवंगत महर्षि महेश योगी की संपत्ति 60, 000 करोड़ बताई गयी थी, जबकि दूसरे नंबर पर काबिज योग गुरु बाबा रामदेव की संपत्ति 43,000 करोड़ बताई गयी थी। तीसरे नंबर पर दिवंगत सत्य साई बाबा रहे, जिनकी संपत्ति का आंकलन 40,000 करोड़ किया गया था। डेढ़ सौ से अधिक देशों में ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ सीखा रहे श्री श्री रविशंकर की संपत्ति 1000 करोड़ बताई गयी थी। उस रिपोर्ट में बलात्कार के आरोप में बंद आसाराम बापू की संपत्ति 10,000 करोड़ बताई गयी थी। इन्हीं की तरह दौलतमंद बाबाओं में मोरारी बापू, निर्मल बाबा, गुरमीत राम रहीम का नाम था, जिनकी दौलत का फिगर देखकर किसी भी व्यक्ति का सिर चकरा जाएगा। दौलतमंद सिर्फ बाबा ही नहीं माएं भी हैं। 2017 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक माता अमृतानन्दमयी की संपत्ति 1500 करोड़ तो मुंबई के चिकूवाड़ी स्थित आलीशान बंगला में रहने वाली ग्लैमरस राधे की संपत्ति भी हजार करोड़ से ऊपर बताई बताई गई थी।

यदि धार्मिक सेक्टर में जितनी आबादी-उतना हक का सिद्धांत लागू हो जाता है तो मंदिरों के ट्रस्टी बोर्ड से लेकर पुजारियों की नियुक्ति में अब्राह्मणों का वर्चस्व हो जाएगा और वे मठों–मंदिरों की बेहिसाब संपदा के भोग का अवसर भी पा जाएंगे। यह सब देखते हुए मौजूदा लोकसभा चुनाव में धार्मिक सेक्टर में अवसरों के पुनर्वितरण का मुद्दा खड़ा करना समय की बड़ी मांग है। क्या इस पर अखिलेश और तेजस्वी यादव जैसे शूद्रों के साथ सामाजिक न्याय की राजनीति के नए आइकॉन राहुल गांधी विचार करेंगे।

एच एल दुसाध
एच एल दुसाध
लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.

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