धर्म, अंधविश्वास और अखबार  डायरी (4 अगस्त, 2021)

नवल किशोर कुमार

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धर्म को जो बातें जिंदा रखती हैं, उनमें भय और आस्था सबसे महत्वपूर्ण हैं। भय का महत्व इसलिए कि बिना भय के कोई भी ईश्वर को सर्वशक्तिमान नहीं मानता। यह एक तरह का प्रोटोकॉल भी है जो अलग-अलग मजहबों के हिसाब से अलग-अलग होता है। वहीं आस्था से धर्म के प्रति निष्ठा बढ़ती है। यह मनोविज्ञान का हिस्सा भी है। आस्था के अलग-अलग रूप होते हैं और यह केवल हमारे देश में ही नहीं होता, पूरे विश्व में होता है। गलत तब होता है जब राज्य भय और आस्था का खेल खेलता है। इसका परिाणाम भी बहुत भयावह होता है।

पहली बार मैं कब डरा, यह याद करने की कोशिश कर रहा हूं। उन दिनों मेरे घर में भैंस पालन आय का महत्वपूर्ण स्रोत हुआ करता था। भैंसें हमारे जीवन का हिस्सा थीं। मैं तो अपनी हर भैंसों का नामकरण भी करता था। ठीक वैसे ही जैसे आजकल कुत्ते पालने वाले अपने कुत्ते का नामकरण करते थे। लेकिन भैंसें और कुत्ते में फर्क यह है कि भैंसें अपने नाम को मान्यता नहीं देतीं। उनकी अपनी ही जीवनशैली होती है। वे कुत्तों के माफिक नहीं होतीं। हालांकि वफादारी के मामले में वह कुत्तों से कम नहीं होतीं। मेरे यहां तो होता यह था कि पापा की साइकिल की आवाज सुनकर मेरे घर की भैंसें बोलने लगती थीं। मां की आहट पाते ही भैंसें अपने कान खड़ी कर लेती थीं। और मुझे तो वह ऐसे देखतीं जैसे मैं उनका ही बच्चा हूं।

मैं जनसत्ता की बुद्धि को दाद देता हूं। उसके लिए एक ब्राह्मण का अंधविश्वास खबर का हिस्सा है और इतना महत्वपूर्ण कि वह उसे अपने पहले पन्ने पर जगह देता है। वैसे यह महान कार्य अकेले केवल जनसत्ता ही नहीं करता। हिंदी के अन्य अखबार भी खूब धड़ल्ले से करते हैं। अंग्रेजी के अखबारों में कुछ कम होता है। लेकिन होता तो वहां भी है।

खैर, एक बार एक भैंस ने बच्चा दिया। मेरे घर में यह परंपरा थी कि पहले 12 दिन का दूध उसका बच्चा पीए। लेकिन दूध अधिक होने की वजह से दूध का उपयोग हमलोग भी करते थे। बहुत गाढ़ा दूध होता है शुरू शुरू में। पहले दिन का दूध तो बहुत खास होता था। मां उसे गर्म कर उसमें गुड़ डालकर फेनूस बनाती। फेनूस को सबसे पहले कुल देवता को चढ़ाया जाता। यह एक तरह से प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करना होता था। कोई धार्मिक मान्यता नहीं थी। लेकिन इस मान्यता के अपने तौर-तरीके और अनुशासन थे। अनुशासन यह कि जबतक कुल देवता को चढ़ाया नहीं जाएगा, कोई हाथ तक नहीं लगाएगा।

उस दिन मैं स्कूल से पढ़कर लौटा। भूख लगी थी। तब कुल देवता और मैं एक ही कमरे में रहते थे। कुल देवता एक पिंडी के रूप में घर के एक कोने में रहते थे। तो हुआ यह कि स्कूल से लौटने के बाद अपने कमरे में गया। मां ने फेनूस आलमारी पर रखा हुआ था। भूख तो थी ही। बस फिर क्या था लकड़ी की कुर्सी के सहारे आलमारी के शीर्ष पर पहुंचा और फेनूस का भोग लगाने लगा। फिर इस डर से कि मां देख न ले, चुपचाप मुंह धोकर उसके सामने खड़ा हो गया। मां जान गयी कि मैंने कुछ तो किया है। वह भागकर कमरे में गयी और उसने मुझसे पूछा। मेरे पास हंसने और रोने का सम्मिश्रित चेहरा बनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। बस इतना ही कह पाया – माई, भूख लगी थी। फिर मां का गुस्सा फुर्र हो गया।

आस्था और भय से जुड़ा एक प्रसंग और याद आ रहा है। बात अगस्त, 2008 की है जब कोसी नदी उत्तर बिहार में कहर बरपा रही थी। मैं उन दिनों सुपौल जिले में था। चारों ओर केवल पानी ही पानी। मुख्य मार्ग पर दो-तीन फुट पानी थी। रिपोर्टिंग के लिए नाव का इंतजाम किया था। इस क्रम में एक गांव में जाना हुआ। वहां कुछ महिलाएं कोसी गीत गा रही थीं। सोचकर अजीब लग रहा था कि जिस नदी ने उनका आशियाना उजाड़ दिया, ये औरतें उसके मनुहार में लगी हैं। कुछ देर रुका रहा। दो-तीन महिलाएं अपने हाथ में शंकर की प्रतिमा को नदी में प्रवाहित करती नजर आयीं।

लेकिन बात वहीं खत्म नहीं हुई। रात में मां ने कहानी सुनायी। कहानी में मेरे जैसा एक बच्चा था जिसने भगवान को चढ़ाया जाने वाला भोग खा लिया था। परिणाम यह हुआ कि उसकी शादी बदसूरत लड़की से हो गयी। वह बहुत बदमाश थी। मां ने मुझे डरा दिया था। बदसूरत पत्नी का डर।

खैर, यह डर केवल यही तक सीमित नहीं रहा। इसके कई और रूप सामने आए। इसके कारण आस्था का विकास भी हुआ। परीक्षा पास करने के लिए भगवान के आगे प्रार्थना करना और अच्छे अंक नहीं आने पर शिकायत करना। यह सब भी हुआ। बाद में जब समझ बनी तो भगवान से मोहभंग हुआ और मैं यथार्थवादी बना। हालांकि अब भी मेरे परिजन यही चाहते हैं कि मैं उनकी तरह भगवान से मोह रखूं।

आस्था और भय से जुड़ा एक प्रसंग और याद आ रहा है। बात अगस्त, 2008 की है जब कोसी नदी उत्तर बिहार में कहर बरपा रही थी। मैं उन दिनों सुपौल जिले में था। चारों ओर केवल पानी ही पानी। मुख्य मार्ग पर दो-तीन फुट पानी थी। रिपोर्टिंग के लिए नाव का इंतजाम किया था। इस क्रम में एक गांव में जाना हुआ। वहां कुछ महिलाएं कोसी गीत गा रही थीं। सोचकर अजीब लग रहा था कि जिस नदी ने उनका आशियाना उजाड़ दिया, ये औरतें उसके मनुहार में लगी हैं। कुछ देर रुका रहा। दो-तीन महिलाएं अपने हाथ में शंकर की प्रतिमा को नदी में प्रवाहित करती नजर आयीं। अब सवाल पूछना जरूरी हो गया था। पूछा तो जवाब मिला कि यह पत्थर का देवता किसी काम का नहीं। यह हमारी रक्षा करने में नाकाम रहा।

भैंसें हमारे जीवन का हिस्सा थीं। मैं तो अपनी हर भैंसों का नामकरण भी करता था। ठीक वैसे ही जैसे आजकल कुत्ते पालने वाले अपने कुत्ते का नामकरण करते थे। लेकिन भैंसें और कुत्ते में फर्क यह है कि भैंसें अपने नाम को मान्यता नहीं देतीं। उनकी अपनी ही जीवनशैली होती है। वे कुत्तों के माफिक नहीं होतीं। हालांकि वफादारी के मामले में वह कुत्तों से कम नहीं होतीं।

यह महिलाओं का आक्रोश था या अंधविश्वास, इस बारे में कोई टिप्पणी करने की इच्छा न तो तब हुई थी और ना ही आज कोई टिप्पणी कर रहा हूं। मुझे तो कटैया पावर हाऊस के पास एक मंदिर को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा की गयी घोषणा याद आ रही है। तब कुमार ने कहा था कि सुंदर कोसी का निर्माण करेंगे और जो मंदिर बह गया है, उसका फिर से निर्माण कराया जाएगा। तब जो सबसे खुश था, वह कोई ब्राह्मण था। वह शायद मंदिर का पुजारी था।

आज दिल्ली से प्रकाशित जनसत्ता में इसी तरह की एक खबर है – समुद्री लहरों में समा गया सदियों पुराना मंदिर। इस खबर में उड़ीसा के केंद्रपाड़ा इलाके एक मंदिर की चर्चा है। खबर के केंद्र में एक ब्राह्मण है जो उस मंदिर का पुजारी था जो समुद्री तट से करीब तीन किलोमीटर दूर था और अब समुद्र में विलीन हो गया है। पुजारी के मुताबिक, इस मंदिर का भगवान लोगों को समुद्र के कोप से बचाता था।

मैं जनसत्ता की बुद्धि को दाद देता हूं। उसके लिए एक ब्राह्मण का अंधविश्वास खबर का हिस्सा है और इतना महत्वपूर्ण कि वह उसे अपने पहले पन्ने पर जगह देता है। वैसे यह महान कार्य अकेले केवल जनसत्ता ही नहीं करता। हिंदी के अन्य अखबार भी खूब धड़ल्ले से करते हैं। अंग्रेजी के अखबारों में कुछ कम होता है। लेकिन होता तो वहां भी है।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

1 Comment
  1. Dr Rohit Barot says

    I found Naval Kishor Kumar’s article interesting as he brings faith and fear together in his personal narrative. The concept of Jansatta is relevant of course relevant. How to cope with the faith which is far removed from the realities of facts. Cow urine as a remedy for Coronavirus infection is a telling example of a misconceived belief. Education and information may help to modify beliefs unrelated to known facts. I am not sure if Shri Naval Kishor Kumar can comment on the misapprehension of reality in making of a faith. My apologies for using English to communicate this comment. My Hindi is rusted and poor. Rohit

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