चाँद की धरती जैसे रास्ते पर दैत्याकार वाहन से 13 किलोमीटर का सफर

जितेंद्र भाटिया

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लेख का दूसरा और अंतिम हिस्सा

मणिभंजन एक तरह से उत्तर की ओर जाने वाला आखिरी बाज़ारनुमा शहर या कि गाँव है। यह बाज़ार यात्रा की आम ज़रूरतें खरीदने का आखिरी ठिकाना भी है। इससे आगे कुछ नहीं मिलेगा, छोटे-छोटे ढाबों पर मिलते भोजन और सर्दी दूर करने वाली छुट्टी शराब के नापे हुए अद्धों के सिवाय। मणिभंजन की दुकानें चीन के सामन से भरी रहती हैं। खिलौने, टॉर्च, सस्ते इलेक्ट्रॉनिक सामान, कपड़े, बौद्ध मूर्तियाँ, चीनी मिट्टी के टी सेट और ड्रैगन के चित्रों से सुसज्जित तोरण एवं चमकीली पताकाएं!  बहुत सी दुकानें स्त्रियाँ चलाती हैं। उनके सिन्दूर से उनके धर्म का स्पष्ट संकेत मिलता है और नेपाली के अलावा वे बहुत साफ़ हिंदी बोलती हैं। मेरा मानना है कि गोरखा प्रदेश में लिंगभेद के आधार पर सत्ता और अधिकारों का विभाजन देश के हमारे दूसरे इलाकों से कहीं अधिक स्वस्थ और जनतांत्रिक है। शायद पहाड़ों की ठंडी आबोहवा और कठिन ज़िन्दगी  में स्त्री और पुरुष दोनों को ही संघर्ष और श्रम की आदत पड़ जाती होगी।

वन विभाग का दफ्तर मणिभंजन की इसी भीड़-भड़क्के वाली इकलौती सड़क पर था। सिंगालीला अभयारण्य और संदकफू के रास्ते पर जाने से पहले इसी दफ्तर से अनुमति पत्र लेकर दोपहर के 2 से पहले प्रवेश द्वार से गुज़रना ज़रूरी था। शायद अँधेरा घिर जाने के बाद उस ऊबड़-खाबड़ सड़क पर आगे बढ़ना नामुमकिन हो जाता होगा। यूं भी आम गाड़ियाँ यहाँ कुछ दूर जाने के बाद ही दम तोड़ देंगी। अंग्रेजों के ज़माने की पुरानी खस्ताहाल फोर व्हील ड्राइव वाली लैंड रोवर गाड़ियाँ अपने सारथी-नुमा चालकों के साथ मणिभंजन की संकरी सड़क के दोनों ओर खड़ी थीं। इन गाड़ियों के अलावा दूसरी आम टैक्सियों को  यहाँ से आगे जाने की अनुमति नहीं है।

टुमलिंग में शिखर लॉज

अपना सामान सिलीगुड़ी की टैक्सी से उस द्वितीय विश्व युद्ध की एंटीक जीप में स्थानांतरित करते हुए हमने गौर किया कि उस जीप का लगभग हर हिस्सा वक्त के साथ हिन्दुस्तनी ठोका-पीटी पद्धति से बदला जा चुका था। खिड़की के शीशे कीलों से फिट किए गए थे और चढ़ाई चढ़ते वक्त गाड़ी को पहले गियर में डालने के लिए एक अजीबोगरीब भद्दी-सी कवायद करनी पड़ती थी। चलते वक्त हमें अविश्वास नहीं हुआ था कि डेढ़ हड्डी का ड्राइवर दिलीप थापा उस प्रागैतिहासिक दैत्य को कैसे और क्योंकर संभाल पायेगा, लेकिन उस ऊबड़खाबड़ रास्ते पर अपनी किडनी, आमाशय और अंतड़ियों को बमुश्किल बचा चुकने के बाद हमें भली भांति समझ में आ गया कि वह ‘cannibalised’ मशीनी जानवर ख़ास दिलीप के लिए बना था और बहादुर सारथी दिलीप थापा ने भी उस बेलगाम दैत्य को हांकने के लिए ही इस पार्थिव दुनिया में जन्म लिया था। हमारे लिए विश्वास करना मुश्किल था कि वह पिद्दी सा नेपाली पिछले दस वर्षों से प्रतिदिन औसतन दस घंटे उस जीप के साथ उन रास्तों पर सफ़र करता था।

चाँद की धरती जैसे रास्ते पर उस जीप में 13 किलोमीटर दूर अपने पहले पड़ाव टुमलिंग तक पहुँचने में गोया कि अनंत काल लग गया। जब दिलीप ने मुस्कराते हुए हमें सूचित किया कि सामने ढाई किलोमीटर के फासले पर जो मकान दिखते हैं, वहीं हमें जाना है, तो हमारे दो साथियों को जीप में बैठे-बैठे उस सीधी चढ़ाई को तय करने की अपेक्षा वहां से पैदल चलने का विकल्प अधिक आरामदेह और सुरक्षित लगा। जीप की उस यात्रा ने दरअसल ‘कलेजा मुंह तक आ जाने’ वाले मुहावरे का वास्तविक अर्थ हमें समझा दिया था।

टुमलिंग में उन दो चार मकानों और एक आध छोटे से रिसोर्ट के अलावा कुछ नहीं है। इनमें से हर एक के सामने या उसके आस पास आपको एकाधिक पहाड़ी कुत्ता मिल जाएगा। दिलीप हमें बताता है कि यात्रियों के संपर्क में आने के बाद ये कुत्ते इतने मित्रवत नज़र आने लगे हैं। वर्ना सुदूर बस्तियों में तो ये काफी खूंखार भी साबित हो सकते हैं।

टुमलिंग आगे की चढ़ाई तय करने से पहले रात में रुकने का एक लोकप्रिय पड़ाव है। यहाँ से आगे संदकफू तक आपको रुकने के बहुत कम ठिकाने मिलेंगे। मार्च के महीने में भी यहाँ कड़ाके की सर्दी थी। हमें आगाह किया गया था कि संदकफू में तो तापमान शून्य से नीचे भी जा सकता है। इसके लिए हमारी तैयारी नाकाफी थी। अपने गाइड शिडिंग शेरपा से हम इसके बारे में पूछते हैं तो वह सिर्फ मुस्कराता रहता है, जिसका मतलब ‘हाँ’ से लेकर ‘ना’ तक कुछ भी हो सकता है। लेकिन कुछ ही देर बाद जब वह अपनी पुरानी जैकेट उतारकर हमें पहना देने की तजवीज पेश करता है तो हम कुछ लज्जित हो उसे गले से लगा लेते हैं।

कहते हैं कि ‘पहला कदम ऊपर बढ़ाने और शिखर तक  पहुँचने के बीच कहीं वह रहस्य छिपा होता है जिसे पाने के लिए हम निकले होते हैं!’ अपने अविस्मरणीय यात्रा वृत्तान्त ‘स्नो लेपर्ड’ में लेखक पीटर मैथीसन ने इसी धरती पर हिम तेंदुए की तलाश करते हुए स्वयं अपने आपको पा लिया था। टुमलिंग से अलस्सुबह दिखती कंचनजंघा की ‘सोये हुए बुद्ध’ की बर्फ से ढंकी पर्वतमाला ऐसे ही  किसी बहुत बड़े, अप्राप्य गंतव्य को ढूँढने की प्रेरणा देती है।

बुरांश के फूल अभी निकलने शुरू हुए हैं। अप्रैल- मई आते आते ये पहाड़ियां उनके सुर्ख रंगों से ढँक जायेंगी। उनकी एक सफ़ेद जाति भी है जो बड़े बड़े पत्तों वाले मैगनोलिया वृक्षों के झक्क सफ़ेद फूलों के बीच कहीं-कहीं दिख जाती है। इन दोनों के अलावा यहाँ भरमार है बैगनी रंगों की ‘दाफने’ झाड़ियों की, जिनके फूल शिडिंग शेरपा के अनुसार ज़हरीले होते हैं। वह हमें यह भी बताता है कि इन्हीं जंगलों में किस्मत वालों को कभी कभी प्रदेश का सबसे दुर्लभ और खूबसूरत जीव-लाल पांडा भी मिलता है। लेकिन अपनी भाग्य रेखा से ऐसी किसी उम्मीद के अभाव में वह शानदार पांडा हमारे लिए मैथीसन के हिम तेंदुए की तरह अप्राप्य बना रहता है। अलबत्ता जंगल के बीच, किसी डाल से हमारी ओर अविकल देखता और फिर पलक झपकते दौड़कर ओझल होता पीले गले वाले नेवले ‘मार्टेन’ का एक जोड़ा ज़रूर मिला। शिडिंग हमें बताता है कि जंगल में ये खूंखार ‘मार्टेन’ कई बार अपने से कहीं अधिक बड़े आकार के जीवों को भी मारने  में कामयाब हो जाते हैं।

रास्ते पर सूरज की पहली किरणों के गिरने के साथ साथ हमारी ठिठुरन भी कम होने लगी है।  रास्ते से गुज़रता हर व्यक्ति हमारा अभिवादन करता निकलता है। यह यहाँ की परंपरा है, या फिर वे सब शिडिंग शेरपा को अच्छी तरह जानते हैं। शेडिंग सालों-साल इन्हीं पहाड़ियों में मेहमानों के साथ घूमता रहता है, सिर्फ बरसात के दो तीन महीनों को छोड़ कर। ड्राइवर दिलीप थापा का घर भी मणिभंजन में शेडिंग के घर के पास ही है। हमने तय किया है कि जहाँ तक हो सके, उस जीप में बैठकर धक्के खाने की अपेक्षा पैदल चलना ही हमारे शरीर की मांसपेशियों और जोड़ों के लिए अधिक हितकर होगा।

पिछली रात टुमलिंग के उस छोटे से होटल में, अलाव के नज़दीक बैठकर तले हुए आलुओं के साथ दार्जीलिंग की बेहतरीन चाय पीते हुए हमने गोरखालैंड आन्दोलन के बारे में शेडिंग शेरपा के विचार जानने चाहे थे तो उसने अपने परिचित अंदाज़ में मुस्कराते हुए पलटकर पूछा था कि हम क्या चाय का एक और कप पीना पसंद करेंगे? ज़ाहिर था कि वह बचना चाह रहा था। पर्यटकों और मेहमानों के बीच काम करने वाले स्थानीय लोग अपने राजनीतिक विचार आसानी से दूसरों के साथ नहीं बांटते। सवालों से बेतरह घिर चुकने के बाद शेडिंग शेरपा ने किसी कुशल कूटनीतिज्ञ की तरह सिर्फ इतना कहा था कि गोरखालैंड बनने से क्या लोगों को पहले से बेहतर काम मिल पायेगा? या कि मणिभंजन से यहाँ तक आने वाली सड़क पक्की हो जायेगी? …ज़ाहिर है कि हमारे पास उसके सवालों का जवाब नहीं था।

हमारे देश में आजकल उथली देशभक्ति की मशीनरी रवीश कुमार की ‘whatsapp यूनिवर्सिटी’ की तरह ओवरटाइम पर चल रही है। देश और इसके लोगों को नए हिस्सों या स्वतंत्र सूबों या नए राज्यों में बांटने के अधिकाँश प्रस्ताव या आन्दोलन हमेशा एक ख़ास किस्म के राजनीतिक तबके द्वारा उठाये जाते हैं और यह ज़रूरी नहीं कि जुलूसों में हिस्सा लेने से आगे उनमें आम लोगों की वास्तविक समस्याओं के समाधान भी शामिल हो। उत्तर पूर्व की अधिकांश चिंताएं सत्ता की बरसों लम्बी उपेक्षा और उदासीनता से जन्मी हैं ,जिन्हें समय रहते वर्तमान व्यवस्था के भीतर भी  ठीक किया जा सकता था। शेडिंग शेरपा की सहज समझ भी कहती है कि टुमलिंग की खस्ताहाल सड़क या कि सिंचोना के बगानों की बदहाली गोरखालैंड की मांग उठने से पहले या उसके बगैर भी दूर की जा सकती है। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

बिमल गुरुंग

यह जानना दिलचस्प है कि नेपाली भाषा के वर्चस्व के बावजूद इस प्रदेश का सम्बन्ध नेपाल से अधिक सिक्किम एवं भूटान से रहा है। 1780 तक इसका कुछ हिस्सा इलाका सिक्किम के चोग्याल के अधीन, तो कुछ भूटान के पास था। बाद में नेपाल के गोरखाओं ने सिक्किम से युद्ध में इसका बहुत सारा हिस्सा हथिया लिया था। 1814-15 में अंग्रेजों ने गोरखाओं को हराकर उनके जीते हुए प्रदेश को पहले ईस्ट इंडिया कंपनी और बाद में सिक्किम के चोग्याल को दे दिया। फिर क्रमशः 1835 और 1864 में अंग्रेजों के साथ सिक्किम और भूटान की स्वायत्तता कायम रखने वाली दो अलग अलग संधियों के तहत सिक्किम और भूटान ने अपनी स्वतंत्रता के बदले इन हिस्सों को दुबारा अंग्रेजों के हवाले कर दिया और इन्हीं को जोड़कर वहां एक गैर अविनियमित क्षेत्र वाले जिले दार्जीलिंग का उदय हुआ।

दार्जीलिंग को एक अलग प्रशासनिक क्षेत्र बनाने की मांग के परिणामस्वरूप  1935 में अंग्रेजों ने दार्जीलिं को एक ‘आंशिक रूप से असम्बद्ध क्षेत्र’ घोषित किया था और स्वतंत्रता के बाद पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) के बनने के बाद यह हिस्सा पश्चिम बंगाल में शामिल कर दिया गया था। अस्सी के दशक में जी एन एल एफ (गोरखा राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा) के संस्थापक सुभाष घिसिंग ने पहली बार जोर-शोर के साथ  ‘गोरखालैंड’ आन्दोलन का सूत्रपात किया। वे यहाँ बंगाल से अलग एक स्वतंत्र राज्य चाहते थे। 1988 में पश्चिम बंगाल सरकार और केंद्र के साथ  जी एन एल एफ के समझौते में घिसिंग को फ़िलहाल  ‘गोरखालैंड’ की मांग वापस लेने पर राज़ी कर लिया गया और आगे की बातचीत के लिए दार्जीलिंग गोरखा हिल परिषद् का गठन किया गया। इन्हीं तीनों पक्षों के बीच लम्बी बातचीत के बाद  2005 में दार्जीलिंग को संविधान की छठी  अनुसूची में शामिल करने का फैसला हुआ।

2007 में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेता बिमल गुरुंग ने इस समझौते को प्रदेश के लोगों के साथ ‘विश्वासघात’ बताते हुए अलग गोरखालैंड राज्य स्थापित करने का मोर्चा फिर से खोल दिया। प्रदेश में चार वर्षों के घमासान संघर्ष के बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने शान्ति बहाल करने के लिए  गोरखा जनमुक्ति मोर्चा से समझौता कर दार्जीलिंग के शासन की ज़िम्मेदारी एक स्वायत्त संस्था गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन के हाथों में सौंप दी। लेकिन 2013 में आंध्र प्रदेश के विभाजन से शह पाकर यह सोया मुद्दा फिर जाग्रत हो गया और स्थानीय नेताओं ने कहा कि वे एक स्वतंत्र राज्य की अलग सांस्कृतिक पहचान से कम कुछ भी स्वीकार नहीं करेंगे। उनकी मानें तो न सिर्फ उत्तरी बंगाल बल्कि असम का एक हिस्सा भी गोरखालैंड में शामिल होना चाहिए। गोरखालैंड पर एकाधिक पुस्तक लिख चुके विशेषज्ञ रजत गांगुली कहते हैं कि यह आन्दोलन आज प्रशासनिक विफलताओं और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का मिला जुला स्वरुप बनकर रह गया है।

खूबसूरत जंगलों और  बुरांश की झाड़ियों के बीच सारा दिन चलने के बाद शाम से पहले हम जिस मुकाम पर पहुंचे, उसे एक छोटे से नामालूम तालाब के कारण काली पोखरी नाम से जाना जाता था। यहाँ से संदकफू महज़ 6 किलोमीटर दूर सीधी चढ़ाई पर था लेकिन इस छोटे से फासले को रात के समय जीप पर भी पार नहीं किया जा सकता था। लिहाजा काली पोखरी में  सड़क से सटे दो चार नामालूम मकानों में बने एक तथाकथित ‘होटल’ में रात गुजारनी पड़ी। गाँव में बिजली नहीं थी और अँधेरा घिर चुकने के बाद एकाध सोलर बल्ब से काम चलाने की मजबूरी थी। ठंडी तेज़ हवा के चलते ढलती दोपहर में भी वहां तापमान शून्य से बहुत ऊपर नहीं रहा होगा। दिलीप  ने जीप से सामान उतारते हुए जब हमें सूचित किया कि हम अब नेपाल में हैं तो आश्चर्य होना स्वाभाविक था क्योंकि हमने रास्ते में किसी सीमा को पार नहीं किया था। शेडिंग शेरपा ने बताया कि वह रास्ता लगभग नेपाल की सीमा पर चलता है जहां औपचारिक पाबंदियां नहीं हैं हालाँकि भारतीय सेना की मौजूदगी लगभग हर जगह है।

हमारे कमरे से दूसरी ओर, सड़क के पार होटल का रसोईघर, छोटी सी दुकान और भोजन का कमरा था, जिसकी दीवारों से सटकर किसी बड़े अवसर पर इस्तेमाल होने वाले बर्तन सजे हुए थे; एक बड़ा सा प्रेशर कुकर, कड़ाहे, भगौने और तेल के पुराने पीपे। कुछ रंग बिरंगी झालरें और एकाध बदरंग तस्वीरें जिनमें चेहरों को पहचानना भी मुश्किल था। लेकिन कमरे का सबसे बड़ा आकर्षण थी बीचोंबीच रक्खी एक बड़े आकार की कोयलों से जलती अंगीठी, जिससे सारे कमरे में एक सुखद गर्माहट फ़ैल रही थी। मौसम को देखते हुए सारे ग्राहक ही नहीं, घर के कुत्ते और बिल्लियाँ भी उस अंगीठी के आस पास पसर गए थे और किसी को इस पर ऐतराज़ नहीं था। होटल के मालिक/रसोइये/वेटर सुम्थंग ने हमारे लिए जगह बनाते हुए काली चाय के साथ हमें हाल ही में गुज़रे तिब्बती नव वर्ष ‘ग्यालपो ल्होसर’ पर बनी मिठाइयाँ और नमकीन खिलाये। उसी कमरे के एक हिस्से में भट्टी पर हमारे लिए रात का खाना पक रहा था। शेडिंग शेरपा हमारा साथ छोड़ रसोईघर में उनकी मदद में जुट गया। उनके हंसी-मज़ाक से ज़ाहिर था कि उन सबके साथ उसका रोज़ का उठना-बैठना था। खाना खाने के बाद हमें कड़ाकेदार ठण्ड और तेज़ हवा में बाहर निकलकर अपने सर्द कमरे तक जाने की ज़हमत उठानी थी और उसके बाद अलस्सुबह संदकफू के लिए निकल जाना था।

भारत के रास्ते नीचे उतरते हुए हम गैरीबास में गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन के छोटे से यात्री निवास में एक और साहसी नौजवान महिला कनु और उनके कुत्ते पीपी से मिलते हैं। कनु जंगल के बीचों-बीच अकेली एक सहायक के साथ उस रेस्ट हाउस को चलती हैं जहाँ ट्रांजिस्टर रेडियो पर हर वक्त ऊंची आवाज़ में नेपाली गाने बजते रहते हैं।

काली पोखरी से संदकफू शिखर पहुँचने के दो रास्ते हैं। एक रास्ता नेपाल से और दूसरा कुछ आगे जाकर भारत की ओर से ऊपर जाता है। पश्चिम बंगाल का सबसे ऊंचा शिखर संदकफू दोनों देशों की सीमा पर इस कदर खड़ा है कि उसे काटने वाली सड़क के एक ओर नेपाल है और दूसरी ओर हिंदुस्तान।

नेपाल के रास्ते से जीप में उस अत्यंत मुश्किल चढ़ाई को तय करते हुए हमें ताज्जुब था कि वह भयावह सड़क ठीक क्यों नहीं हो सकती। कुछ फासले पर ही हमारी आँखों के सामने दो नौजवानों की मोटरसाइकिलें दम तोड़ चुकी थी। लेकिन जान हथेली पर रखकर भी हम आखिरकार दिलीप की लैंड रोवर में सही सलामत और साबुत संदकफू पहुँच गए। संदकफू से भी कंचनजंघा की वही सोये हुए बुद्ध वाली बर्फीली पर्वतमाला कुछ और नज़दीक से देखी जा सकती है। लेकिन एक बड़ा फर्क यह है कि इस नज़ारे में यहाँ एवरेस्ट का शिखर भी शामिल हो जाता है। यहाँ से 21 किलोमीटर आगे एक अन्य शिखर फालुत है, जिसकी ऊँचाई संदकफू से कुछ ही कम है और जो एक तरह से पश्चिम बंगाल की उत्तरी सीमा का आख़िरी पड़ाव है।

बंगाल का संदकफू नेपाल की सीमा में संदकपुर हो जाता है। यही शायद इसका शुद्ध नाम भी है। हमारा होटल सड़क के उस ओर नेपाल में था। बच्चों के किसी खेल की तरह सुबह की सैर के लिए हम भारत आते हैं, फिर नाश्ते के लिए वापस नेपाल लौट जाते हैं। यहाँ भी बिजली नहीं हैं और पानी भी नीचे से टैंकरों में आता है। होटल की बूढ़ी मालकिन कमला छेत्री अपने तीन बौद्ध सहायकों के साथ यहाँ मेहमानों की देखभाल करती हैं। तीन वर्ष पहले उनके दिवंगत पति को कैंसर हो गया था तो वे उसे इलाज के लिए तमिलनाडु में वेलोर तक गयी थी। वहाँ के डॉक्टरों पर उनका असीम विश्वास है और अपनी आँखों के इलाज के लिए भी वे वहीं जाना चाहती हैं। क्या नेपाल और बंगाल में अस्पताल नहीं हैं? वे एक गहरी सांस लेकर कहती हैं कि नहीं, पहाड़ों में बस यही एक कमी है। यहाँ वैसे तो लोग बीमार नहीं पड़ते, लेकिन कभी कुछ हो जाए तो….

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भारत के रास्ते नीचे उतरते हुए हम गैरीबास में गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन के छोटे से यात्री निवास में एक और साहसी नौजवान महिला कनु और उनके कुत्ते पीपी से मिलते हैं। कनु जंगल के बीचों-बीच अकेली एक सहायक के साथ उस रेस्ट हाउस को चलती हैं जहाँ ट्रांजिस्टर रेडियो पर हर वक्त ऊंची आवाज़ में नेपाली गाने बजते रहते हैं। संगीत के बीच ही वह मेहमानों को खाना खिलाती है, उनकी गंदी चादरों को बाहर धूप में टांगती है,बाथरूम धोती है और छः किलोमीटर दूर बाज़ार से राशन लाने के लिए पैदल जाती है। उसे अकेले वहाँ डर नहीं लगता? नहीं, वह मुस्कराती है… डर किस बात का ? यह जंगल उसका अपना घर है। यहाँ के जानवर तक उसे पहचानते हैं।

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शेडिंग शेरपा, दिलीप की 1946 की लैंड रोवर, कमला छेत्री, कनु और उनके झक्क सफ़ेद कुत्ते पीपी से विदा लेते हुए हम फिर से अपने कहीं अधिक खूंखार शहरी जंगल में वापस लौट आते हैं जहां कभी गोरखालैंड तो कभी बोडोलैंड के नाम पर नयी राजनीतिक सीमाएं खींची जा रही होती हैं, जहाँ मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री चंद वोटों के लिए बेहिचक जघन्य झूठ बोलते दिखते हैं और जहाँ  गरीब मुसलमान घुमंतू चरवाहों को सबक सिखाने के लिए एक अबोध बच्ची के साथ मंदिर में अकल्पनीय कुकर्म करने वालों के बचाव में लोग तिरंगा लेकर सड़कों पर उतर आते हैं।

जितेन्द्र भाटिया सुप्रसिद्ध कहानीकार,नाटककार और पर्यावरणविद हैं

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